ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Tuesday, August 19, 2025

दृश्य—छटाओं का अनुकीर्तन

छायांकन दृश्यबंध कला है। एक दृश्य में और भी अनदेखे बहुत से दृश्यों को उद्घाटित करने की कला।  कैमरा वहां प्रमुख नहीं होता, उससे दृश्य सिरजने वाला  महत्वपूर्ण होता है। यह यथार्थ का  कलान्वेषण है। कैमरा बरतने वाला यदि कला—मन का होगा तो वह देखे—अदेखे की लय, गति और यति (ठहराव) को भी सौंदर्य प्रदान कर देगा। 

विश्व छायांकन दिवस फोटोग्राफी से जुड़ी कला, इसके विज्ञान और इतिहास से ही नहीं जुड़ा है, यह इसमें निहित शिल्प का समर्पण है। कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा शिल्प कही गयी है।  शिल्प माने संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु, चित्र और ​तमाम दूसरी कलाएं। शिल्प का अर्थ ही है, गढ़ना। सृजन के उत्स संग कौशल। छायांकन कला छवि में निहित सुंदर—असुंदर का भाव—भव है।  सुप्रसिद्ध यूनानी कवि होमर ने कभी कहा था, जो अभिनव है वही सुन्दर है। छायांकन कला का सच भी यही है। मानव मन की संवेदनाओं, छाया—प्रकाश संयोजन और एक ही दृश्य में बहुत सा और भी जब चाहे आप वहां तलाश सकते हैं। अच्छा छायाचित्र वही होता है जिसे देखकर फिर से देखने का मन करे।  छायांकन ही क्यों, दूसरी सभी कलाओं संग भी यही होता है। कुछ सुना और बार—बार सुनने का मन करे, नृत्य की कोई भंगिमा देखी और फिर से देखने को उत्सुक हों, कलाकृति को निहारा और फिर से उसके रंगों की लय में मन भटके—समझ लें वह अनुकरण नहीं अनुकीर्तन है। माने गुणगान! 

पत्रिका, 19 अगस्त 2025

चीजें स्थिर रहें, मौन रहें तो उदासी पसरती है। पर छायांकन सन्नाटे का छंद है।  जर्मनी के ज्योतिर्विद और वैज्ञानिक जॉन हर्शेल ने 1839 ईस्वी में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में पहले पहल फोटोग्राफी शब्द का इस्तेमाल किया था। इससे पहले 1826 में फ्रांसीसी आविष्कर्ता निप्से ने विश्व का पहला फोटोग्राफ लिया। इसे देखकर पेरिस में चित्रकार प्राध्यापक पॉल देला रोष ने कहा था कि चित्रकला आज से मर गयी है। पर आज   फोटोग्राफी  चित्रकला को समृद्ध कर रही है।  मुझे लगता है, दृश्य को पकड़ते बहुतेरी बार छायाकार उस निःसंग को भी पकड़ता है जिसमें मौन भी हमसे बतियाता है। इसीलिए कहा जाता है, हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कहा जा सकता वह एक छायाचित्र कह देता है। छायांकन और दूसरी सभी कलाएं प्रकृति का रूपान्तरण है। वहां एकरसता नहीं है। एकरसता ऊब पैदा करती ह छायांकन में आकाश का नीला सुहाता है। पर आकाश नीला कहां होता है! सूर्य के प्रकाश में बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला नारंगी और लाल रंग घुला होता है। यह उजास जब वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो विभिन्न गैसों और धूल-कणों से टकराता है। रेले स्कैटरिंग प्रभाव से नीला और बैंगनी रंग तब अधिक बिखरता हैं। लाल और नारंगी कम। प्रकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी में चूंकि हमारी आँख नीले के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। सो हमें आकाश नीला दिखता है। सूर्य किरणों को उदय या अस्त होने के समय चूंकि पृथ्वी तक पहुंचने में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, इसमें नीला और बैंगनी पूरी तरह बिखर जाता हैं और केवल लाल, नारंगी और पीला ही आँखों तक पहुँच पाता हैं। इसीलिए सूर्योदय और सूर्यास्त में आकाश बहुतेरी बार सिंदूरी अनुभूत होता है। छायांकन कला दृश्य में निहित रंगों का पुनराविष्कार करती है। कैमरे में जो लेंस लगे होते हैं वह दृश्य में निहित रंगों में सुधार कर हमें परोसते हैं। माने वहां वस्तु, किसी मुद्रा में निहित प्रकाश कम—ज्यादा है तो उसे नियंत्रित कर इच्छित परिणाम ले सकते है। यही छायांकन की कला—साधना है।

