ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, February 3, 2024

संस्कृति में बसे राम

राजस्थान पत्रिका—3 फरवरी, 2024
अयोध्या में नव निर्मित मंदिर में कृष्ण शीला पर रामलला का विरल विग्रह है। मैसूर के मूर्तिकार अरुण योगिराज ने इसे सिरजा है। राम का रम्य रूप! मंदिर में जब चक्षु उन्मीलन हुआ, मन राम के रुचिर नेत्रों में ही जैसे बस गया। निश्छल नेत्र! बाल सुलभ भावों की मनोहरी छवि। प्राण प्रतिष्ठा सांस्कृतिक अनुष्ठान है। मंदिर में पूजा मूर्ति की कहां होती है! यह ध्यान का ज्ञान है।  

राम पुरुषोत्तम हैं। पुरूषों में उत्तम! वह सूर्यवंशी है। सूर्य की बारह कलाओं से युक्त। इसीलिए उनमें चेतना का सर्वोच्च स्तर है। वह विष्णु का पूर्णांश हैं। राम मंदिर में मूर्ति के मूल विग्रह के चारों ओर दशावतार है। केवल विष्णु ही हैं जिनके दस अवतार हुए। पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता के विकास की जैसे यात्रागाथा। पृथ्वी पर सबसे पहला जीव मछली था। इसलिए पहला अवतार-मत्स्य अवतार। दूसरा जो जीव आया वह जल और थल दोनों में वास कर सकता था। वह थाकछुआ। इसे कूर्मावतार कहा गया। अगला अवतार वराहवतार हुआ। इसके बाद मनुष्य और जीवजंतुओं का समय आया। इसलिए मानवसिंह का सम्मिलित रूपनरसिंह अवतार हुआ। विकास का अगला चरण मनुष्य का बौना रूप था, इसलिए वामन अवतार हुआ। मानव का पहला हथियार कुल्हाड़ी था, इसका प्रमाण परशुराम अवतार में दिखता है। अगला महती अविष्कार तीर था। राम अवतार में राम को सबसे धनुर्धरधुरंधर बताया गया है। हल के साथ बलराम अवतार विकास की अगली अवस्था है।इसके बाद जीवन में संगीत आया, इसलिए श्रीकृष्ण बांसुरी संग पूर्णावतार हुए। कहते हैं, बारहवा अवतार कल्कि का है जो अभी होना है।

महाभारत में युधिष्ठर भीष्म से प्रश्न करता हैवह एक ईश्वर कौन है? चरम लक्ष्य क्या है? परमपद कैसे प्राप्त हो सकता है? जवाब में भीष्म ने 107 पदों में एकएक कर विष्णु के हजार नाम दुहराए। सुंदर काव्यांश में पार्वती शिव से प्रश्न करती है, 'इस सहस्त्रनाम माला का कोई ऐसा भी रूप है जिसका वही प्रभाव हो जो विष्णु सहस्नाम जप से होता है?' शिव तब कहते हैं-राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने।  माने 'राम' का नाम जाप ही सहस्त्रनाम समान प्रभाव पैदा करने वाला है।

रामायण रामकथा नहीं, राम का अयन है। अयन माने गतिशीलता! सूर्य की स्थिति में साल में निरंतर परिवर्तन होता है। माह वह उत्तरायण होते है और महीने दक्षिणायन। सूर्य की इस अवस्था से ही ॠतुओं का निर्माण होता है। राम का संपूर्ण जीवन ऋतुओं की भांति गतिमान रहते जीवन जीने की कला-दृष्टि है। सूर्यवंशी राम अनथक गतिमान रहे हैं। बाल्यकाल में महर्षि विश्वामित्र की यज्ञ रक्षा के लिए वह चल पड़ते हैं। अयोध्या में राजभोग का अवसर आता है कि उन्हें वनवास की आज्ञा मिलती है। वह कहीं ठहरे नहीं है। राम जीवन मूल्य है। इसीलिए कोई जब मूल्यच्युत होता है, मुंह से औचक निकलता हैराम निसरग्यौ।

