मुम्बई में इस बार सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के कुलपति, मित्र प्रो. हिम चटर्जी की संगत ने संपन्न किया। उन्होंने सर जमशेदजी जीजीभॉय द्वारा 1857 में स्थापित देश के इस विरल कला—संस्थान के विभिन्न संकायों का संग चल अवलोकन ही नहीं कराया, इससे जुड़े महती ऐतिहासिक—कला संदर्भों से भी अवगत कराया। उनके द्वारा भानु अथैया, गायतोण्डे, हेब्बर, अकबर पदमसी, दादासाहेब फाल्के, राम वी. सुतार आदि के शुरूआती दौर की सिरजी कलाकृतियों के बारे में जानने, उन्हें देखने के सुयोग में ही मन अभी तक रचा—बसा है। एक महती पहल उन्होंने संस्थान में यह की है कि पुराने डीन आवास को उस दौर के मास्टर्स कलाकारों के रेखांकनों की कलादीर्घा में रूपान्तरित किया है। भवन के प्राचीन स्थापत्य सौंदर्य में कलाकृतियों का यह गलियारा मन—भावन है। वह संस्थान में यहीं पेड़ों के झुरमूट—आलोक में एक आर्ट—हब स्थापित कर रहे हैं। मंशा यह है, दुनियाभर के कला—प्रेमी यहां आएं, छात्र—छात्राएं भारत में सिरजी महान कलाकारों की कलाकृतियों से रूबरू हों और इस स्थान को अनुभूत करें। उनसे साथ बतियाते ही जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के विभिन्न संकायों में, वहां के शिक्षकों से और छात्र—छात्राओं से संवाद में समय पंख लगाते उड़ता रहा। अच्छा भी लगा, एक कुलपति अपने संस्थान में सहज यूं भ्रमण करते अपने साथी आचार्यों संग इस तरह बतियाते बहुत कुछ नया करने के लिए उत्सुक है। वहां की कलाओं में रचते—बसते यह सब कर रहा है।
बहरहाल, रुडयार्ड किपलिंग के पिता जॉन लॉकवुड किपलिंग जे.जे. में ही वास्तुकला पढ़ाते थे। उन्होंने ही भारतीय कारीगरी का पश्चिम से समन्वय करते मुम्बई के विक्टोरिया टर्मिनस और दूसरी इमारतों के स्थापत्य सौंदर्य में बढ़त की। जॉन ग्रिफिथ्स भी तो यहीं पढ़ाते थे वही, जिन्होंने मशालों और मोमबत्तियों की रोशनी में अपने छात्रों के साथ वर्षों कड़ी मेहनत कर अजंता की गुफाओं के भित्तिचित्रों के संरक्षण में ही महती योगदान नही दिया बल्कि अजंता के कला—सौंदर्य का विश्वभर में परिचय कराया। देह से लौट आया हूं, पर मन तो अभी सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट के गलियारों में ही बसा है...







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