ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Monday, June 8, 2026

संस्कृति की जीवंत दृष्टि के चितेरे

 कुबेर नाथ राय अकेले ललित निबंधकार हैं जिन्होंने दर्शन और कलाओं की अपने लिखे में संधि की है। भारतीयता को वह किसी अवधारणा में नहीं बल्कि जीवंत दृष्टि से अभिहित करते हैं। शास्त्र, लोक, मिथक, प्रकृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय उनके लिखे में है। संगीतमय और चित्रात्मक भाषा की उनकी लेखनदृष्टि में पत्तियों के झरने में धरती के सौंदर्य की करुणम अवस्था को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, वह हमारी  संस्कृति के अद्भुत आख्याता और विरल व्याख्याता हैं। उन्हें पढ़ना शब्द, भाव और जीवनगत सौंदर्य से साक्षात् होना है।

कुबेर नाथ राय शब्द के भीतर बसे शब्द का अर्थान्वेषण कर उनका मर्म छुआने वाले रससिद्ध ललित निबंधकार हैं। उनके ललित निबंध वेद, उपनिषद्, पुराण, मिथकों और लोक में रचेबसे मन के अनछुए संदर्भ उद्घाटित करते हैं।  मुझे यह भी लगता है, ललित निबंध की भारतीय परंपरा को उन्होंने ही सांस्कृतिक, दार्शनिक और सौंदर्यबोधी अन्वेषण में नये आयाम दिए। वह अनूठे शब्द-द्रष्टा हैं। इसलिए कि वहां ठौर-ठौर जीवन की सुगंध समाई है।  मराल, ’प्रिया निलकंठी, ’रस-आखेटक, ’रामायण महातीर्थतम्, ’निषाद बांसुरी, ’गंधमादन, ’विषाद योगआदि ललित निबंध संग्रहों के उनके शीर्षकों पर ही जाएंगे तो पाएंगे वहां अर्थ के अनूठे गवाक्ष खुलते हैं। भाषा के सहज प्रवाह संग कहन की उनकी मौलिक दृष्टि इसलिए भी लुभाती है कि वहां पर शब्द-शब्द भावनाओं का रस छलकता है। लोक के आलोक में मनोविज्ञान से जुड़ी उनकी दृष्टि में परम्परा और अतीत ही नहीं झिलमिलाता है, आधुनिकता बोध का सातत्य है।

कुबेरनाथ राय ने  होमर, वर्जिल और शेक्सपीयर को भी अपने लिखे में गहरे जिया है, पर वहां भाषा और भावभंगिमा में देशी भारतीय संस्कारों की सुगंध घुली है। उनके ही शब्दों में कहूं तो हिन्दुस्तानी मन को उन्होंने अपने लिखे मेंविश्व चित्तसे जोड़ पाठकों की मानसिक ऋद्धि की है।

अमर उजाला, 7 जून 2026

कभी उनके एक ललित निबंधतिष्य नक्षत्र, कवि भिक्षु और महापृथिवीको पढ़कर उनसे अनुराग हुआ था। शब्द-शब्द अर्थ की विरल छटाओं को बरसाते उनके इस ललित निबंध में  ’तिष्य, ’पुष्य, शब्दों के विरल अर्थसंदर्भ हैं। अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता का इसमें मार्मिक उल्लेख है। बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा के साथ ही सम्राट अशोक बूढ़ा हो चला था। तिष्यरक्षिता के आंगंन में ही बोधिद्रुम की स्थापना हुई। इसी समय में तिष्यरक्षिता ने अपनी काम-पिपासा सम्राट के पुत्र कुणाल से बुझानी चाही। सम्राट पुत्र कुणाल के अस्वीकार करने पर उसकी आंखे ही निकलवा ली। कुबेरनाथ राय ने इस निबंध में अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा उकेरे एक चित्र का उल्लेख किया है। इस चित्र में बोधिवृक्ष की छिन्न-भिन्न उखाड़ी गई एक शाखा है जिसकी ओर बड़ी उपेक्षा और अहंकार भाव से तिष्यरक्षिता देख रही है। उसके अपेक्षाकृत बड़े आकार के स्तनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ईषत् लटके हुए पूर्ण विकसित स्तनों को मातृकाओं से जोड़ते उसके मां बनने की चाह की विरल व्यंजना की है।  परम्पराओं में समाई दृष्टि से विपरीत उन्होंने अपने इस ललित निबंध में स्थापित किया है कि संभव है, तिष्यरक्षिता के क्रोध का कारण काम तृषा नहीं, मातृत्व तृषा है।

