जोगेन चौधरी का निधन पारंपरिक कलाकृतियों में निहित दृश्यों की आधुनिकी रचने वाले एक उम्दा भारतीय कलाकार से त्रहमारा बिछोह है। कुछ बरस पहले कोलकता में देश के मशहूर कलाकार युसूफ की कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी हुई थी, तभी उनसे प्रयाग शुक्ल जी ने भेंट कराई थी। बहुत अधिक नहीं, पर थोड़े से संवाद में ही उनको जानने—समझने का प्रयास किया था। पर, उनकी कलाकृतियों से आरंभ से ही एक संवाद होता रहा है। मुझे उनका कला—संसार इसलिए भी सुहाता रहा है कि वहां पर पश्चिम की बजाय भारतीय आधुनिकी सदा पाई। प्राय: यह होता है कि हम पश्चिम को मानक बनाते हुए उन्हीं विषयों और अमूर्त को अपना बनाने का प्रयास करने लगते हैं। जोगन चौधरी की कला में एब्स्ट्रेक्ट पश्चिम का था परन्तु दृष्टि सदा भारतीय रही। भारतीय विषय—वस्तुओं, मिथकों, लोक से जुड़ी संवेदनाओं को ही उन्होंने अपनी कलाकृतियो में स्वर दिया। चित्रों में अमूर्तन का आभास परन्तु दृश्यों की सुगंध वह घोलते थे। रेखाओं में निहित उनकी अपनी लय इसे कला में अलंकृत करती है। जोगेन चौधरी की कलाकृतियों की बड़ी विशेषता है, मानव मन की थाह। जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं उन्होंने दृश्य के पार घटित संवेदना को भी अपने चित्रों में रंग—रेखाओं से निरंतर जीया। यह भी लगता है, जोगेन चौधरी की कला विचार का नहीं, दृश्यों का विचार—रूपान्तरण है। गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे, दैनिन्दिनी जीवन से जुड़े प्रसंगों पर एक खास तरह का ह्यूमर और सटायर उनके चित्रों में हैं--
कला—मन
- डॉ. राजेश कुमार व्यास
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Monday, October 26, 2026
Saturday, October 17, 2026
कलाओं में निहित दार्शनिक दृष्टि से जुड़ा पर्व

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026
भारतीय
कलाएं और पर्व सृजन के साथ विसर्जन
की गहन दार्शनिक व्यंजना है। यह
दुर्गा पूजा का समय
है। माँ दुर्गा की
सुंदर, शृंगारित प्रतिमाओं के ध्यान—ज्ञान से जुड़ा। कलाकार देवी को 'चक्षु
दान' करते हैं। दुर्गा
पूजा के लिए माँ
की पूरी मूर्ति पहले
ही रंग दी जाती
है, लेकिन आँखें कोरी छोड़ी जाती
हैं। बंगाली
मूर्तिकला परंपरा में 'चक्षु दान'
भोर के उजास में
होता है। कलाकार ध्यानस्थ
हो देवी का स्मरण
करता है। मंत्र संग
प्रार्थना होती है—जो
दिव्य दृष्टि पूरे ब्रह्मांड को
देखती है, वह इस
प्रतिमा में स्थापित हो।
'चक्षु दान' का अर्थ
ही है, दृष्टि देना।
इसी से प्रतिमा जीवंत होती है। यह
पितृ पक्ष का अंतिम
दिन और मातृ पक्ष
की शुरुआत हती है। देवी की सिरजी
प्रतिमाओं पर गौर करें,
माँ की आँखों में
करुणा, वात्सल्य और क्रोध तीनों
ही मिलेंगे।
देवी
दुर्गा की आराधना का
असल समय चैत्र नवरात्रि
है। पहले 'वासंती पूजा' का ही विधान
था। खगोलीय दृष्टि से, यही वह
समय होता है जब
पृथ्वी की धुरी और
सूर्य की स्थिति में
बदलाव होता है। दिन
और रात लगभग बराबर
होते हैं। ब्रह्मांड में
सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह इसी
समय सबसे अधिक होता
है। इसे पाने के
लिए ही देवी दुर्गा
की आराधना होती है। पौराणिक
मान्यताओं में देवी—देवताओं का समय उत्तरायण
और दक्षिणायन होता है। शरद
ऋतु देवी-देवताओं का
