'अमर उजाला' और 'नवभारत' में ...
'बिहार संग्रहालय में इन दिनों 'टाइमलेस इन ब्रोंज' प्रदर्शनी लगी हुई है। इसे देखते हुए मन बहुत कुछ और भी सोचता रहा। असल में भारतीय मूर्तिकला में कांस्य प्रतिमाओं का ज्ञात—इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से मिली नर्तकी की प्रतिमा से प्रारंभ होता है। बाद में चोल—काल में मूर्ति निर्माण की यह कला शीर्ष पर पहुंची। यह सच है, आस्था के आलोक में ही हमने मूर्तिकला के इस जग पर चिंतन किया है परन्तु आनंद कुमार स्वामी जैसे कला—चिंतकों ने भारतीय मूर्तिकला के बाह्य सौंदर्य संग उसकी आंतरिक गहनता पर भी महती हमें सौंपा है। मुझे लगता है, नटराज और दक्षिण भारत के मंदिरों की दूसरी कांस्य प्रतिमाओं में जितना दृश्य है, उतना ही अदृश्य भी समाया है। इस पर विमर्श से बहुत कुछ नया मिल सकता है। ...मध्यकाल के बाद हमारे यहां रामकिंकर बैज और धनराज भगत ने मूर्तिकला के प्रचलित मानकों को तोड़ते हुए आधुनिक दृष्टि दी। पर, इसके बाद भी निंरतर महती सर्जन होता रहा है। यह प्रदर्शनी इस दृष्टि से भारतीय मूर्तिकला के आधुनिक इतिहास की साक्षी है...प्रचलित मानकों को तोड़ते हुए आधुनिक दृष्टि दी। पर, इसके बाद भी निंरतर महती सर्जन होता रहा है। यह प्रदर्शनी इस दृष्टि से भारतीय मूर्तिकला के आधुनिक इतिहास की साक्षी है...

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