वासुदेव शरण अग्रवाल जी भारतीय कला—संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान ही नहीं, विरल तत्वचिंतक थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने महती पहल करते हुए उनके जीवन—आलोक पर अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी में अपने व्याख्यान में वासुदेव जी की शब्दों से जुड़ी इतिहास दृष्टि, पुरातत्व ज्ञान और कलाओं से जुड़ी सूक्ष्म समझ पर अपनी सूझ को साझा करते हुए कहा, 'वासुदेव जी की कला—दृष्टि अमूर्त से मूर्त में कलाएं प्रकृति और जीवनगत सौंदर्य का संधान है। प्रकृति में जो दृश्यावलियां हैं, उन्हीं से यह कलात्मक संसार बना है। हमारे यहां कलाएं प्रकृति से जुड़ी रही है। पेड़ों की लताओं, टहनियों, पत्तियों से कलाकारों को सदा नया सिरजने की प्रेरणा मिली। बुद्ध के जन्म से जुड़ी शालभंजिका और दूसरी प्रतिमाओं के तत्व बोध से साक्षात् कराते वासुदेव जी ने अपने कला—चिन्तन में शब्दों के इतिहास के जरिए कलाओं को देखने की अपूर्व दृष्टि हमें प्रदान की। भरहूत, सांची आदि स्तूपों के पत्थरों और तोरण द्वारों में उकेरे रूप—सौंदर्य की विरल व्याख्या उन्होंने की है। मुगल कला, राजस्थानी कला और हिमाचल चित्रशैली की अपनी मौलिक दृष्टि में उन्होंने भारतीय कलाओं में नेपथ्य में उकेरी कलाकृतियों पर सर्वथा नवीन दृष्टि हमें सौंपी हैं। उन्होंने स्थापित किया कि बुद्ध की प्रतिमा के जरिए भारतीय धर्म विश्वभर में प्रतिष्ठित हुआ। यह भी कि भारतीय कलाओं का मूलाधार एलिफेंटा में उकेरी त्रिमूर्ति, चिदम्बरम के नटराज और देवगढ़ से मिली विष्णु की शेषशायी प्रतिमा है। ...और यह भी कि मोहनजोदड़ों में मिली समाधिस्थ योगी की अकेली प्रतिमा ने पूरी की पूरी सिंधु सभ्यता को जानने की राह विश्व—भर को दी।' लौट आया हूं, पर संगोष्ठी के प्रकल्पक, मित्र प्रभाकर सिंह की आत्मीयता संग मिला उपहार 'कविता बरास्ते कवि—आलोचक' लौटते हवाई—सफर की भल—संगी रही। इस पर अलग से, विस्तार से लिखूंगा।.
कला—मन
- डॉ. राजेश कुमार व्यास
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Thursday, October 29, 2026
जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के कुलपति, मित्र प्रो. हिम चटर्जी की संगत
मुम्बई में इस बार सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के कुलपति, मित्र प्रो. हिम चटर्जी की संगत ने संपन्न किया। उन्होंने सर जमशेदजी जीजीभॉय द्वारा 1857 में स्थापित देश के इस विरल कला—संस्थान के विभिन्न संकायों का संग चल अवलोकन ही नहीं कराया, इससे जुड़े महती ऐतिहासिक—कला संदर्भों से भी अवगत कराया। उनके द्वारा भानु अथैया, गायतोण्डे, हेब्बर, अकबर पदमसी, दादासाहेब फाल्के, राम वी. सुतार आदि के शुरूआती दौर की सिरजी कलाकृतियों के बारे में जानने, उन्हें देखने के सुयोग में ही मन अभी तक रचा—बसा है। एक महती पहल उन्होंने संस्थान में यह की है कि पुराने डीन आवास को उस दौर के मास्टर्स कलाकारों के रेखांकनों की कलादीर्घा में रूपान्तरित किया है। भवन के प्राचीन स्थापत्य सौंदर्य में कलाकृतियों का यह गलियारा मन—भावन है। वह संस्थान में यहीं पेड़ों के झुरमूट—आलोक में एक आर्ट—हब स्थापित कर रहे हैं। मंशा यह है, दुनियाभर के कला—प्रेमी यहां आएं, छात्र—छात्राएं भारत में सिरजी महान कलाकारों की कलाकृतियों से रूबरू हों और इस स्थान को अनुभूत करें। उनसे साथ बतियाते ही जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के विभिन्न संकायों में, वहां के शिक्षकों से और छात्र—छात्राओं से संवाद में समय पंख लगाते उड़ता रहा। अच्छा भी लगा, एक कुलपति अपने संस्थान में सहज यूं भ्रमण करते अपने साथी आचार्यों संग इस तरह बतियाते बहुत कुछ नया करने के लिए उत्सुक है। वहां की कलाओं में रचते—बसते यह सब कर रहा है।
बहरहाल, रुडयार्ड किपलिंग के पिता जॉन लॉकवुड किपलिंग जे.जे. में ही वास्तुकला पढ़ाते थे। उन्होंने ही भारतीय कारीगरी का पश्चिम से समन्वय करते मुम्बई के विक्टोरिया टर्मिनस और दूसरी इमारतों के स्थापत्य सौंदर्य में बढ़त की। जॉन ग्रिफिथ्स भी तो यहीं पढ़ाते थे वही, जिन्होंने मशालों और मोमबत्तियों की रोशनी में अपने छात्रों के साथ वर्षों कड़ी मेहनत कर अजंता की गुफाओं के भित्तिचित्रों के संरक्षण में ही महती योगदान नही दिया बल्कि अजंता के कला—सौंदर्य का विश्वभर में परिचय कराया। देह से लौट आया हूं, पर मन तो अभी सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के गलियारों में ही बसा है...