विश्राम समय होता है।
भगवान
श्रीराम द्वारा शक्ति पूजा के बाद शारदीय नवरात्र
का भी महत्व हो गया। यही वह समय था जब राम—रावण युद्ध हुआ।
युद्ध में रावण की
रक्षा स्वयं महाशक्ति कर रही थीं।
विभीषण और ब्रह्मा ने
तब श्रीराम को देवी आराधना
के लिए कहा। पर, यह देवी पूजा
का समय नहीं था।
राम ने अकाल बोधन
किया। माने असमय देवी
का आह्वान। देवी को उन्होंने
108 नीलकमल अर्पित करने का संकल्प
लिया। माँ परीक्षा लेने
के लिए एक कमल
छुपा देती है। राम
बहुत व्यथित होते हैं। औचक,
उन्हें याद आता है
कि बचपन में उन्हें
'कमल —लोचन' कहा जाता था।
संकल्प पूरा करने वह
अपनी एक आँख देवी
को अर्पित करने उद्यत होते
हैं कि देवी प्रकट
हो उनका हाथ पकड़
लेती है। विजय का
आशीर्वाद देती है। नौ
दिनों की शक्ति-उपासना
के दसवें दिन विजयादशमी
पर फिर भगवान श्रीराम
रावण का वध करते
हैं। मूल
वाल्मीकि रामायण में इस शक्ति
पूजा का उल्लेख नहीं
है।
बांग्ला
भाषा में 15वीं शताब्दी में
रचित 'श्रीराम पाञ्चाली' में यह प्रसंग
है। महाकवि कृत्तिवास
ओझा ने 'कालिका पुराण'
और 'बृहद्धर्म पुराण' जैसे उप-पुराणों
से प्रेरणा लेते हुए असमय
देवी जागरण का यह मार्मिक
प्रसंग लिखा है। बंगाल
में में देवी पूजा
का इतिहास हालांकि बहुत पुराना है,
पर 'कृत्तिवास रामायण' के बाद इसके
स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव
आया। वसंत ऋतु की
जगह शारदीय नवरात्र मुख्य त्योहार हो गया। वहां
के जमींदारों के बंद महलों
से निकलकर दुर्गा पूजा का पर्व
सार्वजनिक हो पूरे राष्ट्र का उत्सव बन
गया।
शारदीय
नवरात्र देवी—आराधना का पर्व भर
नहीं है। यह भारतीय
संस्कृति और कलाओं की
वह सूक्ष्म दृष्टि भी है जिसमें
सृजन के साथ विसर्जन
जुड़ा है। नौ दिन
दुर्गा पूजा होती हैं।
माँ के सुंदर स्वरूप
में ही मन ध्यान—मग्न
हो उठता है। नौ
दिन बीत जाते हैं
और, वह क्षण आता है
जब हमें देवी के
सुंदर स्वरूप को विसर्जित करना
होता है। सृजन और
विसर्जन का यह चक्र
ही प्रकृति और जीवन का
सत्य है। जो भी
रूप धारण करता है,
उसका विसर्जन या कहें बिछोह
ही उसकी दिव्यता को
अनंत में विलीन करना
है। माँ का
कलाकारों द्वारा सिरजा हुआ भौतिक रूप
भले ही विसर्जित हो
जाए, पर उनकी शक्ति
और प्रदत्त आध्यात्मिक ऊर्जा सदैव हमारे भीतर
जीवंत रहती है। यही
जीवन का, पर्व का
और कलाओं का उजास है।
drrajeshkumarvyas@gmail.com
संस्कृति की संधान भारतीय दृष्टि

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026
कलाओं की हमारी दृष्टि पर पश्चिम की छाया इतनी घनी है कि हम कलाओं के हमारे चिंतक, मर्मज्ञों की ओर प्राय: झांक ही नहीं पाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। लेखक, आलोचक मित्र प्रो. प्रभाकर सिंह ने इस आलोक में इधर महती पहल की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वासुदेवजी के कला, इतिहास और जनपदीयता से जुड़े विरल कार्य को केन्द्र में रखकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। उन्होंने इसमें बोलने की नूंत दी तो वासुदेव शरण अग्रवाल जी के कला—संस्कृति चिंतन ने मन को जैसे मथा। वासुदेव जी का शास्त्रीय कलाओं पर अध्ययन जितना गहरा है, लोक कलाओं पर उससे और भी कहीं अधिक है। लोक के चमत्कारी और अलौकिक अध्ययन की बजाय उसके बहुमुखी परिवेश को समझने की दृष्टि उन्होंने ही पहले पहल हमें दी। उनका लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां ओझल हुए भारतीय संस्कृति से जुड़े ग्रंथो का विरल भाष्य है, मार्मिक टीकाएं है उनका गहन अन्वेषण है और हां, पुरातत्व—अनुसंधान का भी 'भावन' है। भावन माने वह जो मन को भाए। चिंतन और मनन के साथ जिसमें गवेषणा समाई हो।
