ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, September 23, 2023

सरोजा वैद्यनाथन-नृत्य के एक युग का अवसान

राजस्थान पत्रिका, 23 सितम्बर, 2023

सरोजा वैद्यनाथन का बिछोह नृत्य के एक युग का अवसान है। भरतनाट्यम में कथा—अभिप्रायों के जरिए सम—सामयिक संदर्भों का उन्होंने विरल संसार रचा था।

भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से प्रसूत इस नृत्य को बीसवी सदी के आरम्भ में ई. कृष्ण अय्यर और रुक्मणी अरुंडेल ने आधुनिकी दी पर इस नृत्य में गुरु—शिष्य परम्परा के तहत इसकी सैद्धान्तिकी पर किसी ने महती कार्य किया तो वह सरोजा वैद्यनाथन थी। सत्तर के दशक में दिल्ली में गणेश नाट्यालय की स्थापना कर उन्होंने विश्वभर में भरतनाट्यम को लोकप्रिय किया। अस्सी की वय के बाद भी नृत्य में वह निरंतर संक्रिय रही। 

सरोजा जी के नृत्य की विशेषता है, भाव—कहन। वह आंगिक क्रियाओं में कथा—रूपों का अनूठा संयोजन करती थी। नृत्य क्या है? शरीर की गतियों की  सूक्ष्म अंग—प्रत्यंग व्याक्रिया माने विश्लेषण ही तो! सरोजा को नृत्य करते जब भी देखा, अपूर्व ऊर्जा का संचार उनमें पाया। वह कहती भी थी, जब तक थक नहीं जाती थी नृत्य का रियाज करती थी। नृत्य करते शारीरिक गतियों, मुद्राओं, अंगहारों का वह लालित्य रचती थी। आदि—शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य हुए शास्त्रार्थ, बुद्ध कथाओं में यशोधरा और सुब्रहम्ण्यम भारती की कविताओं पर नृत्य का सौंदर्य संसार उन्होने सिरजा। पुराण कथानकों के साथ ही नारी सशक्तिरण और नृत्य के जरिए सामाजिक संदेश प्रदान करते हुए इस कला को जन—जन से जोड़ने का भी कार्य सरोजा जी ने किया। वह संगीत में भी पारंगत थी। कृष्ण लीलाओं को नृत्य में जीवंत करते वह जब 'कहीं देखो रे घनश्यामा...'गाती तो कृष्णमय हो जाती।

नृत्य माने गति में जीवंतता। यामिनी कृष्णमूर्ति तो कहती भी रही है, नृत्य और नदी में समानता होती है। दोनों ही गति में जीवंत होते हैं। कहूं, सरोजना वैद्यनाथन इस दृष्टि से नर्तकी नहीं नृत्य—शिल्पी थी। उनका नृत्य शरीर के अंग—प्रत्यंगों का गति—अनुष्ठान ही तो है! वह चैन्नई में जन्मी। प्रख्यात नृत्यांगना ललितमा से उन्होंनें नृत्य सीखा। देश—विदेश में नृत्य प्रस्तुतियों के साथ ही नृत्य की भारतीय परम्परा पर—द क्लासिकल डांस ऑफ इंडिया, भरतनाट्यम अ डेप्थ स्टडी, कर्नाटक संगीतम और द साइंस ऑफ भरतनाट्यम जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी।

भरतनाट्यम माने भाव,राग और ताल। समभंग, अभंग, त्रिभंग में यह अभिनय और नृत्य का मधुर संगम है। 

