ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Thursday, March 12, 2026

’नवनीत’ मार्च अंक में ...


"...मार्क टली को सुनना और बाद में उनकी भारत केन्द्रित अनुभवपरक लिखी पुस्तकों को पढ़ना इसलिए भाता रहा है कि वहां पत्रकारिता की अपनी स्थापना के आग्रह नहीं है। मसलन उनकी लिखी पुस्तकों 'इण्डिया इन स्लो मोशन', 'नो फुल स्टोप्स इन इण्डिया' में स्पष्ट इस बात को रेखांकित किया गया है कि पश्चिमी सोच, आधुनिकता, विकास और सुधार के नाम पर यहां का अभिजात वर्ग नहीं चाहता कि यह देश अपनी भाषा, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़ा रहे। परन्तु यहां का जन—मानस जड़त्व लिए नहीं है। यह देश इतना उदार, खुलापन लिए है कि निरंतर नया होता रहता है। ...यह महज संयोग नहीं है कि आनंद कुमार स्वामी ने भी कभी यहां की कलाओं और भारतीय दृष्टि को लेकर यही कहा था कि भारत में नवीनता नवीन बनाने में नहीं है, नवीन होने में है। मार्क टली ने भारत को इसी दृष्टिकोण से समझा—परखा। इसलिए वह बार—बार अपने कहे में और लिखे में इस बात पर चिंता और पीड़ा जताते रहे हैं कि अंग्रेजी भाषा के प्रति अतिरिक्त मोह से भारत अपनी परम्पराओं और संस्कृति से पूर्ण विकास की ओर आगे नहीं बढ़ रहा है।"...