रामायण के आदिकाण्ड के प्रथम सर्ग में वाल्मीकि अपने काव्य के उपयुक्त नायक की खोज करते हुए बहुत से गुणों का उल्लेख करते नारद से पूछते हैं कि किस नर का आश्रय लेकर समग्रा लक्ष्मी ने रूप ग्रहण किया, तब नारद कहते हैं कि ऐसा गुण युक्त पुरूष देवताओं में तो मुझे कोईदिखाई नहीं पड़ता। इसलिए जिन नरचंद्रमा में ये सब गुण है, उन अलौकिक राम का ही मनोहारी चित्रण वाल्मीकि ने अपने काव्य में किया है। तुलसी के राम का सौंदर्य उनकी काया में, बल में, गुणों में है। रामचरितमानस लिखते हुए तुलसी की कामना है, 'यह जो रूप कहीं पृथ्वी पर उतर आए तो पृथ्वी पर कैसा आनंद छा जाए!' अमृतलाल नागर के 'मानस का हंस' में आता है, मंदिर पर बाबरी मस्जिद बनने के बाद वहां सूफी संत जायसी की पद्मावत कथा सुनते ही उन्होंने तय किया था कि वह रामकथा लिखेंगे तो जनभाषा में, दोहों में। रामचरितमानस राम के अलौकिक, आनंदमयी स्वरूप का वही सुमधुर गान है! राम की मनोहारी छवि।                

Saturday, January 6, 2024

अप्रतीम ‘सुर-बहार’ वादक अश्विन एम. दलवी

 

राजस्थान पत्रिका, 6 जनवरी 2024

सितार माने सप्त तारों का वाद्य। सुनेंगें तो सब ओर से मन आनंदित होगा। बोल निकालने, मींड खींचने और अंगुलियों के संचालन में सितार से बहुत मिलता ही है ‘सुर-बहार’। पंडित रविशंकर ने सितार में माधुर्य रचा परन्तु इसका राज उनकी सुरबहार से जुड़ी समझ है। कहते हैं, उनके सितार में प्राय: सुरबहार के तार चढ़े होते थे। ध्रुवपद अंग में आलाप, जोड़ और झाला का भावपूर्ण माधुर्य सितार की बजाय सुरबहार में अधिक खिलता है। इस समय हमारे देश में इस विरल वाद्य के जो गिने—चुने कलाकार हैं, उनमें अश्विन एम. दलवी प्रमुख है। 

सुरबहार में स्वर—कंपन संग वह माधुर्य की जैसे वृष्टि करते हैं। सुरबहार में उन्होंने नित—नए प्रयोग किए हैं। भारतीय संगीत की शुद्ध मिठास को बरकरार रखते दीर्घ मींड और लहक में वह नृत्य, वादन संग सुरबहार में गान—अंग जैसे जीवंत करते हैं। गहरी संगीत सूझ से ‘सुर बहार’ को   विश्व संगीत से जोड़ते पारम्परिक ध्रुवपद की उनकी बंदिशें मन मोहती है। उनकी सुनी बहुत सुंदर बंदिश हैं 'प्यारी तोरे नैनन मीन कर लीने...'। नैन और मीन की अर्थ व्यंजना में उनकी लूंठी गमक लुभाती है। प्रकृति और जीवन की सुंदर दृष्टि जो वहां है। वह गान अंग में सदा ऐसा ही करते हैं। हर बंदिश में उनकी लहक भी विरल होती है। लहक माने शोभा। मुझे लगता है, तार वाद्यों में शोभा का संधान उन्होंने ही किया है।