इस नृत्य का पहला सूत्र तमिल महाकाव्य 'शिलप्पादिकारम' में मिलता है। शिलप्पादिकारम का अर्थ होता है—नूपुर की कहानी। महाकाव्य का नायक कोवलन एक रोज़ विख्यात नर्तकी माधवी का नृत्य देखने जाता है और उसके नृत्य सौंदर्य पर मुग्ध हो जाता है। पत्नी कण्णगी को छोड़कर वह नृत्यांगना माधवी पर अपनी सारी दौलत लुटा देता है। पर फिर एक दिन पश्चाताप करता पत्नी के पास लौट आता है। पत्नी कण्णगी उसे मदुरैई में व्यापार करने के लिए अपने रत्नजड़ित पैर की पायल देती है। ऐसी ही पायल मदुरैई की रानी के पास भी होती है। कोवलन जौहरी के पास जाता है तो उसे शक होता है। उसे लगता है यह रानी की चुराई पायल है। राजा के पास इसकी शिकायत होती है। रानी की पायल चुराने के आरोप में कोवलन को फांसी दे दी जाती है। पत्नी कण्णगी को इससे बहुत क्रोध आता है और वह मदुरई नगर को शाप से भस्म कर देती है। कहते हैं इस पर भी कण्णगी शांत नहीं हुई तो स्वयं देवी मीनाक्षी यानी मां पार्वती प्रकट हुई और उन्होंने उसे शांत किया।

 तमिलनाडु में आज भी देवी रूप में "कण्णगी-अम्मा" की पूजा होती है। शिलप्पादिकारम महाकाव्य में नृत्यांगना माधवी जिस नृत्य से नायक को मोहती है उसके बीज भरतनाट्यम में मिलते हैं। सरोजा वैद्यनाथन ने नृत्य की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए महाकाव्यों की परम्परा के साथ सामाजिक जागरूकता के लिए इस नृत्य का मनोहारी रचा।


Saturday, September 9, 2023

रस—सिद्ध गान का बिछोह

राजस्थान पत्रिका, 9 सितम्बर 2023

भारतीय संगीत सुर प्रधान है। शब्द वहां नहीं भी हो तो खास कोई फर्क नहीं पड़ता। शब्द संकेत है, मूल आलापचारी है। स्वरसाधना! मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व, पंडित भीमसेन जोशी, किशोरी अमोणकर, पंडित जसराज आदि को सुनेंगे तो लगेगा राग के अनुशासन में रहते हुए भी उन्होंने सुरों की मौलिक सृष्टि की है। शास्त्रीय संगीत के इन मूर्धन्यों की परम्परा में ही बढ़त करने वाली विदुषी गायिका थी, मालिनी राजुरकर।

इसी बुधवार को हैदराबाद में 82 वर्ष की उम्र में उनसे हमारा बिछोह हो गया। पर हम उस मूल्यमूढ समय में जी रहे हैं जहां ख्यातविख्यात कलाकारों के अलावा जो बहुत महती करते रहे हैं,उन्हें याद नहीं करते। उनकी गायकी की आंतरिक दृष्टि और गहराई को बिसराते हैं।

मालिनी राजुरकर विरल थी। मूलत: ग्वालियर घराने से उनका नाता था पर उन्होंने अपनी गानशैली विकसित की। यह ऐसी थी जिसमें शास्त्रीय संगीत के विभिन्न घरानों का मेल था।  सुरों की उनकी बुलंदी, चंचलता और लयकारी ऐसी  है कि जिस किसी भी राग में उन्होंने गाया,  खिलता हुआ वह लुभाता है। 

कभी उनकी गायी राग भैरवी में 'फूल गेंदवा अब मारो' बंदिश सुनी थी। इस कदर सुरीला लगा कि फिर तो ढूंढढूंढ कर उनके गान की समग्रता को जिया। दिल को छूने वाली उनकी गायकी में राग बिहाग ही सुनें। 'चलो हटो जाओ छांडो मोरी बंईया...' उलाहने में भी धैर्य का जो माधुर्य यहां है, उसकी मिठास अवर्णनीय है। कहते हैं, राग केदार भगवान श्री कृष्ण को बहुत प्रिय था। इसमें मालिनी के गाए बोल  'नंदनंदन कान्हा रे' माधुर्य का जैसे अनुष्ठान है। राग सोहनी में 'रंग ना डारो शामजी' सुनेंगे तो लगेगा इस राग को उन्होंने पुनराविष्कृत किया है। उनका अपना स्वरचिंतन है। गायकी की समझ से जोड़ने वाला गायन। गाते हुए जैसे बिखरे स्वरगुच्छों को सहेजती वह उनकी माला पिरोती है। सुरीलेपन के साथ ही उनके स्वरसंधान पर भी अचरज होता है।

मालिनी राजुरकर राग में स्वरों का सटीक प्रयोग करती। आलापचारी से लय का जो बंधान वह स्थापित करती है, वह भी तो विरल है! स्वरों के छोटेछोटे स्वरपुंज। एक मीठी नैरन्तर्यता। रससिद्ध गान। गौर करेंगे तो यह भी अनुभूत होगा जितना उनके गान का बाह्य पक्ष सुदर है, उतनी ही उसकी आंतरिक प्रवृति भी सुरों के ओज में मौलिकता लिए है।  अचरज हेाता है, ऐसी गायिका के संगीत के आंतरिक पक्ष पर क्योंकर कभी समीक्षकों का ध्यान नहीं गया।

टप्पा में उन्होंने अपने आपको सर्वथा भिन्न अंदाज में साधा। यह बहुत कठिन साधना है। टप्पा माने टापना। स्वनों को उछालते हुए उनपर नियंत्रण रखना। लोक गायन की भांति इसमें खुलापन है।  इस शैली को ग्वालियर घराने में कृष्णराव शंकर और उनके पुत्र लक्ष्मण कृष्ण राव ने आगे बढ़ाया। मालिनी राजुरकर ने टप्पा और ठुमरी गान को नई ऊंचाइयां दी। गंगूबाई हंगल ने स्वरों की रंजकता को अनुभूत करते हुए ही कभी शास्त्रीय संगीत की महफिलों के लिए उनका नाम सुझाया था। राजस्थान के अजमेर मे वह जन्मी। यहीं संगीत महाविद्यालय से विधिवत संगीत की शिक्षा ली। पंडित वसंतराव राजुरकर से उन्होंने संगीत की बारीकियां सीखी। उन्हीं से बाद में उनका विवाह हुआ।

मुझे लगता है, कुमार गंधर्व की गायकी के निर्गुण का ओज मालिनी ने अपेन गान में सहेजा है तो किशोरी अमोनकर सी नफासत भी अंवेरी। किराना घराने में धीमी गति में ख्याल का उनका गान हो या फिर राग काफी में उनका टप्पा। चुलबुले स्वरों की उनकी आलाचारी, सुरचिंतन सदा लुभाएगा। अपने संपूर्ण सौंदर्य में राग उनके गान में खिलता है। हर बार। बारबार।


 

Saturday, August 26, 2023

सहेजें लोक कलाओं का उजास

 कलाओं का आलोक सदा लोक चेतना से जुड़ा रहा है। सभ्यता के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता की जब भी बात होगी तो कलाओं के लोक स्वरूपों पर ही हमें विचारना होगा। लोक माने इंद्रियगोचर प्रत्यक्ष अनुभव। व्यष्टि की बजाय समष्टि। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है इनका वैविध्य। हरेक प्रांत की अपनी लोक कलाओं ने हमारी आधुनिक कलाओं को भी निंरतर समृद्ध और संपन्न किया है। 



