ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, September 6, 2026

नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र ग्रंथ की समीक्षा


'नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र संपादित ग्रंथ की समीक्षा प्रिय दशरथ कुमार सोलंकी जी ने की है। आभार! इस ग्रंथ का संपादन बड़ी चुनौती थी। नाट्यशास्त्र पर इतना कुछ पहले से है, फिर नया क्या? कृतज्ञ हूं, मेरे आग्रह पर मर्मज्ञ विद्वानों ने इसमें नाट्यशास्त्र के बहुविध आयामों, अनछूए पहलुओं पर लिखा है।
इसी से बहुत सी सामग्री नाट्यशास्त्र विमर्श—आलोक में संजो सका। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, पटियाला ने इसे प्रकाशित किया है। तत्कालीन निदेशक फुरकान खान जी को इसका श्रेय जाता है...
पत्रिका, रविवारीय-6 सितम्बर 2026


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