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| पत्रिका 17 जनवरी, 2025 |
"...रस निष्पति माने स्वाद की सिद्धि। नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में आया है, ’न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते रस’ यानी रस के बिना किसी अर्थ का प्रवर्तन नहीं होता।
नाट्यशास्त्र पंचम वेद है। ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, साम से गीत और अथर्ववेद से इसमें रस लिया गया है। अथर्ववेद से रस क्यों? इसलिए कि अथर्ववेद मन से जुड़ा है। जादू टोना, वशीकरण, विवाह मर्यादा आदि भी इसी में है। अथर्व ब्रह्म वेद है। माने मन को जो बांध ले।
मन किससे बंधता है, भाव से ही तो! भाव से ही रस आता है। इसलिए कहूं, नाट्यशास्त्र का बीजाक्षर रस है। रस माने जोड़ना, जुड़ना, बांधना। वाल्मीकि ने तमसा के तट पर कोंच वध देखा। शोकाकुल हो उनके मन में श्लोक उपजा। यही विश्व की पहली कविता बन गई।
सुमित्रानंदन पंत ने इसलिए कहा, 'वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान, निकल आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अन्जान।’ रामायण क्या है? राम का अयन ही तो! राम-सीता की विरह गाथा। शोक दुख नहीं है। करुण रस है। दुखी आदमी कुछ रच नहीं सकता। रस रचता है।"...
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