ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, October 17, 2026

कलाओं में निहित दार्शनिक दृष्टि से जुड़ा पर्व

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026

भारतीय कलाएं और पर्व सृजन के साथ विसर्जन की गहन दार्शनिक व्यंजना है। यह दुर्गा पूजा का समय है। माँ दुर्गा की सुंदर, शृंगारित प्रतिमाओं के ध्यान—ज्ञान से जुड़ा। कलाकार देवी को 'चक्षु दान' करते हैं। दुर्गा पूजा के लिए माँ की पूरी मूर्ति पहले ही रंग दी जाती है, लेकिन आँखें कोरी छोड़ी जाती हैं।  बंगाली मूर्तिकला परंपरा में 'चक्षु दान' भोर के उजास में होता है। कलाकार ध्यानस्थ हो देवी का स्मरण करता है। मंत्र संग प्रार्थना होती है—जो दिव्य दृष्टि पूरे ब्रह्मांड को देखती है, वह इस प्रतिमा में स्थापित हो। 'चक्षु दान' का अर्थ ही है, दृष्टि देना। इसी से प्रतिमा जीवंत होती है। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन और मातृ पक्ष की शुरुआत हती है।  देवी की सिरजी प्रतिमाओं पर गौर करें, माँ की आँखों में करुणा, वात्सल्य और क्रोध तीनों ही मिलेंगे।

देवी दुर्गा की आराधना का असल समय चैत्र नवरात्रि है। पहले 'वासंती पूजा' का ही विधान था। खगोलीय दृष्टि से, यही वह समय होता है जब पृथ्वी की धुरी और सूर्य की स्थिति में बदलाव होता है। दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह इसी समय सबसे अधिक होता है। इसे पाने के लिए ही देवी दुर्गा की आराधना होती है। पौराणिक मान्यताओं में देवी—देवताओं का समय उत्तरायण और दक्षिणायन होता है। शरद ऋतु देवी-देवताओं का विश्राम समय होता है।

भगवान श्रीराम द्वारा शक्ति पूजा के बाद शारदीय नवरात्र का भी महत्व हो गया। यही वह समय था जब राम—रावण युद्ध हुआ। युद्ध में रावण की रक्षा स्वयं महाशक्ति कर रही थीं। विभीषण और ब्रह्मा ने तब श्रीराम को देवी आराधना के लिए कहा। पर, यह देवी पूजा का समय नहीं था। राम ने अकाल बोधन किया। माने असमय देवी का आह्वान। देवी को उन्होंने 108 नीलकमल अर्पित करने का संकल्प लिया। माँ परीक्षा लेने के लिए एक कमल छुपा देती है। राम बहुत व्यथित होते हैं। औचक, उन्हें याद आता है कि बचपन में उन्हें 'कमल —लोचन' कहा जाता था। संकल्प पूरा करने वह अपनी एक आँख देवी को अर्पित करने उद्यत होते हैं कि देवी प्रकट हो उनका हाथ पकड़ लेती है। विजय का आशीर्वाद देती है। नौ दिनों की शक्ति-उपासना के दसवें दिन विजयादशमी  पर फिर भगवान श्रीराम रावण का वध करते हैं।  मूल वाल्मीकि रामायण में इस शक्ति पूजा का उल्लेख नहीं है।

बांग्ला भाषा में 15वीं शताब्दी में रचित 'श्रीराम पाञ्चाली' में यह प्रसंग है। महाकवि  कृत्तिवास ओझा ने 'कालिका पुराण' और 'बृहद्धर्म पुराण' जैसे उप-पुराणों से प्रेरणा लेते हुए असमय देवी जागरण का यह मार्मिक प्रसंग लिखा है। बंगाल में में देवी पूजा का इतिहास हालांकि बहुत पुराना है, पर 'कृत्तिवास रामायण' के बाद इसके स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव आया। वसंत ऋतु की जगह शारदीय नवरात्र मुख्य त्योहार हो गया। वहां के जमींदारों के बंद महलों से निकलकर दुर्गा पूजा का पर्व सार्वजनिक हो पूरे राष्ट्र का उत्सव बन गया।

