साहित्य अकादेमी की नूंत पर नई दिल्ली में आयोजित साहित्योत्सव के अंतर्गत 'अखिल भारतीय लेखक सम्मिलन' में कविता, यात्रा वृतांत, डायरी, ललित निबंध और मायड़ भाषा राजस्थानी में लेखन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए...लौट आया हूं-साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, माधव कौशिक जी, साहित्यकार मित्रो के सान्निध्य—सुख को अंवेरते...
कला—मन
- डॉ. राजेश कुमार व्यास
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Saturday, April 4, 2026
Monday, March 30, 2026
जीवन—धन सहेजता गान
बड़े गुलाम अली ख़ान को सुनना जीवन धन सहेजना है। जीवनानुभूतियों की भांत भांत की छटाओं की गागर छलकते हुए पाना है। आवाज का उनका लचीलापन, अप्रत्याशित स्वर-संयोजन और तानों की अविश्वसनीय गति विरल है। राग मालकौंस , दरबारी कान्हड़ा, मालुहा केदार, राग खाट, बागेश्री, शुद्ध कल्याण, हंसध्वनि में समय को जैसे वह गान में रूपान्तरित करते हैं। वह दृश्य छटाओं का मनोरम रचते हैं। औचक। बार—बार।
सुनेंगे तो मिलन की उमंग, उत्साह, विरह की उदासी अनुभूत होगी तो प्रकृति की भांत—भांत की छटाओं को मन में जीवंत होता पाएंगे। स्वरों का माधुर्य ऐसा कि उसमें खिलती धूप, बादलों की छा रही घटाओं, फूलों के खिलने, सांझ घिरने, बादलों के बरसने आदि को देख—सुन और गुन सकते हैं। राग को, आलाप को घंटों तक खींचने की बजाय वह दोहराव से बचते संक्षिप्त प्रस्तुति में उसे सजाते और संवारते थे। और हां, ठुमरी की कालजयी दृष्टिं को समझना हो तो सुनें उनके स्वर—उजास में "का करूं सजनी आये न बालम" के बोल। लगेगा बिछोह की व्यथा जैसे अंतर्मन अनुभूति बन गई है। उनकी गाई यही नहीं, "प्रेम जोगन बन के","नैना मोरे तरस गए" जैसी ठुमरियां भी अंतर्मन संवेदनाओं का सागर है। वहां मनुहार है, अंतर की पुकार है और है विरह की व्यथा में गुंथा स्वर—उजास। ठुमरी से ध्रुपद अंग तक उनकी गायकी कहन का अपना 'सब रंग' अंदाज है। माने उसमें सभी रंग घुले होते हैं। सबरंग नाम से ख्याल और ठुमरी की विरल रचनाएं भी तो उन्होंने हमें दी है।मुझे लगता है, लोक संगीत की स्वच्छंद मिठास को उन्होंने शास्त्रीय संगीत के सुरों में, राग—नियमों के माधुर्य में पिरोया। उनके गान में सहजता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। हृदय को स्पर्श करता हुआ। सुनेंगे तो मन स्वरों की अतृप्त प्यास से भर उठेगा । बड़े गुलाम अली फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। पर, साठ के दशक में 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने गाया। कहते हैं, फिल्म के एक दृश्य में तानसेन को गाते हुए दिखाना था। नौशाद चाहते थे, बड़े गुलाम अली खान साहब उसे गाए। के. आसिफ आग्रह लेकर उनके पास पहुंचे तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। पर जब देखा कि वह नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने मेहनताने के 25 हजार रूपये मांग लिए। यह वह समय था जब लता मंगेशकर को भी गाने के पांच सौ रूपये से अधिक नहीं मिलते थे। बड़े गुलाम अली खान को लगा इससे फिल्म में गवाने का पीछा छूट जाएगा पर आसिफ ने स्वीकार कर लिया। उनके पास न गाने की अब कोई वजह नहीं थी। उन्होंने राग सोहनी और रागेश्वरी में 'मुगल-ए-आजम' में गाया। फिल्म जगत का ही नहीं यह शास्त्रीय संगीत की साधना का भी जीवंत इतिहास है।
सभी जानते हैं, यह वही बड़े गुलाम अली खान है जिन्होंने कभी लता मंगेशकर के बारे में कहा था, "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती।" लता के गायन की मिठास को बंया करने का यह उनका अपना अंदाज था। ठीक वैसे ही जैसे कभी उन्होंने 'हरिओम तत्सत' भजन को गाते हुए किसी तपस्वी की भांति स्वर—साधना की। गान में अर्चना का यह जीवंत इतिहास है। वह ऐसे ही थे। सुरमंडल संग अपनी खुद की ईजाद पटियाला-कसूर शैली में राग जयजयवंती,जौनपुरी, हमीर आदि मे जो भी गाते लगता है, भाव—भाव में रस छलक—छलक अंतर्मन के किसी कोने में छाई रिक्तताओं को भरता है।
