
पत्रिका, 19 सितम्बर 2026
कलाओं की हमारी दृष्टि पर पश्चिम की छाया इतनी घनी है कि हम कलाओं के हमारे चिंतक, मर्मज्ञों की ओर प्राय: झांक ही नहीं पाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही व्यक्तित्व रहे हैं। लेखक, आलोचक मित्र प्रो. प्रभाकर सिंह ने इस आलोक में इधर महती पहल की है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वासुदेवजी के कला, इतिहास और जनपदीयता से जुड़े विरल कार्य को केन्द्र में रखकर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। उन्होंने इसमें बोलने की नूंत दी तो वासुदेव शरण अग्रवाल जी के कला—संस्कृति चिंतन ने मन को जैसे मथा। वासुदेव जी का शास्त्रीय कलाओं पर अध्ययन जितना गहरा है, लोक कलाओं पर उससे और भी कहीं अधिक है। लोक के चमत्कारी और अलौकिक अध्ययन की बजाय उसके बहुमुखी परिवेश को समझने की दृष्टि उन्होंने ही पहले पहल हमें दी। उनका लिखा इसलिए भी सुहाता है कि वहां ओझल हुए भारतीय संस्कृति से जुड़े ग्रंथो का विरल भाष्य है, मार्मिक टीकाएं है उनका गहन अन्वेषण है और हां, पुरातत्व—अनुसंधान का भी 'भावन' है। भावन माने वह जो मन को भाए। चिंतन और मनन के साथ जिसमें गवेषणा समाई हो।
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Saturday, October 17, 2026
संस्कृति की संधान भारतीय दृष्टि
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment