कला—मन
- डॉ. राजेश कुमार व्यास
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Tuesday, May 26, 2026
गान सरस्वती
नाट्यशास्त्र : पंचम वेद पर एकाग्र
'नाट्यशास्त्र : पंचम वेद पर एकाग्र' का राज्यपाल हरिभाऊ बागडे जी ने किया लोकार्पण--आभार! देवेन्द्र सत्यार्थीजी जब 'आजकल' के संपादक थे तब कहा था, लेखक से लिखवाना सबसे कठिन काम होता है। संपादन कर्म से भी निंरतर जुड़ा रहा हूं, इसलिए उनका यह कहा सदा याद आता है। नाट्यशास्त्र के विविध आयामों और इससे जुड़ी दृष्टि पर ग्रंथ संपादन का जिम्मा ले तो लिया था, पर विषय विशेषज्ञों से आग्रह कर लिखवाने में एक साल की अवधि लग गई। सभी विद्वान लेखकों के प्रति कृतज्ञ हूं।
Saturday, May 16, 2026
भक्ति से बना कलाओं का जग
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| पत्रिका, 16 मई 2026 |
कलाएं ध्यान की मांग करती है। भक्ति परम्परा का मूल भी तो यही है! वैदिक अनुष्ठान में देवता का आह्वान मंत्रोच्चार से होता। मंत्र का अर्थ है मन का तंत्र। संतुलन। मंत्रोच्चार के साथ पूजा जब की जाती है तो वहां पूज्य को समर्पित करने के सभी उपकरण इस साधना के ही तो हेतु होते हैं। पुष्प बौद्धिक जीवन के सार का सूचक है। नैवेद्य अशेष भोग को अर्पित करने का प्रतीक है। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए ही तो जप—तप, लीलानुकरण, नृत्य, संगीत कला जैसे सौंदर्य बोध साधनों का भक्ति में समावेश हुआ।
कभी पढ़ा था,
'भक्ति द्राविड़ उपजी,
लाए रामानंद।' यह
सच है, भक्ति
के बहाने कलाओं
का संसार दक्षिण
में ही सबसे पहले बना। कथा
है, भक्ति कर्नाटक
में युवती बन
कर रही। महाराष्ट्र
और गुजरात तक
आते—आते वृद्धावस्था
के कारण शिथिल हो
गई। आगे चलते—चलते उसके ज्ञान,
वैराग्य आदि पुत्रों
का निधन हो गया। पर,
वृंदावन में पहुंचते
ही पुन: उसने
जीवन प्राप्त कर
लिया। वृंदावन से
जुड़ी कृष्ण लीलाओं
ने ही भारतीय संगीत,
नृत्य, नाट्य और
तमाम दूसरी कलाओं
को बहुत बड़ा
आधार दिया है।
दक्षिण
में जो वैष्णव
भक्त हैं, वह आलवार कहे
गए हैं। आलवार
माने वह जो भगवत्प्रेम में डूबे
हुए हों। छठी
से नवीं शताब्दी
तक का समय आलवारों का रहा है। प्रभु
को स्वामी और
अपने को दास मानकर उसकी
सेवा करना ही उन्होंने परम—पुरुषार्थ माना है।
भक्त के रूप में, कभी
नायिका के रूप में, कभी
माता के रूप में, कभी पिता
के रूप में अपने आराध्य
देव श्रीमन्नारायण के
स्वरूप, गुण और लीला का
अनुभव आलवारों ने
विरल रूप में किया है।
उन्होंने जो लिखा,
वह 'दिव्य प्रबंध'
कहा गया। दक्षिण
के वेद रूप में इसे
मान्यता मिली है।
इस वेद को आधार बनाकर
ही कभी रामानुजाचार्य
ने अन्य धर्मावलम्बियों
को पराजित कर
'ब्रह्मसूत्र भाष्य' की
रचना की और वैष्णव धर्म
की स्थापना की।
वैष्णव भक्ति ने
भारत को एक ही नहीं
किया बल्कि विश्व
एकता का भी संदेश दिया।
इस भक्ति में
सूर्य के सर्वत्र
व्याप्त होने के आलोक में
उन्हें विष्णु केन्द्रित
किया गया। विष्णु
के साथ शंख,
चक्र का प्रतीक
आया। यही नाद—चक्र है। नाद
माने गत्यात्मकता। विष्णु के
व्यापक रूप को अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें
श्याम वर्ण दिया
गया। भू देवी या श्री
से संबद्ध मानकर
उनके एक हाथ में कमल
का संबंध स्थापित
किया गया। विष्णु
की इस कल्पना
में ही प्रजापति,
विश्व के आदि पुरुष तथा
सृष्टि की अव्यक्त
अवस्था के उद्बोधक
हुए।
हमारे
यहां कलाओं ने
इस—सबसे ही
बढ़त की है। सारी
की सारी कलाएं
अव्यक्त से व्यक्त
का ही तो नाद है।
भक्ति रूप में कहें तो
वहां साधना के
समर्पण का आह्वान
है। अपने ईष्ट
या कहें, जिस
कला में कलाकार ने अपने
को विसर्जित कर दिया, उसी ने कालजयी रचा है। तो कहूं, भक्ति
की परम्परा से
ही बना है कलाओं का
हमारा सारा जग!
