
पत्रिका, 20 जून 2026
हमारे यहां कलाओं की पुस्तकें बंधी—बंधाई लीक में एकरसता लिए हैं। अधिकांश पुस्तकें या तो सैद्धान्तिकी लिए हैं या फिर बहुत सी दूसरी पुस्तकों से तैयार एकरसता पसराती पाठ्यपुस्तकनुमा।
इस आलोक में अशोक कुमार सिन्हा की हाल ही आई पुस्तक 'मिथिला चित्रकला' उम्मीद जगाती है। रसिक मन से लिखी यह यह बगैर राज्याश्रय फली—फूली मिथिला चित्रकला का अतीत भर नहीं है, बल्कि उससे जुड़े संसार की मनोरम दृष्टि है।
...कलाओं का इतिहास उसके बाज़ार से भी जुड़ा है। साठ के दशक में कलाओं में निवेश को वैधता मिलने के साथ ही विश्व में एक नया आर्थिक युग प्रारंभ हुआ। इसके साथ ही विरासत से जुड़ी कलाकृतियों की चोरी और तस्करी भी तेजी से बढ़ी।
कला—इतिहासकारों में भी इससे ऐसे लोग सामने आने लगे जो कला—रसिक न होकर कला—बाजार, निजी या सरकारी कलादीर्घाओं की उपज थे। ऐसे ही कला—इतिहासकार में डगलस लैचफोर्ड का नाम भी जुड़ा। लैचफोर्ड असल में कला—संग्राहक रूप में कंबोडिया और थाईलैंड के जंगलों में छिपे प्राचीन खमेर साम्राज्य के मंदिरों से दुर्लभ कलाकृतियों की चोरी करवाकर तस्करी करने से जुड़ा था।
मूर्तियों को खंडहरों से, प्राचीन मंदिरों से साबुत और जल्दी निकालने के लिए वह निर्मम तरीके से ब्लास्टिंग और विष्फोट करवाता। इसी से स्थानीय लोगों ने उसका एक नाम ’डायनामाइट डग’ रख रखा था। मैथ्यू कैंपबेल की हाल ही आई पुस्तक ’द मैन हू स्टोल द गोड्स’यह सब बताती है। हिन्दी में इस तरह की पुस्तकों का अभी भी बड़ा अभाव है।
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