ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Wednesday, December 12, 2018

कविता देवै दीठ-मीठेस निरमोही

काव्य संग्रह 'कविता देवै दीठ' पर कवि, कथाकार मीठेस निरमोही जी ने 'माणक' के मार्च 2013 के अंक में विस्तृत आलोचनात्मक लिखा था।
आपकी नज़र—










Thursday, November 29, 2018

दिनेश ठाकुर- आजकल, सितंबर 2009

दिनेश ठाकुर ने रंगकर्म को सदा ही गहरे से जिया। उनसे कभी लंबा संवाद हुआ था. यह प्रकाशन विभाग की पत्रिका आजकल के सितंबर 2009 अंक में छपा-




दुष्यंत-"आजकल", जुलाई 2001

हिंदी गजल के इतिहास पुरुष दुष्यंत पर यह आलेख 
"आजकल", जुलाई 2001 अंक 



यादवेंद्र शर्मा "चंद्र" - आजकल-नवम्बर 1993

प्रकाशन विभाग की मासिक पत्रिका "आजकल"  के नवम्बर 1993 अंक में प्रख्यात कथाकार यादवेंद्र शर्मा "चंद्र" का यह साक्ष्यात्कार प्रकाशित  हुआ था. पुराने पन्नों में आज मिल गया.



दीठ रै पार

बोधि प्रकाशन से प्रकाशित राजस्थानी भाषा के तीसरे काव्य संग्रह 'दीठ रै पार' पर कवि, आलोचक डॉ. मदनगोपाल लढ्ढा की यह दीठ—राजस्थान पत्रिका में ...10 दिसंबर 2017 


Sunday, November 25, 2018

नर्मदे हर - अमृत लाल वेगड़ जी की प्रतिक्रिया


एन बी टी से प्रकाशित यात्रा संस्मरण की पुस्तक "नर्मदे हर" पर नर्मदा के अनथक पदयात्री स्व. अमृत लाल वेगड़ जी ने अपनी प्रतिक्रिया  दी थी ... 


कश्मीर से कन्याकुमारी-अमृत लाल वेगड़ जी का पत्र

 यात्रा संस्मरण की पुस्तक "कश्मीर से कन्याकुमारी" पर नर्मदा के अनथक पदयात्री स्व. अमृत लाल वेगड़ जी ने हस्तलिखित पत्र भेजा था, आपकी नज़र -




Friday, June 10, 2016

कलाएँ अंतरात्मा की रूप विधान की सृष्टि

अयोध्या पहले भी जाना हुआ है, पर  इस बार राष्ट्रीय कला शिविर में बहुत कुछ नए अनुभव जुड़े। देशभर के कलाकारों के साथ बतियाया, मित्र अवधेश मिश्र के संयोजन में शिविर में कलाकृतियों पर वृहद विमर्श भी हुआ. एक रोज़ दैनिक जागरण ने अपने संवाददाता को कलाओं पर संवाद करने के लिए भेजा। सुखद लगा, किसी अखबार को कलाओं पर पाठकों को देने की सूझ है, अन्यथा पत्र-पत्रिकाओं से कला-संस्कृति का स्थान तो  धीरे धीरे लोप हो रहा है... 
जागरण ने  इंटरव्यू किया, और कलाओं की दी मेरी संज्ञा "कलाएँ अंतरात्मा की रूप विधान की सृष्टि" को ही हेडिंग दिया। सुखद लगा. आप भी आस्वाद करें-

Sunday, March 22, 2015

‘पुस्तक वार्ता’ में ‘सुर जो सजे’

नेशनल बुक ट्रस्ट , नई दिल्ली की और से प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘सुर जो सजे’ की समीक्षा महत्मा गांंधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘पुस्तक वार्ता’में ख्यात आलोचक, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपमजी ने की है। उनका आभार! आप भी करें आस्वाद ...




... ‘सुर जो सजे’ हिन्दी सिनेमा संगीत के इतिहास के संवेदनशील पक्षों को पूरी आत्मीयता से उद्घाटित करती है। कह सकते हैं यह छोटी सी पुस्तक एक झरोखा है जिसके माध्यम से हम सिनेमा संगीत ही नहीं भारत की सांस्कृतिक परम्परा को एक नए नजरिए से देख सकते हैं।...
                                                                                                                          -- विनोद अनुपम 
                                                                                                                            ‘पुस्तक वार्ता’





सुर जो सजे

दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका "अहा! जिंदगी" के मार्च अंक में "सुर जो सजे" पर ...