राजा रवि वर्मा प्रातः चार बजे उठते और चित्र बनाते। क्यो? इसलिए कि तब भोर का उजास छा रहा होता और रात्रि के अंधकार का गमन हो रहा होता है। प्रकृति के इन रंगों की अनुभूति उन्होंने चित्रों में संजो ली। छायांकन में भी तो यही होता है! वहां समय ध्वनित होता हममें बसता है। वामन ठाकरे बड़े चित्रकार हुए पर चुना उन्होंने फोटोग्राफी को। कहते हैं, पूर्व राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का चेहरा फोटोजेनिक नहीं था। वह चाहते थे उनका ऐसा फोटो निकले जो सुंदर हो। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ख्यातनाम छायाकारों ने प्रयास किया पर पार नहीं पड़ी। अंतत: वामन ठाकरे को याद आये। वह पहुंचे और जो लोग राष्ट्रपति से मिलने आ रहे थे, उनके साथ बतियाते उन्हें देखते रहे।  लम्बा समय बीत गया। राष्ट्रपति ने कहा 'तुम फोटो क्यों नहीं ले रहे हो?' ठाकरे ने कहा, 'वही तो कर रहा हूं।'  फ़ख़रुद्दीन चौंके। असल में वामन उनके भांत—भांत के पोज देख रहे थे। अंतत: एक पोज को कैमरे में उन्होंने संजो लिया। यह इतना सुंदर था कि वही बाद में सार्वजनिक प्रसारित हुआ। आपको भी तो ऐसा ही अपना कोई अनायास लिया छायाचित्र भा रहा होगा! कला की यही साधना है। किसी एक दृश्य में छायाकार घंटो तपता है या अनायास को लपक लेता है, तब कहीं वांछित पाता है। इसीलिए कहूं, छायांकन प्रकृति में घुले रंगो, दृश्य—छटाओं, व्यक्ति की भंगिमाओं से भरा—भाव भव है। छायांकन के सृजन स्रोतों पर जाएंगे तो संस्कृति, परम्परा, इतिहास को वहां ध्वनित होते पाएंगे। क्षण जो बीत गया है उसकी स्मृतियां भी झिलमिलाती वहां नजर आएगी। 