राजस्थान पत्रिका, 26 अगस्त 2023


जे. स्वामीनाथन ने कभी आदिवासी और लोक कलाओं के संग्रहण का महती कार्य भोपाल में भारत भवन में रहते किया था। इसी संदर्भ में एक दफा वह एक सुदूर आदिवासी गावं गए तो उन्हें बहुत अचरज हुआ। ऐसे स्थान पर जहां शिक्षा की अलख कभी जगी नहीं थी, वहां आदिवासी कलाकार अपने सिरजे चित्रों में अक्षरों का प्रयोग कर रहे थे। लिपि के साथ सुंदर संसार उन्होंने अपनी कला में उकेरा था। पता चला, भोले आदिवासी कलाकारों ने यह देखा कि कोई अधिकारी, सरकारी कर्मचारी उनके यहां आता है और कागज पर लिखा कुछ देता है, लिखता है तो उससे उनको बहुत कुछ सरकारी योजनाओं का मिल जाता है। उन्हें लगा, यह जो लिखे हुए अक्षर हैं—चमत्कारी हैं। इनमें अद्भुत शक्ति है। बस उन्होंने इसे अपनी कला में संजो लिया। लोक से जुड़ी कलाएं ऐसे ही भांत—भांत रूपों मे हमें लुभाती है। उनके निहितार्थ में जाएंगे तो ऐसी और भी कहानियां चित्र सुनाते मिलेंगे।

 पर इधर बाजारवाद में लोक कलाएं अपने शुद्ध स्वरूपों में तेजी से लुप्त होती जा रही है। राजस्थान में जांगड़ा, सिंधु गायन या फिर मशक, अलगोजा, डेरू, भपंग आदि वादन और भील, मीणा, गरासियों के समूह गान हो या फिर जोगी, भाट, कामड़, सरगडी, भोपा आदि जातियों की कला परम्परा का शुद्ध स्वरूप अब ढूंढे से भी नहीं मिलता है। बहुत पहले लोक संस्कृति की एक शोध परियोजना पर काम करते गांव-गांव जाना हुआ था। तब "जांगड़ा" सुनने का संयोग पहली बार हुआ। ऐसे ही सिंधु देने की भी परंपरा इधर लुप्त हो रही है। सिंधु देना माने जोश जगाते टेर। खेतों में किसान मिलकर सिंधुड़ा देते रहे हैं। बहुत सा और भी  लोक का ऐसा है जो हमसे दूर हो रहा है।

याद है वर्षों पहले बीकानेर में वहीं पास के गांव के एक बुजुर्ग कलाकार को डेरू के साथ झूमते हुए भैरूंजी के हरजस सुने थे। और सुनने की चाह जगती रही। रात भर वह कलाकार डेरू पर झूमते हमें रस सिक्त करता रहा। इतने बरस हो गए, पर लोक का वह माधुर्य अभी भी ज़हन में बसा है। लोक ऐसे ही उजास देता है। वहां एकरसता नहीं है। 

हमारे देश में हर प्रांत की और हरेक समाज की अपनी लोक गायन और वादन परंपरा रही है। गान में आवाज लगाने की, उनके स्वर निभाव की अपनी रीत रही है। 

देश के हर प्रदेश के वाद्य यंत्र भी तो कितने बहुविध है! सुनेंगे तो पता चलेगा कितनी विविधता, भाव व्यंजना की दीठ इनमें है। महाराष्ट्र में सुंदरी का वादन होता है। यह शहनाई की छोटी बहन कही जाती है। पर इस लोक वाद्य के कलाकार भी अब गिनती के हैं। राजस्थान में डेरू, मशक, अलगोजा, भपंग कमायचा के वादक धीरे—धीरे लुप्त हो रहे हैं। पर भुले—भटके यदि इन्हें सुनने का अवसर मिले तो न गवांए। अतिसार में मशक और अल्गोजा बजते हुए ही कभी सुनें। मन अंतर के उजास से नहाएगा।



