तीजन बाई पंडवानी गाती नहीं थी, लोक से जुड़े आलोक को अपने स्वराभिनय में रूपान्तरित करती थी। महाभारत के पात्रो, प्रसंगों और कथा में निहित लोक—मर्म की गहरी—दृष्टि उनमें थी। इसीलिए उनका गान जीवंत होता दृश्य छटाओं में हममें बसता था। महाभारत वेदव्यास रचित भारत का महाकाव्य है। संस्कृत में नाटक को काव्य का चरम रूप माना गया है। तीजन बाई ने इस महाकाव्य को अपनी पंडवानी कला में नाटक की तरह मन की आंखों से देखना संभव किया। पंडवानी माने पाण्डवों की वाणी। यह महज संयोग नहीं है कि जिस तरह संस्कृत कवियों द्वारा काव्य को दृश्य—रूप देने की गहरी ललक रही है, ठीक वैसे ही तीजन बाई ने लोक ने समाई महाभारत को चाक्षुस रूप प्रदान किया। वह अपने ईजाद रंगीन फुँदनों वाले तानपुरे संग मंच पर चहलकदमी करते, गाती और अभिनय करती तो महाभारत की घटनाएं और पात्र जैसे हमारी आंखों के समक्ष जीवंत हो उठते।
![]() |
| पत्रिका, 7 जुलाई 2026 |
पंडवानी
के दो प्रमुख
रूप हैं। पहला
वेदमती स्वरूप और
दूसरा कापालिक। वेदमती
माने शास्त्र पर
आधारित काव्य—गान। कापालिक,
'कपाल' से उपजा शब्द है।
माने स्मृति से,
सुनकर और उसमें
अपनी ओर से कुछ जोड़कर
काव्य की मनोहारी
प्रस्तुति। तीजन
बाई ने कापालिक
स्वरूप में पंडवानी
को नृत्य—नाटिका में
अपनी ओजस्वी वाणी
से जन—प्रिय किया।
यह सच है,
महाभारत के रचयिता
वेद व्यास हैं।
पर, अकेले उनसे
ही महाभारत कहां
आगे बढ़ी है।
लोक ने भी तो अपने
मन से महाभारत
को गुना और बुना है।
गुजराती लोककथा मर्मज्ञ,
साहित्यकार भगवानदास पटेल की कृति 'भीलों
का भारत' कभी
पढ़ी थी। मूल महाभारत की यह भील आदिवासियों
की अपनी समझ
से मौखिक—रूप में आगे बढ़ी
महाभारत कथा है। तीजन बाई
भी जिस 'पारधी'
जनजाति समुदाय से
आती थी, उसमें
महाभारत कहन की अपनी दृष्टि
रही है। अपने
नाना ब्रजलाल परधा
से उन्हें इस
लोककला की प्रारंभिक
शिक्षा मिली। उनसे
कथाओं को सुनते
तीजन ने उन्हें
लोक से जुड़ी
भंगिमाओं और दृष्टि
में अपने स्तर
पर पुनर्नवा किया।
अपने
तानपुरे संग नृत्य—गान और अभिनय
की पंडवानी की
उनकी आनुष्ठानिक शैली
इसलिए भी सदा सुहाती रही
है कि वहां पर किसी
तरह का कोई बनावटीपन नहीं है।
वह जब पंडवानी
में 'राजा के राज मं
रहना है तो हाजिर, हाजिर
कहना है' जैसे
संवादों के साथ दुशासन वध,
द्रोपदी चीर हरण,
भीम से जुड़े
प्रसंगो को अपनी गर्ज—भरी आवाज
में सुनाती जो
महाभारत अंश रूप में नहीं
समग्रता बोध में हममें जैसे
बसने लगती है। कुरुक्षेत्र
में कृष्ण—अर्जुन संवाद
को अपने नृत्य—अभिनय में जींवत
करते जिस तरह से वह
धनुष पर प्रत्यंचा
चढ़ाने का अभिनय
करती या फिर भीम से
