
ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.
...तो आइये, हम भी चलें...
Sunday, November 27, 2011
अल्लाह जिलाई बाई पर यह आलेख ...
लखनऊ से प्रकाशित जन सन्देश टाइम्स में प्रति सप्ताह प्रकाशित संगीत यह स्तम्भ...रविवार, २७ नवम्बर को प्रकाशित यह आलेख


Saturday, April 2, 2011
...जहां आम्रपाली बनी बोद्ध भिक्षुणी
-डॉ. राजेश कुमार व्यास -
आर्यावर्त्त प्रदेष रहा है आज का बिहार। भगवान बुद्ध और महावीर की चरणधूली से पवित्र हुआ प्रदेष।... पटना से कोई 60 किलोमीटर ही दूर है-बाखिरा। बाखिरा माने कोल्हुआ।...मौर्य सम्राट अषोक के सिंह स्तम्भ के साथ ही राजनर्तकी आम्रपाली का हृदय परिवर्तन स्थल। प्राचीन बौद्ध नगरी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस स्थान का विवरण अपनी यात्रा में विषेष रूप से किया है। चीनी उल्लेखों तथा सीमित उत्खननों के पुष्टि करने के बाद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861-62 में इस स्थान को प्राचीन बौद्ध नगरी के रूप में पहचाना। तत्पष्चात टी.ब्लाच (1903-04 ई.) तथा डी.बी. स्पूनर (1913-14 ई.) द्वारा यहां उत्खनन किया गया। कुदालों द्वारा स्पूनर ने कोल्हुआ के निचले स्थानों की खोज जब प्रारंभ की तो 16 से 18 फुट नीचे पहुंचते ही धरातल का जल मिल गया, पर क्वांरी भूमि अभी और नीचे थी। पानी में हाथ डालते ही उसमंे से मूर्तियांे, भांडों आदि के प्राचीनतम खंड निकल पड़े, इनमें ही अषोक कालीन पॉलिष किया हुआ चिकना पाषाण खंड भी था। भग्नावषेषों का स्तर मौर्यकाल तक पहुंच गया। बाद में कुछ मुहरें और सिक्के भी यहां से मिले।...यहां हुई खुदाई से ही पता चलता है कि कभी यह स्थान व्यापार का भी प्रमुख केन्द्र रहा है। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की पत्नी ध्रुवस्वामिनी का नाम भी यहां मिली एक मुहर में भी लिखा मिला है।
...यहां कोल्हुआ में दूर तक सुनसान है। कुछ झोपड़ें जरूर बने हुए हैं। आस-पास कोई घनी आबादी नहीं है। पुरातत्व विभाग की टिकट खिड़की और उसके सामने मिनरल बोतल, बिस्किट के पैकेट और दूसरे कुछ सामानों, यहां से जुड़े इतिहास और पर्यटन साहित्य से सजी झोपड़े में ही एक दुकान बनी हुई है।...टैक्सी से हमें कोल्हुआ पुरावषेष स्थलों की ओर प्रवेष करते देख बहुत सारे बच्चे हमारी ओर लपक आए हैं। पुरातत्व विभाग के कर्मचारी उन्हें वहां से भगाते हैं।...
कोल्हुआ यानी बाखिरा में हुई खुदाई के बाद निकले अवषेषों को पुरातत्व विभाग ने यहां अलग से चारदीवारी बनाकर सहेज कर रख लिया है।...चारदीवारी के अंदर प्रवेष करता हूं।...सामने ही खुदाई में मिला इंटों से निर्मित गोलाकार स्तूप और अषोक स्तम्भ दिखायी दे रहा है। पास में ही छोटा सा एक सरोवर भी नजर आ रहा है। यत्र-तत्र खुदाई के अवषेष यहां जैसे बिखरे पड़े हैं...नई इमारत में जिस प्रकार नींव भरते हैं, ठीक वैसे ही इंटों का निर्माण भी यहां अलग से दिखायी दे रहा है। कुछ-कुछ अन्तराल में प्राचीन प्रासादों, भवनों की याद दिलाते इंटों के अवषेषों से स्पष्ट पता चलता है कि कभी यहां पूरी एक सभ्यता का वास था।
...यहीं सिंहषीर्षक युक्त स्तम्भ भी अलग से दिखायी दे रहा है। मैं मुख्य बौद्ध स्तूप के पास बने इस अषोक स्तम्भ को देखकर बेहद रोमांचित हूं। बरसों तक बस इसके बारे में पढ़ा ही था, आज अपनी आंखों से देख रहा हूं।...चीनी यात्री फाहियान ने इसे 50 फुट ऊंचा बताया था। कहते हैं, इसकी पहचान पुरातत्वविद कनिंघम ने लेख रहित अषोकीय स्तम्भ से की थी। कोल्हुआ यानी प्राचीन कोल्लग।...कालान्तर में कोल्लग कोल्हुआ हो गया।
‘यह भीमसेन की लाठी है।’
अशोक स्तम्भ के पास खड़े उसे गौर से मुझे देखकर वहीं पुरातत्व विभाग के कर्मचारी ने मुझे बताया तो मैं चौंका। मैंने उसी का कहा फिर से दोहराया, ‘भीमसेन की लाठी!’