Saturday, August 19, 2023

'अमर उजाला', 19 अगस्त 2023
-"छायांकन कहन की दृश्य कला है। इसमें तकनीक ही महत्वपूर्ण नहीं है, छायाकार की छायांकन दीठ महती है। दृश्य को पकड़ते बहुतेरी बार छायाकार उस निःसंग को भी पकड़ता है जिसमें मौन भी बोलने लगता है और तब हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कह सकते, वह एक छायाचित्र कह देता है।... दादा साहब फाल्के कैमरे से सिरजी दुनिया के प्रति इतना अधिक जुनूनी थे कि उन्हें इसके लिए अपनी एक आंख तक गंवानी पड़ी थी। ‘द ग्रोथ ऑफ द प्लांट’ में क्षण—क्षण को उन्होंने कलात्मक ढंग से जिया है। फिल्मो में जो ‘स्पेशल इफेक्ट’ हम देखते हैं, वह उन्हीं की देन है। सत्यजित राय के साथ भी यही था, उन्होंने साधारण विषयों, दृश्य के भी सूक्ष्म ब्योरों के विरल कलात्मक रूप सिरजे हैं। प्रख्यात कलाकार रोरिक ने जो कलाकृतियां सिरजी है, उनमें हिमालय पर पड़ती सूर्य की लालिमा, धूप, छांव, अंधकार और प्रकाश से जुड़े दृश्यों का अद्भुत लोक रंग-रेखाओं में रचा है। इसी आलोक में रमते प्रस्तावित करता हूं, इस बार जब किसी कलात्मक छायाचित्र को देखें तो उसमें भी प्रकृति से जुड़े ऐसे ही मोहक छंदो की तलाश करें। बहुत कुछ नया, अभूतपूर्व आप पाएंगे ही।

कलाओं का छंद संस्कार

 

 राजस्थान पत्रिका, 12 अगस्त 2023
"छंद कलाओ का सहज गुण है।.. कालपरक रूपों में छंद संगीत, नृत्य काव्य आदि कलाओं में तो देशपरक में वह मूर्ति, चित्र आदि रूपों में स्वयमेव सधता है। 

संस्कृत वाङ्मय में लय को बताने के लिये छन्द शब्द का प्रयोग मिलता है। 

लय से ही कलाओं में रंजकता आती है। लय क्या है? काल का अनुभूत प्रवाह ही तो! जिस तरह काल की गति मंद-तीव्र होती है, लय का भी वैसा ही प्रवाह होता है। दुःख, विरह शांति, विश्रांति में काल की गति धीमी, विलम्बित और भय, डर आदि में तीव्र, द्रुत होती जाती है।

कलाओं की चर्चा संग छंद की बात आपसे यहां इसलिए की है कि उसके मूल में हम अपनी कला-अन्तर्दृष्टि की ओर अग्रसर हो सकें। 

हुआ बिल्कुल उलट है। हमने कलाओं में अपनी स्वयं की दृष्टि की बजाय पश्चिम की अवधारणाएं ओढ़ ली है।... 

पर पश्चिम हमें आज भी कलाओं में संकुचित अर्थ में देखता है। भारतीय संगीत का अध्ययन वहां ’एथ्नोम्यूजिकॉलोजी’ से कराया जाता है। ...

Saturday, July 29, 2023

भगवान शिव का कंठ मेघ

राजस्थान पत्रिका, 29 जुलाई 2023

सावन में घिर-घिर घटाएं बरसती है। बादलों से ढके आसमान का दृश्य और बरखा कला-मन को नया रचने को भी उकसाती है। मेघ माने जीमूत। वह जो जीवन-जल को अपने में बद्ध रखता है। माने बांधे रखता है। सूर्य, मेघ, पशु-पक्षी, मंद बहती हवाएं और आम जन जब एक स्वर में गुनगुनाने लगे, समझ लीजिए तभी धरती-धन अन्न उपजता है। ब्राह्मण ग्रंथों में इसीलिए कृषि ’सर्वदेवतामयी’ है। कालिदास ने मेघ को ’कामरूप’ कहा है। इच्छानुसार रूप धरने वाला। उसका सौंदर्य अवर्णनीय है। इसीलिए मेघ की एक उपमा भगवान शिव का कंठ भी है।