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Saturday, August 16, 2025

कर्षयति इति कृष्णः

 ‘कर्षयति इति कृष्णः’--वह जो आकर्षित करे। बाह्य रूप में ही नहीं, आंतरिक रूप में भी। अवतारों में अकेले श्री कृष्ण हैं जो सोलह कलाओं युक्त हैं। श्री कृष्ण चन्द्र वंश से थे। चन्द्रमा आदि—अनादि शिव कृपा से आकाश में सोलह कलाएं बांटते हैं। वह सोलह कलाओं संग 64 विधाओं यानी गुणों से संपन्न थे। श्री कृष्ण हर छवि में लुभाते हैं। वह रास रचाने वाले हैं। रास माने ‘रस का उत्स’। कहें जिस विचार अथवा क्रिया से रस का उद्भव हो-वह है रास। इसीलिए कहा गया है, ‘रसोत्पद्यते यस्मात् स रासः।’ आत्मा का परमात्मा से मिलन। ऐसा आनंद जो कभी नष्ट नहीं हो। स्त्री-पुरूष देह के मिलन से इसे जोड़कर जो देखते हैं, वह बौद्धिक दरिद्र हैं। ‘रसना समूहो रासः’ माने सभी रसों के समूह का नाम ही रास है। श्रीकृष्ण जीवन को गढ़ने वाले हैं। वह माखन चोर थे। इसीलिए नहीं कि माखन उन्हें प्रिय था, इसलिए कि मां इससे खीझती थी, रीझती थी। और फिर कृष्ण से अधिक मातृभक्त और कौन होगा! गुरू सान्दीपनि के यहां जब उनका विद्याध्यन पूर्ण हुआ तो ज्ञान के प्रति प्रतिबद्धता देखते उन्होंने वर मांगने को कहा। श्रीकृष्ण ने मांगा, ‘मातृ हस्तैन भोजनम्’। आजीवन मां के हाथ का भोजन मिले। यही हुआ भी। श्री कृष्ण सबसे बड़ें तपस्वी हैं। तपस्या करते हिमालय में उन्हें ब्रर्ह्षि उपमन्यु ने महादेव के एक हजार सिद्धनाम बताए। कृष्ण ने बाद में युधिष्ठर को यह शिव रहस्य सुनाया। वेदव्यास ने महाभारत के अनुशासन पर्व में इसका वर्णन किया है। कलाओं से जुड़ा हूं सो श्री कृष्ण की त्रिभंगी-बांसुरी बजाती भंगिमा पर मन सदा ही रीझता रहा है। कृष्ण है तो मोरपंख भी है। बांसुरी है। धेनु है। कदम्ब का पेड़ भी है। मानों यह संदेश देते हैं कि प्रकृति संग जीवन में ही पूर्णता है! भक्तगण ‘राधे-कृष्ण’ का जाप करते हैं। पर राधा व्यक्तिवाचक नहीं, गुणवाचक है। स्त्रोत से दूर होता प्रवाह ‘धारा’ और मूल की तरफ मुड़ने वाला प्रवाह ‘राधा।’ जयदेव रचित ‘गीतगोविन्द’ की नायिका जन मानस में रूकमणी, सत्यभामा आदि पटरानियों को नेपथ्य में धकेल श्रीकृष्ण के वामांग में प्रतिष्ठित हो गई। कालान्तर में यही राधा लोक चरित्र में कृष्ण के साथ रासलीला में प्रतिष्ठित हो गई।

श्रीकृष्ण पर्व की बहुत बधाई। मंगलकामना। स्वस्ति।

कलाकृति : मनजीत बावा. साभार! 

Monday, August 4, 2025

स्वर—रस सिद्ध सिद्धेश्वरी

 सिद्धेश्वरी देवी का गान स्वरों की किस्सागोई है। विरह, मेल, भक्ति और समर्पण को भाव संवदनाओं में जीवंत करते वह स्वर—दर स्वर संगीत के अपने सिरजे व्याकरण से जैसे हमें रूबरू कराती है। राग—शुद्धता की विरल पुकार वहां है। ऐसी कि जिसे सुनने को मन ललचाए। आखिर उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ाँ साहब और केसरबाई केरकर ने कभी ऐसे ही उन्हें ठुमरी साम्राज्ञी की संज्ञा नहीं दी थी। असल में खयाल शैली में बोल विस्तार और भावपूर्ण पुकार का उनका गान स्वरों का विरल उजास ही तो है!

सिद्धेश्वरी देवी की ठुमरी इसलिए भी लुभाती है कि वहां स्वरों का लालित्य है। ठुमरी का अर्थ ही होता है, स्वरों का ठुमक—ठुमक, हुमक—हुमक निभाव। नाज़-ओ-अंदाज़ में गान का अलंकरण।  पर महत्वपूर्ण यह भी है कि इस सबके बाद भी सिद्धश्वेरी जी के गान में शास्त्रीय शुद्धता, गंभीरता से हम कहीं विलग नहीं होते। माने वह गाती तो उनके स्वर संग सुनने वाला भावो में भी डूब—डूब रससिक्त होता है। गौर करेंगे तो यह भी पाएंगे, जटिल से जटिल राग को सहज बरतते वह ख्याल, तराना, ठुमरी, टप्पा, चैती, होरी आदि में अपने आपको  जैसे भुल जाती और औचक स्वरों का ऐसा सुंदर महल खड़ा होते हम पाते है जिसमें प्रवेश कर हम मुग्ध हो उठें। स्वरों का अनूठा—ओज, कुछ भारीपन और लयात्मक प्रवाह में तीनों सप्तकों पर उनका अधिकार था। और हां, स्वर—लोच​शीलता ऐसी कि बंदिश के एक ही टुकड़े को भांत—भांत के भावों में गाते वह चमत्कृत करती हैं। 

