"...इस समय का बड़ा संकट यह है कि हमने अप संस्कृति, विसंस्कृति, सांस्कृतिक प्रदूषण आदि बहुतेरे शब्दों के घटाटोप में सूचनाओं को ही संस्कृति मानना प्रारंभ कर दिया है। सूचना संस्कृति नहीं है। संस्कृति व्यक्ति का जैविक गुण है। जैविक गुण जीव की आनुवंशिकी प्रतिक्रिया है। हम किसी मंदिर, मजार को देखते हैं अपने आप सर झुक जाता है। अपने से बड़े—बुर्जुग को देखते हैं, उसके सम्मान में अभिवादन हो जाता है। यह शिष्टाचार कहां से आया? संस्कृति से ही तो! संस्कृति की यह सीख एक दिन में नहीं आती, बरसों—बरस की एक विशाल प्रक्रिया से यह सब समझ बनती है। ...कोई समुदाय संस्कृतिविहीन नहीं हो सकता। इसलिए कि उसे जीवित रहने के लिए भोजन, वस्त्र, आवास आदि सब चाहिए होता है। संवाद के लिए भाषा और संकेतों की आवश्यकता होती है। इसीलिए संस्कृति को बहुतेरी बार संगीत, नृत्य, नाट्य और दूसरी कलाओं से जोड़कर अधिक देखा जाता है। मनुष्य जो जीवन जीता है, जिस तरह से रहता है वही संस्कृति है और उसकी अभिव्यक्ति कलाएं हैं। अभिव्यक्ति जीवन जीने के ढंग को रूपायित करती है, इसलिए हम मनुष्य की प्रतीकधर्मी अभिव्यक्ति संगीत, नृत्य, नाट्य आदि कलाओं से उसके होने का आकलन करते हैं। ...संस्कृति बाहरी प्रभावों को स्वीकारती है। दूसरे देशों को कुछ अपना देती है, कुछ लेती है। पर यह प्रभाव औचक नहीं होता। धीरे—धीरे। कुछ इस तरह से कि जो अनुकूल है वह लम्बी अवधि में मिट्टी—पानी में सनकर खाद की तरह पोषण करे। संस्कृति की बहुलता में मनुष्यता का अन्वेषण इसीलिए होता है कि वहां पर एक दूसरे को मिटाने की नहीं, एक—दूसरे को पोषित कर आगे बढाने, वृद्धि की सोच निहित होती है। इसी से जीवन की लय जुड़ी हुई है। यह लय जुड़ी रहती है तभी जीवन में सुगंध घुली रहती है।.."
कला—मन
- डॉ. राजेश कुमार व्यास
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Sunday, May 10, 2026
Saturday, May 9, 2026
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में व्याख्यान
Indian Institute of Advanced Study भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में 27 और 28 अप्रैल 2026 को व्याख्यान देने जाना हुआ। संस्कृति के सरोकारों में 'विकसित भारत' की संकल्पना पर अपनी बात रखते हुए इस बात पर ही जोर दिया कि वही विकास दीर्घकाल तक बना रह सकता है और सार्थक है, जिसमें सांस्कृतिक मूल्य और परम्पराओं का उजास बचाए रखने का जतन हो। कृत्रिम बुद्धिमता से विचार—संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों के साथ विकास मे मानवीय मूल्यों की अनदेखी से उत्पन्न संकट, संभावित जटिलताओं पर भी अपनी समझ साझा की...