थेर गाथाओं में वर्षा की विरल रसानुभूतियां हैं। थेर माने ध्यानलीन भिक्षु। बुद्ध वहां शास्ता है। वह, जिसका मन बस में है। थेर गाथा असल में प्रकृति काव्य ही है। इसमें आता है, ’देव! तुम मन भर बरसो। देव! तुम पेट भर बरसो।’ हृदय से उपजती कविता में इसी तरह संगीत घुलता है। लय और ताल में हर कोई इसे अनुभूत कर सकता है। हमारे समूचे भक्ति काव्य को ही लें। वह राग तत्व में गुंथा है। रीति काव्य में छंद समाया है। कविता में बजते संगीत की इससे बड़ी और क्या गवाही होगी! भक्ति में राग की अनुभूति इसलिए होती है कि वहां अभिभूत होकर, सुध-बुध खोकर ईश्वर के प्रति अभ्यर्थना है। रीति काव्य में आए छंद स्वयमेव शब्द की अलंकृति है। प्रयास करेंगे और वर्णाडम्बर से जटिल बुनेंगे तो कविता में संगीत नहीं घुलेगा। मुझे लगता है, ध्वनि का माधुर्य कविता का ही नहीं भाषा का भी सहज गुण है। 

राजस्थानी कविताओं में भी ठौड़-ठौड़ राग-रस ऐसे ही समाया हुआ है। रेवतदान चारण की एक कविता है, ’बिरखा बिनणी’। इसमें आए शब्द देखें-’ठुमक-ठुमक पग धरती, नखरौ करती, हिवड़ौ हरती...छम-छम आवै बिरखा बिनणी।..’ नई बहु के ठुमक-ठुमक चलने, मन हर्षाने के साथ बरखा की छम-छम की इस व्यंजना में संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्र सभी तो समाए हैं! ऐसे ही वर्षा से जुड़ा बहुत प्यारा लोक गीत भी है, ’झिरमिर बरसै मेह’। सुनता इसे बचपन से ही रहा हूं पर इधर सावन में बार-बार यह सुन रहा हूं और कभी बिन बरसे मेह की बूंदो से इसी में नहा लेता हूं। कविता में सहज बरते शब्द ऐसे ही सौंदर्य बरसाते है। पर मरू-भूमि में बूंदे जब नहीं बरसती तो लोक ने ’मारण मारग मोकळा, मेह बिना मतमार।’ जैसी व्यंजना भी की है। माने हे, सांवरे! बहुत सारे और भी मार्ग हैं, वर्षा के बिना मत मार। अकाल से जूझते मनुष्य की पीड़ा का यह विरल गान है।

कविता में निहित शक्ति और उसका शिल्प ऐसे भाव ही तो है। इससे ही छंद-गति, ताल-लय में कविता अन्य कलाओं से जुड़ी अनुभूतियां कराती हैं। यह सच है, चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्य के मेल से महती सिरजा जा सकता है पर यह स्वतः हो तभी ठीक है। प्रयास से कलाओं के अंतःसंबंध स्थापित करने या दर्शाने की चेष्टा सदा निर्थक होगी। कविता या कोई भी दूसरी कला हृदय से ही उपजती है। सुनाने के लिए, छपवाने के लिए वहां आग्रह होगा, तो कुछ सार्थक न होगा। यह तो बाद की स्थितियां हैं। कालिदास और भास की कविताएं दृश्य से साक्षात् है। शुद्ध राजस्थानी कविताएं भी प्रायः ऐसी ही है। एक छोटे से पट पर समर्थ चित्र जैसे कवि वहां आंक देता है। इन शब्दों पर भी गौर करें, ’उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र।’ बताईए, यहां भाषा बाधा बनी है! कविता में समाई कलाएं ही उत्सव को मनुष्य की जाति और आंनद को गोत्र बनाती है।


