ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Tuesday, July 7, 2026

महाभारत में समाई लोक की सुगंध से बिछोह

 तीजन बाई पंडवानी गाती नहीं थी, लोक से जुड़े आलोक को अपने स्वराभिनय में रूपान्तरित करती थी। महाभारत के पात्रो, प्रसंगों और कथा में निहित लोकमर्म की गहरीदृष्टि उनमें थी। इसीलिए उनका गान जीवंत होता दृश्य छटाओं में हममें बसता था। महाभारत वेदव्यास रचित भारत का महाकाव्य है।  संस्कृत में नाटक को काव्य का चरम रूप माना गया है।  तीजन बाई ने इस महाकाव्य को अपनी पंडवानी कला में नाटक की तरह मन की आंखों से देखना संभव किया। पंडवानी माने पाण्डवों की वाणी। यह महज संयोग नहीं है कि जिस तरह संस्कृत कवियों द्वारा काव्य को दृश्यरूप देने की गहरी ललक रही है, ठीक वैसे ही तीजन बाई ने लोक ने समाई महाभारत को चाक्षुस रूप प्रदान किया। वह अपने ईजाद रंगीन फुँदनों वाले तानपुरे संग मंच पर चहलकदमी करते, गाती और अभिनय करती तो महाभारत की घटनाएं और पात्र जैसे हमारी आंखों के समक्ष जीवंत हो उठते।

पत्रिका, 7 जुलाई 2026

पंडवानी के दो प्रमुख रूप हैं। पहला वेदमती स्वरूप और दूसरा कापालिक। वेदमती माने शास्त्र पर आधारित काव्यगान। कापालिक, 'कपाल' से उपजा शब्द है। माने स्मृति से, सुनकर और उसमें अपनी ओर से कुछ जोड़कर काव्य की मनोहारी प्रस्तुति।  तीजन बाई ने कापालिक स्वरूप में पंडवानी को नृत्यनाटिका में अपनी ओजस्वी वाणी से जनप्रिय किया।

यह सच है, महाभारत के रचयिता वेद व्यास हैं। पर, अकेले उनसे ही महाभारत कहां आगे बढ़ी है। लोक ने भी तो अपने मन से महाभारत को गुना और बुना है। गुजराती लोककथा मर्मज्ञ, साहित्यकार भगवानदास पटेल की कृति 'भीलों का भारत' कभी पढ़ी थी। मूल महाभारत की यह भील आदिवासियों की अपनी समझ से मौखिकरूप में आगे बढ़ी महाभारत कथा है। तीजन बाई भी जिस 'पारधी' जनजाति समुदाय से आती थी, उसमें महाभारत कहन की अपनी दृष्टि रही है। अपने नाना ब्रजलाल परधा से उन्हें इस लोककला की प्रारंभिक शिक्षा मिली। उनसे कथाओं को सुनते तीजन ने उन्हें लोक से जुड़ी भंगिमाओं और दृष्टि में अपने स्तर पर पुनर्नवा किया।

अपने तानपुरे संग नृत्यगान और अभिनय की पंडवानी की उनकी आनुष्ठानिक शैली इसलिए भी सदा सुहाती रही है कि वहां पर किसी तरह का कोई बनावटीपन नहीं है। वह जब पंडवानी में 'राजा के राज मं रहना है तो हाजिर, हाजिर कहना है' जैसे संवादों के साथ दुशासन वध, द्रोपदी चीर हरण, भीम से जुड़े प्रसंगो को अपनी गर्जभरी आवाज में सुनाती जो महाभारत अंश रूप में नहीं समग्रता बोध में हममें जैसे बसने लगती है।  कुरुक्षेत्र में कृष्णअर्जुन संवाद को अपने नृत्यअभिनय में जींवत करते जिस तरह से वह धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने का अभिनय करती या फिर भीम से जुड़ी कहानियों को सुनाती या फिर शंकरपार्वती संवाद के अंतर्गत 'भोलाला पूछे पार्वती' जैसा कुछ गाती तो लगता था, कथा से एकमेक होती वह उसमें प्रवेश कर जाती थी। उनके हाथ का तंबूरा भीम की गदा बन कभी लुभाता तो अर्जुन का धनुष बनकर भी मन को हर्षाता। छत्तीसगढ़ी बोली,  लोक मुहावरों और सहज उपजे हास्य की उनकी कला ने महाभारत की कथा को भी सर्वथा नया आयाम देते इसे जनमन से जोड़ा।

महाभारत की कथाओं को गाते, उनमें निहित भावों पर अपनी अभिनय छटाओं से लुभाने के साथ स्वरों के उतारचढ़ाव में मंच पर किन्हीं विशेष प्रसंगो में तीजन बाई बहुतेरी बार भावुक हो उठती और देखने वालों को भी कथासमय में ले जाती थी। वह जब 13 वर्ष की ही थी, तभी अपनी कला का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। यह वह समय था जब महिलाओं का इस क्षेत्र में आना वर्जित था। पंडवानी पुरुष ही गा सकते थे। पर, तीजन बाई ने इस मिथक को तोड़ा। बहुत विरोध हुआ। निरंतर संघर्ष झेला पर इस कला में तीजन बाई ने अपने को इस कदर साधा कि फिर वह इसकी पर्याय ही हो गई।

महाभारत के कथा तत्व में लोकभावनाओं को जोड़ उसने गायन में किस्सागोई का भी अपना सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। यह ऐसा था जिसमें सुनने वाला दृश्य के वायवीय लोक में विचरण करता सुनते और देखते स्वयं भी उसका हिस्सा हो जाता था। गान संग तीजन बाई की आंगिक मुद्राओं को जब भी देखा, मन मुग्ध हुआ। आवाज में गान संग ओजस्वी हुंकार और गर्जन की उनकी शैली इसलिए भी लोकप्रिय हुई कि वहां पर संवेदनाओं का लोकउजास समाया होता था। श्याम बेनेगल ने कभी अपने धारावाहिक 'भारत एक खोज' में उनके इसी गर्जन का महाभारत से जुड़े प्रसंगों में सुमधुर उपयोग किया। बाद में एक दफा भारत भवन में जब तीजन बाई का कार्यक्रम हुआ तो हबीब तनवीर भी उससे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने फिर वैश्विक मंच पर इस कला प्रोत्साहन के नए अवसर उन्हें दिए।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाटक को लोक का अनुकरण नहीं अनुकीर्तन कहा गया है। माने जो लिखा गया है, जो हो चुका हैउसकी कला द्वारा मौलिक व्याख्या। इस दीठ से तीजन बाई ने महाभारत का अनुकीर्तन किया। तीजन बाई ने 'पंडवानी' के जरिए शास्त्रीय परम्परा में समाई लोक की सुगंध, उससे जुड़े आलोक से हमें जोड़ा। उनका बिछोह लोक कलाओं से जुड़ी हमारी विरल परम्परा की अंतिम कड़ी के टूटने जैसा है। तीजन बाई छत्तीसगढ़ में भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं। भारत सरकार ने उन्हें 1988 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी, नृत्य शिरोमणि आदि बहुत से पुरस्कारों से उन्हें सम्मानित किया गया।

 

Monday, June 22, 2026

सुगठित भावों की गगरी सा गान

 ओंकारनाथ ठाकुर का गान सुगठित भावों की गगरी सा है। शब्दों संग स्वरों के उतार-चढ़ाव की उनकी शैली मन को मथती है। सुनते समय और उसके बाद भी। राग भैरवी में मीरा का भजन 'जोगी मत जा' सुनें। शब्दों में निहित भाव जैसे संगीत में रूपान्तरित हो गए हैं। स्वरों की विरल पुकार यहां है। इसमें उभरता और सदा के लिए मन में बसा रह जाता है-स्वरोच्चार, 'जोगी'! ऐसे ही मालकोंस में 'पग घूंघरू बांध मीरा' को सुनेंगे तो एकबारगी लगेगा सहज—स्वरों में सरलतम रूप में उन्होंने इसे साधा है। पर, उनके गान की स्वर—छटाओं में रमेंगे तो यह भी लगेगा, राग को दार्शनिक गहराई में उतारते वह अद्भुत सम्मोहन से हमें बांध रहे हैं। और यही क्यों? कोमल ऋषभ आसावरी में विलंबित और द्रुत ताल में उनका गान जैसे अमृत की बरखा करता है। ध्रुपद अंग को गले में बिठाते वह स्वरों का जैसे वशीकरण मंत्र पढ़ते हैं। विश्वास नहीं हो तो, राग भीमपलासी में विलंबित एकताल ही सुनें। स्वर दर स्वर और उसका अनुकीर्तन करता एम.एस. गोपालकृष्ण का वायलीन माधुर्य! उनका आलाप सुहाता है तो रागो का निभाव अंतर्मन आलोक से भरता है। मालकोंस में उन्हें सुनेंगे तो लगेगा जीवन—उजास मिल रहा है। भैरवी सुनेंगे तो पाएंगे स्वर—सम्मोहन की किसी डोर से हम बंध रहे हैं। हरेक राग में वह उसके भीतर के रस का मर्म समझाते हैं। आत्म से साक्षात् कराता उनका कंठ जीवन—धन ही तो है! मुझे यह भी लगता है, वह राग से रंजन नहीं करते बल्कि समाधिस्थ चित्त मे ले जाने की क्षमता रखते थे। यह था तभी तो इटली के तानाशाह मुसोलिनी उनका गान सुनकर रो पड़े थे। जगदीशचन्द्र बसु ने स्वीकारा कि पेड़-पौधे उनके संगीत से झुमते हैं। महात्मा गांधी को भी कहना पड़ा था कि उनके एक ही गान में वह जितना हासिल कर सकते हैं, उतना वह बहुत सारे भाषणों से प्राप्त नहीं कर सकते। सूरत के लोगों का यह मानना था कि उनका गान उन्हें अकाल से बचा सकता है। मुझे लगता है, जीते-जी किंवदंती बनने वाले वह महान गायक थे।...



द मैन हू स्टोल द गोड्स

पत्रिका, 20 जून 2026

हमारे यहां कलाओं की पुस्तकें बंधी—बंधाई लीक में एकरसता लिए हैं। अधिकांश पुस्तकें या तो सैद्धान्तिकी लिए हैं या फिर बहुत सी दूसरी पुस्तकों से तैयार एकरसता पसराती पाठ्यपुस्तकनुमा।

इस आलोक में अशोक कुमार सिन्हा की हाल ही आई पुस्तक 'मिथिला चित्रकला' उम्मीद जगाती है। रसिक मन से लिखी यह यह बगैर राज्याश्रय फली—फूली मिथिला चित्रकला का अतीत भर नहीं है, बल्कि उससे जुड़े संसार की मनोरम दृष्टि है।

...कलाओं का इतिहास उसके बाज़ार से भी जुड़ा है। साठ के दशक में कलाओं में निवेश को वैधता मिलने के साथ ही विश्व में एक नया आर्थिक युग प्रारंभ हुआ। इसके साथ ही विरासत से जुड़ी कलाकृतियों की चोरी और तस्करी भी तेजी से बढ़ी।

कला—इतिहासकारों में भी इससे ऐसे लोग सामने आने लगे जो कला—रसिक न होकर कला—बाजार, निजी या सरकारी कलादीर्घाओं की उपज थे। ऐसे ही कला—इतिहासकार में डगलस लैचफोर्ड का नाम भी जुड़ा। लैचफोर्ड असल में कला—संग्राहक रूप में कंबोडिया और थाईलैंड के जंगलों में छिपे प्राचीन खमेर साम्राज्य के मंदिरों से दुर्लभ कलाकृतियों की चोरी करवाकर तस्करी करने से जुड़ा था।

मूर्तियों को खंडहरों से, प्राचीन मंदिरों से साबुत और जल्दी निकालने के लिए वह निर्मम तरीके से ब्लास्टिंग और विष्फोट करवाता। इसी से स्थानीय लोगों ने उसका एक नाम ’डायनामाइट डग’ रख रखा था। मैथ्यू कैंपबेल की हाल ही आई पुस्तक ’द मैन हू स्टोल द गोड्स’यह सब बताती है। हिन्दी में इस तरह की पुस्तकों का अभी भी बड़ा अभाव है।

Monday, June 8, 2026

संस्कृति की जीवंत दृष्टि के चितेरे

 कुबेर नाथ राय अकेले ललित निबंधकार हैं जिन्होंने दर्शन और कलाओं की अपने लिखे में संधि की है। भारतीयता को वह किसी अवधारणा में नहीं बल्कि जीवंत दृष्टि से अभिहित करते हैं। शास्त्र, लोक, मिथक, प्रकृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय उनके लिखे में है। संगीतमय और चित्रात्मक भाषा की उनकी लेखनदृष्टि में पत्तियों के झरने में धरती के सौंदर्य की करुणम अवस्था को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, वह हमारी  संस्कृति के अद्भुत आख्याता और विरल व्याख्याता हैं। उन्हें पढ़ना शब्द, भाव और जीवनगत सौंदर्य से साक्षात् होना है।

कुबेर नाथ राय शब्द के भीतर बसे शब्द का अर्थान्वेषण कर उनका मर्म छुआने वाले रससिद्ध ललित निबंधकार हैं। उनके ललित निबंध वेद, उपनिषद्, पुराण, मिथकों और लोक में रचेबसे मन के अनछुए संदर्भ उद्घाटित करते हैं।  मुझे यह भी लगता है, ललित निबंध की भारतीय परंपरा को उन्होंने ही सांस्कृतिक, दार्शनिक और सौंदर्यबोधी अन्वेषण में नये आयाम दिए। वह अनूठे शब्द-द्रष्टा हैं। इसलिए कि वहां ठौर-ठौर जीवन की सुगंध समाई है।  मराल, ’प्रिया निलकंठी, ’रस-आखेटक, ’रामायण महातीर्थतम्, ’निषाद बांसुरी, ’गंधमादन, ’विषाद योगआदि ललित निबंध संग्रहों के उनके शीर्षकों पर ही जाएंगे तो पाएंगे वहां अर्थ के अनूठे गवाक्ष खुलते हैं। भाषा के सहज प्रवाह संग कहन की उनकी मौलिक दृष्टि इसलिए भी लुभाती है कि वहां पर शब्द-शब्द भावनाओं का रस छलकता है। लोक के आलोक में मनोविज्ञान से जुड़ी उनकी दृष्टि में परम्परा और अतीत ही नहीं झिलमिलाता है, आधुनिकता बोध का सातत्य है।

कुबेरनाथ राय ने  होमर, वर्जिल और शेक्सपीयर को भी अपने लिखे में गहरे जिया है, पर वहां भाषा और भावभंगिमा में देशी भारतीय संस्कारों की सुगंध घुली है। उनके ही शब्दों में कहूं तो हिन्दुस्तानी मन को उन्होंने अपने लिखे मेंविश्व चित्तसे जोड़ पाठकों की मानसिक ऋद्धि की है।

अमर उजाला, 7 जून 2026

कभी उनके एक ललित निबंधतिष्य नक्षत्र, कवि भिक्षु और महापृथिवीको पढ़कर उनसे अनुराग हुआ था। शब्द-शब्द अर्थ की विरल छटाओं को बरसाते उनके इस ललित निबंध में  ’तिष्य, ’पुष्य, शब्दों के विरल अर्थसंदर्भ हैं। अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता का इसमें मार्मिक उल्लेख है। बौद्ध धर्म के प्रति श्रद्धा के साथ ही सम्राट अशोक बूढ़ा हो चला था। तिष्यरक्षिता के आंगंन में ही बोधिद्रुम की स्थापना हुई। इसी समय में तिष्यरक्षिता ने अपनी काम-पिपासा सम्राट के पुत्र कुणाल से बुझानी चाही। सम्राट पुत्र कुणाल के अस्वीकार करने पर उसकी आंखे ही निकलवा ली। कुबेरनाथ राय ने इस निबंध में अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा उकेरे एक चित्र का उल्लेख किया है। इस चित्र में बोधिवृक्ष की छिन्न-भिन्न उखाड़ी गई एक शाखा है जिसकी ओर बड़ी उपेक्षा और अहंकार भाव से तिष्यरक्षिता देख रही है। उसके अपेक्षाकृत बड़े आकार के स्तनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ईषत् लटके हुए पूर्ण विकसित स्तनों को मातृकाओं से जोड़ते उसके मां बनने की चाह की विरल व्यंजना की है।  परम्पराओं में समाई दृष्टि से विपरीत उन्होंने अपने इस ललित निबंध में स्थापित किया है कि संभव है, तिष्यरक्षिता के क्रोध का कारण काम तृषा नहीं, मातृत्व तृषा है।

कुबेरनाथ राय के समग्र लिखे में इसी तरह की मौलिक चिंतन-दृष्टि का विस्तार है। मुझे यह भी लगता है, भारतीय दर्शन ही नहीं साहित्य,  धर्म, अध्यात्म और लोक जीवन के अब तक लिखे में छूटे हुए सुंदर्भों से वह हमारा नाता कराते हैं। वह मन को मायावी नट कहते हैं। लिखते हैं, हम देखने कुछ जाते हैं और उसके बहाने बहुत सारा और देखने लग जाते हैं। असल में कुबेरनाथ राय का समग्र लेखन भी इस आलोक में दृश्यभाषा में हमारी संस्कृति का गहन अन्वेषण करता पाठक के बौद्धिक क्षितिज का विस्तार करता है।

अपने एक ललित निबंध में वह लिखते हैं, भारतीय आर्यनव्य आर्यहैं। इसकी संरचना इतिहास विधाता ने आर्य-द्राविड़-निषाद-किरात, इन चार संयुक्त तत्त्वों से की है। वह भारतीय संस्कृति के तीन प्रमुख आधार वैदिक, तांत्रिक और लोकायत में ले जाते हुए पाठकों को कामधेनु, देवी, नटराज, शेषशायी, यक्ष, श्रीदेवता आदि बहुत से हमारे प्रतीक और बिम्बों की मूल्यपरक और ऐतिहासिक दृष्टि का नया चिंतन हमें देते है। वह लिखते हैं, पूर्ण भारतीय बनने का अर्थ हैरामजैसा बनना।

मुझे लगता है भाषा और कहन की सर्वथा भिन्न भंगिमा के लालित्य में कुबेरनाथ राय शब्द की संस्कृति में आस्था जगाने वाले अनुपम द्रष्टा हैं। इसलिए कि वह भाषा को उसकी मूल संस्कृति से जुड़ी गहराई में परिभाषित करते हैं। इसलिए भी कि अपने लिखे में वह स्थापित करते हैं कि भाषा और शब्दों के प्रयोग को सतही या कामचलाऊ दृष्टि से नहीं ग्रहण करना चाहिए। वह लिखते हैं, 'शब्दों के भूल जाने का अर्थ होता है संस्कारों को भूल जाना।' वह ऐसी हिंदी के हिमायती रहे हैं जिसे समग्र भारतवर्ष समझे और इसका महाकोश लोकभाषा, प्रांतीय भाषा और संस्कृत के सहयोग से विस्तृत हो। यह भी कि भारत से जुड़ने का अर्थ है-शिवत्व, बुद्धत्व, रामत्व के आलोक में मनुष्य, पृथ्वी और ईश्वर से जुड़ना।

कुबेरनाथ राय का लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां पर अपने आपको स्थापित करने का कोई आग्रह नहीं है। लोक और शास्त्र के साथ बौद्धिक स्तर पर छुटे हुए संदर्भों की सर्वथा नई जमीन कुबेरनाथ राय ने  तैयार की है। उनके बरते शब्द अपनी लय में और अर्थगर्भित संदर्भों में चमत्कृत करने वाले हैं। भाषा की अनूठी लय वहां है। अपने एक ललित निबंध संग्रह की भूमिका में उन्होंने लिखा है, मेरा लिखा चन्दन काष्ठ है। लिखे के इस मर्म में जाएंगे तो यह भी लगेगा चन्दन को घिसते हैं तभी सुगंध मिलती है।  सुगंध पाने के लिए ठहरकर, धीरज के साथ पढ़ना होगा। पढेंगे तो उस समय ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी जीवनपर्यन्त हम उसकी खुशबू से महकते रहेंगे।