--डॉ. राजेश कुमार व्यास, शंकर
विहार—ई, 28 ए,
सिद्धार्थ नगर, जयपुर—302017 (राजस्थान)
Sunday, May 10, 2026
संस्कृति सुगंध
"...इस समय का बड़ा संकट यह है कि हमने अप संस्कृति, विसंस्कृति, सांस्कृतिक प्रदूषण आदि बहुतेरे शब्दों के घटाटोप में सूचनाओं को ही संस्कृति मानना प्रारंभ कर दिया है। सूचना संस्कृति नहीं है। संस्कृति व्यक्ति का जैविक गुण है। जैविक गुण जीव की आनुवंशिकी प्रतिक्रिया है। हम किसी मंदिर, मजार को देखते हैं अपने आप सर झुक जाता है। अपने से बड़े—बुर्जुग को देखते हैं, उसके सम्मान में अभिवादन हो जाता है। यह शिष्टाचार कहां से आया? संस्कृति से ही तो! संस्कृति की यह सीख एक दिन में नहीं आती, बरसों—बरस की एक विशाल प्रक्रिया से यह सब समझ बनती है। ...कोई समुदाय संस्कृतिविहीन नहीं हो सकता। इसलिए कि उसे जीवित रहने के लिए भोजन, वस्त्र, आवास आदि सब चाहिए होता है। संवाद के लिए भाषा और संकेतों की आवश्यकता होती है। इसीलिए संस्कृति को बहुतेरी बार संगीत, नृत्य, नाट्य और दूसरी कलाओं से जोड़कर अधिक देखा जाता है। मनुष्य जो जीवन जीता है, जिस तरह से रहता है वही संस्कृति है और उसकी अभिव्यक्ति कलाएं हैं। अभिव्यक्ति जीवन जीने के ढंग को रूपायित करती है, इसलिए हम मनुष्य की प्रतीकधर्मी अभिव्यक्ति संगीत, नृत्य, नाट्य आदि कलाओं से उसके होने का आकलन करते हैं। ...संस्कृति बाहरी प्रभावों को स्वीकारती है। दूसरे देशों को कुछ अपना देती है, कुछ लेती है। पर यह प्रभाव औचक नहीं होता। धीरे—धीरे। कुछ इस तरह से कि जो अनुकूल है वह लम्बी अवधि में मिट्टी—पानी में सनकर खाद की तरह पोषण करे। संस्कृति की बहुलता में मनुष्यता का अन्वेषण इसीलिए होता है कि वहां पर एक दूसरे को मिटाने की नहीं, एक—दूसरे को पोषित कर आगे बढाने, वृद्धि की सोच निहित होती है। इसी से जीवन की लय जुड़ी हुई है। यह लय जुड़ी रहती है तभी जीवन में सुगंध घुली रहती है।.."
Saturday, May 9, 2026
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में व्याख्यान
Indian Institute of Advanced Study भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में 27 और 28 अप्रैल 2026 को व्याख्यान देने जाना हुआ। संस्कृति के सरोकारों में 'विकसित भारत' की संकल्पना पर अपनी बात रखते हुए इस बात पर ही जोर दिया कि वही विकास दीर्घकाल तक बना रह सकता है और सार्थक है, जिसमें सांस्कृतिक मूल्य और परम्पराओं का उजास बचाए रखने का जतन हो। कृत्रिम बुद्धिमता से विचार—संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों के साथ विकास मे मानवीय मूल्यों की अनदेखी से उत्पन्न संकट, संभावित जटिलताओं पर भी अपनी समझ साझा की...