Saturday, July 15, 2023

संस्कृति की मौलिक स्थापनाओं से जुड़ा उजास

आदिवासी और लोक कलाओं पर हमारे यहां लिखा तो बहुत गया है परन्तु उनके जरिए मौलिक स्थापनाओं पर काम अभी भी गौण प्राय: है। यह समझने की बात है कि जो कुछ लोक—संस्कृति का है, उसे संकलित किया जाता है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। इससे भविष्य की नई दृष्टि की संभावनाओं पर कार्य यदि होता है तभी सार्थक कुछ हो सकता है। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'चौमासा'  के प्रकाशित अंक और उसकी सामग्री आलोक देने वाली है।


राजस्थान पत्रिका, 15 जुलाई 2023


अव्वल तो कलाओं पर ढग की पत्रिकाएं ही नहीं है और जो हैं
, वह या तो अकादमिक बोझिलता से लदी है या फिर उनमें वही सामग्री अधिक है जो यत्र—तत्र—सर्वत्र है। पर 'चौमासा' इस दृष्टि से विरल है कि इसके हर अंक में भारतीय संस्कृति से जुड़ी सूक्ष्म सूझ को युगीन अर्थों में कला—संस्कृति मर्मज्ञ और इसके संपादक अशोक मिश्र ने मौलिक स्थापनाओं के साथ प्रस्तुत किया है। अरसा पहले इसका एक अंक 'मृत्यु' जैसे अछूते विषय पर प्रकाशित हुआ था। इस अंक में जीवन प्रवाह के अंतिम विश्राम से जुड़े संस्कारों, मान्यताओं के लोक—आलोक में 'मृत्यु' से जुड़ी संस्कृति का अनूठा संधान है। ऐसे ही घुमंतू समुदायों के कला—सौंदर्य, काल की भारतीय दृष्टि, बांस की जीवन सृष्टि,  प्रदक्षिणा से जुड़ी भारतीय परम्परा जैसे विषयों में जीवन से जुड़े रहस्यों का अनावरण है। अभी 'चौमासा'  का जो नया अंक आया है, वह भी भू—अलंकरण से जुड़ी हमारी लोक संस्कृति का उजास है। इस अंक के अपने सम्पादकीय में अशोक मिश्र लिखते हैं, 'भूमि का अलंकरण धरती के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के साथ मांगलिकता और अभ्यागत के स्वागत का आह्वान है।'  अपने लिखे के इस आलोक में ही उन्होंने​ भित्ति चित्रों के अनछूए पहलुओं से जुड़ी विरल सामग्री इसमें जुटाई है।

अशोक मिश्र के पास लोक परम्पराओं, विश्वास और मान्यताओं से जुड़े लूंठे सन्दर्भ और उनकी वैज्ञानिक व्याख्या है। अभी कुछ दिन पहले ही भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में उनके कक्ष में बैठे बातचीत चल रही थी कि उन्होंने गोत्र परम्परा से जुड़े कुछ सूत्र सौंपे। कहा, शिष्ट और लोक समुदाय में भारत की अपनी एक प्राकृतिक संतुलन की दृष्टि गोत्र का हमारा जो विचार है, उसमें समाया है। वनस्पति, जीव—जंतु, पवित्र स्थल और ज्ञान की हमारी समस्त धाराओं में मानव समुदाय के उद्भव का कारण निरूपित कर उनके संरक्षण एवं विकास का आग्रह गोत्र चिन्हों के रूप में है। जीव जंतु, वनस्पतियां और प्रकृति से जुड़ी हमारी धरोहर के भी अपने—अपने गोत्र हैं। मन में आया, हमारे यहां एक गोत्र में विवाह नहीं किया जाता है। गोत्र संरक्षण इसी से होता है। अशोक मिश्र इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि जातीय समुदायों के गोत्रों के अध्ययन आलोक में संस्कृति की इस विरासत पर कुछ नया प्रकाश में आए। मुझे लगता है,  संस्कृति से जुड़ी इस दृष्टि से ही भविष्य के कुछ मौलिक में रचा—बसा जा सकता है।

