ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, April 4, 2026

साहित्य अकादेमी-साहित्योत्सव 2026

साहित्य अकादेमी की नूंत पर नई दिल्ली में आयोजित साहित्योत्सव के अंतर्गत 'अखिल भारतीय लेखक सम्मिलन' में कविता, यात्रा वृतांत, डायरी, ललित निबंध और मायड़ भाषा राजस्थानी में लेखन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए...लौट आया हूं-साहित्य अकादमी के अध्यक्ष, माधव कौशिक जी, साहित्यकार मित्रो के सान्निध्य—सुख को अंवेरते...