Saturday, April 18, 2026
धरोहर दिवस-संस्कृति की जीवंत दृष्टि
आज विश्व धरोहर
दिवस है। पुरखों
से परम्परा में
जो मिला है,
उसे सहेजने का
दिवस। यह महज संयोग नहीं
है कि मूर्त—अमूर्त विरासत की
दृष्टि से विश्व
भर में भारत
सर्वाधिक समृद्ध है।
पर, धरोहर संरक्षण
के प्रति उदासीनता
भी कम नहीं है। देश
में बहुत से ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक
और सांस्कृतिक दृष्टि
से अत्यधिक महत्व
के विरासत स्थल
सामाजिक चेतना की
दृष्टि से इस समय उपेक्षित
प्रायः हैं। ऐसे
स्थलों के सांस्कृतिक
मूल्यों को नहीं पहचानकर सदा के लिए हम
उनसे दूर होते जा
रहे हैं।
पत्रिका, 18 अप्रैल 2026
याद है, अरसा
पहले भारतीय पर्यटन
एवं यात्रा प्रबंधन
संस्थान, ग्वालियर में व्याख्यान
देने जाना हुआ
था। तभी वहां
के निदेशक संदीप
कुलेश्रष्ठ ने ग्वालियर
से 40 किलोमीटर दूर
मुरैना स्थित चौंसठ
योगिनी मंदिर जाने
का सुझाव दिया
था। छोटी सी पहाड़ी पर
स्थित वह वास्तु—शिल्प देखकर चौंक
उठा था। हूबहू
हमारे पुराने संसद
भवन की छवि आंखों के
समक्ष थी। असल में ब्रिटिश
वास्तुकार लुटियन ने
उसे देखकर ही
पुराने संसद भवन
के निर्माण की
कल्पना की थी। पर सोचता हूं, हममें से कितने हैं जो उस धरोहर
तक पहुंच पाते हैं! राजस्थान के हनुमानगढ़
का भटनेर दुर्ग कभी
हिंद का प्रवेश
द्वार कहा जाता
था। रजिया सुल्तान
को यहां कैद
करके रखा गया था और
विलुप्त सरस्वती नदी
के किनारे भगवान
परशुराम ने यहीं कभी साधना
की थी। पर, इतिहास से
जुड़े इन संदर्भों
से कितने हैं,
जिनका नाता है। असल में
चिर—परिचित
स्थलों के पर्यटन—प्रसार में बहुत से धरोहर स्थल काल—कवलित
भी होते जा रहे हैं।
कुछ समय पहले
पेरिस गया तो सीन नदी
के किनारे स्थित
लूव्र संग्रहालय भी
जाना हुआ। यह दुनिया का
सबसे बड़ा और सबसे अधिक
देखा जाने वाला
संग्रहालय है। लियोनार्डो
दा विंची की
कलाकृति मोना लिसा
यहीं प्रदर्शित है। पर,देखने
के बाद अनुभूत किया पूरे संग्रहालय में एकरसता पसरी है। हमारे यहां हरेक राज्य में
संग्रहालय हैं और एक से बढ़कर एक कला—कृतियां, लूंठी—अलूंठी पुरा—वस्तुएं
संग्रहित हैं परन्तु वहां उदासी पसरी है। बहुत से संग्रहालय तो औपचारिकता में खुलते
भर हैं। उन्हें देखने लोग पहुंचते ही नहीं है। इसलिए कि धरोहर के प्रति आकर्षण की कोई
दृष्टि हमारे यहां विकसित नहीं की गई है।
आनंद
कुमार स्वामी ने
भारतीय कलाओं का
बहुत सा महत्वपूर्ण
अपने स्तर पर संजोया था।
वह चाहते थे
कि कोई ऐसा संग्रहालय भारत में
स्थापित हो जिसे वह इसे
सौंप सकें। परन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तो वह
सारी भारतीय कला धरोहर
बोस्टन चली गई। काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय के प्रांगण
में भारत कला
भवन हैं। कलाविद्
राय कृष्णदास ने
अपना संपूर्ण जीवन
इसके संग्रह हेतु
समर्पित कर दिया था। पर,
इसके बारे में
भी जागरूकता बहुत
कम स्तरों पर
है। ऐसे
ही नालन्दा के
बारे में बहुत
सारा हमें ज्ञात
है, पर वहां के रास्ते में पड़ने
वाले छोटे-छोटे
गांवों और वहाँ की मूर्ति
कलाओं में भारतीय
इतिहास की अनुपम
धरोहरें ध्वनित होतेी
मैंने सुनी है।
कश्मीर के मार्तण्ड मंदिर के
भग्नावशेष आज भी सार्वभौम सम्राट रहे
ललितादित्य की कहानी
सुनाते मुझे मिले
हैं तो विश्वभर
के ज्ञान केन्द्र
रहे शारदा—पीठ की सनातन ज्ञान—दृष्टि
और संस्कृति से