‘हां, यहां के स्थानीय लोग इसे इसी नाम से पुकारते हैं।’
मुझे विस्मय में पड़े देख वह बताने लगा, ‘मौर्य सम्राट अषोक ने देषभर में स्तम्भों का निर्माण करवाया था। उन्हीं मे से एक है यह। पुरातत्व विभाग के अन्वेषण के अनुसार पत्थर का 1100 मीटर का उंचा चमकदार यह एकाष्म स्तम्भ है। अषोक द्वारा स्थापित किए प्रारंभिक स्तम्भों में से एक है जिन पर उनका कोई अभिलेख अंकित नहीं है। इस पर शंख लिपि में उकेरे गए कुछ अक्षर गुप्तकाल के हैं।’
मैं गौर से अषोक स्तम्भ के बारे में कही बातें सुन रहा हूं।...पुरातत्व विभाग के कर्मचारी के साथ बतियाते मुझे देख वहीं जापान से आये तीन पर्यटक भी हमारी ओर ही चले आए हैं।...हिन्दी उन्हें समझ में नहीं आती इसलिए वे अंग्रेजी में मुझसे स्तम्भ के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं। मैं उन्हें कुछ समय पहले बतायी जानकारी का अनुवाद अंग्रेजी में कर सुना देता हूं। वे ‘थैंक्स’ बोलते हुए तीनों का एक साथ स्तम्भ के पास छायाचित्र खिंचने का मुझसे आग्रह करते हैं। उनके डिजिटल कैमरे से मैं उन्हें उनके ही कैमरे में कैद करके कैमरा वापस उन्हें सौंप देता हूं।...कृतज्ञता के भाव उनके चेहरे पर साफ दिखायी देने लगे हैं।
सिंहषीर्ष अषोक स्तम्भ को देखते मैं उसके इतिहास और उनमें निहित वास्तु कला पर ही विचार कर रहा हूं।...बसाढ़-बाखिरा यानी कोल्हुआ का यह अषोक स्तम्भ अपने लघु आकार, अधिक भार, वर्गाकार चौकी तथा अनुपात एवं सौन्दर्य की कमी के कारण स्तम्भ स्थापना के प्रारंभिक चरण की ओर संकेत करता है। ऐसा लगता है, मौर्य सम्राट अषोक ने स्तम्भों के निर्माण की पहल इसी स्तम्भ से की थी। इसके बाद के जो स्तम्भ सारनाथ से प्राप्त हुए हैं, वे हैं तो इसी परम्परा के परन्तु इनसे कहीं अधिक सुन्दर परिष्कृत रूप में मिलते हैं। इन अषोकीय स्तम्भों से पूर्व कहीं भी भारत में एकाष्म स्तम्भ, पशु शीर्षक तथा उच्च कोटी की ओप के उदाहरण नहीं हैं। बौद्धधर्म की स्थापना की स्मृति को स्थाई बनाने की ईच्छा से ही इन स्तम्भों का निर्माण हुआ है। अषोक द्वारा निर्मित पशु शीर्षक युक्त एकाष्मक स्तम्भों को मौर्य वास्तु के विकास की पराकाष्ठा के प्रतिनिधि स्मारक माना जा सकता है।
...चुनार के पत्थर से बने अषोक सिंह शीर्षक 50 फुट तक ऊंचाई वाले इस स्तम्भ के दण्डों पर चमकदार ओप है। ताड़ वृक्ष की भांति नीचे से मोटा और ऊपर की ओर पतले इस स्तम्भ के नीचे दण्ड यानी लाट तथा ऊपर का शीर्षक सिंह की ओजस्वी मूर्ति रूप में है। सिंह की मूर्ति सारनाथ के स्तम्भ में भी है और उसे हमारे राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में भी स्वीकार किये जाने का गौरव प्राप्त है।...अषोक का यह एकाष्म स्तम्भ ही तो ललित कला अकादेमी का भी प्रतीक चिन्ह। सम्राट अषोक ने सिंह शीर्षकों युक्त ही स्तम्भों का निर्माण क्योंकर किया? शायद इसलिए कि सिंह स्वयं भगवान बुद्ध का प्रतीक है। बौद्ध साहित्य में बुद्ध को शाक्य ही कहा गया है। शाक्य माने सिंह। इतिहासकार वासुदेवषरण अग्रवाल का मत थोड़ा भिन्न है। उन्होंने अषोक के स्तम्भों में उकेरी सिंह मूर्तियों को सम्राट की तेजस्विता के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित किया है। कहते हैं, मौर्य सम्राट अषोक ने तथागत यानी गौतम बुद्ध के जन्म स्थान लुम्बिनी ग्राम की यात्रा की थी। पाटलीपुत्र, लौरियानन्दनगढ़, लौरिया अरराज, वैषाली के निकट बाखिरा या कोल्हुआ आदि के ये स्तम्भ संभवतः उसकी यात्रा मार्ग की ओर ही संकेत करते है।
मुझे लगता है, सिंह शीर्षक युक्त अषोक स्तम्भ कोल्हुआ की खुदाई के अवषेषों का प्रहरी है। पुरातत्व विभाग के उत्खनन के दौरान यहां मिला इंटो द्वारा निर्मित मुख्य स्तूप मूलतः मौर्यकाल में बना था। इंटों की गोलाई का ढ़ेर मानिंद यह और इसके साथ ही खुदाई में मिली कुटागारषाला, स्वस्तिस्काकार विहार, पक्का जलकुंड,, बहुसंख्य मनौती स्तूप तथा लघु मंदिर सभी की जैसे सिंहषीर्ष युक्त लाट यानी स्तम्भ रखवाली कर रहा है।...यही सब सोचते हुए मैं खुदाई में मिले अवषेषों का अवलोकन करने में लगा हूं। इंटों की यहां व्यवस्थित उपस्थिति स्पष्ट इस बात की ओर संकेत करती है कि कभी यहां भव्य भवन बने रहे हैं।
पुरातत्व विभाग द्वारा संजोयी गयी सूचना के अनुसार बुद्ध के मुख्य इंटों के स्तूप का आकार कुषाण काल में परिवर्धित करके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ जोड़ा गया। तदुपरान्त गुप्तकाल और परवर्तित गुप्तकाल में पुनः इंटों से आच्छादित करके स्तूप को सवंर्धित किया गया और चारों ओर नियमित अन्तराल पर आयक भी जोड़े गए। कहते हैं, भगवान बुद्ध ने अनेक वर्षावास यहां ही व्यतीत किए तथा अंत में अपने निर्वाण की घोषणा भी उन्होंने यहीं कोल्हुआ में ही की। भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित आठ अनोखी घटनाओं में से एक, बंदरों द्वारा बुद्ध को ‘मधु’ भेंट करने के प्रतीक के रूप में भी भगवान बुद्ध का यह मुख्य स्तूप याद किया जाता है।
कोल्हुआ के अवषेषों को तारबन्दी से सुरक्षित किया हुआ है। थोड़ी दूरी पर ही स्वस्तिक के समान आधार विन्याय का इंटों का निर्माण कार्य दिखायी दे रहा है।...पुरातत्व विभाग का कर्मचारी मुझे यूं गौर से यहां की चीजों को देखकर मेरे पास आ गया है। वह जो कुछ बता रहा है, वही सब कुछ पास ही लगे पुरातत्व विभाग के हिन्दी और अंग्रेजी के सूचना पट्ट में भी लिखा हुआ है।...यहां बहुत कम लोग आते हैं, लगता है पुरातत्व कर्मचारी भी अकेलेपन से उब जाते होंगे। मेरे जैसे हिन्दी भाषी घुम्मकड़ों से बात करना उन्हें भी अच्छा लगता होगा...यही सब सोच रहा हूं। यह भी कि मुझे भी तो कितनी मदद मिल रही है, मुफ्त में गाईड का कार्य हो रहा है। औचक मैं उससे प्रष्न करता हूं, ‘भगवान बुद्ध ने संघ में भिक्षुणियों को प्रवेष की अनुमति यहीं तो नहीं दी थी?’
‘आपने बिल्कुल सही सोचा। अपने परम षिष्य आनंद के परम आग्रह पर उन्होंने इसी स्थान पर संघ में स्त्रियों को प्रवेष करने की अनुमति दी थी।’ मैं जैसे भगवान बुद्ध के समय में पहुंच गया हूं। आनंद उनसे आग्रह कर रहे हैं, ‘भगवन इसमें बुराई ही क्या है?...प्रतिदिन आपके उपदेषों को सुनने इतनी स्त्रियां आती है। वे आपसे तो कुछ कह नहीं सकती। मुझे उलाहना देती है, जब पुरूष भिक्षु बन सकते हैं, तो हम क्यों नहीं। क्यों भगवन, उन्होंने क्या अपराध किया है...आप इस पर विचार करें भगवन!’
...और महात्मा बुद्ध ने अपने परम षिष्य आनंद की बात मान ली है। आनंद के आग्रह पर महाप्रजापति गौतमी-अपनी धर्म माता को भिक्षुणी के रूप में उन्होंने दीक्षित कर स्त्रियों को संघ का अंग बनने का अधिकार प्रदान कर दिया।...झुंड की झुंड स्त्रियांे संघ में प्रवेष कर रही है। बौद्ध धर्म से पहले स्त्रियों का भिक्षुणी होना, उनका मर्द साधुओं के साथ मठों में वास करना प्रचलित नहीं था।...भले ही स्त्रियों को बौद्ध धर्म में दीक्षित करने की प्रक्रिया को स्वीकार कर बुद्ध ने नारी को नर के समकक्ष समादर दिया परन्तु इसकी विकृतियों से बाद में बुद्ध धर्म का पराभव भी हुआ। बुद्ध ने शायद इसीलिए आनंद के बहुत अधिक आग्रह पर ही संघ में स्त्रियों के प्रवेष की बात मानी थी। वे शायद इसके परिणामों को पहले से ही जानते थे, इसीलिए उन्होंने एक दिन अपने षिष्य आनंद को कहा भी, ‘आनंद! मैंने जो धर्म चलाया वह पांच हजार वर्ष तक टिकने वाला था लेकिन अब वह सिर्फ पांच सौ वर्ष तक ही चलेगा, क्योंकि हमने स्त्रियों को संघ में शामिल होने की प्रथा चला दी है।’
...मन में विचार आ रहे है। आम्रपाली को भी तो भगवान बुद्ध ने यहीं संघ में प्रवेष करवाया था। कितनी बातें, कितने किस्से उस राजनर्तकी के साथ जुड़े हुए हैं। गणिका अम्बपाली। सौन्दर्य की मलिका। कभी भगवान बुद्ध भिक्षुओं के साथ आम्रपाली के मेहमान बने।...आम्रपाली ने रूप के गौरव को त्याग दिया।...भगवान बुद्ध के उपदेषों को आत्मसात कर लिया। विनम्र भिक्षुणी हो गयी आम्रपाली।...ऐसी ही बहुत सारी घटनाओं का साक्षी है कोल्हुआ। भगवान बुद्ध, राजनर्तकी आम्रपाली, प्रजापति गौतमी, गुप्त साम्राज्य के बारे में ही सोचते कोल्हुआ उत्खनन में प्राप्त अवषेष परिसर से बाहर निलता हूं।
Tuesday, February 22, 2011
Sunday, October 24, 2010
पेरियार में वन्यजीव निहार
यात्रा वृतान्त
- डॉ. राजेश कुमार व्यास-
सघन जंगल की गंध उसकी सुवास मन को सदा ही भाती रही है। जंगल की निरवता ही तो ऐसी होती है जिसमें पक्षियों का कलरव शोर नहीं करता बल्कि उसका अंग बन मन को भाता है।...मुझे लगता है घने जंगल में उन्मुक्त पक्षियों, वन्यजीवों का बसेरा इसीलिए भी आकर्षित करता है कि हमें वैसी उन्मुक्तता नहीं है।...सुविधाओं के अनगिनत बंधनों से मन इस कदर जकड़ा है कि चाहकर भी उन्मुक्त नहीं हो सकता। वह उड़ना चाहता है, पक्षी की तरह। खुले निर्भीक विचरना चाहता है भांत भांत के वन्यजीवों की तरह।... परन्तु विचर नहीं सकता। पक्षी की तरह उड़ने के लिए मनुष्य के पास पंख कहां से आए! वह तो सोच से आए। उड़ने की सोच कहां से आए! वह तो बंधी है सुविधाओं की बेड़ियों से, जो मिला हुआ है उससे अधिक और अधिक पाने की होड़ से।...पंख हल्के होते हैं। जितने हल्के, उतने ही ताकतवर। ऊंची उड़ान को संभव बनाते। हम हैं जो सुविधाओं के भार से और भारी हुए जाते हैं। भारी से भी भारी होना जो चाहते हैं। जीवन की यह अनंत इच्छाएं हमें क्या हमसे ही निरंतर दूर और दूर नहीं ले जा रही! सड़क के दोनों और घने जंगल के रास्ते से गुजरकर केरल में पेरियार अभयारण्य जब पहुंचे तो यही सब कुछ मन में चल रहा था। पेरियार झील से जंगली जानवरों, खासकर हाथियों और दूसरे वन्यजीवों, पक्षियों के विचरण के निहार का सोच कर ही मैं रोमांचित था।
'रात पेरियार ही रूकेंगे ना सर।' टैक्सी ड्राइवर ने जब पूछा तो मैं विचारों के बियाबान से जैसे बाहर निकला।...उसे रात्रि वहीं रूकने का जवाब देते हुए फिर से मैं दूर तक हरे-भरे मखमली कालीन की तरह फैले चाय बागानों और सड़क के दोनों ओर प्रकृति के सौन्दर्य को निहारने लगा था। हम थेकड़ी के निकट विश्व प्रसिद्ध पेरियार राष्ट्रीय उद्यान पहुंच चुके थे। थेकड़ी के पास यह केरल का पश्चिमी घाट है। हरे-भरे वृक्षों का घनापन यहां इतना है कि गाड़ी से बाहर ऐसा लगता है मानों हम घने जंगल में सैर कर रहे है।...पेरियार राष्ट्रीय उद्यान। ‘पेरियार शब्द बहुत जाना-पहचाना क्यूं लग रहा है! केवल राष्ट्रीय उद्यान से ही इसकी याद नहीं जुड़ी।