Saturday, April 18, 2026
धरोहर दिवस-संस्कृति की जीवंत दृष्टि
आज विश्व धरोहर
दिवस है। पुरखों
से परम्परा में
जो मिला है,
उसे सहेजने का
दिवस। यह महज संयोग नहीं
है कि मूर्त—अमूर्त विरासत की
दृष्टि से विश्व
भर में भारत
सर्वाधिक समृद्ध है।
पर, धरोहर संरक्षण
के प्रति उदासीनता
भी कम नहीं है। देश
में बहुत से ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक
और सांस्कृतिक दृष्टि
से अत्यधिक महत्व
के विरासत स्थल
सामाजिक चेतना की
दृष्टि से इस समय उपेक्षित
प्रायः हैं। ऐसे
स्थलों के सांस्कृतिक
मूल्यों को नहीं पहचानकर सदा के लिए हम
उनसे दूर होते जा
रहे हैं।
पत्रिका, 18 अप्रैल 2026
याद है, अरसा
पहले भारतीय पर्यटन
एवं यात्रा प्रबंधन
संस्थान, ग्वालियर में व्याख्यान
देने जाना हुआ
था। तभी वहां
के निदेशक संदीप
कुलेश्रष्ठ ने ग्वालियर
से 40 किलोमीटर दूर
मुरैना स्थित चौंसठ
योगिनी मंदिर जाने
का सुझाव दिया
था। छोटी सी पहाड़ी पर
स्थित वह वास्तु—शिल्प देखकर चौंक
उठा था। हूबहू
हमारे पुराने संसद
भवन की छवि आंखों के
समक्ष थी। असल में ब्रिटिश
वास्तुकार लुटियन ने
उसे देखकर ही
पुराने संसद भवन
के निर्माण की
कल्पना की थी। पर सोचता हूं, हममें से कितने हैं जो उस धरोहर
तक पहुंच पाते हैं! राजस्थान के हनुमानगढ़
का भटनेर दुर्ग कभी
हिंद का प्रवेश
द्वार कहा जाता
था। रजिया सुल्तान
को यहां कैद
करके रखा गया था और
विलुप्त सरस्वती नदी
के किनारे भगवान
परशुराम ने यहीं कभी साधना
की थी। पर, इतिहास से
जुड़े इन संदर्भों
से कितने हैं,
जिनका नाता है। असल में
चिर—परिचित
स्थलों के पर्यटन—प्रसार में बहुत से धरोहर स्थल काल—कवलित
भी होते जा रहे हैं।
कुछ समय पहले
पेरिस गया तो सीन नदी
के किनारे स्थित
लूव्र संग्रहालय भी
जाना हुआ। यह दुनिया का
सबसे बड़ा और सबसे अधिक
देखा जाने वाला
संग्रहालय है। लियोनार्डो
दा विंची की
कलाकृति मोना लिसा
यहीं प्रदर्शित है। पर,देखने
के बाद अनुभूत किया पूरे संग्रहालय में एकरसता पसरी है। हमारे यहां हरेक राज्य में
संग्रहालय हैं और एक से बढ़कर एक कला—कृतियां, लूंठी—अलूंठी पुरा—वस्तुएं
संग्रहित हैं परन्तु वहां उदासी पसरी है। बहुत से संग्रहालय तो औपचारिकता में खुलते
भर हैं। उन्हें देखने लोग पहुंचते ही नहीं है। इसलिए कि धरोहर के प्रति आकर्षण की कोई
दृष्टि हमारे यहां विकसित नहीं की गई है।
आनंद
कुमार स्वामी ने
भारतीय कलाओं का
बहुत सा महत्वपूर्ण
अपने स्तर पर संजोया था।
वह चाहते थे
कि कोई ऐसा संग्रहालय भारत में
स्थापित हो जिसे वह इसे
सौंप सकें। परन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तो वह
सारी भारतीय कला धरोहर
बोस्टन चली गई। काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय के प्रांगण
में भारत कला
भवन हैं। कलाविद्
राय कृष्णदास ने
अपना संपूर्ण जीवन
इसके संग्रह हेतु
समर्पित कर दिया था। पर,
इसके बारे में
भी जागरूकता बहुत
कम स्तरों पर
है। ऐसे
ही नालन्दा के
बारे में बहुत
सारा हमें ज्ञात
है, पर वहां के रास्ते में पड़ने
वाले छोटे-छोटे
गांवों और वहाँ की मूर्ति
कलाओं में भारतीय
इतिहास की अनुपम
धरोहरें ध्वनित होतेी
मैंने सुनी है।
कश्मीर के मार्तण्ड मंदिर के
भग्नावशेष आज भी सार्वभौम सम्राट रहे
ललितादित्य की कहानी
सुनाते मुझे मिले
हैं तो विश्वभर
के ज्ञान केन्द्र
रहे शारदा—पीठ की सनातन ज्ञान—दृष्टि
और संस्कृति से
जुड़ी धरोहर को
धीरे-धीरे हमने
बिसरा दिया है।
मुझे
लगता है, बहुत
सारे स्थानों पर
सांस्कृतिक दृष्टि से
संपन्न धरोहरें इस
कारण हमसे दूर हो रही हैं कि इतिहास
के पन्ने उन
पर मौन है। धरोहरें इतिहास का
मधुर राग सुनाती
है, बशर्तें उनके
भीतर हम झांकें।
यह अतीत से जुड़ा वह
उजास है जिसमें
संस्कृति और सभ्यता
जीवंत हो नया कुछ हमें
सौंप सकती है। बल्कि कहूं,
इनसे इतिहासकारों ने जो
पन्ने लिखने से
छोड़ दिए, उन्हें
बांचकर हम भविष्य
के भारत की ज्ञान—परम्परा की सौंधी
महक पा सकते हैं। काश! इस पर किसी तरह चिंतन की बढ़त इस धरोहर दिवस से
ही ही हो।
Saturday, April 4, 2026
साहित्य अकादेमी-साहित्योत्सव 2026
साहित्य अकादेमी की नूंत पर नई दिल्ली में आयोजित साहित्योत्सव के अंतर्गत 'अखिल भारतीय लेखक सम्मिलन' में कविता, यात्रा वृतांत, डायरी, ललित निबंध और मायड़ भाषा राजस्थानी में लेखन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए...लौट आया हूं-साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, माधव कौशिक जी, साहित्यकार मित्रो के सान्निध्य—सुख को अंवेरते...
