Tuesday, September 15, 2026
आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी
भारतीय कलाओं को विश्वभर में उसकी वास्तविक महिमा के साथ उजागर करने का विरल कार्य किसी ने किया तो वह आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी थे। अपनी लिखी ‘बगवियर ऑफ लिटरेसी’ (शिक्षा का हव्वा) पुस्तक में उन्होंने कहा भी है कि पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय शिक्षित समाज में भारतीय कला और संस्कृति के प्रति अवहेलना और उदासीनता का भाव पैदा किया है। उन्होंने स्थापित किया कि भारतीय कलाकृतियों में मूर्तिकारों, चित्रकारों ने प्रत्यक्ष में जो दिखता है, वही नहीं सिरजा है बल्कि उसके निहितार्थ भाव-भंगिमाओं में आकाश रचा है...।"
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| अमर उजाला, 13 सितम्बर 2026 |
Sunday, September 6, 2026
नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र ग्रंथ की समीक्षा
"कला तत्व" देता है निराकार को साकार रूप
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| पत्रिका, 29 अगस्त 2026 |
मुझे लगता है, भारतीय कलाओं की अंतर्दृष्टि का सार बहुत से स्तरों पर 'शिव सूत्र विमर्शिनी' में है। इसमें 'कला' तत्व के आध्यात्मिक संदर्भ मन को मथते हैं। आचार्य क्षेमराज लिखते हैं, “कला तत्व” ही निराकार को साकार रूप देने या किसी वस्तु को एक विशेष आकार-प्रकार प्रदान करने का आधार बनते है।
...आनंद कुमार स्वामी भारत के नहीं थे। उनकी माता एलिजाबेथ क्ले इंगलैण्ड की थी, पिता मुथु कुमारस्वामी श्रीलंका के थे। वह स्वयं सीलोन में खनिज निदेशक थे। उत्खनन के दौरान श्रीलंका में उन्होंने जब खुदाई में नटराज की, शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित विष्णु और ऐसे ही दूसरे देवी—देवताओं की मूर्तियां देखी तो उन्हें अचरज हुआ।
उन्होंने इनके अध्ययन के लिए संस्कृत, पाली आदि भाषाओं का अध्ययन किया। यह वह समय था जब पश्चिम में हमारे देवी-देवताओं की कई हाथों और चेहरों वाली मूर्तियों, चित्रों को देखकर मजाक उड़ाया जाता था।
आनंद कुमार स्वामी ने दुनिया को समझाया कि भारतीय कला बाहरी दुनिया की हूबहू नकल नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, भाव और आंतरिक सत्य को व्यक्त करने की महत्वपूर्ण दृष्टि है।
'द डांस ऑफ शिवा' में आनंद कुमार स्वामी लिखते हैं, शिव का नृत्य केवल एक कलात्मक सौंदर्य नहीं है। भौतिक जगत और चेतना की अनंत गतिशीलता का प्रकट रूप है। यह मूलतः प्रकृति, पदार्थ और प्रकृति के अंतर्संबंध को दर्शाता है।
आनंद कुमार स्वामी के बाद स्टेला क्रैमरिश ने एलोरा की गुफाओं में स्थित भगवान शिव की प्रतिमाओं का गहराई से विश्लेषण किया और लिखा कि शिव की उकेरी गुफा—प्रतिमाएं केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि वे कला के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और विनाश चक्र का रूपायन है। ..