सुरबहार में असल में दो पद्धतियां हैं। पहली डागर घराने से संबद्ध और दूसरी है इटावा घराने से संबंधित। डागर पद्धति में सुरबहार में रूद्रवीणा और ध्रुवपद का गांभीर्य मिलेगा। सुरों की पूर्णता के लिए वहां पखावज का प्रयोग होता है। इटावा घराने के सुरबहार में पखावज नहीं लेते। ध्रुवपद की बजाय वहां ख्याल अंग प्रधान है। अश्विन दलवी का सुरबहार माधुर्य का अनुष्ठान है। ऐसा जिसमें मुर्कियां के बगैर भी सुर सधते आनंद की अनुभूति कराते हैं। वह कहते भी हैं, 'मुर्कियां होंगी तो ठुमरी और ख्याल गायकी अग में संगीत का गांर्भीय खत्म हो जाता है।' सुर बहार में इसीलिए उन्होंने लहक को प्रधानता दी। उनका सुरबहार भारतीय लघु चित्रों की मानिंद बंदिश में सुनने वालों को दृश्य की अनुभूति कराता है। यह शायद इसलिए भी है कि गान पर उनका गहरा अधिकार है।

अश्विन दलवी ने 'नाद साधना इंस्टीट्यूट फॉर इंडियन म्यूजिक एंड रिसर्च सेंटर' के जरिए भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्वभर में शोध—अनुसंधान की भी नवीन दृष्टि दी है। इस सेंटर में उन्होंने विलुप्त हो चुके वाद्य यंत्रों को बहुत जतन से सहेजा है।  बेगम अख्तर का सितार उनके इस संग्रह में है तो सुरसागर, सुरसोटा, सुरसिंगार, विचित्र वीणा, नागफनी, रणसिंगा जैसे बहुतेरे लुप्त—वाद्य यंत्र भी है। उनके पास दुलर्भ प्राय: 'मोहन वीणा' भी है।

अप्रतीम सरोद वादक राधिका मोहन मोइत्र ने देश में 1948 में 'मोहन वीणा' का आविष्कार किया था। यह दरअसल सरोद और और सुरबहार का मेल था। बाद में 1949 में आकाशवाणी के तत्कालीन मुख्य निर्माता ठाकुर जयदेव सिंह द्वारा ने इसके माधुर्य में रमते निरंतर इसका प्रसारण करवाया।  राधिका मोहन मोइत्र की 'मोहन वीणा' तब अत्यधिक लोकप्रिय हुई। उनकी यह 'मोहन वीणा' तो दलवी के पास है ही, वाद्य यंत्रों का विरल इतिहास और उससे जुड़े किस्से—कहानियों का भी अनूठा जग उनके पास है।

अश्विन दलवी सुरबहार की संगीत—साधना की धुन में ही थमे नहीं है। इधर उन्होंने राधिका मोहन मोइत्र की परम्परा में बढ़त करते सर्वथा नए वाद्य 'अंश वीणा' का आविष्कार किया है। यह उनकी वह नाद साधना है जिसमें बहुत सारी मीठी धुनों के मेल से उन्होंने इसे सिरजा है। 'अंश वीणा' सुनेंगे तो लगेगा रबाब, सरोद, सितार ओर दिलरूबा के स्वरों के संगम से हम साक्षात् हो रहे हैं।

Saturday, December 30, 2023

नई भोर संग हम और नये हों-आत्मान्वेषण करते ...


यह वर्ष कल बीत जाएगा। नव वर्ष में नई भोर संग हम और नये होंगे। यही जीवन है। 
चलते रहें। कभी न थमें। पानी एक जगह ठहरता है तो सड़ांध मारने लगता है। बुद्ध ने इसलिए कहाचरत भिक्खवे चारिकं। भिक्षुओं चलते रहो। बहुश्रुत मंत्र हैचरैवेति। चरैवेति।

संस्कृति का यही मूल है। चलने का अर्थ पैर बढ़ाना भर नहीं है। पुरातन को छोड़ नूतन की ओर गमन है। विडम्बना हैहमने आधुनिकता को अभिनव मान लिया है। यह भ्रम पश्चिम ने फैलाया। वहां के लेखकों ने कलाओं और दूसरे अनुशासनों में आधुनिकता को युग बोध से जोड़ संस्कृति सापेक्ष बना दिया। असल में आधुनिकता फैशन नहींविचार है। 