मस्तिष्क पर जोर देता हूं। किसी ओर के बारे में भी कहीं पढ़ा है-पेरियार। गाड़ी की गति के साथ दिमाग के घोड़े भी तेजी से दौड़ रहे हैं। पेरियार। पेरियार। पेरियार।...याद आया। उत्तरप्रदेश विधानसभा में कुछ समय पूर्व तमिलनाडू में द्रविड़ आंदोलन की शुरूआत करने वाले जिन नास्तिक और बुद्धिवादी नेता ईवी रामास्वामी की किताब रामायण को प्रतिबंधित करने के लिए हंगामा मचा था, उन्हें कभी अपने राज्य में द्रविड़ आंदोलन की शुरूआत करने के कारण सम्मानवश ‘पेरियार कहा जाने लगा था। ईवी रामास्वामी यानी पेरियार। पेरियार यानी बड़ा। महत्वपूर्ण। गाड़ी में उनके बारे में पढ़ी बहुत सारी बातें कौंध रही है। ये वही पेरियार हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय नारे का सबसे पहले राजनीतिक फायदा उठाया। रामास्वामी ने ही जस्टिस पार्टी को स्थानीय रंगत देते उसका नाम बदलकर द्रविदर कझगम रखते इसके जरिए सामाजिक न्याय का नारा बुलंद किया। उन्होंने रामायण पर एक किताब लिखी जिसमें राम और रामायण की अलग ही व्याख्या करते रामायण के खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बताया। ईवी रामास्वामी के लिए आर्य और ब्राह्मण विरोध एक ही था। कभी ईवीआर समर्थकों ने देश में गणेश की मूर्तियां तोड़ी और रामायण की प्रतियां जलाई। ईवी रामास्वामी की जिस रामायण को प्रतिबंधित करने की मांग पर उत्तरप्रदेश विधानसभा में हंगामा मचा वह आज से कोई साठेक वर्ष पहले आयी थी और तब के पेरियार यानी ईवी रामास्वामी की भी दिसम्बर 1973 में 95 साल की उम्र में मृत्यु हो गयी थी। सैंतीस वर्ष पहले जिस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी, उसके लिखे पर बवाल मचने से एक बार फिर समाचार पत्रों में वह सुर्खियां बन गए।
सोचता हूं भारत भी तो पेरियार है। यही वह बड़ा देश है जहां धर्म, जाति विशेष की भावनाओं पर चोट करने वाली रचनाओं को राजनैतिक पार्टियां अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते कभी नहीं झिझकती। मुझे क्या! कहां पेरियार के चक्कर में राजनीति में उलझ गया।... गाड़ी के ब्रेक तेजी से लगे हैं। एक तगड़ा झटका अंदर तक मन को झकझोर देता है...कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी! सामने से तेजी से आ रही टाटा सुमो से हमारी टाटा सियेरा टकराते-टकराते बची। ड्राइवर जल्दी से गाड़ी को टर्न देकर ब्रेक नहीं लगाता तो!....सोचकर ही अंदर से सिहर जाते हैं।
पेरियार राष्ट्रीय उद्यान करीबन 700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। पेरियार यूं बांध सुरक्षा अभ्यारण्यों में से एक है परन्तु यह विषेष रूप से बहुतायत से पाए जाने वाले यहां के हाथियों के कारण अधिक जाना जाता है।...झील क्षेत्र के पास केरल टूरिज्म विभाग का छोटा सा एक भवन या यूं कहे कि हट बनी हुई है। यहां से टिकट प्राप्त करके ही पेरियार अभ्यारण्य में प्रवेश पाया जा सकता है।...हम प्रवेश शुल्क देकर झील क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।...दूर तक फैली बेहद सुन्दर पेरियार झील में नौकायन करते वन्य जीवों की क्रिडाएं करीब से देखते मन जंगल में ही जैसे रच-बस रहा है। घने जंगल को कभी यूं नौका से निहारने का यह पहला अनुभव है। झील में चलते कुछ देर बार नौका से देखा तो दूर तक जंगल ही जंगल। कहीं कोई छोर नहीं। घना जंगल। पक्षियों, वन्यजीवों से आबाद जंगल। उनकी उन्मुक्त क्रिडाओं का जंगल।
...अरे! हाथी के छोटे छोटे बच्चे पानी में अठखेलियां कर रहे हैं। उनका यूं भयमुक्त एक दूसरे पर सूंड से पानी फेंकने का दृश्य देखने से मन नहीं भरता। जंगली भैंसों, सांभर, हिरणों के झुण्ड और ऐसे ही दूसरे बहुत से वन्य जीवों को स्वच्छन्द विचरते, कभी पानी पीते और कभी एक दूसरे के साथ अठखेलियां करते यूं नजदीके से देखते लगता है जंगल की अपनी दुनिया है। इस दुनिया में मानव दखल आखिर हो ही क्यों...कैमरे से जंगल के बहुत से पहले कभी न देखे पौधे, दृश्य कैद करता मन इसी बात में उलझा हुआ है कि जंगल के इस नैसर्गिक सौन्दर्य को क्या हम धीरे-धीरे लील नहीं रहे, इस जंगल से ही तो हमारा अस्तित्व है, क्या इसे काटकर हम अपने ही अस्तित्व को नहीं मिटा रहे हैं....अभी यह सब सोच ही रहा हूं कि बहुत से पक्षियो का झुण्ड कलरव करते पेड़ों पर आकर बैठ गया।...कलकल बहती झील से उनको सुमधुर कलरव में सुनना मन को अजीब सा सुकून देता है। मन करता है, सुनता रहूं। सुनता ही रहूं। पर भला यह क्या संभव है!
