भारतीय कलाओं को विश्वभर में उसकी वास्तविक महिमा के साथ उजागर करने का विरल कार्य किसी ने किया तो वह आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी थे। अपनी लिखी ‘बगवियर ऑफ लिटरेसी’ (शिक्षा का हव्वा) पुस्तक में उन्होंने कहा भी है कि पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय शिक्षित समाज में भारतीय कला और संस्कृति के प्रति अवहेलना और उदासीनता का भाव पैदा किया है। उन्होंने स्थापित किया कि भारतीय कलाकृतियों में मूर्तिकारों, चित्रकारों ने प्रत्यक्ष में जो दिखता है, वही नहीं सिरजा है बल्कि उसके निहितार्थ भाव-भंगिमाओं में आकाश रचा है...।"
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| अमर उजाला, 13 सितम्बर 2026 |

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