ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Monday, March 30, 2026

जीवन—धन सहेजता गान

बड़े गुलाम अली ख़ान को सुनना जीवन धन सहेजना है। जीवनानुभूतियों की भांत भांत की छटाओं की गागर छलकते हुए पाना  है। आवाज का उनका लचीलापन, अप्रत्याशित स्वर-संयोजन और तानों की अविश्वसनीय गति विरल है। राग मालकौंस , दरबारी कान्हड़ा, मालुहा केदार, राग खाट, बागेश्री, शुद्ध कल्याण, हंसध्वनि में समय को जैसे वह गान में रूपान्तरित करते हैं।  वह दृश्य छटाओं का मनोरम रचते हैं। औचक। बार—बार। 

सुनेंगे तो मिलन की उमंग, उत्साह, विरह की उदासी अनुभूत होगी तो प्रकृति की भांत—भांत की छटाओं को मन में जीवंत होता पाएंगे। स्वरों का माधुर्य ऐसा कि उसमें खिलती धूप, बादलों की छा रही घटाओं, फूलों के खिलने, सांझ घिरने, बादलों के बरसने आदि को देख—सुन और गुन सकते हैं।  राग को, आलाप को घंटों तक खींचने की बजाय वह दोहराव से बचते संक्षिप्त प्रस्तुति में उसे सजाते और संवारते थे। और हां, ठुमरी की कालजयी दृष्टिं को समझना हो तो सुनें उनके स्वर—उजास में "का करूं सजनी आये न बालम" के बोल।  लगेगा बिछोह की व्यथा जैसे अंतर्मन अनुभूति बन गई है। उनकी गाई यही नहीं, "प्रेम जोगन बन के","नैना मोरे तरस गए" जैसी  ठुमरियां भी अंतर्मन संवेदनाओं का सागर है। वहां मनुहार है, अंतर की पुकार है और है विरह की व्यथा में गुंथा स्वर—उजास। ठुमरी से ध्रुपद अंग तक उनकी गायकी कहन का अपना 'सब रंग' अंदाज है। माने उसमें सभी रंग घुले होते हैं।  सबरंग नाम से ख्याल और ठुमरी की विरल रचनाएं भी तो उन्होंने हमें दी है। 

मुझे लगता है, लोक संगीत की स्वच्छंद मिठास को उन्होंने शास्त्रीय संगीत के सुरों में, राग—नियमों के माधुर्य में पिरोया। उनके गान में सहजता है। कहीं कोई बनावटीपन नहीं। हृदय को स्पर्श करता हुआ। सुनेंगे तो मन स्वरों की अतृप्त प्यास से भर उठेगा । बड़े गुलाम अली फिल्मों में गाने के खिलाफ थे। पर, साठ के दशक में 'मुगल-ए-आजम' में उन्होंने  गाया। कहते हैं, फिल्म के एक दृश्य में तानसेन को गाते हुए दिखाना था। नौशाद चाहते थे, बड़े गुलाम अली खान साहब उसे गाए। के. आसिफ आग्रह लेकर उनके पास पहुंचे तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। पर जब देखा कि वह नहीं मान रहे हैं तो उन्होंने मेहनताने के 25 हजार रूपये मांग लिए। यह वह समय था जब लता मंगेशकर को भी गाने के पांच सौ रूपये से अधिक नहीं मिलते थे। बड़े गुलाम अली खान को लगा इससे फिल्म में गवाने का पीछा छूट जाएगा पर आसिफ ने स्वीकार कर लिया। उनके पास न गाने की अब कोई वजह नहीं थी। उन्होंने राग सोहनी और रागेश्वरी में 'मुगल-ए-आजम' में गाया।  फिल्म जगत का ही नहीं यह शास्त्रीय संगीत की साधना का भी जीवंत इतिहास है।  

सभी जानते हैं, यह वही बड़े गुलाम अली खान है जिन्होंने कभी लता मंगेशकर के बारे में कहा था, "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती।" लता के गायन की मिठास को बंया करने का यह उनका अपना अंदाज था। ठीक वैसे ही जैसे कभी उन्होंने 'हरिओम तत्सत' भजन को गाते हुए किसी तपस्वी की भांति स्वर—साधना की। गान में अर्चना का यह जीवंत इतिहास है। वह ऐसे ही थे। सुरमंडल संग अपनी खुद की ईजाद पटियाला-कसूर शैली में राग जयजयवंती,जौनपुरी, हमीर आदि मे जो भी गाते लगता है, भाव—भाव में रस छलक—छलक अंतर्मन के किसी कोने में छाई रिक्तताओं को भरता है। 