भारतीय संदर्भों में यह संस्कार हैं। एक तरह से आत्मान्वेषण की प्रकिया। जितना हम अपने आपको जानेंगेउतना ही आगे बढेंगें। 'चरैवेतिका मूल भी यही है।


कठोपनिषद् में कथा हैनचिकेता पिता द्वारा यज्ञ पश्चात दक्षिणा में मरणासन्न गायों को दान होते देख व्यथित होता है। प्रश्न करता हैवह उन्हें किसे दान देंगेक्रोधित पिता कहते हैंयम को। नचिकेता यमलोक पहुंचता हैं। तीन दिन वह बिना अन्न—जल ग्रहण किए यम की प्रतीक्षा करता है। यम प्रसन्न हो उसे तीन वर मांगने को कहते हैं। नचिकेता मांगता हैक्रोधित पिता प्रसन्न हो जाए। यम कहते हैंऐसा ही होगा। दूसरा वर वह स्वर्ग में अमरत्व प्राप्ति के रहस्य जानने का मांगता है। यम इसका ज्ञान उसे देते हैं। पर नचिकेता जब तीसरा वर ब्रह्म को जानने के संबंध में मांगता है तो यम अचरज करते हैं। वह उसे यह वर नहीं मांग हर तरह के सुखों के भोगपृथ्वी सम्राट बनने आदि का प्रलोभन देते हैं। नचिकेता नहीं मानता। अंतत: यम उसे जो ज्ञान देते हैंउसका मूल है—ब्रह्म माने आत्म का अन्वेषण। अपने आपको जानना। मिथ्या ज्ञान की माया से यही हमें मुक्त करता है।


पर प्रश्न हैआत्म का ज्ञान कोई कैसे करे

नव वर्ष का संकल्प क्या यही नहीं होना चाहिए कि हम अपने पास जो हैउसको देखनेउसके बारे में चिंतन की दृष्टि विकसित करें। 


विचार करेंहममें से कितने हैं जिनके पास अपनी बरतीपढ़ी जाने वाली भाषा का शब्दकोश है?  जर्मन दार्शनिक हेगल पश्चिम दर्शन के संस्थापक माने जाते है। उनकी 'कला का दर्शनपुस्तक जगचावी हुई। इसमें उन्होंने स्थापत्य को प्रतीकवाद बताते उसमें संगीत के संबंधों पर चर्चा की है। एक अनुभूति शायद उन्हें किसी इमारत को देखकर हुई होगी कि वाह! यह तो संगीत की तरह है। बसउन्होंने यह लिख दिया और फिर तो उनके इस ज्ञान से भी आगे सोचने की जैसे झड़ी लग गयी। बगैर सोचे—समझे स्थापत्य को कलाओं की जननी कहना प्रारंभ कर दिया गया। आज भी हमारे यहां कोई समाचार लिखा जाता है या वास्तु पर कोई बात होती है तो सूत्र वाक्य उभरता है, 'आर्किटेक्चर— द मदर ऑर ऑल आर्ट्स'

 

विचार करेंकैसे यह हो सकता हैजब मनुष्य आदिम अवस्था में था तो आसमान उसकी छत थी। बाद में वह कंदराओं में रहने लगा। मन प्रसन्न होता तो नाचता। गाता। गुफा की दीवारों पर चित्र उकेरता। घर तो बहुत बाद में बने। तो स्थापत्य बाद की बात है। पहले नृत्यसंगीतचित्र है। अनुभूति का सौंदर्य अलग हैकलाओं का इतिहास तथ्याधारित है। कलात्मक सौंदर्य कोई शब्द—अलंकार नहीं है कि जिसे हम इतिहास की किसी स्थापना से जुड़े विचार का वस्त्र पहना दें।


इसलिए आईए नव वर्ष में भाषा और शब्द की सूक्ष्म सूझ से हम अपने आपको जोड़ें। शब्द की अर्थगर्भित छटाओं को निहारने में रुचि लें। दृष्टि को तर्कसंगत बनाएं।


 रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि को नोबेल पुरस्कार ऐसे ही नहीं मिला। उन्होंने जो लिखा आत्मान्वेषण की साधना है। उन्होंने ताजमहल को अनंत काल के गाल पर आंसुओं की एक बूंद कहा है। कम शब्दों में कितनी गहरी बात उन्होंने कही है! शब्द—सौंदर्य में दृष्टिकोण इसी तरह तर्कसंगत बनता है। 


हम कहते हैंबंधु! कभी सोचा हैइसका अर्थ कितना गहरा हैबंधु माने वह जो बांध लेता है। तो आइएहम अपने स्वयं के पास जो हैउसको खुली आंखो से देखते मनन करने में अपने आपको बांधें। इसी से नया कुछ मिलेगा। नव वर्ष की अग्रिम स्वस्तिकासना!



Saturday, December 2, 2023

अन्तर अन्वेषण में उपजती कला—संस्कृति की परम्पराएं

पत्रिका, 2 दिसम्बर 2023 

हमारे सांस्कृतिक प्रतीकों पर जाएंगे तो यह गहरे से अनुभूत होगा कि वहां बाह्य पक्ष ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि विचार—उजास में परम्पराबद्ध ज्ञान की जड़ें वहां पल्लवित और पुष्पित हुई हैं। मोर पंख को ही लें। बचपन में पढ़ाई करते तो इसे किताब में रखते। शुभ मान सहेजते। कहां से आई यह दृष्टि?  कथा आती है कि गीत गोविंद की रचना करने वाले जयदेव तब राधा—माधव लीला रच रहे थे। एक पद में वह अटक गए। सुबह से सांझ होने को आई, कविता पूरी ही नहीं हुई। उहापोह में वह नहाए ही नहीं। पत्नी ने कहा, 'आप नहाकर भोजन करलें। संभव है, नया कुछ पा जाएं।' अनमने जयदेव नदी तट को हो लिए। अभी कुछ ही देर हुई कि द्वार खटखटाया। पत्नी ने कहा, 'आप इतनी जल्दी लौट आए? जयदेव ने कहा, ' हां, याद आ गया। अभी पद पूरा कर देता हूं।' 

उन्होंने कविता पूर्ण की। पत्नी ने भोजन कराया और फिर सदा की तरह वह  बिस्तर पर लेट गए। कुछ ही देर में किवाड़ फिर से बजा। पत्नी ने द्वार खोला तो हतप्रभ! गीले वस्त्रों में जयदेव थे। वह बोली, आप आए हैं तो फिर वह कौन है जो अंदर सो रहे हैं। जयदेव भागे—भागे कक्ष में पहुंचे। देखा उनका अधूरा छंद पूर्ण हुआ पड़ा था। पास ही मोरपंख रखा था। जयदेव समझ गए, प्रभु माधव खुद आए थे उनका पद पूर्ण करने! 

कला-संस्कृति में संस्कारों की ऐसे ही बढ़त होती है। सौंदर्य की सूझ का मूल भी यही है। हम कहते हैं, कृषि- संस्कृति। कहां से आया यह शब्द?  युग लग जाते हैं, तब कोई सधा हुआ शब्द—रूप इस तरह से सभ्यता में समाता है। 

खेती का जब आविष्कार नहीं हुआ था तब मनुष्य पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर था। जो कुछ धरती पर पक्षी उगलते, उससे उपजे धरती—धन से ही उसका गुजारा होता। पेड़ों पर फल लगते तो वह उनको खाकर अपनी क्षुधा शांत करता। पर तब संकट का समय होता जब अकाल पड़ता या फिर कोई प्राकृतिक प्रकोप से उसका सामना होता। दिन—महिने मनुष्य को भूखे रहना पड़ता। ऐसे ही तब किसी मनुष्य को सूझा होगा कि कैसे धरती में बीज समाता है और अन्न् उपजता है। कैसे पेड़ पर फल लगते हैं। बस फिर क्या था? जंगल के एक हिस्से की सफाई कर मुनष्य ने झुम—खेती प्रारंभ कर दी। उत्पादन हुआ तो प्रकृति पर उसकी निर्भरता खत्म हो गयी। कृषि-संस्कृति के बीज ऐसे ही हममें समाए।

