ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, September 6, 2026

नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र ग्रंथ की समीक्षा


'नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र संपादित ग्रंथ की समीक्षा प्रिय दशरथ कुमार सोलंकी जी ने की है। आभार! इस ग्रंथ का संपादन बड़ी चुनौती थी। नाट्यशास्त्र पर इतना कुछ पहले से है, फिर नया क्या? कृतज्ञ हूं, मेरे आग्रह पर मर्मज्ञ विद्वानों ने इसमें नाट्यशास्त्र के बहुविध आयामों, अनछूए पहलुओं पर लिखा है।
इसी से बहुत सी सामग्री नाट्यशास्त्र विमर्श—आलोक में संजो सका। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला ने इसे प्रकाशित किया है। तत्कालीन निदेशक फुरकान खान जी को इसका श्रेय जाता है...
पत्रिका, रविवारीय-6 सितम्बर 2026


"कला तत्व" देता है निराकार को साकार रूप

पत्रिका, 29 अगस्त 2026

आचार्य क्षेमराज का एक बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, 'शिव सूत्र विमर्शिनी'।
शिवसूत्रों की यह महत्वपूर्ण टीका है। आचार्य क्षेमराज अभिनवगुप्त के शिष्य थे।

मुझे लगता है, भारतीय कलाओं की अंतर्दृष्टि का सार बहुत से स्तरों पर 'शिव सूत्र विमर्शिनी' में है। इसमें 'कला' तत्व के आध्यात्मिक संदर्भ मन को मथते हैं। आचार्य क्षेमराज लिखते हैं, “कला तत्व” ही निराकार को साकार रूप देने या किसी वस्तु को एक विशेष आकार-प्रकार प्रदान करने का आधार बनते है।

...आनंद कुमार स्वामी भारत के नहीं थे। उनकी माता एलिजाबेथ क्ले इंगलैण्ड की थी, पिता मुथु कुमारस्वामी श्रीलंका के थे। वह स्वयं सीलोन में खनिज निदेशक थे। उत्खनन के दौरान श्रीलंका में उन्होंने जब खुदाई में नटराज की, शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित विष्णु और ऐसे ही दूसरे देवी—देवताओं की मूर्तियां देखी तो उन्हें अचरज हुआ।

उन्होंने इनके अध्ययन के लिए संस्कृत, पाली आदि भाषाओं का अध्ययन किया। यह वह समय था जब पश्चिम में हमारे देवी-देवताओं की कई हाथों और चेहरों वाली मूर्तियों, चित्रों को देखकर मजाक उड़ाया जाता था।

आनंद कुमार स्वामी ने दुनिया को समझाया कि भारतीय कला बाहरी दुनिया की हूबहू नकल नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, भाव और आंतरिक सत्य को व्यक्त करने की महत्वपूर्ण दृष्टि है।

'द डांस ऑफ शिवा' में आनंद कुमार स्वामी लिखते हैं, शिव का नृत्य केवल एक कलात्मक सौंदर्य नहीं है। भौतिक जगत और चेतना की अनंत गतिशीलता का प्रकट रूप है। यह मूलतः प्रकृति, पदार्थ और प्रकृति के अंतर्संबंध को दर्शाता है।

आनंद कुमार स्वामी के बाद स्टेला क्रैमरिश ने एलोरा की गुफाओं में स्थित भगवान शिव की प्रतिमाओं का गहराई से विश्लेषण किया और लिखा कि शिव की उकेरी गुफा—प्रतिमाएं केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि वे कला के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और विनाश चक्र का रूपायन है। ..

Monday, August 17, 2026

विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी

 विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी पर आज 'जागरण' में...




संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतरता

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में बीज वक्तव्य देने जाना हुआ। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी जी के सान्निध्य में कुलगुरु प्रो. सुरेश अग्रवाल जी ने आयोजन की महती पहल की।

संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए कहा, 'विभाजन से भारत की भौगोलिक सीमा से बाहर रह गए हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, शारदा पीठ, प्रह्लादपुरी मंदिर, सूर्य मंदिर, हिंगलाज माता मंदिर, कपासराज मंदिर और वरुण देव मंदिर सहित अन्य ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों की जो क्षति हुई, उसकी भरपाई कभी हो नहीं सकती। असल में पाक अधिकृत कश्मीर में शारदा पीठ के भारत में नहीं होने का बड़ा नुकसान यह भी हुआ है कि हमने नालंदा और तक्षशिला से भी महत्वपूर्ण ज्ञान-परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के अतीत को बिसरा दिया। विभाजन की विभिषिका बेकसूर लोगों की हत्या, करोड़ों लोगों के अपने घर, जमीन और अपनों को छोड़ने की व्यथा—कथा ही नहीं है, यह हमारी संस्कृति से जुड़ी विरासत से भी सदा—सदा के लिए अलग होना है। विभाजन अपनी जड़ों, इतिहास और सांस्कृतिक निरंतरता को खो देने की भी बड़ी क्षति है। संस्कृति की शक्ति उसकी निरंतरता के साथ परंपराओं की श्रेष्ठताओं को पहचानते हुए उनके संग भविष्य की दृष्टि का विकास करना भी है।...'







वंदे मातरम्

बंकिम चन्द्र का लिखा 'वंदे मातरम्' गीत भर नहीं है, भारतीय संस्कृति का नाद है। आजादी आंदोलन का बीज मंत्र कभी यही गीत बना था। इसका संपूर्ण गायन पहले पहल 1896 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में 'राष्ट्रीय सभा' के दूसरे अधिवेशन में हुआ। बंकिमचंद्र का 8 अप्रैल 1894 को निधन हो गया। पर, तब तक उनका लिखा 'वंदे मातरम्' राष्ट्र मंत्र बन जनजन से जुड़ गया था।

राजस्थान पत्रिका, 15 अगस्त 2026




Thursday, July 30, 2026

‘बाघ संरक्षण—संवाद’

 'जयपुर टाइगर फेस्टिवल' के आमंत्रण पर अन्तरराष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस, 29 जुलाई 2026 को ‘बाघ संरक्षण—संवाद’ में मानसरोवर स्थित दीप स्मृति ऑडिटोरियम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलने जाना हुआ। इस दौरान सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार—गायक और सीताबाणी वाइल्डलाइफ रिजर्व के संस्थापक अभिषेक रे और सरिस्का टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डायरेक्टर सुनयन शर्मा के साथ संवाद का सुयोग सुखद था। बाघ संरक्षण से जुड़ी सोच के साथ ही वन्य जीव अभ्यारण्य प्रबंधन, पारिस्थितिकी संतुलन पर विमर्श की यह महती पहल है...













Saturday, July 25, 2026

राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं-परिसंवाद

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा ​बीकानेर में 'राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं' विषयक एक दिवसीय परिसंवाद में समापन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में बोलने जाना हुआ। अपने अनुभवों के साथ राजस्थानी पत्रिकाओं में संपादकों द्वारा लिखवाए गए प्रसंगों को साझा करने के साथ ही देवेन्द्र सत्यार्थीजी की इस बात को भी विशेष रूप से रेखांकित किया कि 'लेखक से लिखवाना सबसे कठिन कार्य है।' यह भी कि राजस्थानी ही नहीं तमाम भाषाओं पर बाजार द्वारा पैदा संकट गहरा रहा है। शब्द—संस्कृति को बचाए रखना इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। इस दौरान राजस्थानी पत्रिकाओं के संपादन—सरोकारों के अंतर्गत कभी अंग्रेजी में ही लिखने वाले केन्या के उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो द्वारा भाषाई दासता छोड़ने के संकल्प के साथ अपनी स्वयं की गिकुयू-भाषा में लिखने से जुड़ी दृष्टि से जुड़ी पुस्तक 'डिकोलाइजिंग द माइंड' की विशेष रूप से चर्चा की।...

