ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Tuesday, September 15, 2026

आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी

भारतीय कलाओं को विश्वभर में उसकी वास्तविक महिमा के साथ उजागर करने का विरल कार्य किसी ने किया तो वह आनंद कैन्टिश कुमारस्वामी थे। अपनी लिखी ‘बगवियर ऑफ लिटरेसी’ (शिक्षा का हव्वा) पुस्तक में उन्होंने कहा भी है कि पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय शिक्षित समाज में भारतीय कला और संस्कृति के प्रति अवहेलना और उदासीनता का भाव पैदा किया है। उन्होंने स्थापित किया कि भारतीय कलाकृतियों में मूर्तिकारों, चित्रकारों ने प्रत्यक्ष में जो दिखता है, वही नहीं सिरजा है बल्कि उसके निहितार्थ भाव-भंगिमाओं में आकाश रचा है...।"

 अमर उजाला, 13 सितम्बर 2026




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