शारदीय नवरात्र देवी—आराधना का पर्व भर नहीं है। यह भारतीय संस्कृति और कलाओं की वह सूक्ष्म दृष्टि भी है जिसमें सृजन के साथ विसर्जन जुड़ा है। नौ दिन दुर्गा पूजा होती हैं। माँ के सुंदर स्वरूप में ही मन ध्यान—मग्न हो उठता है। नौ दिन बीत जाते हैं और, वह क्षण आता है जब हमें देवी के सुंदर स्वरूप को विसर्जित करना होता है। सृजन और विसर्जन का यह चक्र ही प्रकृति और जीवन का सत्य है। जो भी रूप धारण करता है, उसका विसर्जन या कहें बिछोह ही उसकी दिव्यता को अनंत में विलीन करना है।  माँ  का कलाकारों द्वारा सिरजा हुआ भौतिक रूप भले ही विसर्जित हो जाए, पर उनकी शक्ति और प्रदत्त आध्यात्मिक ऊर्जा सदैव हमारे भीतर जीवंत रहती है। यही जीवन का, पर्व का और कलाओं का उजास है।

drrajeshkumarvyas@gmail.com

संस्कृति की संधान भारतीय दृष्टि

पत्रिका, 19 सितम्बर 2026

कलाओं की हमारी दृष्टि पर पश्चिम की छाया इतनी घनी है कि हम कलाओं के हमारे चिंतक, मर्मज्ञों की ओर प्राय: झांक ही नहीं पाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। लेखक, आलोचक मित्र प्रो. प्रभाकर सिंह ने इस आलोक में इधर महती पहल की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वासुदेवजी के कला, इतिहास और जनपदीयता से जुड़े विरल कार्य को केन्द्र में रखकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। उन्होंने इसमें बोलने की नूंत दी तो वासुदेव शरण अग्रवाल जी के कला—संस्कृति चिंतन ने मन को जैसे मथा। वासुदेव जी का शास्त्रीय कलाओं पर अध्ययन जितना गहरा है, लोक कलाओं पर उससे और भी कहीं अधिक है। लोक के चमत्कारी और अलौकिक अध्ययन की बजाय उसके बहुमुखी परिवेश को समझने की दृष्टि उन्होंने ही पहले पहल हमें दी। उनका लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां ओझल हुए भारतीय संस्कृति से जुड़े ग्रंथो का विरल भाष्य है, मार्मिक टीकाएं है उनका गहन अन्वेषण है और हां, पुरातत्व—अनुसंधान का भी 'भावन' है। भावन माने वह जो मन को भाए। चिंतन और मनन के साथ जिसमें गवेषणा समाई हो।

वासुदेव शरण अग्रवाल ने 1931 में मथुरा संग्रहालय के अध्यक्ष बने। उन्होंने इस संग्रहालय में मौजूद ऐतिहासिक मूर्तियों और कलाकृतियों के वैज्ञानिक वर्गीकरण के डॉ. जे. पी. एच. फोगल के किए काम को आगे बढ़ाया और मथुरा मूर्तिकला से जुड़े अनछुए तथ्यों से विश्वभर का साक्षात कराया। ..अंग्रेजी साम्राज्य ने विदा लेते लेते भारतीय कलाओं की एक विराट प्रदर्शनी लन्दन में की थी। इसमें भारतीय संग्रहालयों से चुनी हुई वस्तुएं आई थी। रियासतों से चीजें उधार मिली और स्वयं इंग्लैंड के विश्वविख्यात संग्रहों के भारतीय कला रत्न उपलब्ध थे। जब कला प्रदर्शनी समाप्त हुई तो सारी सामग्री लौट कर भारत आई। राष्ट्रपति भवन के दरबार हाल में उसकी एक प्रदर्शनी हुई। वासुदेव शरण अग्रवाल के प्रयासों से ही सारी संग्रहित वस्तुएं राष्ट्रीय संग्रहालय में ही फिर रह गई। ..