ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, July 25, 2026

राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं-परिसंवाद

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा ​बीकानेर में 'राजस्थानी साहित्यिक पत्रिकाएं' विषयक एक दिवसीय परिसंवाद में समापन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में बोलने जाना हुआ। अपने अनुभवों के साथ राजस्थानी पत्रिकाओं में संपादकों द्वारा लिखवाए गए प्रसंगों को साझा करने के साथ ही देवेन्द्र सत्यार्थीजी की इस बात को भी विशेष रूप से रेखांकित किया कि 'लेखक से लिखवाना सबसे कठिन कार्य है।' यह भी कि राजस्थानी ही नहीं तमाम भाषाओं पर बाजार द्वारा पैदा संकट गहरा रहा है। शब्द—संस्कृति को बचाए रखना इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। इस दौरान राजस्थानी पत्रिकाओं के संपादन—सरोकारों के अंतर्गत कभी अंग्रेजी में ही लिखने वाले केन्या के उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो द्वारा भाषाई दासता छोड़ने के संकल्प के साथ अपनी स्वयं की गिकुयू-भाषा में लिखने से जुड़ी दृष्टि से जुड़ी पुस्तक 'डिकोलाइजिंग द माइंड' की विशेष रूप से चर्चा की।...

लौट आया हूं—अपने शहर में कुछ देर ठहर मिलने—मिलाने की अतृप्त प्यास को और घनीभूत रूप में अनुभव करते।















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