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| पत्रिका, 18 जुलाई 2026 |
शास्त्रीय संगीत रागाधारित है। हरेक राग का अपना समय और भाव होता है। राग का एक अर्थ ही है, रंगना। राग कारण है और रस उसका परिणाम। अभिनवगुप्त ने नौ रस बताए हैं। पर, राजा भोज कहते हैं—रस केवल एक ही 'शृंगार रस' है। उनका लिखा संस्कृत ग्रंथ 'शृंगार—मंजरी कथा' रागों के कारण और उसके परिणाम की कथाएं संजोए हैं। इसमें एक प्रमुख कथा और उसकी फिर तेरह छोटी—छोटी उप—कथाएं हैं। कथा की शुरूआत राजा भोज द्वारा अपनी धारानगरी के महिमा—गान से होती है। औचक, फिर वह एक कठपुतली की ओर मुड़कर उसे बोलने का आदेश देते हैं। यांत्रिक गुड़िया भोज की महिमा का गान करती है। इसके बाद भोज अपनी प्रिय गणिका शृंगार-मंजरी और उसकी माता विषमा-शिला से कथा आगे बढ़ाते है। उपकथाओं में अलग—अलग चरित्र के पुरूषों के राग और उसके परिणामों के आलोक में गणिका की मां द्वारा पुत्री को शिक्षा दी गई है। मसलन एक कथा में स्त्री के प्रति आसक्ति को नील के रंग समान बताया गया है। जैसे नील में रंगा कपड़ा कई बार धोने के बाद भी अपना रंग नहीं खोता, वैसे ही इस चरित्र का व्यक्ति बर्बाद होने के बाद भी अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता। इसी तरह केसर में रंगे कपड़े से जुड़े मानव मन के राग, हल्दी के रंग के जल्द छूट जाने आदि के आलोक में यह कथा पुरूष चरित्रों की स्त्री आसक्ति यानी राग—अनुराग की मनोहारी व्यंजना है।
असल में राग
की अनुभूति गहन
सौंदर्य बोध से ही तो जुड़ी
है! आचार्य मम्मट रचित "काव्य प्रकाश" में रस, ध्वनि, अलंकार, और दोष का
वर्णन है। एक कविता में पर—पुरूष की प्रीति से जुड़े रस का नायिका-कथन देखें,
'वही चांदनी रात है। वही रेवा का किनारा है। वही प्रेमी भी है, पर आज वह पहले वाली
बात नहीं है। क्योंकि वह प्रेमी अब मेरा पति बन चुका है।' कहन में भाषा से जुड़ी यह
लय ही राग बोध है। संतोष चौबे का एक उपन्यास है, 'जलतरंग।' मुख्य चरित्र देवाशीष और
स्मृति के प्रेम में पगी यह मनोहारी कथा है। इसमें स्वरों में निहित भाव—रस
और वहां पहुंचने के लिए राग में डूबने के बहाने संगीत की हमारी पूरी परम्परा का रोचक
आख्यान है। रागों और उनसे जुड़े रस—रंजन की किस्सागोई यहां है तो नाद, श्रुति, स्वर,
राग, रूप, ताल, वाद्य—इतिहास के विरल संदर्भ भी है। संतोष चौबे ने उपन्यास
के पांच अध्याय संगीत की गति—मति में गूंथे हैं। यह हैं, आलाप, जोड़, विलम्बित,
द्रुत और झाला। देवाशीष के 'जलतरंग' वाद्य यंत्र सीखने से प्रारंभ होती कथा उसकी मित्र
स्मृति से हुए संवाद में आगे बढ़ती भारतीय संगीत संधान में बदलते समय में कर्कश होती
ध्वनियों में समाज के विद्रुप होते चरित्र को हमारे समक्ष रखती है। मुझे लगता है, यह
उपन्यास संगीत के जरिए समाज मे हो रहे बदलाव का कथा—रूप है।
संगीत से जुड़ा
शब्द 'विदारी' मुझे सदा लुभाता रहा है। माने स्वर और उसके गुच्छों के बीच का अंतराल।
यह 'विदारण' शब्द से बना है। यानी बीच से टुकड़े करना। स्वर—प्रवाह
के मध्य का मौन! निहित गूंज। जैसे किसी रंग के साथ दूसरे रंग की घुली छाया। स्पष्ट
दिखती नहीं पर, अंतर्मन मथती है। 'विदारी' संगीत की 'गंधमयता' है। कथा के संदर्भ में
कहें तो, वहां शब्दों के मध्य संगीत बजने, उनमें मधुर तान छीड़ने की अनुभति की अलौकिक
छटा 'विदारी' है। संतोष चौबे की 'जलतरंग' ऐसी ही कृति है। वहां भाषा है, परन्तु उसकी
लय और निहित सांगीतिक प्रंसग—छटाओं में रागदारी परम्परा में जीवन से जुड़ी आत्मीयता
घुली है। पर, बदलते समय संग आ रही कटुताओं में बिखरते जा रहे संगीत में रस—विहीन
होती दुनिया की दास्तां भी है। पढेंगे तो मन करेगा गुनें।

