बड़े गुलाम अली ख़ान को सुनना जीवन धन सहेजना है। जीवनानुभूतियों की भांत भांत की छटाओं की गागर छलकते हुए पाना है। आवाज का उनका लचीलापन, अप्रत्याशित स्वर-संयोजन और तानों की अविश्वसनीय गति विरल है। राग मालकौंस , दरबारी कान्हड़ा, मालुहा केदार, राग खाट, बागेश्री, शुद्ध कल्याण, हंसध्वनि में समय को जैसे वह गान में रूपान्तरित करते हैं। वह दृश्य छटाओं का मनोरम रचते हैं। औचक। बार—बार।
सुनेंगे तो मिलन की उमंग, उत्साह, विरह की उदासी अनुभूत होगी तो प्रकृति की भांत—भांत की छटाओं को मन में जीवंत होता पाएंगे। स्वरों का माधुर्य ऐसा कि उसमें खिलती धूप, बादलों की छा रही घटाओं, फूलों के खिलने, सांझ घिरने, बादलों के बरसने आदि को देख—सुन और गुन सकते हैं। राग को, आलाप को घंटों तक खींचने की बजाय वह दोहराव से बचते संक्षिप्त प्रस्तुति में उसे सजाते और संवारते थे। और हां, ठुमरी की कालजयी दृष्टिं को समझना हो तो सुनें उनके स्वर—उजास में "का करूं सजनी आये न बालम" के बोल। लगेगा बिछोह की व्यथा जैसे अंतर्मन अनुभूति बन गई है। उनकी गाई यही नहीं, "प्रेम जोगन बन के","नैना मोरे तरस गए" जैसी ठुमरियां भी अंतर्मन संवेदनाओं का सागर है। वहां मनुहार है, अंतर की पुकार है और है विरह की व्यथा में गुंथा स्वर—उजास। ठुमरी से ध्रुपद अंग तक उनकी गायकी कहन का अपना 'सब रंग' अंदाज है। माने उसमें सभी रंग घुले होते हैं। सबरंग नाम से ख्याल और ठुमरी की विरल रचनाएं भी तो उन्होंने हमें दी है।मुझे लगता है, लोक संगीत की स्वच्छंद मिठास को उन्होंने शास्त्रीय संगीत के सुरों में, राग—नियमों के माधुर्य में पिरोया। उनके गान में सहजता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। हृदय को स्पर्श करता हुआ। सुनेंगे तो मन स्वरों की अतृप्त प्यास से भर उठेगा । बड़े गुलाम अली फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। पर, साठ के दशक में 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने गाया। कहते हैं, फिल्म के एक दृश्य में तानसेन को गाते हुए दिखाना था। नौशाद चाहते थे, बड़े गुलाम अली खान साहब उसे गाए। के. आसिफ आग्रह लेकर उनके पास पहुंचे तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। पर जब देखा कि वह नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने मेहनताने के 25 हजार रूपये मांग लिए। यह वह समय था जब लता मंगेशकर को भी गाने के पांच सौ रूपये से अधिक नहीं मिलते थे। बड़े गुलाम अली खान को लगा इससे फिल्म में गवाने का पीछा छूट जाएगा पर आसिफ ने स्वीकार कर लिया। उनके पास न गाने की अब कोई वजह नहीं थी। उन्होंने राग सोहनी और रागेश्वरी में 'मुगल-ए-आजम' में गाया। फिल्म जगत का ही नहीं यह शास्त्रीय संगीत की साधना का भी जीवंत इतिहास है।
सभी जानते हैं, यह वही बड़े गुलाम अली खान है जिन्होंने कभी लता मंगेशकर के बारे में कहा था, "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती।" लता के गायन की मिठास को बंया करने का यह उनका अपना अंदाज था। ठीक वैसे ही जैसे कभी उन्होंने 'हरिओम तत्सत' भजन को गाते हुए किसी तपस्वी की भांति स्वर—साधना की। गान में अर्चना का यह जीवंत इतिहास है। वह ऐसे ही थे। सुरमंडल संग अपनी खुद की ईजाद पटियाला-कसूर शैली में राग जयजयवंती,जौनपुरी, हमीर आदि मे जो भी गाते लगता है, भाव—भाव में रस छलक—छलक अंतर्मन के किसी कोने में छाई रिक्तताओं को भरता है।
लाहौर के निकट कसूर नामक स्थान पर पाकिस्तान में वह जन्मे। पिता अली बख्श खां कश्मीर के महाराजा के दरबारी गायक थे। चाचा काले खां से संगीत सीखने के बाद उन्होंने संगीत सफर की सारंगी वादक के रूप में शुरूआत की। पर, कोलकाता संगीत सम्मेलन में 1938 में उन्होंने जब सार्वजनिक प्रस्तुति दी तो उनकी सुरीली आवाज ने सुनने वालों के मन जीत लिए। मखमली, मन को भाने वाली मिठी आवाज में उन्होंने बाद में खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का घोल कर अपनी स्वयं की गायन—शैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें जीवन—रस घुला था।
बड़े गुलाम अली खान संगीत को ओढ़ते—बिछाते थे। कभी उनका गंभीर ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने पूर्ण विश्राम के लिए कहा। पर, 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने तीन सप्तकों तक फैली एक तान गा दी। टोका गया तो बोले, “संगीत बिना मेरे जीवन का क्या अर्थ? देखना चाहता था कि मेरी आवाज पर तो ऑपरेशन का कोई असर नहीं पड़ा।“ महाराष्ट्र सरकार ने 1967 में नृत्य महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया। रोशनी केवल उन पर थी। बाकी बत्तियाँ बुझी हुई थी। उन्होंने कहा, 'नहीं गा सकता। अंधेरे में किसी को देख ही नहीं पा रहा। मुझे अपने प्रिय श्रोताओं के दर्शन होंगे तभी गा सकता हूँ?' बत्तियां जला दी गईं। श्रोताओं की भीड़ की झलक पाते ही, राग छाया में “जो करे राम कृपा” गाते हुए वह खिल उठे थे। वह और उनका गान ऐसे ही सदा मन को मोहता था। इसीलिए कहूं, वह मन—मोहक हैं। उस्तादों के उस्ताद। जग गायक!




















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