ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Friday, May 9, 2014

सुर जो सजे

"मुम्‍बई में बांद्रा में बने उनके घर का नाम भी उनकी बेटी 'बोस्‍की' के नाम पर ही है। इन पंक्तियों का लेखक जब गुलजार के घर 'बोस्कियाना' में प्रवेश करता है तो सबसे पहले ड्राइंग रूम की दीवार पर लगा छोटी सी मासूम बच्‍ची का पोष्‍टर स्‍वागत करते मिलता है। पूछने पर पता चलता है, यह उनकी बेटी 'बोस्‍की' के बचपन का फोटो है। गुलजार से उनके घर पर बात होती है..." 
शीघ्र आ रही पुस्‍तक 'सुर जो सजे' में गुलजार से संवाद-संस्‍मरण का अंश।






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