कुबेरनाथ राय के समग्र लिखे में इसी तरह की मौलिक चिंतन-दृष्टि का विस्तार है। मुझे यह भी लगता है, भारतीय दर्शन ही नहीं साहित्य,  धर्म, अध्यात्म और लोक जीवन के अब तक लिखे में छूटे हुए सुंदर्भों से वह हमारा नाता कराते हैं। वह मन को मायावी नट कहते हैं। लिखते हैं, हम देखने कुछ जाते हैं और उसके बहाने बहुत सारा और देखने लग जाते हैं। असल में कुबेरनाथ राय का समग्र लेखन भी इस आलोक में दृश्यभाषा में हमारी संस्कृति का गहन अन्वेषण करता पाठक के बौद्धिक क्षितिज का विस्तार करता है।

अपने एक ललित निबंध में वह लिखते हैं, भारतीय आर्यनव्य आर्यहैं। इसकी संरचना इतिहास विधाता ने आर्य-द्राविड़-निषाद-किरात, इन चार संयुक्त तत्त्वों से की है। वह भारतीय संस्कृति के तीन प्रमुख आधार वैदिक, तांत्रिक और लोकायत में ले जाते हुए पाठकों को कामधेनु, देवी, नटराज, शेषशायी, यक्ष, श्रीदेवता आदि बहुत से हमारे प्रतीक और बिम्बों की मूल्यपरक और ऐतिहासिक दृष्टि का नया चिंतन हमें देते है। वह लिखते हैं, पूर्ण भारतीय बनने का अर्थ हैरामजैसा बनना।

मुझे लगता है भाषा और कहन की सर्वथा भिन्न भंगिमा के लालित्य में कुबेरनाथ राय शब्द की संस्कृति में आस्था जगाने वाले अनुपम द्रष्टा हैं। इसलिए कि वह भाषा को उसकी मूल संस्कृति से जुड़ी गहराई में परिभाषित करते हैं। इसलिए भी कि अपने लिखे में वह स्थापित करते हैं कि भाषा और शब्दों के प्रयोग को सतही या कामचलाऊ दृष्टि से नहीं ग्रहण करना चाहिए। वह लिखते हैं, 'शब्दों के भूल जाने का अर्थ होता है संस्कारों को भूल जाना।' वह ऐसी हिंदी के हिमायती रहे हैं जिसे समग्र भारतवर्ष समझे और इसका महाकोश लोकभाषा, प्रांतीय भाषा और संस्कृत के सहयोग से विस्तृत हो। यह भी कि भारत से जुड़ने का अर्थ है-शिवत्व, बुद्धत्व, रामत्व के आलोक में मनुष्य, पृथ्वी और ईश्वर से जुड़ना।

कुबेरनाथ राय का लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां पर अपने आपको स्थापित करने का कोई आग्रह नहीं है। लोक और शास्त्र के साथ बौद्धिक स्तर पर छुटे हुए संदर्भों की सर्वथा नई जमीन कुबेरनाथ राय ने  तैयार की है। उनके बरते शब्द अपनी लय में और अर्थगर्भित संदर्भों में चमत्कृत करने वाले हैं। भाषा की अनूठी लय वहां है। अपने एक ललित निबंध संग्रह की भूमिका में उन्होंने लिखा है, मेरा लिखा चन्दन काष्ठ है। लिखे के इस मर्म में जाएंगे तो यह भी लगेगा चन्दन को घिसते हैं तभी सुगंध मिलती है।  सुगंध पाने के लिए ठहरकर, धीरज के साथ पढ़ना होगा। पढेंगे तो उस समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी जीवनपर्यन्त हम उसकी खुशबू से महकते रहेंगे।

Saturday, May 30, 2026

नाट्यशास्त्र में संगीत

पत्रिका, 30 मई 2026
नाट्यशास्त्र लोकमन की सांगीतिक व्यंजना है। संगीत में  जो अनुभूत होता है, उसकी व्याख्या कहीं है तो वह इसी ग्रंथ में है। इसमें एक स्थान पर आया है, संगीत नाट्य का पोषक है। अभिनव गुप्त ने इसके लिए जो सुंदर शब्द दिया है, वह है'उपरंजन।' कहा गया है, संगीत नाट्य का उपरंजन करता है। नाट्यशास्त्र कहता है, गीत, नृत्य और वाद्य के रंग का यह उपरंजन करता है। माने उन्हें गाढ़ा करता है। रंजन में केवल राग बजता है, पर उपरंजन राग का ध्यान कराता है। हम कुछ सुनते हैं और उसमें निहित रस से ओतप्रोत हो जाते हैं। संगीत और नृत्य की भारतीय परम्परा में तबला और पखावज वादक बीचबीच में पढंत करते हैं। वह जो बजाते हैं, उनसे जुड़े अक्षरों को पढ़ते हैं। कथक की तो पूरी परम्परा इसी का आलोक है। यह परम्परा कहां से आई? नाट्यशास्त्र से ही तो!

