ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, April 18, 2026

धरोहर दिवस-संस्कृति की जीवंत दृष्टि

पत्रिका, 18 अप्रैल 2026
आज विश्व धरोहर दिवस है। पुरखों से परम्परा में जो मिला है, उसे सहेजने का दिवस। यह महज संयोग नहीं है कि मूर्तअमूर्त विरासत की दृष्टि से विश्व भर में भारत सर्वाधिक समृद्ध है। पर, धरोहर संरक्षण के प्रति उदासीनता भी कम नहीं है। देश में बहुत से ऐतिहासिक, पौराणिक, पुरातात्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व के विरासत स्थल सामाजिक चेतना की दृष्टि से इस समय उपेक्षित प्रायः हैं। ऐसे स्थलों के सांस्कृतिक मूल्यों को नहीं पहचानकर सदा के लिए हम उनसे दूर होते जा रहे हैं।

याद है, अरसा पहले भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान, ग्वालियर में व्याख्यान देने जाना हुआ था। तभी वहां के निदेशक संदीप कुलेश्रष्ठ ने ग्वालियर से 40 किलोमीटर दूर मुरैना स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर जाने का सुझाव दिया था। छोटी सी पहाड़ी पर स्थित वह वास्तुशिल्प देखकर चौंक उठा था। हूबहू हमारे पुराने संसद भवन की छवि आंखों के समक्ष थी। असल में ब्रिटिश वास्तुकार लुटियन ने उसे देखकर ही पुराने संसद भवन के निर्माण की कल्पना की थी। पर सोचता हूं, हममें से कितने हैं जो उस धरोहर तक पहुंच  पाते हैं! राजस्थान के हनुमानगढ़ का भटनेर दुर्ग कभी हिंद का प्रवेश द्वार कहा जाता था। रजिया सुल्तान को यहां कैद करके रखा गया था और विलुप्त सरस्वती नदी के किनारे भगवान परशुराम ने यहीं कभी साधना की थी। पर, इतिहास से जुड़े इन संदर्भों से कितने हैं, जिनका नाता है। असल में चिरपरिचित स्थलों के पर्यटनप्रसार में बहुत से धरोहर स्थल कालकवलित भी होते जा रहे हैं।

कुछ समय पहले पेरिस गया तो सीन नदी के किनारे स्थित लूव्र संग्रहालय भी जाना हुआ। यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक देखा जाने वाला संग्रहालय है। लियोनार्डो दा विंची की कलाकृति मोना लिसा यहीं प्रदर्शित है। पर,देखने के बाद अनुभूत किया पूरे संग्रहालय में एकरसता पसरी है। हमारे यहां हरेक राज्य में संग्रहालय हैं और एक से बढ़कर एक कलाकृतियां, लूंठीअलूंठी पुरावस्तुएं संग्रहित हैं परन्तु वहां उदासी पसरी है। बहुत से संग्रहालय तो औपचारिकता में खुलते भर हैं। उन्हें देखने लोग पहुंचते ही नहीं है। इसलिए कि धरोहर के प्रति आकर्षण की कोई दृष्टि हमारे यहां विकसित नहीं की गई है।

आनंद कुमार स्वामी ने भारतीय कलाओं का बहुत सा महत्वपूर्ण अपने स्तर पर संजोया था। वह चाहते थे कि कोई ऐसा संग्रहालय भारत में स्थापित हो जिसे वह इसे सौंप सकें। परन्तु जब ऐसा नहीं हुआ तो वह सारी भारतीय कला धरोहर बोस्टन चली गई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में भारत कला भवन हैं। कलाविद् राय कृष्णदास ने अपना संपूर्ण जीवन इसके संग्रह हेतु समर्पित कर दिया था। पर, इसके बारे में भी जागरूकता बहुत कम स्तरों पर है।  ऐसे ही नालन्दा के बारे में बहुत सारा हमें ज्ञात है, पर वहां के रास्ते में पड़ने वाले छोटे-छोटे गांवों और वहाँ की मूर्ति कलाओं में भारतीय इतिहास की अनुपम धरोहरें ध्वनित होतेी मैंने सुनी है। कश्मीर के  मार्तण्ड मंदिर के भग्नावशेष आज भी सार्वभौम सम्राट रहे ललितादित्य की कहानी सुनाते मुझे मिले हैं तो विश्वभर के ज्ञान केन्द्र रहे शारदापीठ की सनातन ज्ञानदृष्टि और संस्कृति से जुड़ी धरोहर को धीरे-धीरे हमने बिसरा दिया है।

मुझे लगता है, बहुत सारे स्थानों पर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न धरोहरें इस कारण हमसे दूर हो रही हैं कि  इतिहास के पन्ने उन पर मौन है। धरोहरें इतिहास का मधुर राग सुनाती है, बशर्तें उनके भीतर हम झांकें। यह अतीत से जुड़ा वह उजास है जिसमें संस्कृति और सभ्यता जीवंत हो नया कुछ हमें सौंप सकती है। बल्कि कहूं, इनसे इतिहासकारों ने जो पन्ने लिखने से छोड़ दिए, उन्हें बांचकर हम भविष्य के भारत की ज्ञानपरम्परा की सौंधी महक पा सकते हैं। काश! इस पर किसी तरह चिंतन की बढ़त इस धरोहर दिवस से ही ही हो।

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