लाहौर के निकट कसूर नामक स्थान पर पाकिस्तान में वह जन्मे। पिता अली बख्श खां कश्मीर के महाराजा के दरबारी गायक थे। चाचा काले खां से संगीत सीखने के बाद उन्होंने संगीत सफर की सारंगी वादक के रूप में शुरूआत की। पर, कोलकाता संगीत सम्मेलन में 1938 में उन्होंने जब सार्वजनिक प्रस्तुति दी तो उनकी सुरीली आवाज ने सुनने वालों के मन जीत लिए। मखमली, मन को भाने वाली मिठी आवाज में उन्होंने बाद में खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का घोल कर अपनी स्वयं की गायन—शैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें जीवन—रस घुला था।
बड़े गुलाम अली खान संगीत को ओढ़ते—बिछाते थे। कभी उनका गंभीर ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने पूर्ण विश्राम के लिए कहा। पर, 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने तीन सप्तकों तक फैली एक तान गा दी। टोका गया तो बोले, “संगीत बिना मेरे जीवन का क्या अर्थ? देखना चाहता था कि मेरी आवाज पर तो ऑपरेशन का कोई असर नहीं पड़ा।“ महाराष्ट्र सरकार ने 1967 में नृत्य महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया। रोशनी केवल उन पर थी। बाकी बत्तियाँ बुझी हुई थी। उन्होंने कहा, 'नहीं गा सकता। अंधेरे में किसी को देख ही नहीं पा रहा। मुझे अपने प्रिय श्रोताओं के दर्शन होंगे तभी गा सकता हूँ?' बत्तियां जला दी गईं। श्रोताओं की भीड़ की झलक पाते ही, राग छाया में “जो करे राम कृपा” गाते हुए वह खिल उठे थे। वह और उनका गान ऐसे ही सदा मन को मोहता था। इसीलिए कहूं, वह मन—मोहक हैं। उस्तादों के उस्ताद। जग गायक!
Sunday, March 29, 2026
काल के पार कांसा
'अमर उजाला' और 'नवभारत' में ...
टाइमलेस इन ब्रोंज
बिहार संग्रहालय में इस समय 'टाइमलेस इन ब्रोंज' माने कांस्य में कालजयी शीर्षक के अंतर्गत देश के प्रतिनिधि मूतिकारों की प्रदर्शनी लगी हुई है। इस प्रदर्शनी के आलोक में बोलने जाना हुआ। सुखद था, अपने व्याख्यान के बाद संग्रहालय में ही आउटलुक की संपादक चिंकी सिन्हा से हुए एक संवाद में मूर्तिकला की आधुनिकी पर भी महती विमर्श का भागीदार बना।...
Saturday, March 21, 2026
गणगौर

पत्रिका, 21 मार्च 2026
पर्व यानी पड़ाव। मिलन बिंदु। गन्ने में थोड़े—थोड़े अंतराल में उभरी हुई गांठे होती है। यही आगे से आगे उसे जोड़ती है। इनके बीच का हिस्सा मीठा और रसदार होता है। यही पर्व है। पर्व का अर्थ ही है, जीवन में घुली मिठास! गणगौर ऐसा ही है। शृंगार और सौंदर्य की व्यंजना से जुड़ा। पराशक्ति मां पार्वती के पूजन का अनुष्ठान-पर्व। संस्कृति की सुगंध। गण और गौर से मिलकर बना है—गणगौर।
‘गण माने शिव और ‘गौर यानी पार्वती। होली दहन के दूसरे दिन ही गवर पूजन शुरू हो जाता है। याद है, बचपन में ‘गढ़ सूं गौरल उतरी', 'गैरो गैरो गवरा बाई रो ढोलो बालम रसिया', 'गवर पूजूं, ईसर पूजूं' जैसे स्वर—माधुर्य से ही भोर में आंख खुलती। बहन अपनी सखियों संग अल—सुबह किसी एक स्थान पर एकत्र हो गणगौर पूजन प्रारंभ कर देती।
इस पूजन में भक्ति भाव की बजाय 'खेलने' का सखी भाव प्रमुख है। 'खेलण दो गणगौर' संग कन्याएं अच्छे वर के लिए गवर पूजती है, हंसी—ठिठोली संग होली की बची राख से पिंडिया बनाती हैं। मिट्टी के पात्र में गेंहू और जौ के बीज बोती है। पौधा अंकुरित होने तक रोज सौंदर्य—शृंगार और गहने पहनने की गुंथी संस्कृति के गीत गा उन्हें सींचती है। गान संग गुलाल के मांडणे मांडती है।
...गणगौर समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। कन्याएं ईसर-गौरा बनाकर एक पखवाड़े पूजती है। गवर के भांत भांत के शृंगार करती है। और फिर सोलहवें दिन गवर की सज—धजकर सवारी निकलती है। गवर को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
विसर्जन से ही जुड़ा है, सृजन। पेड़ो से पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी नए उगते हैं। गवर विसर्जन के साथ ही त्योंहारों की शृंखला एक बार थम जाती है। लोक में इसीलिए कहा गया भी है, "तीज त्यौहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर"। सावन की तीज पर पर्व शुरू होते हैं और चैत्र माह की गणगौर के साथ इनका समापन हो जाता है। फिर से नई उमंग, उत्साह संग नया कुछ करने के लिए।"
Thursday, March 12, 2026
’नवनीत’ मार्च अंक में ...
