कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंपैक्ट समिट ने वैश्विक
स्तर पर हमें अग्रणी
करने की दृष्टि से
भले ही जोड़ा है
परन्तु मौलिक चिंतन और मनन में
यह शून्य उपजाने की बहुत सी
आशंकाएं लिए भी है।
लुप्त कलाओं की रिकॉर्डिग, अभिलेखीय
संरक्षण में इसका बेहतर
उपयोग हो सकता है
परन्तु सब—कुछ जब मशीन
ही करेगी तो मौलिक रचने,
उसमें बसने की संभावनाएं
क्या तेजी से समाप्त
नहीं होगी! ए.आई. शून्य से सृजन
नहीं करती। मानव मस्तिष्क से
पुनर्संरचित और अनुमान पर
ही इसका अस्तित्व है।
पत्रिका, 21 फरवरी 2026
बड़ा संकट यह भी
है कि हमने सूचनाओं
को ही ज्ञान मानना
प्रारंभ कर दिया है।
सूचनाएं, संस्कृति से जुड़ी दृष्टि
तक पहुंच की सुगमता हो
सकती है परन्तु कलाओं
से जुड़ा विचार नहीं हो सकती।
भारतीय कलाएं प्रतिकधर्मी है। संगीत, नृत्य,
नाट्य, चित्रकलाएं आदि सभी में
प्रतीकों से सूचनाओं का
संप्रेषण होता है। एब्सट्रेक्ट
ही नहीं आदिवासी और
जनजातीय कलाओं के संसार में
जाएंगे तो पाएंगे, वहां
प्रतीकों में, अर्थगर्भित संकेतो
में और कहन की
भांत—भांत की छटाओं
में संसार बुना गया है।
ए.आई.बहुत सारे
एकत्र शास्त्रीय संगीत, नृत्य की भंगिमाओं, नाट्य
से जुड़ी परम्पराओं का एकत्रीकरण कर
स्वयंमेव बहुत सारा उससे
नया गढ़ देगी परन्तु
वहां मनुष्य सिरजे की जीवंतता कहां से आएगी!
प्रकृति की छटाएं, परिवेश
की सुगंध वहां कैसे घुलेगी!
जब बहुत सारा संस्कृति
से जुड़ा सूचनाओं का ढेर हमारे
पास सदा मौजूद रहेगा
तो यह भी हो
सकता है, हम कला
में नया कुछ रचने
की आदत को ही
बिसरा दें।
याद रखें, प्रकृति और परिवेश का
संतुलन बिगड़ते ही सूचनाओं के
स्त्रोत सूखने लगते हैं। मनुष्य
और मशीन में यही
बड़ा फर्क है। मनुष्य
मस्तिष्क परिवेश और प्रकृति प्रदत्त
सूचनाओं को निरंतर ग्रहण
करता है परन्तु कहीं
ठहरता नहीं है। इसलिए
बहुतेरी बार अनपेक्षित अप्रत्याशित
कलाओं का सृजन अनायास
मनुष्य मन कर देता
है। वह सूचनाओं का
आश्रित नहीं होता—सूचना पाने की उसमें
हौड़ नहीं होती। सहज,
स्वाभाविक सूचनाएं पाकर वह उससे
अपने आपको पोषित करता
है।
ए.आई. में कलाओं
से जुड़ी सूचनाओं के स्त्रोत महत्वपूर्ण
कारक होते हैं। इनके
आधार पर वहां बुद्धिमता
का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता दिखता है
पर यदि सूचनाएं गलत
होगी या अनर्गल होगी
तो सर्वथा विनाश की संभावनाएं भी
बनेगी। मशीन—मनुष्य में बड़ा भेद
यही है कि मशीन
प्रदत्त सुचनाओं अथवा बहुत सारे
एकत्र सूचना—बैंक का विश्लेषण
कर उनको नियोजित कर
परिणाम देगी परन्तु मानव
मन चेतन—अचेतन से, प्रकृति से
निंरतर संकेत—सूचनाएं तो लेता है
परन्तु अच्छे—बुरे में भेद
कर उसका उपयोग करना
जानता है। मशीन अच्छे—बुरे
में भेद नहीं कर
सकती। संस्कृति
का अर्थ है—सुधरा हुआ। परिष्कृत। जीवन
जीने का ढंग। कलाओं
में जीवन जीने का
यह ढंग अभिव्यक्ति पाता
है तो उर में
उमंग जगाता है। मनुष्य की
चैतन्य अवस्था का यह स्वाभाविक
गुण है। मशीन का नहीं।
सूचनाओं के विष्फोट के
इस दौर में मानव
मष्तिष्क को पढ़, उससे
अपना गढ़ने का गुण तो
कृत्रि बुद्धिमता ने पा लिया
है परन्तु सूचनाओं को संस्कृति मान
आगे बढ़ने की जोखिम बढ़ने लगी है। चिंतन, ठहरकर
सोचने की दृष्टि चुपके
से इससे हमसे लोप
होने लगी है। एकरसता
में विविधता सिमट रही है।
प्राचीन ग्रंथों, कलाओं से जुड़ी विरासत
का डिजिटलाईजेशन तो हो रहा
है परन्तु संकट यह है
कि उसमें जो कुछ हमारे
पास मौजूद हो रहा है—उसे
पढ़ने की फुर्सत एक
समय में बहुत सारा
एक साथ पाने के
लालच में क्या मिल
पाएगी!
No comments:
Post a Comment