ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, August 3, 2014


डा दुर्गाप्रसाद अग्रवाल सुधि आलोचक हैं। इस समय 'राजस्‍थान सम्राट' पत्रिका में पुस्‍तकों की समीक्षा का स्‍तम्‍भ लिखते हैं। "रंग नाद" की उन्‍होंने इसमें समीक्षा की है, आस्‍वाद करें