ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Monday, October 9, 2023

कलात्मक अन्वेषण में मानव मन की थाह


इस वर्ष साहित्य का नोबेल पुरस्कार नॉर्वेजियन लेखक जॉन फॉसे को मिला है। अनुवाद के जरिए उनको पढ़ते अनुभूत किया, कलात्मक अन्वेषण में अपने लिखे में उन्होंने उन स्थितियों और घटनाओं का आलोक बुना हैं जिनमें मानव मन की थाह समाई है।  अज्ञेय के शब्द उधार लेकर कहूं तो उनका लिखा "सन्नाटे का छंदहै। जॉन फॉसे का संगीत से भी गहरा लगाव रहा है, इसीलिए उनके उपन्यास ही नहीं नाटकों में भी सांगीतिक कहन लुभाता है। उनके नाटक 'समवन इज गोइंग टू कम','नाइट सॉन्ग्स' उपन्यास 'मॉर्निंग एंड इवनिंग', 'रेड, ब्लैक', 'क्लोज्ड गिटार','वाकफुलनेस' गद्य कृति 'ट्रायलॉजी', कविता संग्रहों, निबंधों में मानव मन की वह दृष्टि है, जो प्रायः कहते भी अनकही रहती हैं। मुझे यह भी लगता है उनका लेखन शब्द के भीतर बसे शब्दों में निहित मौन की मुखरता है।

राजस्थान पत्रिका, 7 अक्टूबर, 2023

जो कुछ दिख रहा है, जो आपकी अनुभूति है या स्मृतियां हैं, उन्हें यदि लिखे में शब्दों में सपाट बरता जाएगा तो कहन की सघनता महसूस होगी। लिखे का स्थायी महत्व और उसकी कलात्मकता इसमें है कि कैसे हम अपने सोचे को पाठक का सच बनाते उसका राग अनुराग बनाएं। उनके लिखे के अंग्रेजी में अनुदितअंश ढूंढढूंढ कर पढ़ते यह भी लग रहा है, वह शब्द बरतते उस चुप्पी को भी अनायास स्वर देते हैं जिसमें कोई अपने होने की तलाश करता है।  उनके लिखे मेंअर्थ एक अचरज, ईश्वर की अंतर्सृष्टि, भरी हुई जगह में मौजूद खालीपन, अणु में व्याप्त परमाणु जैसे वाक्यांश मुहावरे सरीखे हैं। इनमें उनकी वह गहन कला दृष्टि भी जैसे निहित है जिसमें शब्दब्रह्म बनता है। शब्दाद्वैतवाद में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। बतौर लेखक चिंतन करता हूं, यह शायद इसलिए है कि मन की जो तीन गतियां है- स्मृति, कल्पना और चिंतन, इनकी जीवंतता शब्द से ही है। जैन पंथ में जल्प और अंतर्जल्प शब्द है। जल्प माने बोला हुआ व्यक्त। जैन मुनि मुंह बंद होने, होंठ स्थिर होने पर भी मन से इतना प्रभावी होते हैं कि होंठ खोलकर भी वह नहीं कहा जा सकता। यही अंतर्जल्प है। ध्वनि विज्ञान के दो भाग हैं, श्रव्य और अश्रव्य। यही आहत और अनाहत नाद है। अनाहत वह जो अंतर्मन से सुना जाए। पर इसके लिए आत्म का अन्वेषण जरूरी है।

