
पत्रिका, 21 मार्च 2026
पर्व यानी पड़ाव। मिलन बिंदु। गन्ने में थोड़े—थोड़े अंतराल में उभरी हुई गांठे होती है। यही आगे से आगे उसे जोड़ती है। इनके बीच का हिस्सा मीठा और रसदार होता है। यही पर्व है। पर्व का अर्थ ही है, जीवन में घुली मिठास! गणगौर ऐसा ही है। शृंगार और सौंदर्य की व्यंजना से जुड़ा। पराशक्ति मां पार्वती के पूजन का अनुष्ठान-पर्व। संस्कृति की सुगंध। गण और गौर से मिलकर बना है—गणगौर।
‘गण माने शिव और ‘गौर यानी पार्वती। होली दहन के दूसरे दिन ही गवर पूजन शुरू हो जाता है। याद है, बचपन में ‘गढ़ सूं गौरल उतरी', 'गैरो गैरो गवरा बाई रो ढोलो बालम रसिया', 'गवर पूजूं, ईसर पूजूं' जैसे स्वर—माधुर्य से ही भोर में आंख खुलती। बहन अपनी सखियों संग अल—सुबह किसी एक स्थान पर एकत्र हो गणगौर पूजन प्रारंभ कर देती।
इस पूजन में भक्ति भाव की बजाय 'खेलने' का सखी भाव प्रमुख है। 'खेलण दो गणगौर' संग कन्याएं अच्छे वर के लिए गवर पूजती है, हंसी—ठिठोली संग होली की बची राख से पिंडिया बनाती हैं। मिट्टी के पात्र में गेंहू और जौ के बीज बोती है। पौधा अंकुरित होने तक रोज सौंदर्य—शृंगार और गहने पहनने की गुंथी संस्कृति के गीत गा उन्हें सींचती है। गान संग गुलाल के मांडणे मांडती है।
...गणगौर समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। कन्याएं ईसर-गौरा बनाकर एक पखवाड़े पूजती है। गवर के भांत भांत के शृंगार करती है। और फिर सोलहवें दिन गवर की सज—धजकर सवारी निकलती है। गवर को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।
विसर्जन से ही जुड़ा है, सृजन। पेड़ो से पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी नए उगते हैं। गवर विसर्जन के साथ ही त्योंहारों की शृंखला एक बार थम जाती है। लोक में इसीलिए कहा गया भी है, "तीज त्यौहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर"। सावन की तीज पर पर्व शुरू होते हैं और चैत्र माह की गणगौर के साथ इनका समापन हो जाता है। फिर से नई उमंग, उत्साह संग नया कुछ करने के लिए।"
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