ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, July 18, 2026

शब्दों के मध्य संगीत

 

पत्रिका, 18 जुलाई 2026

शास्त्रीय संगीत रागाधारित है।  हरेक राग का अपना समय और भाव होता है। राग का एक अर्थ ही है, रंगना। राग कारण है और रस उसका परिणाम। अभिनवगुप्त ने नौ रस बताए हैं। पर, राजा भोज कहते हैंरस केवल एक ही 'शृंगार रस' है। उनका लिखा संस्कृत ग्रंथ 'शृंगारमंजरी कथा'  रागों के कारण और उसके परिणाम की कथाएं संजोए हैं।  इसमें एक प्रमुख कथा और उसकी फिर तेरह छोटीछोटी उपकथाएं हैं। कथा की शुरूआत राजा भोज द्वारा अपनी धारानगरी के महिमागान से होती है। औचक, फिर वह एक कठपुतली की ओर मुड़कर उसे बोलने का आदेश देते हैं। यांत्रिक गुड़िया भोज की महिमा का गान करती है। इसके बाद भोज अपनी प्रिय गणिका शृंगार-मंजरी और उसकी माता विषमा-शिला से कथा आगे बढ़ाते है। उपकथाओं में अलगअलग चरित्र के पुरूषों के राग और उसके परिणामों के आलोक मेंगणिका की मां द्वारा पुत्री को शिक्षा दी गई है। मसलन एक कथा में स्त्री के प्रति आसक्ति को नील के रंग समान बताया गया है। जैसे नील में रंगा कपड़ा कई बार धोने के बाद भी अपना रंग नहीं खोता, वैसे ही इस चरित्र का व्यक्ति बर्बाद होने के बाद भी अपनी आसक्ति नहीं छोड़ता। इसी तरह केसर में रंगे कपड़े से जुड़े मानव मन के राग, हल्दी के रंग के जल्द छूट जाने आदि के आलोक में यह कथा पुरूष चरित्रों की स्त्री आसक्ति यानी रागअनुराग की मनोहारी व्यंजना है। 

असल में राग की अनुभूति गहन सौंदर्य बोध से ही तो जुड़ी है! आचार्य मम्मट रचित "काव्य प्रकाश" में रस, ध्वनि, अलंकार, और दोष का वर्णन है। एक कविता में परपुरूष की प्रीति से जुड़े रस का नायिका-कथन देखें, 'वही चांदनी रात है। वही रेवा का किनारा है। वही प्रेमी भी है, पर आज वह पहले वाली बात नहीं है। क्योंकि वह प्रेमी अब मेरा पति बन चुका है।' कहन में भाषा से जुड़ी यह लय ही राग बोध है। संतोष चौबे का एक उपन्यास है, 'जलतरंग।' मुख्य चरित्र देवाशीष और स्मृति के प्रेम में पगी यह मनोहारी कथा है। इसमें स्वरों में निहित भावरस और वहां पहुंचने के लिए राग में डूबने के बहाने संगीत की हमारी पूरी परम्परा का रोचक आख्यान है। रागों और उनसे जुड़े रसरंजन की किस्सागोई यहां है तो नाद, श्रुति, स्वर, राग, रूप, ताल, वाद्यइतिहास के विरल संदर्भ भी है। संतोष चौबे ने उपन्यास के पांच अध्याय संगीत की गतिमति में गूंथे हैं। यह हैं, आलाप, जोड़, विलम्बित, द्रुत और झाला। देवाशीष के 'जलतरंग' वाद्य यंत्र सीखने से प्रारंभ होती कथा उसकी मित्र स्मृति से हुए संवाद में आगे बढ़ती भारतीय संगीत संधान में बदलते समय में कर्कश होती ध्वनियों में समाज के विद्रुप होते चरित्र को हमारे समक्ष रखती है। मुझे लगता है, यह उपन्यास संगीत के जरिए समाज मे हो रहे बदलाव का कथारूप है।

संगीत से जुड़ा शब्द 'विदारी' मुझे सदा लुभाता रहा है। माने स्वर और उसके गुच्छों के बीच का अंतराल। यह 'विदारण' शब्द से बना है। यानी बीच से टुकड़े करना। स्वरप्रवाह के मध्य का मौन! निहित गूंज। जैसे किसी रंग के साथ दूसरे रंग की घुली छाया। स्पष्ट दिखती नहीं पर, अंतर्मन मथती है। 'विदारी' संगीत की 'गंधमयता' है। कथा के संदर्भ में कहें तो, वहां शब्दों के मध्य संगीत बजने, उनमें मधुर तान ​छीड़ने की अनुभति की अलौकिक छटा 'विदारी' है। संतोष चौबे की 'जलतरंग' ऐसी ही कृति है। वहां भाषा है, परन्तु उसकी लय और निहित सांगीतिक प्रंसगछटाओं में रागदारी परम्परा में जीवन से जुड़ी आत्मीयता घुली है। पर, बदलते समय संग आ रही कटुताओं में बिखरते जा रहे संगीत में रसविहीन होती दुनिया की दास्तां भी है। पढेंगे तो मन करेगा गुनें।

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