लाहौर के निकट कसूर नामक स्थान पर पाकिस्तान में वह जन्मे। पिता अली बख्श खां कश्मीर के महाराजा के दरबारी गायक थे। चाचा काले खां से संगीत सीखने के बाद उन्होंने संगीत सफर की सारंगी वादक के रूप में शुरूआत की। पर, कोलकाता संगीत सम्मेलन में 1938 में उन्होंने जब सार्वजनिक प्रस्तुति दी तो उनकी सुरीली आवाज ने सुनने वालों के मन जीत लिए। मखमली, मन को भाने वाली मिठी आवाज में उन्होंने बाद में खयाल गायन में ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने की शैलियों का घोल कर अपनी स्वयं की गायन—शैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें जीवन—रस घुला था। 

बड़े गुलाम अली खान संगीत को ओढ़ते—बिछाते थे। कभी उनका गंभीर ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने पूर्ण विश्राम के लिए कहा। पर, 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने तीन सप्तकों तक फैली एक तान गा दी। टोका गया तो बोले, “संगीत बिना मेरे जीवन का क्या अर्थ? देखना चाहता था कि मेरी आवाज पर तो ऑपरेशन का कोई असर नहीं पड़ा।“ महाराष्ट्र सरकार ने 1967 में नृत्य महोत्सव में उन्हें आमंत्रित किया। रोशनी केवल उन पर थी। बाकी बत्तियाँ बुझी हुई थी। उन्होंने कहा, 'नहीं गा सकता। अंधेरे में किसी को देख ही नहीं पा रहा। मुझे अपने प्रिय श्रोताओं के दर्शन होंगे तभी गा सकता हूँ?' बत्तियां जला दी गईं। श्रोताओं की भीड़ की झलक पाते ही, राग छाया में “जो करे राम कृपा” गाते हुए वह खिल उठे थे। वह और उनका गान ऐसे ही सदा मन को मोहता था। इसीलिए कहूं, वह मन—मोहक हैं। उस्तादों के उस्ताद। जग गायक!


Sunday, March 29, 2026

काल के पार कांसा

 'अमर उजाला' और 'नवभारत' में ...

'बिहार संग्रहालय में इन दिनों 'टाइमलेस इन ब्रोंज' प्रदर्शनी लगी हुई है। इसे देखते हुए मन बहुत कुछ और भी सोचता रहा। असल में भारतीय मूर्तिकला में कांस्य प्रतिमाओं का ज्ञात—इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से मिली नर्तकी की प्रतिमा से प्रारंभ होता है। बाद में चोल—काल में मूर्ति निर्माण की यह कला शीर्ष पर पहुंची। यह सच है, आस्था के आलोक में ही हमने मूर्तिकला के इस जग पर चिंतन किया है परन्तु आनंद कुमार स्वामी जैसे कला—चिंतकों ने भारतीय मूर्तिकला के बाह्य सौंदर्य संग उसकी आंतरिक गहनता पर भी महती हमें सौंपा है। मुझे लगता है, नटराज और दक्षिण भारत के मंदिरों की दूसरी कांस्य प्रतिमाओं में जितना दृश्य है, उतना ही अदृश्य भी समाया है। इस पर विमर्श से बहुत कुछ नया मिल सकता है। ...मध्यकाल के बाद हमारे यहां रामकिंकर बैज और धनराज भगत ने मूर्तिकला के प्रचलित मानकों को तोड़ते हुए आधुनिक दृष्टि दी। पर, इसके बाद भी निंरतर महती सर्जन होता रहा है। यह प्रदर्शनी इस दृष्टि से भारतीय मूर्तिकला के आधुनिक इतिहास की साक्षी है...प्रचलित मानकों को तोड़ते हुए आधुनिक दृष्टि दी। पर, इसके बाद भी निंरतर महती सर्जन होता रहा है। यह प्रदर्शनी इस दृष्टि से भारतीय मूर्तिकला के आधुनिक इतिहास की साक्षी है...
अमर उजाला, 29 मार्च 2026


टाइमलेस इन ब्रोंज

 बिहार संग्रहालय में इस समय 'टाइमलेस इन ब्रोंज' माने कांस्य में कालजयी शीर्षक के अंतर्गत देश के प्रतिनिधि मूतिकारों की प्रदर्शनी लगी हुई है। इस प्रदर्शनी के आलोक में बोलने जाना हुआ। सुखद था, अपने व्याख्यान के बाद संग्रहालय में ही आउटलुक की संपादक चिंकी सिन्हा से हुए एक संवाद में  मूर्तिकला की आधुनिकी पर भी महती विमर्श का भागीदार बना।...

















Saturday, March 21, 2026

गणगौर

पत्रिका, 21 मार्च 2026

पर्व यानी पड़ाव। मिलन बिंदु। गन्ने में थोड़े—थोड़े अंतराल में उभरी हुई गांठे होती है। यही आगे से आगे उसे जोड़ती है। इनके बीच का हिस्सा मीठा और रसदार होता है। यही पर्व है। पर्व का अर्थ ही है, जीवन में घुली मिठास! गणगौर ऐसा ही है। शृंगार और सौंदर्य की व्यंजना से जुड़ा। पराशक्ति मां पार्वती के पूजन का अनुष्ठान-पर्व। संस्कृति की सुगंध। गण और गौर से मिलकर बना है—गणगौर।

‘गण माने शिव और ‘गौर यानी पार्वती। होली दहन के दूसरे दिन ही गवर पूजन शुरू हो जाता है। याद है, बचपन में ‘गढ़ सूं गौरल उतरी', 'गैरो गैरो गवरा बाई रो ढोलो बालम रसिया', 'गवर पूजूं, ईसर पूजूं' जैसे स्वर—माधुर्य से ही भोर में आंख खुलती। बहन अपनी सखियों संग अल—सुबह किसी एक स्थान पर एकत्र हो गणगौर पूजन प्रारंभ कर देती।

इस पूजन में भक्ति भाव की बजाय 'खेलने' का सखी भाव प्रमुख है। 'खेलण दो गणगौर' संग कन्याएं अच्छे वर के लिए गवर पूजती है, हंसी—ठिठोली संग होली की बची राख से पिंडिया बनाती हैं। मिट्टी के पात्र में गेंहू और जौ के बीज बोती है। पौधा अंकुरित होने तक रोज सौंदर्य—शृंगार और गहने पहनने की गुंथी संस्कृति के गीत गा उन्हें सींचती है। गान संग गुलाल के मांडणे मांडती है।

...गणगौर समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। कन्याएं ईसर-गौरा बनाकर एक पखवाड़े पूजती है। गवर के भांत भांत के शृंगार करती है। और फिर सोलहवें दिन गवर की सज—धजकर सवारी निकलती है। गवर को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

विसर्जन से ही जुड़ा है, सृजन। पेड़ो से पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी नए उगते हैं। गवर विसर्जन के साथ ही त्योंहारों की शृंखला एक बार थम जाती है। लोक में इसीलिए कहा गया भी है, "तीज त्यौहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर"। सावन की तीज पर पर्व शुरू होते हैं और चैत्र माह की गणगौर के साथ इनका समापन हो जाता है। फिर से नई उमंग, उत्साह संग नया कुछ करने के लिए।"

Thursday, March 12, 2026

’नवनीत’ मार्च अंक में ...


"...मार्क टली को सुनना और बाद में उनकी भारत केन्द्रित अनुभवपरक लिखी पुस्तकों को पढ़ना इसलिए भाता रहा है कि वहां पत्रकारिता की अपनी स्थापना के आग्रह नहीं है। मसलन उनकी लिखी पुस्तकों 'इण्डिया इन स्लो मोशन', 'नो फुल स्टोप्स इन इण्डिया' में स्पष्ट इस बात को रेखांकित किया गया है कि पश्चिमी सोच, आधुनिकता, विकास और सुधार के नाम पर यहां का अभिजात वर्ग नहीं चाहता कि यह देश अपनी भाषा, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़ा रहे। परन्तु यहां का जन—मानस जड़त्व लिए नहीं है। यह देश इतना उदार, खुलापन लिए है कि निरंतर नया होता रहता है। ...यह महज संयोग नहीं है कि आनंद कुमार स्वामी ने भी कभी यहां की कलाओं और भारतीय दृष्टि को लेकर यही कहा था कि भारत में नवीनता नवीन बनाने में नहीं है, नवीन होने में है। मार्क टली ने भारत को इसी दृष्टिकोण से समझा—परखा। इसलिए वह बार—बार अपने कहे में और लिखे में इस बात पर चिंता और पीड़ा जताते रहे हैं कि अंग्रेजी भाषा के प्रति अतिरिक्त मोह से भारत अपनी परम्पराओं और संस्कृति से पूर्ण विकास की ओर आगे नहीं बढ़ रहा है।"...