ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Tuesday, May 26, 2026

गान सरस्वती


"हीराबाई बडोदकर को शृंगेरी के शंकराचार्य ने कभी 'गान सरस्वती' की संज्ञा दी थी। राग—शुद्धता में उन्होंने शास्त्रीय संगीत को सुगम—सहज करते सदा ही उसे जन—मन से जोड़ा। कहन का सौंदर्य—छंद, स्वरों का अनहद नाद वहां है। स्वर—व्याकुलता में वह जीवन से जुड़े भावों का जैसे संगीत संधान करती है। मुझे लगता है, वह गाती नहीं है—बंदिश के शब्दों, बरते भावों में तल्लीन हो जाती है। गाते हुए वह अपने आपको भी जैसे भुल जाती है। स्वरों में डूब—डूब जाती, सुनने वालों को और सुनने की प्यास जगाती है। वह देश की पहली ऐसी शास्त्रीय गायिका हुई जिन्हें लोग टिकट खरीदकर सुनने जाते थे।...हीराबाई के गायन में स्वर—माधुर्य संग कहन का सम्मोहन है। श्री कृष्ण की नटखट शरारतों से जुड़ी बंदिश 'काहे सताओ मोहे श्याम' हो या फिर राग 'देश' पर आधारित ठुमरी 'अब के सावन घर आजा..' या फिर राग मारवा में गाया उनका तराना 'अता तना देरे' या राग भैरवी पर आधारित दादरा 'लागी मोरी बिंदिया' सुनें। लगेगा, स्वर-उजास में अंतर्मन आनंद की अनुभूति का आलोक मिला है। ध्रुवपद के पारंपरिक पदों को ख्याल की बंदिशों में रूपांतरित करते उसे संगीत-माधुर्य की नवीन दृष्टि देने का कार्य जिन चंद गायक-गायिकाओं ने किया हैं, उनमें हीराबाई बड़ोदकर प्रमुख हैं। कभी राग हिंडोल में उनके गाये बोल सुने थे- ’लाल जिनकर हो’। धु्रवपद के ख्याल रूपान्तरण की उनकी यह विरल सांगीतिक दृष्टि है। शृंगार और भक्ति रस में रचे पद को ख्याल में ढालते खटका, मींड और तानों के माध्यम से उन्होंने इसे और अधिक भावपूर्ण बना दिया है। ..."



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