ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, May 30, 2026

नाट्यशास्त्र में संगीत

पत्रिका, 30 मई 2026
नाट्यशास्त्र लोकमन की सांगीतिक व्यंजना है। संगीत में  जो अनुभूत होता है, उसकी व्याख्या कहीं है तो वह इसी ग्रंथ में है। इसमें एक स्थान पर आया है, संगीत नाट्य का पोषक है। अभिनव गुप्त ने इसके लिए जो सुंदर शब्द दिया है, वह है'उपरंजन।' कहा गया है, संगीत नाट्य का उपरंजन करता है। नाट्यशास्त्र कहता है, गीत, नृत्य और वाद्य के रंग का यह उपरंजन करता है। माने उन्हें गाढ़ा करता है। रंजन में केवल राग बजता है, पर उपरंजन राग का ध्यान कराता है। हम कुछ सुनते हैं और उसमें निहित रस से ओतप्रोत हो जाते हैं। संगीत और नृत्य की भारतीय परम्परा में तबला और पखावज वादक बीचबीच में पढंत करते हैं। वह जो बजाते हैं, उनसे जुड़े अक्षरों को पढ़ते हैं। कथक की तो पूरी परम्परा इसी का आलोक है। यह परम्परा कहां से आई? नाट्यशास्त्र से ही तो!

नाट्यशास्त्र के 34 वें अध्याय में अवनद्य वाद्यों की ध्वनियों के सूत्र हैं। किस स्थान पर कौनसी थाप होगी, पूरा हाथ या कि उंगली का कौनसा हिस्सा प्रहार करेगाइसकी पूरी तकनीक है। तबले, पखावज, मृदंग आदि के किस स्थान पर और उंगली का भी आगे का हिस्सा जिसे चांटी कहते हैं, वह या पूरा हाथ या हाथ के किनारे का हिस्सा कहां लगेगा, यह सब नाट्यशास्त्र में आया है। हाथ के हिस्से का प्रहार चमड़े से मढ़े वाद्य के किस भाग पर कितनी मात्रा में होगा, इसकी कोड भाषा  माने पाटाक्षर की विधि नाट्यशास्त्र ने ही दी है। असल में तो नाट्यशास्त्र में संगीत के स्वरों की कोई व्याख्या नहीं है। इतना ही कहा है कि सप्त स्वर हैंषडज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। मतंग ने अपने ग्रंथ 'बृहद्देशी'  में हमारे यहां पहलेपहल 'राग' की अवधारणा दी। इसमें संगीत स्वरों की व्यवस्थित व्याख्या है। अभिनव गुप्त ने नाट्यशास्त्र की जो टीका की है, उसमें कहा है कि गीत, वाद्य और नृत्य किसी के अधीन नहीं है। 'स्वयं प्रतिष्ठित' हैं। उनमें निहित रस वाच्य नहीं है।

संगीत बजता है तो उसमें शब्द तीन तरह से काम करते हैंवचन, रंजन और व्यंजन का। वचन वह जो सीधेसीधे कहा जाए। माने बंदिश का कोई बोल, 'श्याम तुम जाओ।'  इसके बाद आता हैरंजन। माने नाद का कोई अंश। लय में काव्यपाठ। कहने का मोहक अंदाज। और इसके बाद आता है, व्यंजन। यही सबसे महत्वपूर्ण है। कुछ कहना नहीं, पर अर्थ का बोध करा देना। संगीत में कुछ इस तरह से स्वरों का लगाव कि रसप्रवाहित हो जाए। भाव में हम बह जाएं।

कालिदास को याद करें। 'कुमार संभव' में नारद पार्वती के भावी पति के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। पार्वती के पिता बैठे सुन रहे हैं। पार्वती भी वहां है। वह लजा जाती है। पर, कालिदास यह नहीं कहते है कि उसे शर्म की अनुभूति हो रही है। लाज से  मरी जा रही है। इतना ही लिखा है कि पार्वती के हाथ में जो लीलाकमल था, वह उसकी पत्तियां गिनने लगी। हम ऐसा ही करते हैं जब उत्तेजित होते हैं या अंदर से किसी भाव से पूरी तरह से भरे होते हैं तो कुछ ऐसा करते हैं जिसका कोई अर्थ नहीं होता पर वह अपनेआप होने लगता है। संगीत की शब्दावली में यह 'अनुरणन' है। माने गूंज! कठ से स्वर निकले या फिर वाद्य से, प्रथम ध्वनि में आघात पर फिर उसकी निरंतरता। संगीत की इस साधना से ही अपूर्व रचा जाता है। हम कहते हैं, उनके गले में जवारी है। यह क्या है? यह 'अनुरणन' है। ध्वनि की वह मिठास जो सुनने के बाद अंतर में बजती रहे। गूंज के माधुर्य में रचाबसा स्वर ज्ञान ही अनुरणन है। नाट्यशास्त्र बताता है कि संगीत के स्वर बोलचाल की ध्वनियों से इसीलिए भिन्न है कि वहां शब्दों पर आश्रय नहीं है। संगीत में शब्द भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए कि वह अनुरणन प्रधान है। संगीतात्मक ध्वनियों के ऐसे ही सूक्ष्मसूत्र नाट्यशास्त्र अपने में समाए हैं।


No comments:

Post a Comment