...प्रकृति के जीवंत नजारे। सौन्दर्य में लिपटी झील। जंगल की सुमधुर स्वांस। कहते हैं, यहां उड़ने वाली गिलहरियां और उड़ने वाले सांप भी हैं। पर सुना भर है। देखने की जिज्ञासा का शमन नहीं हुआ। जब तक आंखों से न देखें कैसे सच मानें! हां, पक्षियों की विविधता इतनी है कि उनके बारे में भेद नहीं किया जा सकता। प्रकृति की गोद में जंगली जानवर और पक्षियों को यूं देख जैसे अपने आपको भुल गया हूं।....साथी मित्र सुनील, दयाराम और शुक्लाजी की उपस्थिति को ही भुल गया हूं। उनके द्वारा किसी बात के लिए झिंझोड़ने पर प्रकृति में खोने की तंद्रा भंग होती है।....
नौका में पानी से वन्यजीवों को देखते समय का पता ही नहीं चला। अंधेरा छा रहा है।...झील के किनारे जब नौका से उतरते हैं तो इक्का-दुक्का पर्यटक ही नजर आते हैं। हम ही हैं जो सबसे बाद में अभ्यारण्य से लौट रहे हैं।
Sunday, October 3, 2010
नेशनल आर्ट वीक
ललित कला अकादेमी, नई दिल्ली और ललित कला अकादेमी, चंडीगढ़ द्वारा पिछले दिनों चंडीगढ़ में नेशनल आर्ट वीक के अंतर्गत "न्यू मीडिया ऑफ़ आर्ट" पर राष्ट्रीय स्तर पर गहन विमर्श हुआ. खाकसार भी विमर्श में मोजूद था. न्यू मीडिया पर संभवत देश में यह पहला आयोजन था.
चंडीगढ़ से लौट कर राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के अपने प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" में इस पर जो लिखा, आप भी करें उसका आस्वाद-
चंडीगढ़ से लौट कर राजस्थान पत्रिका समूह के "डेली न्यूज़" के अपने प्रति शुक्रवार को प्रकाशित स्तम्भ "कला तट" में इस पर जो लिखा, आप भी करें उसका आस्वाद-
Wednesday, September 29, 2010
Saturday, September 4, 2010
"कलावाक्" समीक्षा
ललित कला अकादेमी द्वारा प्रकाशित "कलावाक्" की दैनिक हिंदुस्तान ने अपने एक अगस्त 2010 के "रविवासरीय" में समीक्षा प्रकाशित की है. आप भी करें आस्वाद...
Thursday, July 29, 2010
मुन्नार के जंगलों में...
भारत की खोज करते-करते कोलम्बस भारत तो नहीं पहुंच पाया परन्तु उसने नई दुनिया की जरूर खोज कर दी। इसके बाद पूर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा ने भारत खोज का लक्ष्य करते जब अपनी यात्रा प्रारंभ की तो उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा परन्तु अंततः उसने भारत को ढूंढ ही निकाला। कहा यह भी जाता है कि केरल के गर्म मसालों की खूशबू ने ही वास्का-डी गामा से भारत की खोज करवाई। जो, हो इस बात से तो इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि वास्कोडिगामा के जरिए ही पहले पहल केरल के गर्म मसालों का स्वाद सुदूर देशों तक पहंुचा। काली मीर्च, लौंग, इलायची, जायफल, दालचीनी, जावित्रि, तेजपत्ता आदि मसालों की यह प्रदेश खान है।....यहां चाय बागानों की भी भरमार है। मीलों तक फैले चाय बागान ऐसे लगते हैं जैसे हरी-भरी मखमली कालीन धरती पर बिछायी हुई हो।
....केरल के इदुक्की जिले के प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल मुन्नार की ओर हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही है। गर्म मसालों की सर्वाधिक खेती यहीं होती है। यह पूरा इलाका पहाड़ी है।....ड्राइवर बेहद सावधानी से गाड़ी पहाड़ों पर चढ़ा रहा है। गाड़ी से बाहर मीलों तक फैले चाय उद्यानों का मनभावन दृश्य देखते और इलायची की खूशबू को महसूस करते हम दक्षिण भारत के पहाड़ों पर सैर की अनुभूति से ही रोमांचित है। यहां सड़क के किनारे मसालों की दुकाने भी थोड़े-थोड़े अन्तराल पर दिखायी देती है, पर्यटक इन्हीं से गर्म मसालों की खरीद कर रहे हैं।
...लो पहुंच गए मुन्नार। पहाड़ों की ठंडक का अपना मजा है। घुमते-फिरते इस ठंडक को अनेक बार महसूस करता रहा हूं परन्तु यहां कुछ अलग बात है। हवा के झोंकों के साथ इलायची की खूषबू फिजाओं में जो है। ....ड्राइवर होटल में गाड़ी पार्क करता है। हम होटल मैनेजर से ही आस-पास के स्थानों के बारे में जानकारी लेते हैं। मुन्नार मुद्रापुझा, नलथन्नी और कुंडला नाम की तीन पहाड़ियों पर बसा है। पहाड़ों पर कभी ट्रेकिंग करते तो कभी गाड़ी के जरिए इधर-उधर घुमते ही चाय बागानों की सैर हो जाती है। यहां आस-पास के स्थानों पर खूबसूरत झीलें, जल प्रपात और चाय बागानों का सौन्दर्य चप्पे-चप्पे पर बिखरा पड़ा है। यहीं दक्षिण भारत की सबसे ऊंची अनामुड़ी चोटी भी है।
