ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Monday, August 17, 2026

वंदे मातरम्

बंकिम चन्द्र का लिखा 'वंदे मातरम्' गीत भर नहीं है, भारतीय संस्कृति का नाद है। आजादी आंदोलन का बीज मंत्र कभी यही गीत बना था। इसका संपूर्ण गायन पहले पहल 1896 में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कलकत्ता में 'राष्ट्रीय सभा' के दूसरे अधिवेशन में हुआ। बंकिमचंद्र का 8 अप्रैल 1894 को निधन हो गया। पर, तब तक उनका लिखा 'वंदे मातरम्' राष्ट्र मंत्र बन जनजन से जुड़ गया था।

राजस्थान पत्रिका, 15 अगस्त 2026




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