नाट्यशास्त्र के 34 वें अध्याय में अवनद्य वाद्यों की ध्वनियों के सूत्र हैं। किस स्थान पर कौनसी थाप होगी, पूरा हाथ या कि उंगली का कौनसा हिस्सा प्रहार करेगाइसकी पूरी तकनीक है। तबले, पखावज, मृदंग आदि के किस स्थान पर और उंगली का भी आगे का हिस्सा जिसे चांटी कहते हैं, वह या पूरा हाथ या हाथ के किनारे का हिस्सा कहां लगेगा, यह सब नाट्यशास्त्र में आया है। हाथ के हिस्से का प्रहार चमड़े से मढ़े वाद्य के किस भाग पर कितनी मात्रा में होगा, इसकी कोड भाषा  माने पाटाक्षर की विधि नाट्यशास्त्र ने ही दी है। असल में तो नाट्यशास्त्र में संगीत के स्वरों की कोई व्याख्या नहीं है। इतना ही कहा है कि सप्त स्वर हैंषडज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। मतंग ने अपने ग्रंथ 'बृहद्देशी'  में हमारे यहां पहलेपहल 'राग' की अवधारणा दी। इसमें संगीत स्वरों की व्यवस्थित व्याख्या है। अभिनव गुप्त ने नाट्यशास्त्र की जो टीका की है, उसमें कहा है कि गीत, वाद्य और नृत्य किसी के अधीन नहीं है। 'स्वयं प्रतिष्ठित' हैं। उनमें निहित रस वाच्य नहीं है।

संगीत बजता है तो उसमें शब्द तीन तरह से काम करते हैंवचन, रंजन और व्यंजन का। वचन वह जो सीधेसीधे कहा जाए। माने बंदिश का कोई बोल, 'श्याम तुम जाओ।'  इसके बाद आता हैरंजन। माने नाद का कोई अंश। लय में काव्यपाठ। कहने का मोहक अंदाज। और इसके बाद आता है, व्यंजन। यही सबसे महत्वपूर्ण है। कुछ कहना नहीं, पर अर्थ का बोध करा देना। संगीत में कुछ इस तरह से स्वरों का लगाव कि रसप्रवाहित हो जाए। भाव में हम बह जाएं।

कालिदास को याद करें। 'कुमार संभव' में नारद पार्वती के भावी पति के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। पार्वती के पिता बैठे सुन रहे हैं। पार्वती भी वहां है। वह लजा जाती है। पर, कालिदास यह नहीं कहते है कि उसे शर्म की अनुभूति हो रही है। लाज से  मरी जा रही है। इतना ही लिखा है कि पार्वती के हाथ में जो लीलाकमल था, वह उसकी पत्तियां गिनने लगी। हम ऐसा ही करते हैं जब उत्तेजित होते हैं या अंदर से किसी भाव से पूरी तरह से भरे होते हैं तो कुछ ऐसा करते हैं जिसका कोई अर्थ नहीं होता पर वह अपनेआप होने लगता है। संगीत की शब्दावली में यह 'अनुरणन' है। माने गूंज! कठ से स्वर निकले या फिर वाद्य से, प्रथम ध्वनि में आघात पर फिर उसकी निरंतरता। संगीत की इस साधना से ही अपूर्व रचा जाता है। हम कहते हैं, उनके गले में जवारी है। यह क्या है? यह 'अनुरणन' है। ध्वनि की वह मिठास जो सुनने के बाद अंतर में बजती रहे। गूंज के माधुर्य में रचाबसा स्वर ज्ञान ही अनुरणन है। नाट्यशास्त्र बताता है कि संगीत के स्वर बोलचाल की ध्वनियों से इसीलिए भिन्न है कि वहां शब्दों पर आश्रय नहीं है। संगीत में शब्द भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए कि वह अनुरणन प्रधान है। संगीतात्मक ध्वनियों के ऐसे ही सूक्ष्मसूत्र नाट्यशास्त्र अपने में समाए हैं।