उपनिषद कथा है, ऋषि वाजश्रवस विश्वजीत यज्ञ के बाद बूढ़ी एवं बीमार गायों को दान कर रहे थे। यह देख उनके पुत्र नचिकेता को बहुत ग्लानि हुई। नचिकेता ने अपने पिता से पूछा कि आप मुझे दान में किसे देंगे? क्रोध से भरकर वह बोले, मैं तुम्हें यमराज को दूंगा। शब्द चूंकि यज्ञ के समय कहे गए थे, इसलिए नचिकेता को यमराज के पास जाना पड़ा। यमराज अपने स्थान से बाहर थे। नचिकेता ने तीन दिन और रात उनकी प्रतीक्षा की। यमराज लौटे तो नचिकेता के धीरज और वचनबद्धता से प्रसन्न हो उसे वह तीन वर मांगने को कहते हैं। नचिकेता ने पहला वर पिता द्वारा उन्हें स्वीकार करने और उनका क्रोध शांत होने का मांगा। दूसरा वर स्वर्ग में अनवरत स्वर्ण अग्नि के रहस्य जानने का मांगा। यम ने तथास्तु कहा। तीसरा वर नचिकेता ने ब्रह्म का रहस्य समझाने का मांगा। यमराज ने नचिकेता को सारे सुखवैभव प्रदान करने, पृथ्वी का एकछत्र राज देने आदि का प्रलोभन दिया पर नचिकेता माना। अंतत: यमराज ने यह मानकर की वह कामनाओं से मुक्त हो गया है, उसे ब्रह्म का रहस्य बताया। ब्रह्म माने परमज्ञान।  आत्म खोज प्रक्रिया। अद्वैत कहता हैब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या। माने ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या। सच-झूठ से परे आत्म अन्वेषण में ऐषणाओं से मुक्त हो जाते हैं। शब्द को ब्रह्म इसीलिए कहा गया है कि उसके जरिए लेखक अंतर-उजास रचता है। यही कला है।  लिखना बहुत सरल मान लिया गया है, पर विचारें यह शब्दों को ज्यों का त्यों धरना नहीं है। लेखक शब्द शब्द उजास में रमकर अर्थ अनंतता का नाद करता है, तभी शब्द ब्रह्म बनता है। यही कला अन्वेषण है। 



Saturday, September 23, 2023

सरोजा वैद्यनाथन-नृत्य के एक युग का अवसान

राजस्थान पत्रिका, 23 सितम्बर, 2023

सरोजा वैद्यनाथन का बिछोह नृत्य के एक युग का अवसान है। भरतनाट्यम में कथा—अभिप्रायों के जरिए सम—सामयिक संदर्भों का उन्होंने विरल संसार रचा था।

भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से प्रसूत इस नृत्य को बीसवी सदी के आरम्भ में ई. कृष्ण अय्यर और रुक्मणी अरुंडेल ने आधुनिकी दी पर इस नृत्य में गुरु—शिष्य परम्परा के तहत इसकी सैद्धान्तिकी पर किसी ने महती कार्य किया तो वह सरोजा वैद्यनाथन थी। सत्तर के दशक में दिल्ली में गणेश नाट्यालय की स्थापना कर उन्होंने विश्वभर में भरतनाट्यम को लोकप्रिय किया। अस्सी की वय के बाद भी नृत्य में वह निरंतर संक्रिय रही। 

सरोजा जी के नृत्य की विशेषता है, भाव—कहन। वह आंगिक क्रियाओं में कथा—रूपों का अनूठा संयोजन करती थी। नृत्य क्या है? शरीर की गतियों की  सूक्ष्म अंग—प्रत्यंग व्याक्रिया माने विश्लेषण ही तो! सरोजा को नृत्य करते जब भी देखा, अपूर्व ऊर्जा का संचार उनमें पाया। वह कहती भी थी, जब तक थक नहीं जाती थी नृत्य का रियाज करती थी। नृत्य करते शारीरिक गतियों, मुद्राओं, अंगहारों का वह लालित्य रचती थी। आदि—शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य हुए शास्त्रार्थ, बुद्ध कथाओं में यशोधरा और सुब्रहम्ण्यम भारती की कविताओं पर नृत्य का सौंदर्य संसार उन्होने सिरजा। पुराण कथानकों के साथ ही नारी सशक्तिरण और नृत्य के जरिए सामाजिक संदेश प्रदान करते हुए इस कला को जन—जन से जोड़ने का भी कार्य सरोजा जी ने किया। वह संगीत में भी पारंगत थी। कृष्ण लीलाओं को नृत्य में जीवंत करते वह जब 'कहीं देखो रे घनश्यामा...'गाती तो कृष्णमय हो जाती।

नृत्य माने गति में जीवंतता। यामिनी कृष्णमूर्ति तो कहती भी रही है, नृत्य और नदी में समानता होती है। दोनों ही गति में जीवंत होते हैं। कहूं, सरोजना वैद्यनाथन इस दृष्टि से नर्तकी नहीं नृत्य—शिल्पी थी। उनका नृत्य शरीर के अंग—प्रत्यंगों का गति—अनुष्ठान ही तो है! वह चैन्नई में जन्मी। प्रख्यात नृत्यांगना ललितमा से उन्होंनें नृत्य सीखा। देश—विदेश में नृत्य प्रस्तुतियों के साथ ही नृत्य की भारतीय परम्परा पर—द क्लासिकल डांस ऑफ इंडिया, भरतनाट्यम अ डेप्थ स्टडी, कर्नाटक संगीतम और द साइंस ऑफ भरतनाट्यम जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी।