‘मींड, ‘मुरकियां और गान के बीच औचक ‘ठहराव  की उनकी अनुभूतियों अवर्णीय है। विश्वास नहीं हो तो सुनें उनका दादरा, 'तड़पे बिन बालम मोरा जिया' या फिर 'तोड़ लायी राजा, जमुनिया की डार रे' या फिर  'सांवरिया मन भायो रे' या राग मिश्र तिलक कामोद में गाई ठुमरी 'सांझ भई घर आओ'।  सुनेंगे तो मन करेगा बार—बार सुनें। याद है, खमाज में उनकी गाई ठुमरी 'जावो बलम नाही बोलो हमसे' जब भी सुनी, लगा फिर से सुनूं। स्वरों में भावों का ऐसा सौंदर्य कि हर बार मन उनके बोल बनाव, पलटों में खो जाता है।  स्वरों का उनका फेंकने का अंदाज भी बार—बार उन्हें सुनने को ललचाता है। मुझे लगता है, ठुमरी को उपशास्त्रीय से निकाल कर शास्त्रीय संगीत में लाने की दृष्टि किसी में थी तो वह सिद्धेश्वरी देवी में ही थी। यह था तभी तो वह ठुमरी को हर बार ध्रुवपद की भांति संस्कारित करती मन को भाती है । मध्य, मन्द्र और तार सप्तक में साधिकार मींड, खटका और कभी वक्र तान में उनकी गायकी स्वर-लालित्य के अनूठे भव में ले जाती है।

सिद्धेश्वरी का गान शब्द—शब्द रस है। कभी 'गुरु ग्रंथ साहिब' में एकत्र संतों की वाणी को उन्होंने अपना स्वर—उजास दिया तो संत तुकाराम, नामदेव, मीरा, कबीर के पदों को भी अपने गान में जीवंत किया है। सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित सियाजी महाराज से उन्होंने संगीत की आरंभिक शिक्षा ली।  देवास के रजब अली खान और लाहौर के इनायत खान से भी उन्हेांने संगीत का प्रशिक्षण लिया, पर बड़े रामदासजी को सदा अपना मुख्य गुरु माना। कलकत्ता सम्मेलन में अपनी पहली ही सार्वजनिक प्रस्तुति में सिद्धेश्वरी देवी ने ख़याल और ठुमरी की अपनी विरल दृष्टि से श्रोताओं को इतना मोहित किया कि बाद में तो देशभर में उनके गान की धूम सी मच गई। बनारस अंग की ठुमरी में ख़याल अंग का घोल कर उन्होंने गान का अपना मौलिक मुहावरा रचा। परम्परा में रहते हुए उसके जड़त्व को तोड़ कैसे स्वर—वैविध्य में गान को भाव—संवेदना से अलंकृत किया जाए, सिद्धेश्वरी देवी का गान जैसे हमे यह समझाता है। हर बार। बार—बार!

Saturday, July 19, 2025

कलाओं संग मन भी जुड़े

पत्रिका, 19 जुलाई 2025

कलाकार क्लेयर लीटन की सिरजी महात्मा गांधी की एक दुलर्भ पेटिंग 1.7 करोड़ रुपये में बिकी है। गांधी की यह कलाकृति तब की सिरजी है जब वह दूसरी राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने लंदन गए थे। असल में यह गांधी का चित्रभर नहीं है। यह वह दृष्टि है जिसमें गांधी के उस समय को कलाकार ने अपनी अनुभूति में रूपान्तरित किया है। इसमें गांधी की भाव—संवेदना, अंतर्मन दृष्टि को रंग—रेखाओं में जिया गया है। कोई भी कलाकार दृश्य में इस तरह संगतता नहीं रखेगा तो उसका सिरजा कालजयी नहीं बनेगा। कला क्या है? भावनाओं, विचारों और अनुभवों की रचनात्मक दृष्टि ही तो!  