जुड़ी धरोहर को
धीरे-धीरे हमने
बिसरा दिया है।
मुझे
लगता है, बहुत
सारे स्थानों पर
सांस्कृतिक दृष्टि से
संपन्न धरोहरें इस
कारण हमसे दूर हो रही हैं कि इतिहास
के पन्ने उन
पर मौन है। धरोहरें इतिहास का
मधुर राग सुनाती
है, बशर्तें उनके
भीतर हम झांकें।
यह अतीत से जुड़ा वह
उजास है जिसमें
संस्कृति और सभ्यता
जीवंत हो नया कुछ हमें
सौंप सकती है। बल्कि कहूं,
इनसे इतिहासकारों ने जो
पन्ने लिखने से
छोड़ दिए, उन्हें
बांचकर हम भविष्य
के भारत की ज्ञान—परम्परा की सौंधी
महक पा सकते हैं। काश! इस पर किसी तरह चिंतन की बढ़त इस धरोहर दिवस से
ही ही हो।
Saturday, April 4, 2026
साहित्य अकादेमी-साहित्योत्सव 2026
साहित्य अकादेमी की नूंत पर नई दिल्ली में आयोजित साहित्योत्सव के अंतर्गत 'अखिल भारतीय लेखक सम्मिलन' में कविता, यात्रा वृतांत, डायरी, ललित निबंध और मायड़ भाषा राजस्थानी में लेखन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए...लौट आया हूं-साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, माधव कौशिक जी, साहित्यकार मित्रो के सान्निध्य—सुख को अंवेरते...
Monday, March 30, 2026
जीवन—धन सहेजता गान
बड़े गुलाम अली ख़ान को सुनना जीवन धन सहेजना है। जीवनानुभूतियों की भांत भांत की छटाओं की गागर छलकते हुए पाना है। आवाज का उनका लचीलापन, अप्रत्याशित स्वर-संयोजन और तानों की अविश्वसनीय गति विरल है। राग मालकौंस , दरबारी कान्हड़ा, मालुहा केदार, राग खाट, बागेश्री, शुद्ध कल्याण, हंसध्वनि में समय को जैसे वह गान में रूपान्तरित करते हैं। वह दृश्य छटाओं का मनोरम रचते हैं। औचक। बार—बार।
सुनेंगे तो मिलन की उमंग, उत्साह, विरह की उदासी अनुभूत होगी तो प्रकृति की भांत—भांत की छटाओं को मन में जीवंत होता पाएंगे। स्वरों का माधुर्य ऐसा कि उसमें खिलती धूप, बादलों की छा रही घटाओं, फूलों के खिलने, सांझ घिरने, बादलों के बरसने आदि को देख—सुन और गुन सकते हैं। राग को, आलाप को घंटों तक खींचने की बजाय वह दोहराव से बचते संक्षिप्त प्रस्तुति में उसे सजाते और संवारते थे। और हां, ठुमरी की कालजयी दृष्टिं को समझना हो तो सुनें उनके स्वर—उजास में "का करूं सजनी आये न बालम" के बोल। लगेगा बिछोह की व्यथा जैसे अंतर्मन अनुभूति बन गई है। उनकी गाई यही नहीं, "प्रेम जोगन बन के","नैना मोरे तरस गए" जैसी ठुमरियां भी अंतर्मन संवेदनाओं का सागर है। वहां मनुहार है, अंतर की पुकार है और है विरह की व्यथा में गुंथा स्वर—उजास। ठुमरी से ध्रुपद अंग तक उनकी गायकी कहन का अपना 'सब रंग' अंदाज है। माने उसमें सभी रंग घुले होते हैं। सबरंग नाम से ख्याल और ठुमरी की विरल रचनाएं भी तो उन्होंने हमें दी है।मुझे लगता है, लोक संगीत की स्वच्छंद मिठास को उन्होंने शास्त्रीय संगीत के सुरों में, राग—नियमों के माधुर्य में पिरोया। उनके गान में सहजता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। हृदय को स्पर्श करता हुआ। सुनेंगे तो मन स्वरों की अतृप्त प्यास से भर उठेगा । बड़े गुलाम अली फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। पर, साठ के दशक में 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने गाया। कहते हैं, फिल्म के एक दृश्य में तानसेन को गाते हुए दिखाना था। नौशाद चाहते थे, बड़े गुलाम अली खान साहब उसे गाए। के. आसिफ आग्रह लेकर उनके पास पहुंचे तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। पर जब देखा कि वह नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने मेहनताने के 25 हजार रूपये मांग लिए। यह वह समय था जब लता मंगेशकर को भी गाने के पांच सौ रूपये से अधिक नहीं मिलते थे। बड़े गुलाम अली खान को लगा इससे फिल्म में गवाने का पीछा छूट जाएगा पर आसिफ ने स्वीकार कर लिया। उनके पास न गाने की अब कोई वजह नहीं थी। उन्होंने राग सोहनी और रागेश्वरी में 'मुगल-ए-आजम' में गाया। फिल्म जगत का ही नहीं यह शास्त्रीय संगीत की साधना का भी जीवंत इतिहास है।
सभी जानते हैं, यह वही बड़े गुलाम अली खान है जिन्होंने कभी लता मंगेशकर के बारे में कहा था, "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती।" लता के गायन की मिठास को बंया करने का यह उनका अपना अंदाज था। ठीक वैसे ही जैसे कभी उन्होंने 'हरिओम तत्सत' भजन को गाते हुए किसी तपस्वी की भांति स्वर—साधना की। गान में अर्चना का यह जीवंत इतिहास है। वह ऐसे ही थे। सुरमंडल संग अपनी खुद की ईजाद पटियाला-कसूर शैली में राग जयजयवंती,जौनपुरी, हमीर आदि मे जो भी गाते लगता है, भाव—भाव में रस छलक—छलक अंतर्मन के किसी कोने में छाई रिक्तताओं को भरता है।
लाहौर के निकट कसूर नामक स्थान पर पाकिस्तान में वह जन्मे। पिता अली बख्श खां कश्मीर के महाराजा के दरबारी गायक थे। चाचा काले खां से संगीत सीखने के बाद उन्होंने संगीत सफर की सारंगी वादक के रूप में शुरूआत की। पर, कोलकाता संगीत सम्मेलन में 1938 में उन्होंने जब सार्वजनिक प्रस्तुति दी तो उनकी सुरीली आवाज ने सुनने वालों के मन जीत लिए। मखमली, मन को भाने वाली मिठी आवाज में उन्होंने बाद में खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का घोल कर अपनी स्वयं की गायन—शैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें जीवन—रस घुला था।
बड़े गुलाम अली खान संगीत को ओढ़ते—बिछाते थे। कभी उनका गंभीर ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने पूर्ण विश्राम के लिए कहा। पर, 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने तीन सप्तकों तक फैली एक तान गा दी। टोका गया तो बोले, “संगीत बिना मेरे जीवन का क्या अर्थ? देखना चाहता था कि मेरी आवाज पर तो ऑपरेशन का कोई असर नहीं पड़ा।“ महाराष्ट्र सरकार ने 1967 में नृत्य महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया। रोशनी केवल उन पर थी। बाकी बत्तियाँ बुझी हुई थी। उन्होंने कहा, 'नहीं गा सकता। अंधेरे में किसी को देख ही नहीं पा रहा। मुझे अपने प्रिय श्रोताओं के दर्शन होंगे तभी गा सकता हूँ?' बत्तियां जला दी गईं। श्रोताओं की भीड़ की झलक पाते ही, राग छाया में “जो करे राम कृपा” गाते हुए वह खिल उठे थे। वह और उनका गान ऐसे ही सदा मन को मोहता था। इसीलिए कहूं, वह मन—मोहक हैं। उस्तादों के उस्ताद। जग गायक!
Sunday, March 29, 2026
काल के पार कांसा
'अमर उजाला' और 'नवभारत' में ...
टाइमलेस इन ब्रोंज
बिहार संग्रहालय में इस समय 'टाइमलेस इन ब्रोंज' माने कांस्य में कालजयी शीर्षक के अंतर्गत देश के प्रतिनिधि मूतिकारों की प्रदर्शनी लगी हुई है। इस प्रदर्शनी के आलोक में बोलने जाना हुआ। सुखद था, अपने व्याख्यान के बाद संग्रहालय में ही आउटलुक की संपादक चिंकी सिन्हा से हुए एक संवाद में मूर्तिकला की आधुनिकी पर भी महती विमर्श का भागीदार बना।...
