ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, October 23, 2010

पेरियार में वन्यजीव निहार

यात्रा वृतान्त
         - डॉ. राजेश कुमार व्यास-
घन जंगल की गंध उसकी सुवास मन को सदा ही भाती रही है। जंगल की निरवता ही तो ऐसी होती है जिसमें पक्षियों का कलरव शोर नहीं करता बल्कि उसका अंग बन मन को भाता है।...मुझे लगता है घने जंगल में उन्मुक्त पक्षियों, वन्यजीवों का बसेरा इसीलिए भी आकर्षित करता है कि हमें वैसी उन्मुक्तता नहीं है।...सुविधाओं के अनगिनत बंधनों से मन इस कदर जकड़ा है कि चाहकर भी उन्मुक्त नहीं हो सकता। वह उड़ना चाहता है, पक्षी की तरह। खुले निर्भीक विचरना चाहता है भांत भांत के वन्यजीवों की तरह।... परन्तु विचर नहीं सकता। पक्षी की तरह उड़ने के लिए मनुष्य के पास पंख कहां से आए! वह तो सोच से आए। उड़ने की सोच कहां से आए! वह तो बंधी है सुविधाओं की बेड़ियों से, जो मिला हुआ है उससे अधिक और अधिक पाने की होड़ से।...पंख हल्के होते हैं। जितने हल्के, उतने ही ताकतवर। ऊंची उड़ान को संभव बनाते। हम हैं जो सुविधाओं के भार से और भारी हुए जाते हैं। भारी से भी भारी होना जो चाहते हैं। जीवन की यह अनंत इच्छाएं हमें क्या हमसे ही निरंतर दूर और दूर नहीं ले जा रही!

सड़क के दोनों और घने जंगल के रास्ते से गुजरकर केरल में पेरियार अभयारण्य जब पहुंचे तो यही सब कुछ मन में चल रहा था। पेरियार झील से जंगली जानवरों, खासकर हाथियों और दूसरे वन्यजीवों, पक्षियों के विचरण के निहार का सोच कर ही मैं रोमांचित था।

'रात पेरियार ही रूकेंगे ना सर।' टैक्सी ड्राइवर ने जब पूछा तो मैं विचारों के बियाबान से जैसे बाहर निकला।...उसे रात्रि वहीं रूकने का जवाब देते हुए फिर से मैं दूर तक हरे-भरे मखमली कालीन की तरह फैले चाय बागानों और सड़क के दोनों ओर प्रकृति के सौन्दर्य को निहारने लगा था। हम थेकड़ी के निकट विश्‍व प्रसिद्ध पेरियार राष्ट्रीय उद्यान पहुंच चुके थे। थेकड़ी के पास यह केरल का पश्चिमी घाट है। हरे-भरे वृक्षों का घनापन यहां इतना है कि गाड़ी से बाहर ऐसा लगता है मानों हम घने जंगल में सैर कर रहे है।...पेरियार राष्ट्रीय उद्यान। ‘पेरियार शब्द बहुत जाना-पहचाना क्यूं लग रहा है! केवल राष्ट्रीय उद्यान से ही इसकी याद नहीं जुड़ी।

मस्तिष्क पर जोर देता हूं। किसी ओर के बारे में भी कहीं पढ़ा है-पेरियार। गाड़ी की गति के साथ दिमाग के घोड़े भी तेजी से दौड़ रहे हैं। पेरियार। पेरियार। पेरियार।...याद आया। उत्तरप्रदेश विधानसभा में कुछ समय पूर्व तमिलनाडू में द्रविड़ आंदोलन की शुरूआत करने वाले जिन नास्तिक और बुद्धिवादी नेता ईवी रामास्वामी की किताब रामायण को प्रतिबंधित करने के लिए हंगामा मचा था, उन्हें कभी अपने राज्य में द्रविड़ आंदोलन की शुरूआत करने के कारण सम्मानवश ‘पेरियार कहा जाने लगा था। ईवी रामास्वामी यानी पेरियार। पेरियार यानी बड़ा। महत्वपूर्ण। गाड़ी में उनके बारे में पढ़ी बहुत सारी बातें कौंध रही है। ये वही पेरियार हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय नारे का सबसे पहले राजनीतिक फायदा उठाया। रामास्वामी ने ही जस्टिस पार्टी को स्थानीय रंगत देते उसका नाम बदलकर द्रविदर कझगम रखते इसके जरिए सामाजिक न्याय का नारा बुलंद किया। उन्होंने रामायण पर एक किताब लिखी जिसमें राम और रामायण की अलग ही व्याख्या करते रामायण के खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बताया। ईवी रामास्वामी के लिए आर्य और ब्राह्मण विरोध एक ही था। कभी ईवीआर समर्थकों ने देश में गणेश की मूर्तियां तोड़ी और रामायण की प्रतियां जलाई। ईवी रामास्वामी की जिस रामायण को प्रतिबंधित करने की मांग पर उत्तरप्रदेश विधानसभा में हंगामा मचा वह आज से कोई साठेक वर्ष पहले आयी थी और तब के पेरियार यानी ईवी रामास्वामी की भी दिसम्बर 1973 में 95 साल की उम्र में मृत्यु हो गयी थी। सैंतीस वर्ष पहले जिस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी, उसके लिखे पर बवाल मचने से एक बार फिर समाचार पत्रों में वह सुर्खियां बन गए।