जीवन को अर्थ देने वाली या फिर नए ढंग से देखने की दृष्टि जहां भी हमें मिली है, हमने उसे सहेजा है। पर जहां उस दृष्टि का मूल हमें नहीं मिला, हमने उसे ईश्वर—प्रदत्त कहा है। 

वेदों को ईश्वरीय ज्ञान कहा गया है। क्यों? इसलिए कि तब लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था। ऋषियों के गूढ़ ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी कंठस्थ सहेजा गया। श्रुति परम्परा से यह आगे बढ़ा पर लिपि के आविष्कार से इन्हें पुस्तकाकार मिला। वैदिक काल में चित्रकला नहीं थी परन्तु रूप—कल्पना थी। 

वृहदारण्यक उपनिषद् में अश्वमेघ यज्ञ के स्थान पर इस सारे विश्व को अश्व के रूप में मानकर उसका ध्यान योग द्वारा यज्ञ का निर्देश है। ऊषा अश्व का शिर माना गया है, सूर्य उसके नेत्र बताए गए हैं, वायु उसका प्राण, अग्नि उसका मुख और वर्ष उसकी आत्मा कही गयी है। इसी तरह अन्य उपमाओं से एक विराट् रूप का वर्णन है। यह जो कल्पनाएं हुई हैं, उन्हीं से कालजयी फिर रचा गया है। मूर्तिशिल्प, संगीत में या नृत्य में कोई नई उपज हुई है, नाट्य में कथा को नई दृष्टि से सहेजा गया है तो उसमें अंतर का यह अन्वेषण ही प्रमुख आधार रहा है।


Saturday, November 18, 2023

संघ गणराज्य संस्कृति से जुड़ा लोकतंत्र और श्री कृष्ण

 पत्रिका, 18 नवम्बर, 2023

पर्व का अर्थ है उत्सव। नई शुरूआत। उल्लसित मन से सब हिल—मिल जिसे मनाए, वह है पर्व। पर्व का मूलार्थ है—गाँठ या जोड़। इससे आगे पूंगल फूटती है। पुंगल माने प्राणियों की वह चेतन शक्ति जिससे वे जीवित रहते हैं। पर्व इसीलिए जीवंतता का संवाहक है। इस समय देश के पांच राज्यों में लोकतंत्र का पर्व मनाया जा रहा है। तीन दिसम्बर को जब वोटों की गिनती होगी तो इन राज्यों में जनतंत्र की नई शुरूआत ही तो होगी। वेदव्यास रचित महाभारत अठारह पर्वों में विभक्त है। कौरव—पाण्डवों का युद्ध अठारह दिन चला इसलिए अठारह पर्व है। युद्ध आरम्भ होने के ठीक पहले अर्जुन युद्ध करने से मना करता हैं तब श्री कृष्ण उन्हें जो उपदेश देते है, वही महाभारत के भीष्म पर्व का अंग 'श्रीमद्भगवद्गीता' है।  इसमें भी अठारह अध्याय हैं।