छायांकन कला का जब जन्म हुआ, तो फ्रांसीसी चित्रकार पॉल डेलारोशे ने कहा था, आज से, चित्रकला खत्म हो गई है। पर चित्रकला और छायांकन दोनों ही उसके बाद निंरतर समृद्ध हुए। इसलिए कि कलाओं में दृश्य से अधिक उस अदृश्य की सत्ता होती है जो कलाकार अनुभूतियों के आलोक में संजोता है। छायांकन में कैमरा नहीं वह आंख महवपूर्ण होती है जिसमें कैमरे से दृश्य का मनोरम सिरजा जाता है। कभी छायाकार मित्र और कला—प्रशासक फुरकान खान के लद्दाख केन्द्रित छायाचित्रो से रू—ब—रू हुआ था। लद्दाख को तभी पहली बार उसकी संपूर्णता में मन ने सहेजा था। वहां की धूप, छांव, रात्रि और इन सबमें निहित रंगो की विरल दृष्टि जैसे उनके छायाचित्रों में घुली है। एक छायाचित्र में रेत रंग में खड़े वहां के सूखे पहाड़, पेंगोग झील और उसमें बसे आसमानी रंग संग बादलों की श्वेतिमा इतनी रम्य है कि प्रत्यक्ष देखने पर भी वह दृश्य हम पा नहीं सकते। ऐसे ही पहाड़ों से निकलती सर्पीली सड़को, बर्फ,हरितिमा से आच्छादित लद्दाख के उनके खेत औचक कलाकार वॉन गॉग की याद दिलाते हैं। उन्होंने हरे रंग में भी और घुले दूसरे हरे, नीले में निहित दूसरे आसमानी रंगो का जैसे अपने छायाचित्रों में छंद रचा है। ऐसे ही मांडू के उनके छायांकन की दृश्यभाषा लुभाती है। एक चित्र में शिवलिंग और उन पर चढे बिल्वपत्र संग वहीं अटका खड़ा बेल-पत्र और वहां के किले पर उतरती सांझ,स्थापत्य शिल्प, झरोखे और उनसे झांकते प्रकाश में हम  जैसे जीवन की सुगंध पा लेते हैं। फुरकान खान कला—मन के हैं, इसीलिए अच्छे कला प्रबंधक भी हैं। उत्तर क्षेत्र और पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्रों, जवाहर कला केन्द्र में रहते उन्होंने कला—आयोजनों की सधी दृष्टि से निरंतर संपन्न किया है। जवाहर कला केन्द्र के लोकरंग में देशभर के लोक कलाकार आते हैं पर निरंतर एक जैसी ही प्रस्तुतियां से ऊब से निजात उन्होंने ही दिलाई। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कभी रक्षा मंत्रालय और जनजातीय मामलों के मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों से हुए 'आदिशौर्य' पर्व में एक साथ देशभर की कलाओं की सौंधी महक में गूंथी थीम धुन और उस पर 1 हजार 400 कलाकारों की मोहक संगत उनकी ही कल्पना थी।

मुझे लगता है, कलाएं जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही उनका प्रदर्शन भी सधा हुआ और बेहतर प्रबंधन से होगा तभी कलाओं से लोगों की निकटता बढ़ती है। अच्छे और सच्चे कलाकारों की कला को मंच भी तभी मिल पाता है जब उस कला की परख करने वाला हो। कोमल कोठारी इसीलिए राजस्थानी और दूसरे प्रांतों की  लुप्त हो रही कलाकारों को प्रश्रय दे सके कि उनके भीतर एक कला पारखी मन था। कपिला वात्स्यायन की बौद्धिक गहराई संग भारतीय कलाओं की संवेदनशील दृष्टि ने इन्दिरा गांधी कला केन्द्र को जीवंत किया। कलाओं और कला—प्रस्तुतियों में संलग्नता होगी तभी यह सब हो सकेगा। इसी से कलाओं के प्रति रसिकता जगेगी।