सोचता हूं भारत भी तो पेरियार है। यही वह बड़ा देश है जहां धर्म, जाति विशेष की भावनाओं पर चोट करने वाली रचनाओं को राजनैतिक पार्टियां अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते कभी नहीं झिझकती। मुझे क्या! कहां पेरियार के चक्कर में राजनीति में उलझ गया।... गाड़ी के ब्रेक तेजी से लगे हैं। एक तगड़ा झटका अंदर तक मन को झकझोर देता है...कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी! सामने से तेजी से आ रही टाटा सुमो से हमारी टाटा सियेरा टकराते-टकराते बची। ड्राइवर जल्दी से गाड़ी को टर्न देकर ब्रेक नहीं लगाता तो!....सोचकर ही अंदर से सिहर जाते हैं।

पेरियार राष्ट्रीय उद्यान करीबन 700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। पेरियार यूं बांध सुरक्षा अभ्यारण्यों में से एक है परन्तु यह विषेष रूप से बहुतायत से पाए जाने वाले यहां के हाथियों के कारण अधिक जाना जाता है।...झील क्षेत्र के पास केरल टूरिज्म विभाग का छोटा सा एक भवन या यूं कहे कि हट बनी हुई है। यहां से टिकट प्राप्त करके ही पेरियार अभ्यारण्य में प्रवेश पाया जा सकता है।...हम प्रवेश शुल्क देकर झील क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।...दूर तक फैली बेहद सुन्दर पेरियार झील में नौकायन करते वन्य जीवों की क्रिडाएं करीब से देखते मन जंगल में ही जैसे रच-बस रहा है। घने जंगल को कभी यूं नौका से निहारने का यह पहला अनुभव है। झील में चलते कुछ देर बार नौका से देखा तो दूर तक जंगल ही जंगल। कहीं कोई छोर नहीं। घना जंगल। पक्षियों, वन्यजीवों से आबाद जंगल। उनकी उन्मुक्त क्रिडाओं का जंगल।

...अरे! हाथी के छोटे छोटे बच्चे पानी में अठखेलियां कर रहे हैं। उनका यूं भयमुक्त एक दूसरे पर सूंड से पानी फेंकने का दृश्य देखने से मन नहीं भरता। जंगली भैंसों, सांभर, हिरणों के झुण्ड और ऐसे ही दूसरे बहुत से वन्य जीवों को स्वच्छन्द विचरते, कभी पानी पीते और कभी एक दूसरे के साथ अठखेलियां करते यूं नजदीके से देखते लगता है जंगल की अपनी दुनिया है। इस दुनिया में मानव दखल आखिर हो ही क्यों...कैमरे से जंगल के बहुत से पहले कभी न देखे पौधे, दृश्य कैद करता मन इसी बात में उलझा हुआ है कि जंगल के इस नैसर्गिक सौन्दर्य को क्या हम धीरे-धीरे लील नहीं रहे, इस जंगल से ही तो हमारा अस्तित्व है, क्या इसे काटकर हम अपने ही अस्तित्व को नहीं मिटा रहे हैं....अभी यह सब सोच ही रहा हूं कि बहुत से पक्षियो का झुण्ड कलरव करते पेड़ों पर आकर बैठ गया।...कलकल बहती झील से उनको सुमधुर कलरव में सुनना मन को अजीब सा सुकून देता है। मन करता है, सुनता रहूं। सुनता ही रहूं। पर भला यह क्या संभव है!

...प्रकृति के जीवंत नजारे। सौन्दर्य में लिपटी झील। जंगल की सुमधुर स्वांस। कहते हैं, यहां उड़ने वाली गिलहरियां और उड़ने वाले सांप भी हैं। पर सुना भर है। देखने की जिज्ञासा का शमन नहीं हुआ। जब तक आंखों से न देखें कैसे सच मानें! हां, पक्षियों की विविधता इतनी है कि उनके बारे में भेद नहीं किया जा सकता। प्रकृति की गोद में जंगली जानवर और पक्षियों को यूं देख जैसे अपने आपको भुल गया हूं।....साथी मित्र सुनील, दयाराम और शुक्लाजी की उपस्थिति को ही भुल गया हूं। उनके द्वारा किसी बात के लिए झिंझोड़ने पर प्रकृति में खोने की तंद्रा भंग होती है।....

नौका में पानी से वन्यजीवों को देखते समय का पता ही नहीं चला। अंधेरा छा रहा है।...झील के किनारे जब नौका से उतरते हैं तो इक्का-दुक्का पर्यटक ही नजर आते हैं। हम ही हैं जो सबसे बाद में अभ्यारण्य से लौट रहे हैं।

Sunday, October 3, 2010

नेशनल आर्ट वीक

ललित कला अकादेमी, नई दिल्ली और ललित कला अकादेमी, चंडीगढ़ द्वारा पिछले दिनों चंडीगढ़ में नेशनल आर्ट वीक के अंतर्गत "न्यू मीडिया ऑफ़ आर्ट" पर राष्ट्रीय स्तर पर गहन विमर्श हुआ. खाकसार भी विमर्श में मोजूद था. न्यू मीडिया पर संभवत देश में यह पहला आयोजन था.
चंडीगढ़ से लौट कर राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के  अपने प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" में इस पर जो लिखा, आप  भी करें उसका आस्वाद-