लौट आया हूं—अपने शहर में कुछ देर ठहर मिलने—मिलाने की अतृप्त प्यास को और घनीभूत रूप में अनुभव करते।















Saturday, July 18, 2026

शब्दों के मध्य संगीत

 

पत्रिका, 18 जुलाई 2026

शास्त्रीय संगीत रागाधारित है।  हरेक राग का अपना समय और भाव होता है। राग का एक अर्थ ही है, रंगना। राग कारण है और रस उसका परिणाम। अभिनवगुप्त ने नौ रस बताए हैं। पर, राजा भोज कहते हैंरस केवल एक ही 'शृंगार रस' है। उनका लिखा संस्कृत ग्रंथ 'शृंगारमंजरी कथा'  रागों के कारण और उसके परिणाम की कथाएं संजोए हैं।  इसमें एक प्रमुख कथा और उसकी फिर तेरह छोटीछोटी उपकथाएं हैं। कथा की शुरूआत राजा भोज द्वारा अपनी धारानगरी के महिमागान से होती है। औचक, फिर वह एक कठपुतली की ओर मुड़कर उसे बोलने का आदेश देते हैं। यांत्रिक गुड़िया भोज की महिमा का गान करती है। इसके बाद भोज अपनी प्रिय गणिका शृंगार-मंजरी और उसकी माता विषमा-शिला से कथा आगे बढ़ाते है। उपकथाओं में अलगअलग चरित्र के पुरूषों के राग और उसके परिणामों के आलोक मेंगणिका की मां द्वारा पुत्री को शिक्षा दी गई है। मसलन एक कथा में स्त्री के प्रति आसक्ति को नील के रंग समान बताया गया है। जैसे नील में रंगा कपड़ा कई बार धोने के बाद भी अपना रंग नहीं खोता, वैसे ही इस चरित्र का व्यक्ति बर्बाद होने के बाद भी अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता। इसी तरह केसर में रंगे कपड़े से जुड़े मानव मन के राग, हल्दी के रंग के जल्द छूट जाने आदि के आलोक में यह कथा पुरूष चरित्रों की स्त्री आसक्ति यानी रागअनुराग की मनोहारी व्यंजना है। 

असल में राग की अनुभूति गहन सौंदर्य बोध से ही तो जुड़ी है! आचार्य मम्मट रचित "काव्य प्रकाश" में रस, ध्वनि, अलंकार, और दोष का वर्णन है। एक कविता में परपुरूष की प्रीति से जुड़े रस का नायिका-कथन देखें, 'वही चांदनी रात है। वही रेवा का किनारा है। वही प्रेमी भी है, पर आज वह पहले वाली बात नहीं है। क्योंकि वह प्रेमी अब मेरा पति बन चुका है।' कहन में भाषा से जुड़ी यह लय ही राग बोध है। संतोष चौबे का एक उपन्यास है, 'जलतरंग।' मुख्य चरित्र देवाशीष और स्मृति के प्रेम में पगी यह मनोहारी कथा है। इसमें स्वरों में निहित भावरस और वहां पहुंचने के लिए राग में डूबने के बहाने संगीत की हमारी पूरी परम्परा का रोचक आख्यान है। रागों और उनसे जुड़े रसरंजन की किस्सागोई यहां है तो नाद, श्रुति, स्वर, राग, रूप, ताल, वाद्यइतिहास के विरल संदर्भ भी है। संतोष चौबे ने उपन्यास के पांच अध्याय संगीत की गतिमति में गूंथे हैं। यह हैं, आलाप, जोड़, विलम्बित, द्रुत और झाला। देवाशीष के 'जलतरंग' वाद्य यंत्र सीखने से प्रारंभ होती कथा उसकी मित्र स्मृति से हुए संवाद में आगे बढ़ती भारतीय संगीत संधान में बदलते समय में कर्कश होती ध्वनियों में समाज के विद्रुप होते चरित्र को हमारे समक्ष रखती है। मुझे लगता है, यह उपन्यास संगीत के जरिए समाज मे हो रहे बदलाव का कथारूप है।