मुम्बई के रवींद्र नाट्य मंदिर में व्याख्यान
मुम्बई के रवींद्र नाट्य मंदिर में 'वंदे मातरम्' के आलोक में व्याख्यान देने जाना हुआ।...अपने कहे में मास्टर कृष्णराव को स्मरण किया। मास्टर कृष्णराव भारतीय शास्त्रीय संगीत के ही मर्मज्ञ विद्वान नहीं थे बल्कि 'वंदे मातरम्' को समूहगान के रूप में स्थापति उन्होंने ही किया। उनके प्रयासों से ही अंतत: यह राष्ट्रगीत बना-
Monday, October 26, 2026
स्मृतिशेष : जोगेन चौधरी (25.10.2026) विचार का नहीं, दृश्यों का विचार—रूपान्तरण
जोगेन चौधरी का निधन पारंपरिक कलाकृतियों में निहित दृश्यों की आधुनिकी रचने वाले एक उम्दा भारतीय कलाकार से त्रहमारा बिछोह है। कुछ बरस पहले कोलकता में देश के मशहूर कलाकार युसूफ की कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी हुई थी, तभी उनसे प्रयाग शुक्ल जी ने भेंट कराई थी। बहुत अधिक नहीं, पर थोड़े से संवाद में ही उनको जानने—समझने का प्रयास किया था। पर, उनकी कलाकृतियों से आरंभ से ही एक संवाद होता रहा है। मुझे उनका कला—संसार इसलिए भी सुहाता रहा है कि वहां पर पश्चिम की बजाय भारतीय आधुनिकी सदा पाई। प्राय: यह होता है कि हम पश्चिम को मानक बनाते हुए उन्हीं विषयों और अमूर्त को अपना बनाने का प्रयास करने लगते हैं। जोगन चौधरी की कला में एब्स्ट्रेक्ट पश्चिम का था परन्तु दृष्टि सदा भारतीय रही। भारतीय विषय—वस्तुओं, मिथकों, लोक से जुड़ी संवेदनाओं को ही उन्होंने अपनी कलाकृतियो में स्वर दिया। चित्रों में अमूर्तन का आभास परन्तु दृश्यों की सुगंध वह घोलते थे। रेखाओं में निहित उनकी अपनी लय इसे कला में अलंकृत करती है। जोगेन चौधरी की कलाकृतियों की बड़ी विशेषता है, मानव मन की थाह। जो कुछ दिख रहा है, वही नहीं उन्होंने दृश्य के पार घटित संवेदना को भी अपने चित्रों में रंग—रेखाओं से निरंतर जीया। यह भी लगता है, जोगेन चौधरी की कला विचार का नहीं, दृश्यों का विचार—रूपान्तरण है। गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे, दैनिन्दिनी जीवन से जुड़े प्रसंगों पर एक खास तरह का ह्यूमर और सटायर उनके चित्रों में हैं--
Saturday, October 17, 2026
कलाओं में निहित दार्शनिक दृष्टि से जुड़ा पर्व

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026
भारतीय
कलाएं और पर्व सृजन के साथ विसर्जन
की गहन दार्शनिक व्यंजना है। यह
दुर्गा पूजा का समय
है। माँ दुर्गा की
सुंदर, शृंगारित प्रतिमाओं के ध्यान—ज्ञान से जुड़ा। कलाकार देवी को 'चक्षु
दान' करते हैं। दुर्गा
पूजा के लिए माँ
की पूरी मूर्ति पहले
ही रंग दी जाती
है, लेकिन आँखें कोरी छोड़ी जाती
हैं। बंगाली
मूर्तिकला परंपरा में 'चक्षु दान'
भोर के उजास में
होता है। कलाकार ध्यानस्थ
हो देवी का स्मरण
करता है। मंत्र संग
प्रार्थना होती है—जो
दिव्य दृष्टि पूरे ब्रह्मांड को
देखती है, वह इस
प्रतिमा में स्थापित हो।
'चक्षु दान' का अर्थ
ही है, दृष्टि देना।
इसी से प्रतिमा जीवंत होती है। यह
पितृ पक्ष का अंतिम
दिन और मातृ पक्ष
की शुरुआत हती है। देवी की सिरजी
प्रतिमाओं पर गौर करें,
माँ की आँखों में
करुणा, वात्सल्य और क्रोध तीनों
ही मिलेंगे।
देवी
दुर्गा की आराधना का
असल समय चैत्र नवरात्रि
है। पहले 'वासंती पूजा' का ही विधान
था। खगोलीय दृष्टि से, यही वह
समय होता है जब
पृथ्वी की धुरी और
सूर्य की स्थिति में
बदलाव होता है। दिन
और रात लगभग बराबर
होते हैं। ब्रह्मांड में
सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह इसी
समय सबसे अधिक होता
है। इसे पाने के
लिए ही देवी दुर्गा
की आराधना होती है। पौराणिक
मान्यताओं में देवी—देवताओं का समय उत्तरायण
और दक्षिणायन होता है। शरद
ऋतु देवी-देवताओं का
विश्राम समय होता है।
भगवान
श्रीराम द्वारा शक्ति पूजा के बाद शारदीय नवरात्र
का भी महत्व हो गया। यही वह समय था जब राम—रावण युद्ध हुआ।
युद्ध में रावण की
रक्षा स्वयं महाशक्ति कर रही थीं।
विभीषण और ब्रह्मा ने
तब श्रीराम को देवी आराधना
के लिए कहा। पर, यह देवी पूजा
का समय नहीं था।
राम ने अकाल बोधन
किया। माने असमय देवी
का आह्वान। देवी को उन्होंने
108 नीलकमल अर्पित करने का संकल्प
लिया। माँ परीक्षा लेने
के लिए एक कमल
छुपा देती है। राम
बहुत व्यथित होते हैं। औचक,
उन्हें याद आता है
कि बचपन में उन्हें
'कमल —लोचन' कहा जाता था।
संकल्प पूरा करने वह
अपनी एक आँख देवी
को अर्पित करने उद्यत होते
हैं कि देवी प्रकट
हो उनका हाथ पकड़
लेती है। विजय का
आशीर्वाद देती है। नौ
दिनों की शक्ति-उपासना
के दसवें दिन विजयादशमी
पर फिर भगवान श्रीराम
रावण का वध करते
हैं। मूल
वाल्मीकि रामायण में इस शक्ति
पूजा का उल्लेख नहीं
है।
बांग्ला
भाषा में 15वीं शताब्दी में
रचित 'श्रीराम पाञ्चाली' में यह प्रसंग
है। महाकवि कृत्तिवास
ओझा ने 'कालिका पुराण'
और 'बृहद्धर्म पुराण' जैसे उप-पुराणों
से प्रेरणा लेते हुए असमय
देवी जागरण का यह मार्मिक
प्रसंग लिखा है। बंगाल
में में देवी पूजा
का इतिहास हालांकि बहुत पुराना है,
पर 'कृत्तिवास रामायण' के बाद इसके
स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव
आया। वसंत ऋतु की
जगह शारदीय नवरात्र मुख्य त्योहार हो गया। वहां
के जमींदारों के बंद महलों
से निकलकर दुर्गा पूजा का पर्व
सार्वजनिक हो पूरे राष्ट्र का उत्सव बन
गया।
शारदीय
नवरात्र देवी—आराधना का पर्व भर
नहीं है। यह भारतीय
संस्कृति और कलाओं की
वह सूक्ष्म दृष्टि भी है जिसमें
सृजन के साथ विसर्जन
जुड़ा है। नौ दिन
दुर्गा पूजा होती हैं।
माँ के सुंदर स्वरूप
में ही मन ध्यान—मग्न
हो उठता है। नौ
दिन बीत जाते हैं
और, वह क्षण आता है
जब हमें देवी के
सुंदर स्वरूप को विसर्जित करना
होता है। सृजन और
विसर्जन का यह चक्र
ही प्रकृति और जीवन का
सत्य है। जो भी
रूप धारण करता है,
उसका विसर्जन या कहें बिछोह
ही उसकी दिव्यता को
अनंत में विलीन करना
है। माँ का
कलाकारों द्वारा सिरजा हुआ भौतिक रूप
भले ही विसर्जित हो
जाए, पर उनकी शक्ति
और प्रदत्त आध्यात्मिक ऊर्जा सदैव हमारे भीतर
जीवंत रहती है। यही
जीवन का, पर्व का
और कलाओं का उजास है।
drrajeshkumarvyas@gmail.com
संस्कृति की संधान भारतीय दृष्टि

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026
कलाओं की हमारी दृष्टि पर पश्चिम की छाया इतनी घनी है कि हम कलाओं के हमारे चिंतक, मर्मज्ञों की ओर प्राय: झांक ही नहीं पाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। लेखक, आलोचक मित्र प्रो. प्रभाकर सिंह ने इस आलोक में इधर महती पहल की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वासुदेवजी के कला, इतिहास और जनपदीयता से जुड़े विरल कार्य को केन्द्र में रखकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। उन्होंने इसमें बोलने की नूंत दी तो वासुदेव शरण अग्रवाल जी के कला—संस्कृति चिंतन ने मन को जैसे मथा। वासुदेव जी का शास्त्रीय कलाओं पर अध्ययन जितना गहरा है, लोक कलाओं पर उससे और भी कहीं अधिक है। लोक के चमत्कारी और अलौकिक अध्ययन की बजाय उसके बहुमुखी परिवेश को समझने की दृष्टि उन्होंने ही पहले पहल हमें दी। उनका लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां ओझल हुए भारतीय संस्कृति से जुड़े ग्रंथो का विरल भाष्य है, मार्मिक टीकाएं है उनका गहन अन्वेषण है और हां, पुरातत्व—अनुसंधान का भी 'भावन' है। भावन माने वह जो मन को भाए। चिंतन और मनन के साथ जिसमें गवेषणा समाई हो।
