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| पत्रिका, 16 मई 2026 |
कलाएं ध्यान की मांग करती है। भक्ति परम्परा का मूल भी तो यही है! वैदिक अनुष्ठान में देवता का आह्वान मंत्रोच्चार से होता। मंत्र का अर्थ है मन का तंत्र। संतुलन। मंत्रोच्चार के साथ पूजा जब की जाती है तो वहां पूज्य को समर्पित करने के सभी उपकरण इस साधना के ही तो हेतु होते हैं। पुष्प बौद्धिक जीवन के सार का सूचक है। नैवेद्य अशेष भोग को अर्पित करने का प्रतीक है। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए ही तो जप—तप, लीलानुकरण, नृत्य, संगीत कला जैसे सौंदर्य बोध साधनों का भक्ति में समावेश हुआ।
कभी पढ़ा था,
'भक्ति द्राविड़ उपजी,
लाए रामानंद।' यह
सच है, भक्ति
के बहाने कलाओं
का संसार दक्षिण
में ही सबसे पहले बना। कथा
है, भक्ति कर्नाटक
में युवती बन
कर रही। महाराष्ट्र
और गुजरात तक
आते—आते वृद्धावस्था
के कारण शिथिल हो
गई। आगे चलते—चलते उसके ज्ञान,
वैराग्य आदि पुत्रों
का निधन हो गया। पर,
वृंदावन में पहुंचते
ही पुन: उसने
जीवन प्राप्त कर
लिया। वृंदावन से
जुड़ी कृष्ण लीलाओं
ने ही भारतीय संगीत,
नृत्य, नाट्य और
तमाम दूसरी कलाओं
को बहुत बड़ा
आधार दिया है।
दक्षिण
में जो वैष्णव
भक्त हैं, वह आलवार कहे
गए हैं। आलवार
माने वह जो भगवत्प्रेम में डूबे
हुए हों। छठी
से नवीं शताब्दी
तक का समय आलवारों का रहा है। प्रभु
को स्वामी और
अपने को दास मानकर उसकी
सेवा करना ही उन्होंने परम—पुरुषार्थ माना है।
भक्त के रूप में, कभी
नायिका के रूप में, कभी
माता के रूप में, कभी पिता
के रूप में अपने आराध्य
देव श्रीमन्नारायण के
स्वरूप, गुण और लीला का
अनुभव आलवारों ने
विरल रूप में किया है।
उन्होंने जो लिखा,
वह 'दिव्य प्रबंध'
कहा गया। दक्षिण
के वेद रूप में इसे
मान्यता मिली है।
इस वेद को आधार बनाकर
ही कभी रामानुजाचार्य
ने अन्य धर्मावलम्बियों
को पराजित कर
'ब्रह्मसूत्र भाष्य' की
रचना की और वैष्णव धर्म
की स्थापना की।
वैष्णव भक्ति ने
भारत को एक ही नहीं
किया बल्कि विश्व
एकता का भी संदेश दिया।
इस भक्ति में
सूर्य के सर्वत्र
व्याप्त होने के आलोक में
उन्हें विष्णु केन्द्रित
किया गया। विष्णु
के साथ शंख,
चक्र का प्रतीक
आया। यही नाद—चक्र है। नाद
माने गत्यात्मकता। विष्णु के
व्यापक रूप को अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें
श्याम वर्ण दिया
गया। भू देवी या श्री
से संबद्ध मानकर
उनके एक हाथ में कमल
का संबंध स्थापित
किया गया। विष्णु
की इस कल्पना
में ही प्रजापति,
विश्व के आदि पुरुष तथा
सृष्टि की अव्यक्त
अवस्था के उद्बोधक
हुए।
हमारे
यहां कलाओं ने
इस—सबसे ही
बढ़त की है। सारी
की सारी कलाएं
अव्यक्त से व्यक्त
का ही तो नाद है।
भक्ति रूप में कहें तो
वहां साधना के
समर्पण का आह्वान
है। अपने ईष्ट
या कहें, जिस
कला में कलाकार ने अपने
को विसर्जित कर दिया, उसी ने कालजयी रचा है। तो कहूं, भक्ति
की परम्परा से
ही बना है कलाओं का
हमारा सारा जग!
--डॉ. राजेश कुमार व्यास, शंकर
विहार—ई, 28 ए,
सिद्धार्थ नगर, जयपुर—302017 (राजस्थान)

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