संगीत से जुड़ा शब्द 'विदारी' मुझे सदा लुभाता रहा है। माने स्वर और उसके गुच्छों के बीच का अंतराल। यह 'विदारण' शब्द से बना है। यानी बीच से टुकड़े करना। स्वरप्रवाह के मध्य का मौन! निहित गूंज। जैसे किसी रंग के साथ दूसरे रंग की घुली छाया। स्पष्ट दिखती नहीं पर, अंतर्मन मथती है। 'विदारी' संगीत की 'गंधमयता' है। कथा के संदर्भ में कहें तो, वहां शब्दों के मध्य संगीत बजने, उनमें मधुर तान ​छीड़ने की अनुभति की अलौकिक छटा 'विदारी' है। संतोष चौबे की 'जलतरंग' ऐसी ही कृति है। वहां भाषा है, परन्तु उसकी लय और निहित सांगीतिक प्रंसगछटाओं में रागदारी परम्परा में जीवन से जुड़ी आत्मीयता घुली है। पर, बदलते समय संग आ रही कटुताओं में बिखरते जा रहे संगीत में रसविहीन होती दुनिया की दास्तां भी है। पढेंगे तो मन करेगा गुनें।

Tuesday, July 7, 2026

महाभारत में समाई लोक की सुगंध से बिछोह

 तीजन बाई पंडवानी गाती नहीं थी, लोक से जुड़े आलोक को अपने स्वराभिनय में रूपान्तरित करती थी। महाभारत के पात्रो, प्रसंगों और कथा में निहित लोकमर्म की गहरीदृष्टि उनमें थी। इसीलिए उनका गान जीवंत होता दृश्य छटाओं में हममें बसता था। महाभारत वेदव्यास रचित भारत का महाकाव्य है।  संस्कृत में नाटक को काव्य का चरम रूप माना गया है।  तीजन बाई ने इस महाकाव्य को अपनी पंडवानी कला में नाटक की तरह मन की आंखों से देखना संभव किया। पंडवानी माने पाण्डवों की वाणी। यह महज संयोग नहीं है कि जिस तरह संस्कृत कवियों द्वारा काव्य को दृश्यरूप देने की गहरी ललक रही है, ठीक वैसे ही तीजन बाई ने लोक ने समाई महाभारत को चाक्षुस रूप प्रदान किया। वह अपने ईजाद रंगीन फुँदनों वाले तानपुरे संग मंच पर चहलकदमी करते, गाती और अभिनय करती तो महाभारत की घटनाएं और पात्र जैसे हमारी आंखों के समक्ष जीवंत हो उठते।

पत्रिका, 7 जुलाई 2026

पंडवानी के दो प्रमुख रूप हैं। पहला वेदमती स्वरूप और दूसरा कापालिक। वेदमती माने शास्त्र पर आधारित काव्यगान। कापालिक, 'कपाल' से उपजा शब्द है। माने स्मृति से, सुनकर और उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़कर काव्य की मनोहारी प्रस्तुति।  तीजन बाई ने कापालिक स्वरूप में पंडवानी को नृत्यनाटिका में अपनी ओजस्वी वाणी से जनप्रिय किया।

यह सच है, महाभारत के रचयिता वेद व्यास हैं। पर, अकेले उनसे ही महाभारत कहां आगे बढ़ी है। लोक ने भी तो अपने मन से महाभारत को गुना और बुना है। गुजराती लोककथा मर्मज्ञ, साहित्यकार भगवानदास पटेल की कृति 'भीलों का भारत' कभी पढ़ी थी। मूल महाभारत की यह भील आदिवासियों की अपनी समझ से मौखिकरूप में आगे बढ़ी महाभारत कथा है। तीजन बाई भी जिस 'पारधी' जनजाति समुदाय से आती थी, उसमें महाभारत कहन की अपनी दृष्टि रही है। अपने नाना ब्रजलाल परधा से उन्हें इस लोककला की प्रारंभिक शिक्षा मिली। उनसे कथाओं को सुनते तीजन ने उन्हें लोक से जुड़ी भंगिमाओं और दृष्टि में अपने स्तर पर पुनर्नवा किया।