Tuesday, September 15, 2026
आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी
भारतीय कलाओं को विश्वभर में उसकी वास्तविक महिमा के साथ उजागर करने का विरल कार्य किसी ने किया तो वह आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी थे। अपनी लिखी ‘बगवियर ऑफ लिटरेसी’ (शिक्षा का हव्वा) पुस्तक में उन्होंने कहा भी है कि पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय शिक्षित समाज में भारतीय कला और संस्कृति के प्रति अवहेलना और उदासीनता का भाव पैदा किया है। उन्होंने स्थापित किया कि भारतीय कलाकृतियों में मूर्तिकारों, चित्रकारों ने प्रत्यक्ष में जो दिखता है, वही नहीं सिरजा है बल्कि उसके निहितार्थ भाव-भंगिमाओं में आकाश रचा है...।"
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| अमर उजाला, 13 सितम्बर 2026 |
Sunday, September 6, 2026
नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र ग्रंथ की समीक्षा
"कला तत्व" देता है निराकार को साकार रूप
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| पत्रिका, 29 अगस्त 2026 |
मुझे लगता है, भारतीय कलाओं की अंतर्दृष्टि का सार बहुत से स्तरों पर 'शिव सूत्र विमर्शिनी' में है। इसमें 'कला' तत्व के आध्यात्मिक संदर्भ मन को मथते हैं। आचार्य क्षेमराज लिखते हैं, “कला तत्व” ही निराकार को साकार रूप देने या किसी वस्तु को एक विशेष आकार-प्रकार प्रदान करने का आधार बनते है।
...आनंद कुमार स्वामी भारत के नहीं थे। उनकी माता एलिजाबेथ क्ले इंगलैण्ड की थी, पिता मुथु कुमारस्वामी श्रीलंका के थे। वह स्वयं सीलोन में खनिज निदेशक थे। उत्खनन के दौरान श्रीलंका में उन्होंने जब खुदाई में नटराज की, शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित विष्णु और ऐसे ही दूसरे देवी—देवताओं की मूर्तियां देखी तो उन्हें अचरज हुआ।
उन्होंने इनके अध्ययन के लिए संस्कृत, पाली आदि भाषाओं का अध्ययन किया। यह वह समय था जब पश्चिम में हमारे देवी-देवताओं की कई हाथों और चेहरों वाली मूर्तियों, चित्रों को देखकर मजाक उड़ाया जाता था।
आनंद कुमार स्वामी ने दुनिया को समझाया कि भारतीय कला बाहरी दुनिया की हूबहू नकल नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, भाव और आंतरिक सत्य को व्यक्त करने की महत्वपूर्ण दृष्टि है।
'द डांस ऑफ शिवा' में आनंद कुमार स्वामी लिखते हैं, शिव का नृत्य केवल एक कलात्मक सौंदर्य नहीं है। भौतिक जगत और चेतना की अनंत गतिशीलता का प्रकट रूप है। यह मूलतः प्रकृति, पदार्थ और प्रकृति के अंतर्संबंध को दर्शाता है।
आनंद कुमार स्वामी के बाद स्टेला क्रैमरिश ने एलोरा की गुफाओं में स्थित भगवान शिव की प्रतिमाओं का गहराई से विश्लेषण किया और लिखा कि शिव की उकेरी गुफा—प्रतिमाएं केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि वे कला के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और विनाश चक्र का रूपायन है। ..
