जुड़ी कहानियों को
सुनाती या फिर शंकर—पार्वती संवाद के
अंतर्गत 'भोलाला पूछे
पार्वती' जैसा कुछ
गाती तो लगता था, कथा
से एकमेक होती
वह उसमें प्रवेश
कर जाती थी।
उनके हाथ का तंबूरा भीम
की गदा बन कभी लुभाता
तो अर्जुन का
धनुष बनकर भी मन को
हर्षाता। छत्तीसगढ़ी बोली, लोक मुहावरों
और सहज उपजे
हास्य की उनकी कला ने
महाभारत की कथा को भी
सर्वथा नया आयाम
देते इसे जन—मन से जोड़ा।
महाभारत
की कथाओं को
गाते, उनमें निहित
भावों पर अपनी अभिनय छटाओं
से लुभाने के
साथ स्वरों के
उतार—चढ़ाव में
मंच पर किन्हीं
विशेष प्रसंगो में
तीजन बाई बहुतेरी
बार भावुक हो
उठती और देखने
वालों को भी कथा—समय में
ले जाती थी।
वह जब 13 वर्ष
की ही थी, तभी अपनी
कला का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया।
यह वह समय था जब
महिलाओं का इस क्षेत्र में आना वर्जित था।
पंडवानी पुरुष ही
गा सकते थे।
पर, तीजन बाई
ने इस मिथक को तोड़ा।
बहुत विरोध हुआ।
निरंतर संघर्ष झेला
पर इस कला में तीजन
बाई ने अपने को इस
कदर साधा कि फिर वह
इसकी पर्याय ही
हो गई।
महाभारत
के कथा तत्व
में लोक—भावनाओं को
जोड़ उसने गायन
में किस्सागोई का
भी अपना सर्वथा
नया मुहावरा गढ़ा।
यह ऐसा था जिसमें सुनने
वाला दृश्य के
वायवीय लोक में विचरण करता
सुनते और देखते
स्वयं भी उसका हिस्सा हो
जाता था। गान संग तीजन
बाई की आंगिक
मुद्राओं को जब
भी देखा, मन
मुग्ध हुआ। आवाज
में गान संग ओजस्वी हुंकार
और गर्जन की
उनकी शैली इसलिए
भी लोकप्रिय हुई
कि वहां पर संवेदनाओं का लोक—उजास समाया होता
था। श्याम बेनेगल
ने कभी अपने
धारावाहिक 'भारत एक
खोज' में उनके
इसी गर्जन का
महाभारत से जुड़े
प्रसंगों में सुमधुर
उपयोग किया। बाद
में एक दफा भारत भवन
में जब तीजन बाई का
कार्यक्रम हुआ तो
हबीब तनवीर भी
उससे इतना प्रभावित
हुए कि उन्होंने
फिर वैश्विक मंच
पर इस कला प्रोत्साहन के नए अवसर उन्हें
दिए।
भरतमुनि
के नाट्यशास्त्र में
नाटक को लोक का अनुकरण
नहीं अनुकीर्तन कहा
गया है। माने
जो लिखा गया
है, जो हो चुका है—उसकी कला द्वारा
मौलिक व्याख्या। इस
दीठ से तीजन बाई ने
महाभारत का अनुकीर्तन
किया। तीजन बाई
ने 'पंडवानी' के
जरिए शास्त्रीय परम्परा
में समाई लोक
की सुगंध, उससे
जुड़े आलोक से हमें जोड़ा।
उनका बिछोह लोक
कलाओं से जुड़ी
हमारी विरल परम्परा
की अंतिम कड़ी
के टूटने जैसा
है। तीजन बाई छत्तीसगढ़
में भिलाई के
गनियारी गांव में
जन्मीं। भारत सरकार
ने उन्हें 1988 में
पद्मश्री और 2003 में पद्म
भूषण से सम्मानित
किया। संगीत नाटक
अकादमी, नृत्य शिरोमणि
आदि बहुत से पुरस्कारों से उन्हें
सम्मानित किया गया।