अपने तानपुरे संग नृत्यगान और अभिनय की पंडवानी की उनकी आनुष्ठानिक शैली इसलिए भी सदा सुहाती रही है कि वहां पर किसी तरह का कोई बनावटीपन नहीं है। वह जब पंडवानी में 'राजा के राज मं रहना है तो हाजिर, हाजिर कहना है' जैसे संवादों के साथ दुशासन वध, द्रोपदी चीर हरण, भीम से जुड़े प्रसंगो को अपनी गर्जभरी आवाज में सुनाती जो महाभारत अंश रूप में नहीं समग्रता बोध में हममें जैसे बसने लगती है।  कुरुक्षेत्र में कृष्णअर्जुन संवाद को अपने नृत्यअभिनय में जींवत करते जिस तरह से वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का अभिनय करती या फिर भीम से जुड़ी कहानियों को सुनाती या फिर शंकरपार्वती संवाद के अंतर्गत 'भोलाला पूछे पार्वती' जैसा कुछ गाती तो लगता था, कथा से एकमेक होती वह उसमें प्रवेश कर जाती थी। उनके हाथ का तंबूरा भीम की गदा बन कभी लुभाता तो अर्जुन का धनुष बनकर भी मन को हर्षाता। छत्तीसगढ़ी बोली,  लोक मुहावरों और सहज उपजे हास्य की उनकी कला ने महाभारत की कथा को भी सर्वथा नया आयाम देते इसे जनमन से जोड़ा।

महाभारत की कथाओं को गाते, उनमें निहित भावों पर अपनी अभिनय छटाओं से लुभाने के साथ स्वरों के उतारचढ़ाव में मंच पर किन्हीं विशेष प्रसंगो में तीजन बाई बहुतेरी बार भावुक हो उठती और देखने वालों को भी कथासमय में ले जाती थी। वह जब 13 वर्ष की ही थी, तभी अपनी कला का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। यह वह समय था जब महिलाओं का इस क्षेत्र में आना वर्जित था। पंडवानी पुरुष ही गा सकते थे। पर, तीजन बाई ने इस मिथक को तोड़ा। बहुत विरोध हुआ। निरंतर संघर्ष झेला पर इस कला में तीजन बाई ने अपने को इस कदर साधा कि फिर वह इसकी पर्याय ही हो गई।

महाभारत के कथा तत्व में लोकभावनाओं को जोड़ उसने गायन में किस्सागोई का भी अपना सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। यह ऐसा था जिसमें सुनने वाला दृश्य के वायवीय लोक में विचरण करता सुनते और देखते स्वयं भी उसका हिस्सा हो जाता था। गान संग तीजन बाई की आंगिक मुद्राओं को जब भी देखा, मन मुग्ध हुआ। आवाज में गान संग ओजस्वी हुंकार और गर्जन की उनकी शैली इसलिए भी लोकप्रिय हुई कि वहां पर संवेदनाओं का लोकउजास समाया होता था। श्याम बेनेगल ने कभी अपने धारावाहिक 'भारत एक खोज' में उनके इसी गर्जन का महाभारत से जुड़े प्रसंगों में सुमधुर उपयोग किया। बाद में एक दफा भारत भवन में जब तीजन बाई का कार्यक्रम हुआ तो हबीब तनवीर भी उससे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने फिर वैश्विक मंच पर इस कला प्रोत्साहन के नए अवसर उन्हें दिए।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाटक को लोक का अनुकरण नहीं अनुकीर्तन कहा गया है। माने जो लिखा गया है, जो हो चुका हैउसकी कला द्वारा मौलिक व्याख्या। इस दीठ से तीजन बाई ने महाभारत का अनुकीर्तन किया। तीजन बाई ने 'पंडवानी' के जरिए शास्त्रीय परम्परा में समाई लोक की सुगंध, उससे जुड़े आलोक से हमें जोड़ा। उनका बिछोह लोक कलाओं से जुड़ी हमारी विरल परम्परा की अंतिम कड़ी के टूटने जैसा है। तीजन बाई छत्तीसगढ़ में भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं। भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी, नृत्य शिरोमणि आदि बहुत से पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया।