ओंकारनाथ ठाकुर का गान सुगठित भावों की गगरी सा है। शब्दों संग स्वरों के उतार-चढ़ाव की उनकी शैली मन को मथती है। सुनते समय और उसके बाद भी। राग भैरवी में मीरा का भजन 'जोगी मत जा' सुनें। शब्दों में निहित भाव जैसे संगीत में रूपान्तरित हो गए हैं। स्वरों की विरल पुकार यहां है। इसमें उभरता और सदा के लिए मन में बसा रह जाता है-स्वरोच्चार, 'जोगी'! ऐसे ही मालकोंस में 'पग घूंघरू बांध मीरा' को सुनेंगे तो एकबारगी लगेगा सहज—स्वरों में सरलतम रूप में उन्होंने इसे साधा है। पर, उनके गान की स्वर—छटाओं में रमेंगे तो यह भी लगेगा, राग को दार्शनिक गहराई में उतारते वह अद्भुत सम्मोहन से हमें बांध रहे हैं। और यही क्यों? कोमल ऋषभ आसावरी में विलंबित और द्रुत ताल में उनका गान जैसे अमृत की बरखा करता है। ध्रुपद अंग को गले में बिठाते वह स्वरों का जैसे वशीकरण मंत्र पढ़ते हैं। विश्वास नहीं हो तो, राग भीमपलासी में विलंबित एकताल ही सुनें। स्वर दर स्वर और उसका अनुकीर्तन करता एम.एस. गोपालकृष्ण का वायलीन माधुर्य! उनका आलाप सुहाता है तो रागो का निभाव अंतर्मन आलोक से भरता है। मालकोंस में उन्हें सुनेंगे तो लगेगा जीवन—उजास मिल रहा है। भैरवी सुनेंगे तो पाएंगे स्वर—सम्मोहन की किसी डोर से हम बंध रहे हैं। हरेक राग में वह उसके भीतर के रस का मर्म समझाते हैं। आत्म से साक्षात् कराता उनका कंठ जीवन—धन ही तो है! मुझे यह भी लगता है, वह राग से रंजन नहीं करते बल्कि समाधिस्थ चित्त मे ले जाने की क्षमता रखते थे। यह था तभी तो इटली के तानाशाह मुसोलिनी उनका गान सुनकर रो पड़े थे। जगदीशचन्द्र बसु ने स्वीकारा कि पेड़-पौधे उनके संगीत से झुमते हैं। महात्मा गांधी को भी कहना पड़ा था कि उनके एक ही गान में वह जितना हासिल कर सकते हैं, उतना वह बहुत सारे भाषणों से प्राप्त नहीं कर सकते। सूरत के लोगों का यह मानना था कि उनका गान उन्हें अकाल से बचा सकता है। मुझे लगता है, जीते-जी किंवदंती बनने वाले वह महान गायक थे।...
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Monday, June 22, 2026
द मैन हू स्टोल द गोड्स

पत्रिका, 20 जून 2026
हमारे यहां कलाओं की पुस्तकें बंधी—बंधाई लीक में एकरसता लिए हैं। अधिकांश पुस्तकें या तो सैद्धान्तिकी लिए हैं या फिर बहुत सी दूसरी पुस्तकों से तैयार एकरसता पसराती पाठ्यपुस्तकनुमा।
इस आलोक में अशोक कुमार सिन्हा की हाल ही आई पुस्तक 'मिथिला चित्रकला' उम्मीद जगाती है। रसिक मन से लिखी यह यह बगैर राज्याश्रय फली—फूली मिथिला चित्रकला का अतीत भर नहीं है, बल्कि उससे जुड़े संसार की मनोरम दृष्टि है।
...कलाओं का इतिहास उसके बाज़ार से भी जुड़ा है। साठ के दशक में कलाओं में निवेश को वैधता मिलने के साथ ही विश्व में एक नया आर्थिक युग प्रारंभ हुआ। इसके साथ ही विरासत से जुड़ी कलाकृतियों की चोरी और तस्करी भी तेजी से बढ़ी।
कला—इतिहासकारों में भी इससे ऐसे लोग सामने आने लगे जो कला—रसिक न होकर कला—बाजार, निजी या सरकारी कलादीर्घाओं की उपज थे। ऐसे ही कला—इतिहासकार में डगलस लैचफोर्ड का नाम भी जुड़ा। लैचफोर्ड असल में कला—संग्राहक रूप में कंबोडिया और थाईलैंड के जंगलों में छिपे प्राचीन खमेर साम्राज्य के मंदिरों से दुर्लभ कलाकृतियों की चोरी करवाकर तस्करी करने से जुड़ा था।
मूर्तियों को खंडहरों से, प्राचीन मंदिरों से साबुत और जल्दी निकालने के लिए वह निर्मम तरीके से ब्लास्टिंग और विष्फोट करवाता। इसी से स्थानीय लोगों ने उसका एक नाम ’डायनामाइट डग’ रख रखा था। मैथ्यू कैंपबेल की हाल ही आई पुस्तक ’द मैन हू स्टोल द गोड्स’यह सब बताती है। हिन्दी में इस तरह की पुस्तकों का अभी भी बड़ा अभाव है।
Monday, June 8, 2026
संस्कृति की जीवंत दृष्टि के चितेरे
कुबेर नाथ राय अकेले ललित निबंधकार हैं जिन्होंने दर्शन और कलाओं की अपने लिखे में संधि की है। भारतीयता को वह किसी अवधारणा में नहीं बल्कि जीवंत दृष्टि से अभिहित करते हैं। शास्त्र, लोक, मिथक, प्रकृति और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय उनके लिखे में है। संगीतमय और चित्रात्मक भाषा की उनकी लेखन—दृष्टि में पत्तियों के झरने में धरती के सौंदर्य की करुणम अवस्था को गहरे से अनुभूत किया जा सकता है। मुझे लगता है, वह हमारी संस्कृति के अद्भुत आख्याता और विरल व्याख्याता हैं। उन्हें पढ़ना शब्द, भाव और जीवनगत सौंदर्य से साक्षात् होना है।
कुबेर
नाथ राय शब्द के
भीतर बसे शब्द का
अर्थान्वेषण कर उनका मर्म
छुआने वाले रस—सिद्ध ललित निबंधकार हैं।
उनके ललित निबंध वेद,
उपनिषद्, पुराण, मिथकों और लोक में
रचे—बसे मन के
अनछुए संदर्भ उद्घाटित करते हैं। मुझे यह भी
लगता है, ललित निबंध
की भारतीय परंपरा को उन्होंने ही
सांस्कृतिक, दार्शनिक और सौंदर्यबोधी अन्वेषण
में नये आयाम दिए।
वह अनूठे शब्द-द्रष्टा हैं।
इसलिए कि वहां ठौर-ठौर जीवन की
सुगंध समाई है। ’मराल’, ’प्रिया
निलकंठी’, ’रस-आखेटक’,
’रामायण महातीर्थतम्’,
’निषाद बांसुरी’,
’गंधमादन, ’विषाद योग’ आदि ललित निबंध
संग्रहों के उनके शीर्षकों
पर ही जाएंगे तो
पाएंगे वहां अर्थ के
अनूठे गवाक्ष खुलते हैं। भाषा के
सहज प्रवाह संग कहन की
उनकी मौलिक दृष्टि इसलिए भी लुभाती है
कि वहां पर शब्द-शब्द भावनाओं का
रस छलकता है। लोक के
आलोक में मनोविज्ञान से
जुड़ी उनकी दृष्टि में
परम्परा और अतीत ही
नहीं झिलमिलाता है, आधुनिकता बोध
का सातत्य है।
कुबेरनाथ
राय ने होमर,
वर्जिल और शेक्सपीयर को
भी अपने लिखे में
गहरे जिया है, पर
वहां भाषा और भावभंगिमा
में देशी भारतीय संस्कारों
की सुगंध घुली है। उनके
ही शब्दों में कहूं तो
हिन्दुस्तानी मन को उन्होंने
अपने लिखे में ’विश्व
चित्त’
से जोड़ पाठकों की
मानसिक ऋद्धि की है।
![]() |
| अमर उजाला, 7 जून 2026 |
कभी
उनके एक ललित निबंध
’तिष्य नक्षत्र, कवि भिक्षु और
महापृथिवी’को पढ़कर उनसे अनुराग हुआ
था। शब्द-शब्द अर्थ
की विरल छटाओं को
बरसाते उनके इस ललित
निबंध में ’तिष्य’,
’पुष्य’, शब्दों
के विरल अर्थ—संदर्भ हैं। अशोक की
पत्नी तिष्यरक्षिता का इसमें मार्मिक
उल्लेख है। बौद्ध धर्म
के प्रति श्रद्धा के साथ ही
सम्राट अशोक बूढ़ा हो
चला था। तिष्यरक्षिता के
आंगंन में ही बोधिद्रुम
की स्थापना हुई। इसी समय
में तिष्यरक्षिता ने अपनी काम-पिपासा सम्राट के पुत्र कुणाल
से बुझानी चाही। सम्राट पुत्र कुणाल के अस्वीकार करने
पर उसकी आंखे ही
निकलवा ली। कुबेरनाथ राय
ने इस निबंध में
अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा उकेरे एक चित्र का