मित्र सुनील यहां के वन्य जीव अभ्यारण्य की सैर के लिए राय देते हैं। हम सभी उनकी इस बात से सहमत हैं। दक्षिण भारत के हराविकुलम-राजमाला क्षेत्र का राष्ट्रीय वन्य प्राणी अभ्यारण्य और चिन्नूर वन्यप्राणी अभ्यारण्य में वनों का घनापन इतना है कि इसे देखकर अनजाना सा एक भय भी मन में प्रवेष करता है।...हम अभ्यारण्य में दूर तक निकल आए हैं। जीव जंतुओं और वनस्पतियां के बीच यूं घुमना भला-भला सा लग रहा है। लगता है भागमभाग को छोड़ते ऐसे पल ही जिंदगी में आ जाएं तो कितना अच्छा हो परन्तु यह कोरी कल्पना है। जिस कंक्रिट के जंगल में हम रहते हैं, वहां पलभर को किसी बात की सोचने की ही फूर्सत नहीं है... फिर भी जंगलों में यूं बेपरवाह घुमते लगता है बचपन के दिन लौट आए हैं। तब कहां किसी बात की चिन्ता होती थी, जो अच्छा लगता वही करते थे। अब हर पल, हरक्षण जैसे हमें जिन्दगी की रेस बहुत कुछ करने से रोक देती है।...कहीं हमसे कुछ ऐसा नहीं हो जाए, कुछ वैसा नहीं हो जाए। दूसरे से पिछड़ नहीं जाए। नौकरी में ट्रेक से भटक नहीं जाए....इतनी चिन्ताएं कि हर पल सजग रहता है मन।...अरे! भाग रहा है हिरनी का बच्चा। शायद हमें देखकर भागा है।...चौकन्नापन इतना कि हल्की सी आहट ही उसे हमसे बगैर किसी खतरे के दूर, बहुत दूर कर देती है।... हमारे साथ भी क्या यही नहीं हो रहा! भीड़ के जंगल में हर आहट से चौकन्ने जैसे अपने आप से ही हम हर पल, हर क्षण दूर हुए जाते हैं।
‘क्या सोचने लगे? प्रकृति को देखो। प्रकृति के नजारों को देखो। देखो, इन जंगल के जीव जंतुओ को।’ मुझे बहुत देर से चुप विचारों में खोए देखते जी.पी.शुक्लाजी ने कहा तो मैं विचारों के घने जंगल से फिर से मुन्नार अभ्यारण्य में लौट आया। जंगल के नीरव वातावरण में पक्षियों की चहचहाट और झाड़ियों में सरसराते पशुओं की आहट को हम साफ सुन रहे थे कि कोई जंगली जानवर तेजी से झाड़ियों में लुप्त होता चला गया। ...यहां इस अभ्यारण्य में विषाल वृक्ष हैं। ऐसे पक्षी भी बहुतायत से दिखायी दे रहे हैं, जिन्हें पहले कभी देखा नहीं। पक्षी विज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी भी तो नहीं है, इसलिए उनकी प्रजातियों की पहचान भला हमें कैसे हो।...मनोरम जंगल!....कहीं, कहीं घास उबड़ खाबड़ मैदान! बहुत देर तक अभ्यारण्य में यूं ही घुमते रहे हैं।
मुन्नार के आस-पास पहाड़ ही पहाड़ हैं। अभ्यारण्य तो खैर घोषित उद्यान है परन्तु यूं भी यहां इधर-उधर भ्रमण के दौरान जंगल की सैर लुभाती है।...जल प्रपात, नदियां और पहाड़ के नीचे कुछ स्थानों पर ठहरा पानी तालाब की मानिंद।...दूर तक नजर जाए तो चाय के बागान सुनियोजित हरियाली फैलाए। लगता है, प्रकृति यहां पर पूरी तरह से मेहरबान है। प्रकृति का सौन्दर्य यहां तरतीब से बिखरा पड़ा है।
...आज की रजनी मुन्नार में। सोते समय जी.पी. शुक्लाजी मिमिक्री करते चुटुकुलों का जैसे पिटारा ही खोल देते हैं। इन्हें सुनकर सभी लोटपोट हो रहे हैं। दिनभर की थकान हंसी में जैसे गायब हो गयी है। हास्य की यह उन्मुक्तता यात्रा के इन दिनों में ही होती है, अन्यथा तो चाह कर भी कहां हंस पाते हैं। मैं यह सब सोच ही रहा हूं कि जेहन में ‘सैर कर गाफिल...’ पंक्तियां जैसे गूंज रही है। राहुल सांकृत्यायन ने तो यायावरी को धर्म बताते पूरा इस पर घुम्मकड़ शास्त्र ही लिख दिया। यह सब यूं ही थोड़े ही है। सच में घुमने में जो सुकून है, वह किसी और में नहीं।...अर्द्ध रात्रि हो गयी है। हम सभी एक दूसरे को शुभरात्रि कहते नींद की गोद में अपना सर रख रहे हैं...।"डेली न्यूज़" के रविवारीय परिशिस्ट "हम लोग" में 18 जुलाई 2010 को प्रकाशित डॉ.राजेश कुमार व्यास का यात्रा संस्मरण
Friday, July 2, 2010
वाह उस्ताद! वाह
"संस्क्रती संवाद" पत्रिका,
जून २०१० अंक में प्रकाशित
- डॉ. राजेश कुमार व्यास -
तबले पर उनकी उंगलियां तेजी से हरकत करती गजब का वातावरण बनाती है। इस वातावरण में वे कभी सुनने वालों को बादलों के गर्जन का अहसास कराते है तो कुछ ही देर में आसमान से टप-टप गिरती वर्षा बूंदों से भी जैसे साक्षात् कराते हैं। तेजी से भागती ट्रेन की ध्वनि उत्पन्न करता उनका तबला कभी ट्रेफिक जाम को संगीत सभा में साकार करता है तो वहीं तेजी से भागते हिरन का शिकार करने जाते शेर के दृश्यों को भी जैसे जीवन्त करता है। सच में तबले से वे जादू जगाते हैं। ...
उस्ताद जाकिर हुसैन और तबले का गजब का मेल है। वे शास्त्रीय संगीत की विभिन्न रागों पर ही तबले पर गजब की संगत नहीं करते बल्कि जीवनानुभूतियों को भी तबले में जैसे जीते हैं। राग-रूप के शास्त्रीय सरोकारों में समझदार श्रोता जहां उन्हें खुलकर दाद देते हैं वहीं आम श्रोता देते हैं उन्हें ‘वाह उस्ताद! वाह’ की संज्ञा।
यूं तबला सोलो वाद्य नहीं है परन्तु जाकिर हुसैन का तबला सोलो में श्रोताओं के कान तृप्त करता अपनी ताल से उन्हें भीतर तक जोड़ता है। यही नहीं परम्परा के सारे नियमों, कायदों को अपनाते हुए भी उन्होंने नूतन चिंतन में तबले का सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा है। अन्तर्दृष्टि संवेदन के जरिए वे ताल का जो माधुर्य उत्पन्न करते हैं वह ऐसा है जिसमें तबला ध्वनि से भावों की अद्भुत व्यंजना करता है।
याद पड़ता है, एक कार्यक्रम में तबले का उनका ‘कायदा’ सुना था। तबले में परम्परागत शास्त्रीय संकेतो को न बिगाड़ते हुए इसमें तेज दौड़ते घोड़े की टापों के साथ कड़कती बिजली में झमाझम होती बारीश की जो ध्वनि उन्होंने उत्पन्न की उसने सुनने वालों को जैसे स्तब्ध कर दिया था। ऐसा ही तब भी होता है जब वे अपने तबले पर डमरू का वादन करते हैं। तबले पर डमरू की ध्वनि का उनका अंदाज सुनने वालों को अपने साथ बहा ले जाता है। तबले के जरिए भगवान शिव की लीलाओं का आभाष कराती उनकी डमरू ध्वनि औचक जब शंख ध्वनि में तब्दील होती है तो लगता है उन्होंने ध्वनि की अपने तई नई परिभाषा गढ़ी है। इस नई परिभाषा में ताल में बढ़त का उनका कोई एक निश्चित फार्मुला नहीं है। यहां तबला जैसे अपनी गूंज की समग्रता के साथ ध्वनि के विस्तार और उसकी सीमाओं को पहचानता कुछ बोलता है, गाता है और हॉं, सुनने वालों से लगातार संवाद भी करता है।
तबले पर उत्पन्न ध्वनियों का उनका संसार बहुत से स्तरों पर लुभाता है। किसी वाद्य यंत्र बजाने या गाने वाले कलाकार के साथ संगत करते हर राग में ताल का वे अचूक उपयोग करते हैं। तबले पर यूं माहौल को जीवन्त करने का राज? प्रश्न करने पर वे कहते हैं-‘मेरे और तबले के बीच गजब की अंतरंगता है। यह मेरी जड़ों से जुड़ा साथी है। मेरा भाई, मेरा जुड़वा। अक्सर यह महसूस करता हूं कि अपने आपको मैं पूरी तरह से इसके जरिए ही व्यक्त करता पाता हूं।...मैं यह कह सकता हूं कि मैं तबले से प्यार करता हूं और वह मुझसे। हम एक दूसरे के बगैर रह नहीं सकते।’
उस्ताद जाकिर हुसैन जब यह कहते हैं तो ध्यान तबला वादन के उनके उस रूप पर भी जा रहा है जिसमें वे विभिन्न रागों पर पारम्परिक भारतीय शास्त्रीय तबला वादन के साथ पश्चिमी वाद्य यंत्रों के साथ फ्युजन का भी तबले से जादू जगाते हैं। दरअसल वे ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने तबले में इलेक्ट्रोनिक तत्वों को जोड़ते पश्चिम की तर्ज का उसमें भारतीयता के साथ सांगोपांग मेल किया है। वर्ष 1987 में उनका पहला सोलो एलबम ‘मेकिंग म्यूजिक’ जब आया तो पहली बार श्रोताओं ने इसमें ताल वाद्य में पूर्व-पश्चिम का अदभुत संयोग पाया।
विख्यात तबला वादक उस्ताद अल्लाह रखा के पुत्र जाकिर हुसैन ने तबला वादन बहुत कम उम्र में ही प्रारंभ कर दिया था। तब जब वे मात्र 7 वर्ष के थे।...और 12 वर्ष की उम्र से तो उन्होंने संगीत सभाओं में प्रस्तुतियां प्रारंभ कर दी थी। इसके बाद तो अमेरिका और दूसरे देशों में तबला वादन की संगीत यात्राओं की उनकी जो शुरूआत हुई, उसमें वर्ष में 150 से अधिक प्रस्तुतियां का रिकॉर्ड भी बना। भारत ही नहीं विश्वभर के कलाकारों के साथ तबले की उनकी जुगलबंदी ने जैसे नये इतिहास की शुरूआत की। अंग्रेजी फिल्म ‘ऐपोकेल्पस नाव इन कस्टडी,’ ‘द मिस्टिक मेजर, हिट एंड डस्ट’, ‘लिटिल बुद्ध’, जैसी बेहद लोकप्रिय रही फिल्मांे के साथ उन्होंने प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टीवल मंे प्रदर्शित ‘वानप्रस्थम’ फिल्म का संगीत ही नहीं दिया बल्कि उसके निर्माण और प्रस्तुति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन पर 2003 में ‘द स्पिकिंग हैण्ड ः जाकिर हुसैन एंड द आर्ट आॅफ द इण्डियन ड्रम’ डाक्यूमेंटरी फिल्म भी बनी। पश्चिम के बेहद लोकप्रिय ‘शान्ति और, ‘शक्ति’, बैंड में किया उनका काम भी अलग से पहचाना गया।
वर्ष 1988 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया तो यह पहला अवसर था जब इतनी कम उम्र के किसी कलाकार को यह सम्मान दिया गया। उन्हें वर्ष 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ की अत्यधिक प्रतिष्ठित नेशनल हेरिटेज फैलोशिप भी प्रदान की गयी तो 1991 में राष्ट्रपति ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी प्रदान किया।
कुछ समय पूर्व ही उस्ताद को ‘ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट’ एलबम के लिए समकालीन विश्व संगीत श्रेणी का प्रतिष्ठित ग्रेमी पुरस्कार भी मिला। यह इस बात का गवाह है कि वे आज भी अपने ताल वाद्य में संगीत का जादू जगाते हैं। इसलिए भी इसे महत्वपूर्ण कहा जाना चाहिए कि ग्रेमी उन्हें दूसरी बार मिला है। इससे पहले ‘प्लेनेट ड्रम’ एलबम पर भी उन्हे ग्रेमी पुरस्कार मिला था। पं. रविशंकर के बाद जाकिर हुसैन ही वह कलाकार हैं, जिन्हें प्रतिष्ठित ग्रेमी अवार्ड दूसरी दिया गया।