भरतनाट्यम माने भाव,राग और ताल। समभंग, अभंग, त्रिभंग में यह अभिनय और नृत्य का मधुर संगम है। 

इस नृत्य का पहला सूत्र तमिल महाकाव्य 'शिलप्पादिकारम' में मिलता है। शिलप्पादिकारम का अर्थ होता है—नूपुर की कहानी। महाकाव्य का नायक कोवलन एक रोज़ विख्यात नर्तकी माधवी का नृत्य देखने जाता है और उसके नृत्य सौंदर्य पर मुग्ध हो जाता है। पत्नी कण्णगी को छोड़कर वह नृत्यांगना माधवी पर अपनी सारी दौलत लुटा देता है। पर फिर एक दिन पश्चाताप करता पत्नी के पास लौट आता है। पत्नी कण्णगी उसे मदुरैई में व्यापार करने के लिए अपने रत्नजड़ित पैर की पायल देती है। ऐसी ही पायल मदुरैई की रानी के पास भी होती है। कोवलन जौहरी के पास जाता है तो उसे शक होता है। उसे लगता है यह रानी की चुराई पायल है। राजा के पास इसकी शिकायत होती है। रानी की पायल चुराने के आरोप में कोवलन को फांसी दे दी जाती है। पत्नी कण्णगी को इससे बहुत क्रोध आता है और वह मदुरई नगर को शाप से भस्म कर देती है। कहते हैं इस पर भी कण्णगी शांत नहीं हुई तो स्वयं देवी मीनाक्षी यानी मां पार्वती प्रकट हुई और उन्होंने उसे शांत किया।

 तमिलनाडु में आज भी देवी रूप में "कण्णगी-अम्मा" की पूजा होती है। शिलप्पादिकारम महाकाव्य में नृत्यांगना माधवी जिस नृत्य से नायक को मोहती है उसके बीज भरतनाट्यम में मिलते हैं। सरोजा वैद्यनाथन ने नृत्य की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए महाकाव्यों की परम्परा के साथ सामाजिक जागरूकता के लिए इस नृत्य का मनोहारी रचा।


Saturday, September 9, 2023

रस—सिद्ध गान का बिछोह

राजस्थान पत्रिका, 9 सितम्बर 2023

भारतीय संगीत सुर प्रधान है। शब्द वहां नहीं भी हो तो खास कोई फर्क नहीं पड़ता। शब्द संकेत है, मूल आलापचारी है। स्वरसाधना! मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व, पंडित भीमसेन जोशी, किशोरी अमोणकर, पंडित जसराज आदि को सुनेंगे तो लगेगा राग के अनुशासन में रहते हुए भी उन्होंने सुरों की मौलिक सृष्टि की है। शास्त्रीय संगीत के इन मूर्धन्यों की परम्परा में ही बढ़त करने वाली विदुषी गायिका थी, मालिनी राजुरकर।

इसी बुधवार को हैदराबाद में 82 वर्ष की उम्र में उनसे हमारा बिछोह हो गया। पर हम उस मूल्यमूढ समय में जी रहे हैं जहां ख्यातविख्यात कलाकारों के अलावा जो बहुत महती करते रहे हैं,उन्हें याद नहीं करते। उनकी गायकी की आंतरिक दृष्टि और गहराई को बिसराते हैं।

मालिनी राजुरकर विरल थी। मूलत: ग्वालियर घराने से उनका नाता था पर उन्होंने अपनी गानशैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें शास्त्रीय संगीत के विभिन्न घरानों का मेल था।  सुरों की उनकी बुलंदी, चंचलता और लयकारी ऐसी  है कि जिस किसी भी राग में उन्होंने गाया,  खिलता हुआ वह लुभाता है। 

कभी उनकी गायी राग भैरवी में 'फूल गेंदवा अब मारो' बंदिश सुनी थी। इस कदर सुरीला लगा कि फिर तो ढूंढढूंढ कर उनके गान की समग्रता को जिया। दिल को छूने वाली उनकी गायकी में राग बिहाग ही सुनें। 'चलो हटो जाओ छांडो मोरी बंईया...' उलाहने में भी धैर्य का जो माधुर्य यहां है, उसकी मिठास अवर्णनीय है। कहते हैं, राग केदार भगवान श्री कृष्ण को बहुत प्रिय था। इसमें मालिनी के गाए बोल  'नंदनंदन कान्हा रे' माधुर्य का जैसे अनुष्ठान है। राग सोहनी में 'रंग ना डारो शामजी' सुनेंगे तो लगेगा इस राग को उन्होंने पुनराविष्कृत किया है। उनका अपना स्वरचिंतन है। गायकी की समझ से जोड़ने वाला गायन। गाते हुए जैसे बिखरे स्वरगुच्छों को सहेजती वह उनकी माला पिरोती है। सुरीलेपन के साथ ही उनके स्वरसंधान पर भी अचरज होता है।