Sunday, February 22, 2026
कुरुक्षेत्र में व्याख्यान-नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा-
संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली के आग्रह पर कुरुक्षेत्र में "नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा" विषयक व्याख्यान देने जाना हुआ। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के समन्वय से अकादेमी ने जब कला समीक्षा कार्यशाला में आमंत्रित किया तो लगा, इस बहाने श्री कृष्ण द्वारा जहां अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया गया उस स्थान को देख सकूंगा। वहां भी गया जहां, महाभारत का युद्ध हुआ। वहां भी, जहां बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह के लिए अर्जुन ने धरती पर अपने तीर से बाणगंगा प्रकट की। महाभारत युद्ध से पहले श्री कृष्ण और पाण्डवों द्वारा महादेव की आराधना स्थल स्थानेश्वर मन्दिर, भद्रकाली शक्तिपीठ आदि बहुत से स्थलों की यात्रा भी इस बहाने हो गई। लौट आया हूं, पर अनुभव कर रहा हूं—कुरुक्षेत्र की ऊर्जा से अंतर्मन आलोक मिला है ...
कत्रिम बुद्धिमता के दौर में कला—संस्कृति से जुड़ी जीवंतता
कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंपैक्ट समिट ने वैश्विक
स्तर पर हमें अग्रणी
करने की दृष्टि से
भले ही जोड़ा है
परन्तु मौलिक चिंतन और मनन में
यह शून्य उपजाने की बहुत सी
आशंकाएं लिए भी है।
लुप्त कलाओं की रिकॉर्डिग, अभिलेखीय
संरक्षण में इसका बेहतर
उपयोग हो सकता है
परन्तु सब—कुछ जब मशीन
ही करेगी तो मौलिक रचने,
उसमें बसने की संभावनाएं
क्या तेजी से समाप्त
नहीं होगी! ए.आई. शून्य से सृजन
नहीं करती। मानव मस्तिष्क से
पुनर्संरचित और अनुमान पर
ही इसका अस्तित्व है।
पत्रिका, 21 फरवरी 2026
बड़ा संकट यह भी
है कि हमने सूचनाओं
को ही ज्ञान मानना
प्रारंभ कर दिया है।
सूचनाएं, संस्कृति से जुड़ी दृष्टि
तक पहुंच की सुगमता हो
सकती है परन्तु कलाओं
से जुड़ा विचार नहीं हो सकती।
भारतीय कलाएं प्रतिकधर्मी है। संगीत, नृत्य,
नाट्य, चित्रकलाएं आदि सभी में
प्रतीकों से सूचनाओं का
संप्रेषण होता है। एब्सट्रेक्ट
ही नहीं आदिवासी और
जनजातीय कलाओं के संसार में
जाएंगे तो पाएंगे, वहां
प्रतीकों में, अर्थगर्भित संकेतो
में और कहन की
भांत—भांत की छटाओं
में संसार बुना गया है।
ए.आई.बहुत सारे
एकत्र शास्त्रीय संगीत, नृत्य की भंगिमाओं, नाट्य
से जुड़ी परम्पराओं का एकत्रीकरण कर
स्वयंमेव बहुत सारा उससे
नया गढ़ देगी परन्तु
वहां मनुष्य सिरजे की जीवंतता कहां से आएगी!
प्रकृति की छटाएं, परिवेश
की सुगंध वहां कैसे घुलेगी!