उल्लेख किया है। इस
चित्र में बोधिवृक्ष की
छिन्न-भिन्न उखाड़ी गई एक शाखा
है जिसकी ओर बड़ी उपेक्षा
और अहंकार भाव से तिष्यरक्षिता
देख रही है। उसके
अपेक्षाकृत बड़े आकार के
स्तनों का उल्लेख करते
हुए उन्होंने ईषत् लटके हुए
पूर्ण विकसित स्तनों को मातृकाओं से
जोड़ते उसके मां बनने
की चाह की विरल
व्यंजना की है। परम्पराओं में समाई दृष्टि
से विपरीत उन्होंने अपने इस ललित
निबंध में स्थापित किया
है कि संभव है,
तिष्यरक्षिता के क्रोध का
कारण काम तृषा नहीं,
मातृत्व तृषा है।
कुबेरनाथ
राय के समग्र लिखे
में इसी तरह की
मौलिक चिंतन-दृष्टि का विस्तार है।
मुझे यह भी लगता
है, भारतीय दर्शन ही नहीं साहित्य,
धर्म, अध्यात्म और लोक जीवन
के अब तक लिखे
में छूटे हुए सुंदर्भों
से वह हमारा नाता
कराते हैं। वह मन
को मायावी नट कहते हैं।
लिखते हैं, हम देखने
कुछ जाते हैं और
उसके बहाने बहुत सारा और
देखने लग जाते हैं।
असल में कुबेरनाथ राय
का समग्र लेखन भी इस
आलोक में दृश्य—भाषा में हमारी
संस्कृति का गहन अन्वेषण
करता पाठक के बौद्धिक
क्षितिज का विस्तार करता
है।
अपने
एक ललित निबंध में
वह लिखते हैं, भारतीय आर्य
’नव्य आर्य’ हैं। इसकी संरचना
इतिहास विधाता ने आर्य-द्राविड़-निषाद-किरात, इन चार संयुक्त
तत्त्वों से की है।
वह भारतीय संस्कृति के तीन प्रमुख
आधार वैदिक, तांत्रिक और लोकायत में
ले जाते हुए पाठकों
को कामधेनु, देवी, नटराज, शेषशायी, यक्ष, श्रीदेवता आदि बहुत से
हमारे प्रतीक और बिम्बों की
मूल्यपरक और ऐतिहासिक दृष्टि
का नया चिंतन हमें
देते है। वह लिखते
हैं, पूर्ण भारतीय बनने का अर्थ
है ’राम’ जैसा बनना।
मुझे
लगता है भाषा और
कहन की सर्वथा भिन्न
भंगिमा के लालित्य में
कुबेरनाथ राय शब्द की
संस्कृति में आस्था जगाने
वाले अनुपम द्रष्टा हैं। इसलिए कि
वह भाषा को उसकी
मूल संस्कृति से जुड़ी गहराई
में परिभाषित करते हैं। इसलिए
भी कि अपने लिखे
में वह स्थापित करते
हैं कि भाषा और
शब्दों के प्रयोग को
सतही या कामचलाऊ दृष्टि
से नहीं ग्रहण करना
चाहिए। वह लिखते हैं,
'शब्दों के भूल जाने
का अर्थ होता है
संस्कारों को भूल जाना।'
वह ऐसी हिंदी के
हिमायती रहे हैं जिसे
समग्र भारतवर्ष समझे और इसका
महाकोश लोकभाषा, प्रांतीय भाषा और संस्कृत
के सहयोग से विस्तृत हो।
यह भी कि भारत
से जुड़ने का अर्थ है-शिवत्व, बुद्धत्व, रामत्व के आलोक में
मनुष्य, पृथ्वी और ईश्वर से
जुड़ना।
कुबेरनाथ
राय का लिखा इसलिए
भी सुहाता है कि वहां
पर अपने आपको स्थापित
करने का कोई आग्रह
नहीं है। लोक और
शास्त्र के साथ बौद्धिक
स्तर पर छुटे हुए
संदर्भों की सर्वथा नई
जमीन कुबेरनाथ राय ने तैयार
की है। उनके बरते
शब्द अपनी लय में
और अर्थगर्भित संदर्भों में चमत्कृत करने
वाले हैं। भाषा की
अनूठी लय वहां है।
अपने एक ललित निबंध
संग्रह की भूमिका में
उन्होंने लिखा है, मेरा
लिखा चन्दन काष्ठ है। लिखे के
इस मर्म में जाएंगे
तो यह भी लगेगा
चन्दन को घिसते हैं
तभी सुगंध मिलती है। सुगंध
पाने के लिए ठहरकर,
धीरज के साथ पढ़ना
होगा। पढेंगे तो उस समय
ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी
जीवन—पर्यन्त हम उसकी खुशबू
से महकते रहेंगे।