मालिनी राजुरकर राग में स्वरों का सटीक प्रयोग करती। आलापचारी से लय का जो बंधान वह स्थापित करती है, वह भी तो विरल है! स्वरों के छोटेछोटे स्वरपुंज। एक मीठी नैरन्तर्यता। रससिद्ध गान। गौर करेंगे तो यह भी अनुभूत होगा जितना उनके गान का बाह्य पक्ष सुदर है, उतनी ही उसकी आंतरिक प्रवृति भी सुरों के ओज में मौलिकता लिए है।  अचरज हेाता है, ऐसी गायिका के संगीत के आंतरिक पक्ष पर क्योंकर कभी समीक्षकों का ध्यान नहीं गया।

टप्पा में उन्होंने अपने आपको सर्वथा भिन्न अंदाज में साधा। यह बहुत कठिन साधना है। टप्पा माने टापना। स्वनों को उछालते हुए उनपर नियंत्रण रखना। लोक गायन की भांति इसमें खुलापन है।  इस शैली को ग्वालियर घराने में कृष्णराव शंकर और उनके पुत्र लक्ष्मण कृष्ण राव ने आगे बढ़ाया। मालिनी राजुरकर ने टप्पा और ठुमरी गान को नई ऊंचाइयां दी। गंगूबाई हंगल ने स्वरों की रंजकता को अनुभूत करते हुए ही कभी शास्त्रीय संगीत की महफिलों के लिए उनका नाम सुझाया था। राजस्थान के अजमेर मे वह जन्मी। यहीं संगीत महाविद्यालय से विधिवत संगीत की शिक्षा ली। पंडित वसंतराव राजुरकर से उन्होंने संगीत की बारीकियां सीखी। उन्हीं से बाद में उनका विवाह हुआ।

मुझे लगता है, कुमार गंधर्व की गायकी के निर्गुण का ओज मालिनी ने अपेन गान में सहेजा है तो किशोरी अमोनकर सी नफासत भी अंवेरी। किराना घराने में धीमी गति में ख्याल का उनका गान हो या फिर राग काफी में उनका टप्पा। चुलबुले स्वरों की उनकी आलाचारी, सुरचिंतन सदा लुभाएगा। अपने संपूर्ण सौंदर्य में राग उनके गान में खिलता है। हर बार। बारबार।


 

Saturday, August 26, 2023

सहेजें लोक कलाओं का उजास

 कलाओं का आलोक सदा लोक चेतना से जुड़ा रहा है। सभ्यता के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता की जब भी बात होगी तो कलाओं के लोक स्वरूपों पर ही हमें विचारना होगा। लोक माने इंद्रियगोचर प्रत्यक्ष अनुभव। व्यष्टि की बजाय समष्टि। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है इनका वैविध्य। हरेक प्रांत की अपनी लोक कलाओं ने हमारी आधुनिक कलाओं को भी निंरतर समृद्ध और संपन्न किया है। 



राजस्थान पत्रिका, 26 अगस्त 2023


जे. स्वामीनाथन ने कभी आदिवासी और लोक कलाओं के संग्रहण का महती कार्य भोपाल में भारत भवन में रहते किया था। इसी संदर्भ में एक दफा वह एक सुदूर आदिवासी गावं गए तो उन्हें बहुत अचरज हुआ। ऐसे स्थान पर जहां शिक्षा की अलख कभी जगी नहीं थी, वहां आदिवासी कलाकार अपने सिरजे चित्रों में अक्षरों का प्रयोग कर रहे थे। लिपि के साथ सुंदर संसार उन्होंने अपनी कला में उकेरा था। पता चला, भोले आदिवासी कलाकारों ने यह देखा कि कोई अधिकारी, सरकारी कर्मचारी उनके यहां आता है और कागज पर लिखा कुछ देता है, लिखता है तो उससे उनको बहुत कुछ सरकारी योजनाओं का मिल जाता है। उन्हें लगा, यह जो लिखे हुए अक्षर हैं—चमत्कारी हैं। इनमें अद्भुत शक्ति है। बस उन्होंने इसे अपनी कला में संजो लिया। लोक से जुड़ी कलाएं ऐसे ही भांत—भांत रूपों मे हमें लुभाती है। उनके निहितार्थ में जाएंगे तो ऐसी और भी कहानियां चित्र सुनाते मिलेंगे।