जब बहुत सारा संस्कृति
से जुड़ा सूचनाओं का ढेर हमारे
पास सदा मौजूद रहेगा
तो यह भी हो
सकता है, हम कला
में नया कुछ रचने
की आदत को ही
बिसरा दें।
याद रखें, प्रकृति और परिवेश का
संतुलन बिगड़ते ही सूचनाओं के
स्त्रोत सूखने लगते हैं। मनुष्य
और मशीन में यही
बड़ा फर्क है। मनुष्य
मस्तिष्क परिवेश और प्रकृति प्रदत्त
सूचनाओं को निरंतर ग्रहण
करता है परन्तु कहीं
ठहरता नहीं है। इसलिए
बहुतेरी बार अनपेक्षित अप्रत्याशित
कलाओं का सृजन अनायास
मनुष्य मन कर देता
है। वह सूचनाओं का
आश्रित नहीं होता—सूचना पाने की उसमें
हौड़ नहीं होती। सहज,
स्वाभाविक सूचनाएं पाकर वह उससे
अपने आपको पोषित करता
है।
ए.आई. में कलाओं
से जुड़ी सूचनाओं के स्त्रोत महत्वपूर्ण
कारक होते हैं। इनके
आधार पर वहां बुद्धिमता
का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता दिखता है
पर यदि सूचनाएं गलत
होगी या अनर्गल होगी
तो सर्वथा विनाश की संभावनाएं भी
बनेगी। मशीन—मनुष्य में बड़ा भेद
यही है कि मशीन
प्रदत्त सुचनाओं अथवा बहुत सारे
एकत्र सूचना—बैंक का विश्लेषण
कर उनको नियोजित कर
परिणाम देगी परन्तु मानव
मन चेतन—अचेतन से, प्रकृति से
निंरतर संकेत—सूचनाएं तो लेता है
परन्तु अच्छे—बुरे में भेद
कर उसका उपयोग करना
जानता है। मशीन अच्छे—बुरे
में भेद नहीं कर
सकती। संस्कृति
का अर्थ है—सुधरा हुआ। परिष्कृत। जीवन
जीने का ढंग। कलाओं
में जीवन जीने का
यह ढंग अभिव्यक्ति पाता
है तो उर में
उमंग जगाता है। मनुष्य की
चैतन्य अवस्था का यह स्वाभाविक
गुण है। मशीन का नहीं।
सूचनाओं के विष्फोट के
इस दौर में मानव
मष्तिष्क को पढ़, उससे
अपना गढ़ने का गुण तो
कृत्रि बुद्धिमता ने पा लिया
है परन्तु सूचनाओं को संस्कृति मान
आगे बढ़ने की जोखिम बढ़ने लगी है। चिंतन, ठहरकर
सोचने की दृष्टि चुपके
से इससे हमसे लोप
होने लगी है। एकरसता
में विविधता सिमट रही है।
प्राचीन ग्रंथों, कलाओं से जुड़ी विरासत
का डिजिटलाईजेशन तो हो रहा
है परन्तु संकट यह है
कि उसमें जो कुछ हमारे
पास मौजूद हो रहा है—उसे
पढ़ने की फुर्सत एक
समय में बहुत सारा
एक साथ पाने के
लालच में क्या मिल
पाएगी!
Wednesday, February 18, 2026
हलीम जाफर खान
'दैनिक जागरण' में आज...
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| दैनिक जागरण 16 फरवरी 2026 |
Saturday, January 17, 2026
कलाओ में रस और नाट्यशास्त्र
![]() |
| पत्रिका 17 जनवरी, 2025 |
"...रस निष्पति माने स्वाद की सिद्धि। नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में आया है, ’न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते रस’ यानी रस के बिना किसी अर्थ का प्रवर्तन नहीं होता।
नाट्यशास्त्र पंचम वेद है। ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, साम से गीत और अथर्ववेद से इसमें रस लिया गया है। अथर्ववेद से रस क्यों? इसलिए कि अथर्ववेद मन से जुड़ा है। जादू टोना, वशीकरण, विवाह मर्यादा आदि भी इसी में है। अथर्व ब्रह्म वेद है। माने मन को जो बांध ले।
मन किससे बंधता है, भाव से ही तो! भाव से ही रस आता है। इसलिए कहूं, नाट्यशास्त्र का बीजाक्षर रस है। रस माने जोड़ना, जुड़ना, बांधना। वाल्मीकि ने तमसा के तट पर कोंच वध देखा। शोकाकुल हो उनके मन में श्लोक उपजा। यही विश्व की पहली कविता बन गई।
सुमित्रानंदन पंत ने इसलिए कहा, 'वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान, निकल आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अन्जान।’ रामायण क्या है? राम का अयन ही तो! राम-सीता की विरह गाथा। शोक दुख नहीं है। करुण रस है। दुखी आदमी कुछ रच नहीं सकता। रस रचता है।"...
























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