ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, January 17, 2026

स्वामी विवेकानंद जयंती पर व्याख्यान


महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के आग्रह पर महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के आग्रह पर 12 जनवरी 2026 को  'भारतीय ज्ञान परम्परा' पर मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान देने जाना हुआ..."ज्ञान परम्परा का अर्थ ही है, स्वीकार और निरंतर परिष्कार। 'ज्ञान परम्परा' पुस्तकों से नहीं समझाई जा सकती। यह संपूर्ण जीवन ही ज्ञान—परम्परा है। पश्चिम का चिंतन गणित से प्रारंभ होता है। विश्लेषण से श्रेणियां बनाना, वर्ग का विभाजन  की दृष्टि वहां है। भारतीय चिंतन का आधार संश्लेषण है। माने संबद्धता। रचना प्रक्रिया। सोचिए, प्रकाश संश्लेषण न हो, तो पौधे ऑक्सीजन उत्पन्न नहीं करें। इस दीठ से पूरी की पूरी भारतीय परम्परा सहमति—असहमति की संबद्धता से गूंथी हुई है। यहां नकार नहीं है। इसीलिए कहा गया, कोई भी ऋषि ऐसा नहीं है जिसका वचन प्रमाणित माना जाए। हमारे यहां शंकराचार्य का अद्वैत भी मान्य हुआ है तो कबीर और रैदास को भी हमने पूजा है। लोक में भी उन्हें ही पूजा गया जिन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीवन समर्पित किया। लोकदेवताओं की मान्यता से बड़ा इसका और बड़ा उदाहरण क्या होगा! प्रकृति पूजन से जुड़ी है, ज्ञान परम्परा।  अकेला भारत है, जहां नदी की पैदल परिक्रमा का विधान है। शिव—पुत्री नर्मदे की परिक्रमा का अर्थ है, अपने भीतर के अहंकार से मुक्त होकर अपने—आप का समर्पण...यही सब तो है, हमारी ज्ञान परम्परा।..."





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