बहुत बार लगता है, यह समय मूल ज्ञान से च्युत लोगों का है। ऐसे दौर में लोक सस्कृति मर्मज्ञ, लाक कलाविद्, विशेषज्ञ जैसी संज्ञाओं से अपने को अलग रखते अशोक मिश्र को देखता हूं तो अचरज होता है। मेरी जानकारी में लोक से जुड़े किसी एक अछूते विषय पर हर बार आग्रह करके निंरतर उन्होंने लेखकों से 'चौमासा' के लिए लिखवाया है। इसी से यह पत्रिका फल—फूल रही है। कला—संस्कृति में ऐसे उजास की ही तो इस समय सवार्धिक जरूरत है!


Sunday, July 9, 2023

गंगा निहार

कल श्रावण का पहला सोमवारहै। पर मैं तो एक दिन पहले ही शिव को स्मरण करते हरिद्वार में गंगा स्नान कर लौट आया हूं। मन कह रहा है, ‘तीर्थ बड़ा केदार, मन का मोक्ष हरिद्वार।’ हरिद्वार मन का मोक्ष ही तो है! न जाता तो भी क्या फर्क पड़ता! पर मन कहां मानने वाला है। हम वही करते हैं, जो मन कहता है। प्रातः पहुंचते ही मां गंगा के दर्शन किए। असल में इस बार एक छोटे पर अच्छे, साफ सुथरे घाट किनारे के होटल "गंगा निहार" में रुकना हुआ। गंगा के बिलकुल समीप। रात्रि वहां सोया तो वेग में बहती गंगा को ही सुनता रहा। दूसरे दिन प्रातः अलसुबह जगा तो देखा, घाट पर नहाने वाले पहुंच गए थे। भोर विष्णु घाट पर गंगा में डुबकी लगाई। ठंडा-टीप पानी! एक बार तो कंपकपी छुड़ाने वाला पर जब डुबकी लग गई तो मां की गोद से निकलने का मन न करे। मां गंगा लाड-लडाती है। आप फिर उसमें सहज हो जाते हैं। गंगा माने लोकमातरः। हम सबकी माता। निर्बन्ध! तीव्रतम इसके वेग को कौन पहले सहता सो भगवान शिव ने जटाओं में धारण किया। और फिर गंगा बह निकली। शिव जटा से मुक्ति, जह्नु गंधा, विष्णु पद से छूटने का अर्थ ही है-बंधन मुक्ति। गंगा स्नान भी मुक्त करता है, जीवन की विषमताओं से।

हरिद्वार शिव तक पहुंचने का द्वार ही तो है! घाट पर स्नान में गंगा का तीव्र वेग इस कदर होता है कि सांकल न पकड़ी हो तो व्यक्ति बह जाए। बारिश होने पर दूर पहाड़ों से बहती चली आने वाली गंगा बहुत सारी मिट्टी भी अपने संग बहा ले आती है। हरिद्वार में घाटों के पास गंगा का वेग बहुत प्रचण्ड होता है। इसलिए कि यहां वह कृत्रिम रूप से लायी धारा है।
पर प्रचण्ड या कम वेग में बहती नदी की यात्रा का ध्येय है सागर में समाना। और गंगा तो भागीरथी के रूप में सगर के साठ हजार पुत्रों की ही उद्वारक नहीं, हम सबकी भी मोक्षदायिनी है। तर्पणी! सप्तपुरियों में से एक हरिद्वार में ही यह पहाड़ों की गोद से उतरती है। हरिद्वार इसीलिए ‘गंगद्वार’ भी है! यूं हरिद्वार न भी कहें, हरद्वार से काम चल सकता है। हरद्वार में अपनापा है। आत्मीयता का भाव है। ...गंगा के मिले अपनापे को अंवेरते जयपुर लौट आया हूं। पर वह जो प्रातः काल विष्णु घाट पर किया स्नान है, मन उसमें ही नहा रहा है।
—राजेश कुमार व्यास
छायाचित्र—राजेश