Saturday, March 21, 2026
गणगौर

पत्रिका, 21 मार्च 2026
पर्व यानी पड़ाव। मिलन बिंदु। गन्ने में थोड़े—थोड़े अंतराल में उभरी हुई गांठे होती है। यही आगे से आगे उसे जोड़ती है। इनके बीच का हिस्सा मीठा और रसदार होता है। यही पर्व है। पर्व का अर्थ ही है, जीवन में घुली मिठास! गणगौर ऐसा ही है। शृंगार और सौंदर्य की व्यंजना से जुड़ा। पराशक्ति मां पार्वती के पूजन का अनुष्ठान-पर्व। संस्कृति की सुगंध। गण और गौर से मिलकर बना है—गणगौर।
‘गण माने शिव और ‘गौर यानी पार्वती। होली दहन के दूसरे दिन ही गवर पूजन शुरू हो जाता है। याद है, बचपन में ‘गढ़ सूं गौरल उतरी', 'गैरो गैरो गवरा बाई रो ढोलो बालम रसिया', 'गवर पूजूं, ईसर पूजूं' जैसे स्वर—माधुर्य से ही भोर में आंख खुलती। बहन अपनी सखियों संग अल—सुबह किसी एक स्थान पर एकत्र हो गणगौर पूजन प्रारंभ कर देती।
इस पूजन में भक्ति भाव की बजाय 'खेलने' का सखी भाव प्रमुख है। 'खेलण दो गणगौर' संग कन्याएं अच्छे वर के लिए गवर पूजती है, हंसी—ठिठोली संग होली की बची राख से पिंडिया बनाती हैं। मिट्टी के पात्र में गेंहू और जौ के बीज बोती है। पौधा अंकुरित होने तक रोज सौंदर्य—शृंगार और गहने पहनने की गुंथी संस्कृति के गीत गा उन्हें सींचती है। गान संग गुलाल के मांडणे मांडती है।
...गणगौर समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। कन्याएं ईसर-गौरा बनाकर एक पखवाड़े पूजती है। गवर के भांत भांत के शृंगार करती है। और फिर सोलहवें दिन गवर की सज—धजकर सवारी निकलती है। गवर को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
विसर्जन से ही जुड़ा है, सृजन। पेड़ो से पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी नए उगते हैं। गवर विसर्जन के साथ ही त्योंहारों की शृंखला एक बार थम जाती है। लोक में इसीलिए कहा गया भी है, "तीज त्यौहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर"। सावन की तीज पर पर्व शुरू होते हैं और चैत्र माह की गणगौर के साथ इनका समापन हो जाता है। फिर से नई उमंग, उत्साह संग नया कुछ करने के लिए।"
Thursday, March 12, 2026
’नवनीत’ मार्च अंक में ...
Sunday, February 22, 2026
कुरुक्षेत्र में व्याख्यान-नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा-
संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली के आग्रह पर कुरुक्षेत्र में "नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा" विषयक व्याख्यान देने जाना हुआ। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के समन्वय से अकादेमी ने जब कला समीक्षा कार्यशाला में आमंत्रित किया तो लगा, इस बहाने श्री कृष्ण द्वारा जहां अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया गया उस स्थान को देख सकूंगा। वहां भी गया जहां, महाभारत का युद्ध हुआ। वहां भी, जहां बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह के लिए अर्जुन ने धरती पर अपने तीर से बाणगंगा प्रकट की। महाभारत युद्ध से पहले श्री कृष्ण और पाण्डवों द्वारा महादेव की आराधना स्थल स्थानेश्वर मन्दिर, भद्रकाली शक्तिपीठ आदि बहुत से स्थलों की यात्रा भी इस बहाने हो गई। लौट आया हूं, पर अनुभव कर रहा हूं—कुरुक्षेत्र की ऊर्जा से अंतर्मन आलोक मिला है ...



































