'दैनिक जागरण' में आज...
"उस्ताद हलीम जाफर खान का सितार बजता नहीं, गाता था। सितार को लोकप्रिय कर जन जन तक पहुंचाने वाली त्रयी-उस्ताद विलायत खान, पंडित रवि शंकर के साथ उस्ताद हलीम जाफर खान इस रूप में महत्वपूर्ण थे कि उन्होंने सितार का चमत्कृत करता सर्वथा अनूठा जाफरखानी बाज आविष्कृत किया। कर्नाटकी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रस माधुर्य में उन्होंने सितार के गान पक्ष को लोकप्रिय किया। उनका सितार सुनेंगे तो पाएंगे छोटे छोटे स्वर, स्वरों में गुंथे और बहुत सारे अलंकृत स्वर मन को झंकृत करते हैं। मुझे लगता है, उनका सितार कहन का माधुर्य छंद है। ...उनके सितार की चंचलता, स्वर ठहराव और औचक ध्वनियों में घुला मधुर प्रवाह इसलिए भी मन को भाता है कि वहां सितार का कृन्तन है। कृन्तन माने मिज़राब को एक ही आघात में दो, तीन अथवा चार स्वरों को बिना मींड के केवल उँगलियों की सहायता से निकालते वह स्वरों को एक खास अंदाज में सदा ही सजाते रहे हैं।..."
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| दैनिक जागरण 16 फरवरी 2026 |