गीता के जरिए बगैर किसी फल की कामना कर्म का संदेश देने वाले भगवान अवतारों में अकेले श्री कृष्ण हैं जो संपूर्ण कला—पुरूष कहे गए हैं। भगवान राम भी अवतार हैं पर वह बारह कलाओं युक्त थे। सूर्य वंश में वह अवतरित हुए। सूर्य की बारह कलाएं है। श्री कृष्ण चन्द्र वंश से थे। चन्द्रमा आदि—अनादि शिव कृपा से आकाश में सोलह कलाएं बांटते हैं। पर यह भी जान लें कि कम या अधिक कला से किसी अवतार का महत्व अधिक—ज्यादा नहीं हो जाता है। अवतारों की कलाएं आवश्यकता आधारित हैं। श्री राम को रावण का वध कर मर्यादित समाज की स्थापना करनी थी, इसमें बारह कलाएं युक्त होना ही पर्याप्त था। कृष्ण द्वापर युग के अंत में जन्में। उन्हें धर्म की पुनर्स्थापना करनी थी। इसलिए सभी सोलह कलाओं की उन्हें जरूरत थी। वह सोलह कलाओं संग 64 विधाओं यानी गुणों से संपन्न थे। और फिर श्री कृष्ण हमारे देश के लोकतंत्र के भी सबसे बड़े नायक हैं। महाभारत में वर्णित अनेक राज्यों में कोई संघ राज्य नहीं था, बस एक द्वारका संघ राज्य थी। श्री कृष्ण ने ही इस संघ राज्य की नींव डाली। उसे पाला और वैभव दिया। समर्थ होते हुए, बड़ी शक्ति रखते हुए भी उन्होंने संघ के आदर्श को प्रधानता दी। एकतंत्र नहीं किया। चाहते तो कंस को मारने के बाद वह मथुरा के राजा बन सकते थे परन्तु उन्होंने संघ राज्य में विश्वास किया।   महाभारत में अकेला द्वारका ही एक ऐसा गणराज्य था जिसके संघ प्रमुखों की सेनाएं दोनों पक्षों की ओर से युद्ध लड़ रही थी। कृष्ण अर्जुन के सारथी बन पाण्डवों के साथ थे पर उनकी गोपवीरों की नारायणी सेना दुर्योधन के लिए लड़ी। द्वारका के ही एक और राजन्य कृतवर्मा ने अपनी सेना के साथ दुर्योधन का साथ दिया। तो कहें, भारत में गणराज्यों की नींव कलाओं के सर्वांग श्री कृष्ण के कारण ही पड़ी।

श्री कृष्ण भारतीय कलाओं ही नहीं हमारी संस्कृति में भी गहरे से रचे—बसे हैं। वह महाभारत के मानवीय नायक हैं तो धर्म और अध्यात्म के रूढ़ अर्थों से हमें मुक्त करते लौकिकता में अलौकिकता की अनुभूति कराने वाले हैं। गोवर्धन पर्वत उठाए,  वन में मुरली बजाते धेनु और कदम्ब संग, मोर—मुकुट की भांत—भांत की की उनकी मोहक मूरतें भारतीय लघु चित्रों की ही प्रेरणा नहीं रही है, हमारी संस्कृति को भी निरंतर पर्व—मय करती रही है। वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत में श्री कृष्ण की जिन लीलाओं को शब्द—शब्द उकेरा है,  अद्भुत है। गीत गोविन्द में जयदेव ने जिस तरह से कृष्ण संग राधा का वास कराया है वह भी तो विरल है! कृष्ण की त्रिभंगी—बांसुरी बजाती, टेढ़ी गर्दन, टेढ़ी कमर की छवियां कितनी मोहक है। यह जो त्रिभंगी जिसकी है, उसमें ही तो विश्वात्मा का भाव—भव है। कलाओं की सर्वांग दीठ और लोकतंत्र में पुरुषार्थ से विजयी होने की प्रेरणा श्रीकृष्ण के इन कला—रूपों में ही मिलेगी। तो आईए,  लोकतंत्र के इस पर्व में श्री कृष्ण को स्मरण करते चुनें उनको जो आपके मत का महत्व समझते सही—सर्वहित की समझ भरा प्रतिनिधित्व करे।


Saturday, November 4, 2023

लोक रची व्यंजनाओं में समाई कला—दृष्टि

लोक का अनूठा माधुर्य रचने वाली जीते जी किंवदंती बनी गायिका अल्लाह जिलाई बाई की कल पुण्यतिथि थी। पर यह विडंबना ही है कि उन्हें किसी ने याद नहीं किया। कभी लता मंगेशकर ने भी 'पधारो म्हारे देस' को उन्हीं की तरह गाने का प्रयास किया पर लोक में घुली जिस शास्त्रीय छटा में अल्लाह जिलाई बाई ने इसे साधा उसकी कहां कोई होड़!  माड प्रादेशिक राग है। कहीं यह मांड भी कहा गया है पर मूलत: है यह माड ही। माड माने मड प्रदेश। संगीत रत्नाकर में इसे धोरा—धरा से जुड़ी उसकी अनुभूति कराती धुन माना गया है। विष्णु नारायण भातखण्डे ने इसे राग बिलावल थाट के अंतर्गत माना है।

