ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Friday, June 10, 2016

कलाएँ अंतरात्मा की रूप विधान की सृष्टि

अयोध्या पहले भी जाना हुआ है, पर  इस बार राष्ट्रीय कला शिविर में बहुत कुछ नए अनुभव जुड़े। देशभर के कलाकारों के साथ बतियाया, मित्र अवधेश मिश्र के संयोजन में शिविर में कलाकृतियों पर वृहद विमर्श भी हुआ. एक रोज़ दैनिक जागरण ने अपने संवाददाता को कलाओं पर संवाद करने के लिए भेजा। सुखद लगा, किसी अखबार को कलाओं पर पाठकों को देने की सूझ है, अन्यथा पत्र-पत्रिकाओं से कला-संस्कृति का स्थान तो  धीरे धीरे लोप हो रहा है... 
जागरण ने  इंटरव्यू किया, और कलाओं की दी मेरी संज्ञा "कलाएँ अंतरात्मा की रूप विधान की सृष्टि" को ही हेडिंग दिया। सुखद लगा. आप भी आस्वाद करें-

Sunday, March 22, 2015

‘पुस्तक वार्ता’ में ‘सुर जो सजे’

नेशनल बुक ट्रस्ट , नई दिल्ली की और से प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘सुर जो सजे’ की समीक्षा महत्मा गांंधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘पुस्तक वार्ता’में ख्यात आलोचक, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपमजी ने की है। उनका आभार! आप भी करें आस्वाद ...




... ‘सुर जो सजे’ हिन्दी सिनेमा संगीत के इतिहास के संवेदनशील पक्षों को पूरी आत्मीयता से उद्घाटित करती है। कह सकते हैं यह छोटी सी पुस्तक एक झरोखा है जिसके माध्यम से हम सिनेमा संगीत ही नहीं भारत की सांस्कृतिक परम्परा को एक नए नजरिए से देख सकते हैं।...
                                                                                                                          -- विनोद अनुपम 
                                                                                                                            ‘पुस्तक वार्ता’





Saturday, March 21, 2015

सुर जो सजे

दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका "अहा! जिंदगी" के मार्च अंक में "सुर जो सजे" पर ...




Sunday, August 3, 2014


डा दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सुधि आलोचक हैं। इस समय 'राजस्‍थान सम्राट' पत्रिका में पुस्‍तकों की समीक्षा का स्‍तम्‍भ लिखते हैं। "रंग नाद" की उन्‍होंने इसमें समीक्षा की है, आस्‍वाद करें




Friday, May 9, 2014

"रंगनाद" की समीक्षा "कला दीर्घा" में

संगीत, नृत्य, चित्रकला एवं छायांकन पर आलोचनात्मक निबंधों की पुस्तक "रंगनाद" की समीक्षा लखनऊ से प्रकाशित दृशय कलाओं की पत्रिका "कला दीर्घा" में संपादक, कलाकार डॉ अवधेश मिश्र ने की है. आप भी आस्वाद करें-


सुर जो सजे

"मुम्‍बई में बांद्रा में बने उनके घर का नाम भी उनकी बेटी 'बोस्‍की' के नाम पर ही है। इन पंक्तियों का लेखक जब गुलजार के घर 'बोस्कियाना' में प्रवेश करता है तो सबसे पहले ड्राइंग रूम की दीवार पर लगा छोटी सी मासूम बच्‍ची का पोष्‍टर स्‍वागत करते मिलता है। पूछने पर पता चलता है, यह उनकी बेटी 'बोस्‍की' के बचपन का फोटो है। गुलजार से उनके घर पर बात होती है..." 
शीघ्र आ रही पुस्‍तक 'सुर जो सजे' में गुलजार से संवाद-संस्‍मरण का अंश।






"अनिल विश्‍वास ने कहा, 'तुम गाते भी हो?' 
जवाब में तलत ने गीत गाकर उन्‍हें सुनाया। उनकी आवाज का कंपन और मखमली अहसास उन्‍हें इस कदर भाया कि बाकायदा उनके लिए उन्‍होंने एक गीत की धुन कंपोज की। तलत महमूद आए तो उन्‍हें गीत गाने को कहा। तलत संभलकर गीत गाने लगे। अनिल दा ने बीच में ही टोका, 'भाई तु कौन है?'
तलत चौंक कर बोले, 'क्‍यों दादा गलती हो गई?"
गलती! अरे वह तलत महमूद किधर है जिसे मैंने कल सुना था..."


अनिल विश्‍वास ने यह वाकया सुनाने के साथ फिल्‍म संगीत से जुडे ऐसे ही और भी किस्‍से सुनाए थे। गीत लेखन, गायन, धुन निर्माण आदि के अर्न्‍तनिहित बहुत सा फिल्‍म पत्रकारिता के दौरान शायद इसीलिए संजो पाया कि जुनून की हद तक तब फिल्‍म संगीत से लगाव था। लगाव आज भी है पर अब वह बात कहां हां शीघ्र आ रही 'सुर जो सजे' पुस्‍तक में ऐसी ही बहुतेरी यादों का वातायन आपके लिए भी खुलेगा ही...