 पर इधर बाजारवाद में लोक कलाएं अपने शुद्ध स्वरूपों में तेजी से लुप्त होती जा रही है। राजस्थान में जांगड़ा, सिंधु गायन या फिर मशक, अलगोजा, डेरू, भपंग आदि वादन और भील, मीणा, गरासियों के समूह गान हो या फिर जोगी, भाट, कामड़, सरगडी, भोपा आदि जातियों की कला परम्परा का शुद्ध स्वरूप अब ढूंढे से भी नहीं मिलता है। बहुत पहले लोक संस्कृति की एक शोध परियोजना पर काम करते गांव-गांव जाना हुआ था। तब "जांगड़ा" सुनने का संयोग पहली बार हुआ। ऐसे ही सिंधु देने की भी परंपरा इधर लुप्त हो रही है। सिंधु देना माने जोश जगाते टेर। खेतों में किसान मिलकर सिंधुड़ा देते रहे हैं। बहुत सा और भी  लोक का ऐसा है जो हमसे दूर हो रहा है।

याद है वर्षों पहले बीकानेर में वहीं पास के गांव के एक बुजुर्ग कलाकार को डेरू के साथ झूमते हुए भैरूंजी के हरजस सुने थे। और सुनने की चाह जगती रही। रात भर वह कलाकार डेरू पर झूमते हमें रस सिक्त करता रहा। इतने बरस हो गए, पर लोक का वह माधुर्य अभी भी ज़हन में बसा है। लोक ऐसे ही उजास देता है। वहां एकरसता नहीं है। 

हमारे देश में हर प्रांत की और हरेक समाज की अपनी लोक गायन और वादन परंपरा रही है। गान में आवाज लगाने की, उनके स्वर निभाव की अपनी रीत रही है। 

देश के हर प्रदेश के वाद्य यंत्र भी तो कितने बहुविध है! सुनेंगे तो पता चलेगा कितनी विविधता, भाव व्यंजना की दीठ इनमें है। महाराष्ट्र में सुंदरी का वादन होता है। यह शहनाई की छोटी बहन कही जाती है। पर इस लोक वाद्य के कलाकार भी अब गिनती के हैं। राजस्थान में डेरू, मशक, अलगोजा, भपंग कमायचा के वादक धीरे—धीरे लुप्त हो रहे हैं। पर भुले—भटके यदि इन्हें सुनने का अवसर मिले तो न गवांए। अतिसार में मशक और अल्गोजा बजते हुए ही कभी सुनें। मन अंतर के उजास से नहाएगा।



Saturday, August 19, 2023

'अमर उजाला', 19 अगस्त 2023
-"छायांकन कहन की दृश्य कला है। इसमें तकनीक ही महत्वपूर्ण नहीं है, छायाकार की छायांकन दीठ महती है। दृश्य को पकड़ते बहुतेरी बार छायाकार उस निःसंग को भी पकड़ता है जिसमें मौन भी बोलने लगता है और तब हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कह सकते, वह एक छायाचित्र कह देता है।... दादा साहब फाल्के कैमरे से सिरजी दुनिया के प्रति इतना अधिक जुनूनी थे कि उन्हें इसके लिए अपनी एक आंख तक गंवानी पड़ी थी। ‘द ग्रोथ ऑफ द प्लांट’ में क्षण—क्षण को उन्होंने कलात्मक ढंग से जिया है। फिल्मो में जो ‘स्पेशल इफेक्ट’ हम देखते हैं, वह उन्हीं की देन है। सत्यजित राय के साथ भी यही था, उन्होंने साधारण विषयों, दृश्य के भी सूक्ष्म ब्योरों के विरल कलात्मक रूप सिरजे हैं। प्रख्यात कलाकार रोरिक ने जो कलाकृतियां सिरजी है, उनमें हिमालय पर पड़ती सूर्य की लालिमा, धूप, छांव, अंधकार और प्रकाश से जुड़े दृश्यों का अद्भुत लोक रंग-रेखाओं में रचा है। इसी आलोक में रमते प्रस्तावित करता हूं, इस बार जब किसी कलात्मक छायाचित्र को देखें तो उसमें भी प्रकृति से जुड़े ऐसे ही मोहक छंदो की तलाश करें। बहुत कुछ नया, अभूतपूर्व आप पाएंगे ही।