राजस्थान के बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर में माड के अलग—अलग रूप—शुद्ध, सूब माड, सामेरी और आसा माड में नजर आते हैं। अल्लाह जिलाई बाई, गवरी देवी और मांगी देवी ने अपने तई माड के इन रूपों को जैसे पुननर्ववा किया। लंगा—मांगणियारों ने भी पारम्परिक वाद्य यंत्रों में इसे अपनी कल्पना से कम परवान नहीं चढ़ाया है। राजस्थान ही क्यों भारत के दूसरे प्रदेशों में भी देश, पीलू, तिलक कामोद, सोहनी आदि में शास्त्रीयता में घुले लोक स्वरों में माड गायकी सदा ही खिलती सुनने वालों को लुभाती रही है।  

राजस्थान पत्रिका, 4 नवम्बर, 2023

अल्लाह जिलाई बाई से अरसा पहले बीकानेर में उनके निवास पर लम्बा संवाद हुआ था। तभी उन्होंने गाते हुए समझाया था कि माड दोहों की अलंकृति है। यह सच है। राजस्थानी लोक संगीत में 'केसरिया बालम', 'कुरजां', 'उमराव', 'सुपनो', 'बायरियो', 'जल्लो' आदि गीत जगचावे हुए हैं। सुनेंगे तो उनमें निहित शब्दों में बसी अर्थ छटाएं मन में सदा के लिए बस जाएगी। भारतीय सिने—जगत ने भी माड राग से अपने आपको कम समृद्ध नहीं किया है। माड में घुले लोक—गीतों से निरंतर प्रेरणा ली जाती रही है। याद करें, फिल्म 'रेशमा और शेरा' का गीत 'तू चंदा मैं चांदनी'। सिने—संगीत में घुला यह जैसे लोक—उजास है। संगीतकार जयदेव के संगीत में दोहों की अलंकृति सरीखे बोलों की भांति लिखी बाल कवि बैरागी की पंक्तियां में निहित अर्थ—छटाओं पर जाएंगे तो मन करेगा गीत सुनें और बस सुनते ही रहें। 'तू चंदा मैं चांदनी'  मुखड़े के बाद लगभग सभी अंतरे भाव—भरी अंजूरी है। अनूठी व्यंजना देखें, 'चंद्रकिरण को छोड़ कर जाए कहाँ चकोर...अँगारे भी लगने लगे आज मुझे मधुमास रे।'  


बौद्ध साहित्य के सुभाषितों में चकोर पक्षी के चांदनी पीने का विवरण मिलता है। पूरा संस्कृत साहित्य ऐसी व्यंजनाओं से भरा पड़ा है। नल-दमयन्ती की कथा में दमयंती के स्वयंवर वर्णन में भी तो चकोर के चन्द्रमा की किरणों का सुधारस पीने का वर्णन है। असल में
 लोक में चकोर चन्द्रमा का प्रेमी है। ऐसा प्रेमी जो अंगारे खाता है। अंगारे माने चन्द्र किरणें। लोक का यही तो उजास है जिसमें कीटभक्षी पक्षी के चन्द्रकिरणों को जूगनू आदि चमकने वाले कीट समझकर खाने को कवियों ने अपने तई कल्पना करते भाव—प्रवण रूपान्तरण किया है। मुझे कई बार यह भी लगता है  कविता में घुली कलाएं युग—बोध में सदा—सर्वदा के लिए हममें जीवंत रहती संवेदनाओं को ऐसे ही पंख लगाती है।

मिथकों, धार्मिक विश्वासों और दैनिन्दिनी कार्यकलापो में जीवन से जुड़ी सहज दृष्टि कहीं है तो वह लोक रची व्यंजनाओं में ही है। चंदा—चकोर रूपी भाव—बोध का स्वस्थ मनोरंजन भी तो लोक ने ही रचा है!