छायांकन विरल कला है। जो दिख रहा है और जैसा दिख रहा है वह तो हमारी आंख भी देख लेती है परन्तु छायांकन दृश्य में बसे अदृश्य सौंदर्य को अंवेरने की अद्भुत कला है। बल्कि कहूं छायाकार बहुतेरी बार यथार्थ को अपने तईं मौलिक कला—दीठ से रूपांतरित करता है। छायाकार रंग, स्पेस, रेखाओं और परिवेश से जुड़ी तमाम कलात्मक संभावनाओं का एक तरह से हम सबके समक्ष आकाश खोलता है।मुझे लगता है, छायांकन देखने को संस्कारित करने की दृश्य -छंद कला है। परिवेश को समग्रता में अनुभूत करने को प्रेरित करती वह कला जिसमें किसी दृश्य को उसके किसी एक पक्ष में नहीं, समग्रता में निहारा जा सकता है। सूक्ष्म पर्यवेक्षण में इस कला के अंतर्गत छायाकार चीजों, व्यक्तियों और यथार्थ से जुड़े दृश्यों में एक प्रकार से रमता है। ध्यानस्थ होते नया कुछ गढ़ता है। छायांकन असल में देखे, अनुभूत किए हुए यथार्थ को अपनी मौलिक दीठ में सर्वथा नए ढंग से रूपायित करने की ही विरल कला है।
रघुराय ने इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की परन्तु भारतीय जन जीवन, प्रकृति दृष्यावलियों, युद्ध, आस्था स्थलों, स्मारकों के साथ ही राजनीतिक, सामाजिक जीवन से जुड़े विशिष्ट व्यक्तियों के उनके छायाचित्र जड़ को जीवंत करने वाले हैं। एक छायाकार की अंतर्मन अनुभूतियों के भव को उनकी छायांकन कला संग पढ़ा ही नहीं देखा जा सकता है। रघुराय के संगीत, नृत्य, नाट्य आदि कलाओं से जुड़े कलात्मक छायाचित्रों में कलाकारों के जरिए कला के समय को भी हम सुन-गुन और बांच सकते हैं। किसी सांगीतिक प्रस्तुति में ध्यानस्थ गायक-गायिका, नृत्यरत नर्तक की कोई खास भंगिमा, नाट्य से जुड़ा कोई ऐसा विरल भाव जो बीत चुका होता है, छायाकार उसे छायांकन कला में ऐसे छायाचित्रों में सदा के लिए फिर से जीवंत ही तो करता है!





