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| पत्रिका, 29 अगस्त 2026 |
मुझे लगता है, भारतीय कलाओं की अंतर्दृष्टि का सार बहुत से स्तरों पर 'शिव सूत्र विमर्शिनी' में है। इसमें 'कला' तत्व के आध्यात्मिक संदर्भ मन को मथते हैं। आचार्य क्षेमराज लिखते हैं, “कला तत्व” ही निराकार को साकार रूप देने या किसी वस्तु को एक विशेष आकार-प्रकार प्रदान करने का आधार बनते है।
...आनंद कुमार स्वामी भारत के नहीं थे। उनकी माता एलिजाबेथ क्ले इंगलैण्ड की थी, पिता मुथु कुमारस्वामी श्रीलंका के थे। वह स्वयं सीलोन में खनिज निदेशक थे। उत्खनन के दौरान श्रीलंका में उन्होंने जब खुदाई में नटराज की, शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित विष्णु और ऐसे ही दूसरे देवी—देवताओं की मूर्तियां देखी तो उन्हें अचरज हुआ।
उन्होंने इनके अध्ययन के लिए संस्कृत, पाली आदि भाषाओं का अध्ययन किया। यह वह समय था जब पश्चिम में हमारे देवी-देवताओं की कई हाथों और चेहरों वाली मूर्तियों, चित्रों को देखकर मजाक उड़ाया जाता था।
आनंद कुमार स्वामी ने दुनिया को समझाया कि भारतीय कला बाहरी दुनिया की हूबहू नकल नहीं, बल्कि आध्यात्मिकता, भाव और आंतरिक सत्य को व्यक्त करने की महत्वपूर्ण दृष्टि है।
'द डांस ऑफ शिवा' में आनंद कुमार स्वामी लिखते हैं, शिव का नृत्य केवल एक कलात्मक सौंदर्य नहीं है। भौतिक जगत और चेतना की अनंत गतिशीलता का प्रकट रूप है। यह मूलतः प्रकृति, पदार्थ और प्रकृति के अंतर्संबंध को दर्शाता है।
आनंद कुमार स्वामी के बाद स्टेला क्रैमरिश ने एलोरा की गुफाओं में स्थित भगवान शिव की प्रतिमाओं का गहराई से विश्लेषण किया और लिखा कि शिव की उकेरी गुफा—प्रतिमाएं केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि वे कला के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संरक्षण और विनाश चक्र का रूपायन है। ..

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