बहरहाल, तबले में अपार लोकप्रियता और शिखर सम्मानों को अपने पिता उस्ताद अल्लाह रखा का आशीर्वाद मानते जाकिर हुसैन भावुक हो उठते हैं, कहते हैं-‘पिता जी की वजह से ही दुनिया में तबले पर शुरूआत हुई। उनकी वजह से ही मैं इस लायक बना कि दुनियाभर में इतने बड़े कलाकारों के साथ काम कर सका हूं।’
उस्ताद जाकिर हुसैन कुछ पल सोचते हैं फिर कहने लगते हैं, ‘पुरस्कार तो बहुत से मिले जीवन मंे। अब भी मिल रहे हैं परन्तु जो दो पुरस्कार मुझे मिले, उन्हें मैं कभी भी भुल नहीं सकता। पहला पुरस्कार मुझे तब मिला जब मेरे पिताजी उस्ताद अल्लाह रखा जी ने मेरी प्रस्तुति पर कहा था, ‘ठीक है।’
यह तब मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार था और दूसरा पुरस्कार प्रख्यात सितार वाद पं. रविशंकर ने मुझे जो दिया, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता। मुझे याद है, तब मैं 20 वर्ष का था। उनके साथ मैं तबले की प्रस्तुति दे रहा था। उन्होंने मुझे ‘उस्ताद’ कहा। मुझे लगा यह उनकी ओर से मुझे दिया बहुत बड़ा पुरस्कार था।’
जाकिर हुसैन पुरस्कारों को प्रस्तुति की कसौटी नहीं मानते। कहते हैं, ‘पुरस्कार शुरूआत है। इसका अर्थ है आपको नए सिरे से फिर से शुरूआत करनी है। अपने आपको और बेहतर करने की शुरूआत।’
उस्ताद जाकिर हुसैन से बतियाना बेहद सुखद अनुभूति है। वे अपनी नपे-तुले शब्दों में अपनी बात संप्रेषित करते हैं। मुस्कान के साथ। मैं गौर करता हूं, उनकी उंगलियां हरकत में हैं। मुझे लगता है, तबले पर वे थिरकने ही वाली हैं। लगता है, उस्ताद मुझे पढ़ रहेे हैं। मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘आप यही सोच रहे हैं ना कि तबला बजाते मैं कैसा अनुभव करता हूं।’
मैं अचरज से उन्हें देखने लगता हूं। वे कहने लगते हैं, ‘संगीत मेरी जिन्दगी है। मैं इससे अपने आपको कभी दूर नहीं पाता। तबला वादन करता हूं तो अपने आपको भूल जाता हूं, लगता है, ईश्वर की ईबादत कर रहा हूं।’
‘संगीत कभी मरता नहीं है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह अपना रूप बदलता रहता है। जरूरी यह है कि हम इसकी गहराई को समझें। धर्म, समाज से ऊपर है संगीत। यह किसी की जागिर नहीं है।...इसे किसी धारा, मजहब से जोड़कर देखा भी नहीं जाना चाहिए। समय के साथ संगीत बदलता रहता है परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि हम इसकी आत्मा को कभी मरने नहीं दें।’
उस्ताद जाकिर हुसैन यह कहते हुए बेहद भावुक हो जाते हैं। संगीत की चर्चा उन्हें अंदर से भरती है। वे शास्त्रीय संगीत की समृद्ध भारतीय परम्परा की विशेषताओं के बारे में बताते हुए अपनी तबला प्रस्तुतियों के रोचक संस्मरण भी सुनाते हैं। इन संस्मरणों के अंतर्गत ख्यात विख्यात कलाकारेां के साथ प्रस्तुतियों के रोमांच से लेकर वादन की निरंतरता और लोगों से मिली अपार दाद के ढ़ेरों किस्से हैं। कहते हैं, ‘आपको सुनाने लगूंगा तो वक्त का पता ही नहीं चलेगा।’ ढ़ेरों यादें, ढ़ेरों बातें।...तबला वादन की। एकल तबला वादन में किए बहुत सारे प्रयोगों की और दूसरे वाद्य यंत्रों के साथ तबले की होड़ की भी।
उस्ताद जाकिर हुसैन ने दरअसल तबले की एकल प्रस्तुतियों को सर्वथा नया आयाम दिया है। उनकी अंगुलियां जब तबले पर चलती है तो मन को अजीब सा सुकून मिलता है। होले होले उनके तबले की थाप गति पकड़ती है।
उस्ताद भरी में भी बेहद लुभाते हैं। भरी यानी ताली।...उनके तबला वादन में आवृत्तियों भी खूब रहती है।...और लय भी धीमी या तेज कुछ इस कदर रहती है कि मन उनके सम्मोहन में बंध सा जाता है। विलम्बित लय में मध्य और फिर द्रुत करते वे तबले को सच में जीते हैं।
बहुत समय नहीं हुआ। जयपुर के सेन्ट्रल पार्क में ‘म्यूजिक इन द पार्क’ में उनका सोलो तबला वादन सुनते हुए उसे जैसे गुना। असीम काल की अवधि को सीमाबद्ध करते उनकी अंगूलियां जब तबले पर थिरकने लगी तो पूरा माहौल भी जैसे थिरकने लगा। वे बजा रहे थे, मन भीतर से जैसे झूम झूम रहा था। सच! डनके तबले में प्रस्तार है। प्रस्तान माने विस्तार। तालों का भिन्न भिन्न रीति से विस्तार करते वे श्रोताओं को अपनी कला से सराबोर करते हैं।
पारम्परिक भारतीय तबला वादन में उत्साद जाकिर हुसैन जितने सिद्धहस्त हैं, उतने ही पश्चिम के संगीत के साथ भी वे गजब का मेल करते हैं। तबले को हालात और संगीत के साथ ढ़ालते उन्होंने इसका और अधिक खुला वजनदार रूख बनाया। परिपूर्ण है उनके तबले की ताल। त्रिताल का ‘धिन’ और एकताल का ‘धिन’ भिन्न आघात करते भी उनके तबले पर कभी एकमेक होते काल से जैसे होड़ करते हैं। सोलो में ही वे अपने फन में माहिर नहीं है बल्कि सुप्रसिद्ध वाद्य कलाकारों या फिर गायक कलाकारों के साथ भी जब कभी वे तबले की संगत कर रहे होते हैं तो वह ‘संगत’ भर नहीं होतीं बल्कि उसे एक दूसरे के वादी सम्वादी के रूप में ही अभिहित किया जाना चाहिए। तबला वादन को जाकिर हुसैन ने सर्वथा नया आयाम दिया है। वे इसे जीते हैं। उनकी अंगूलियां तबले पर थिरकती गजब का सम्मोहन जगाती है। वे जब बजाते हैं तो स्वतः ही मुंह से निकलता है-वाह उस्ताद! वाह।
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