ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, February 22, 2026

कुरुक्षेत्र में व्याख्यान-नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा-

संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली के आग्रह पर कुरुक्षेत्र में "नाट्यशास्त्र के आलोक में कला समीक्षा" विषयक व्याख्यान देने जाना हुआ। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के समन्वय से अकादेमी ने जब कला समीक्षा कार्यशाला में आमंत्रित किया तो लगा, इस बहाने श्री कृष्ण द्वारा जहां अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया गया उस स्थान को देख सकूंगा। वहां भी गया जहां, महाभारत का युद्ध हुआ। वहां भी, जहां बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह के लिए अर्जुन ने धरती पर अपने तीर से बाणगंगा प्रकट की। महाभारत युद्ध से पहले श्री कृष्ण और पाण्डवों द्वारा महादेव की आराधना स्थल स्थानेश्वर मन्दिर, भद्रकाली शक्तिपीठ आदि बहुत से स्थलों की यात्रा भी इस बहाने हो गई। लौट आया हूं, पर अनुभव कर रहा हूं—कुरुक्षेत्र की ऊर्जा से अंतर्मन आलोक मिला है ...








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