Monday, August 17, 2026
संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतरता
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में बीज वक्तव्य देने जाना हुआ। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी जी के सान्निध्य में कुलगुरु प्रो. सुरेश अग्रवाल जी ने आयोजन की महती पहल की।
संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए कहा, 'विभाजन से भारत की भौगोलिक सीमा से बाहर रह गए हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, शारदा पीठ, प्रह्लादपुरी मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज माता मंदिर, कपासराज मंदिर और वरुण देव मंदिर सहित अन्य ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों की जो क्षति हुई, उसकी भरपाई कभी हो नहीं सकती। असल में पाक अधिकृत कश्मीर में शारदा पीठ के भारत में नहीं होने का बड़ा नुकसान यह भी हुआ है कि हमने नालंदा और तक्षशिला से भी महत्वपूर्ण ज्ञान-परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के अतीत को बिसरा दिया। विभाजन की विभिषिका बेकसूर लोगों की हत्या, करोड़ों लोगों के अपने घर, जमीन और अपनों को छोड़ने की व्यथा—कथा ही नहीं है, यह हमारी संस्कृति से जुड़ी विरासत से भी सदा—सदा के लिए अलग होना है। विभाजन अपनी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता को खो देने की भी बड़ी क्षति है। संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतरता के साथ परंपराओं की श्रेष्ठताओं को पहचानते हुए उनके संग भविष्य की दृष्टि का विकास करना भी है।...'
वंदे मातरम्
बंकिम चन्द्र का लिखा 'वंदे मातरम्' गीत भर नहीं है, भारतीय संस्कृति का नाद है। आजादी आंदोलन का बीज मंत्र कभी यही गीत बना था। इसका संपूर्ण गायन पहले पहल 1896 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में 'राष्ट्रीय सभा' के दूसरे अधिवेशन में हुआ। बंकिमचंद्र का 8 अप्रैल 1894 को निधन हो गया। पर, तब तक उनका लिखा 'वंदे मातरम्' राष्ट्र मंत्र बन जन—जन से जुड़ गया था।

राजस्थान पत्रिका, 15 अगस्त 2026
Thursday, July 30, 2026
‘बाघ संरक्षण—संवाद’
'जयपुर टाइगर फेस्टिवल' के आमंत्रण पर अन्तरराष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस, 29 जुलाई 2026 को ‘बाघ संरक्षण—संवाद’ में मानसरोवर स्थित दीप स्मृति ऑडिटोरियम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलने जाना हुआ। इस दौरान सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार—गायक और सीताबाणी वाइल्डलाइफ रिजर्व के संस्थापक अभिषेक रे और सरिस्का टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डायरेक्टर सुनयन शर्मा के साथ संवाद का सुयोग सुखद था। बाघ संरक्षण से जुड़ी सोच के साथ ही वन्य जीव अभ्यारण्य प्रबंधन, पारिस्थितिकी संतुलन पर विमर्श की यह महती पहल है...





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