ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, September 11, 2022

"अमर उजाला" साप्ता​हिक किताब में "कला—मन"

सुखद लगता है, जब आपकी लिखी किसी पुस्तक के गहरे में उतरते परख होती है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री डॉ. सी.पी. देवल ने 'अमर उजाला' के लिए "कला—मन" की यह समीक्षा की है।...

भारतीय कलाओं पर हिन्दी में स्तरीय प्रकाशनों की अभी भी बहुत कमी है। डॉ. राजेश कुमार व्यास की सद्य प्रकाशित वैचारिक निबंधों की पुस्तक ‘कला-मन’ इस कमी को कम करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। पुस्तक के ‘पुरोवाक’ में ही लेखक भारतीय कला दृष्टि का वैचारिक गान करता हुआ पाश्चात्य जगत की कला समीक्षा को एक कोण विशेष से देखने वाली बताते हुए भारतीय कला दृष्टि की गहराई में ले जाता है। इसीलिए उदाहरणार्थ वह भारतीय कला में उकेरे श्री कृष्ण की चर्चा करता है।

अमर उजाला

व्यास पुस्तक में लिखते हैं कि भारतीय कला दृृष्टि में कृृष्ण की एक पक्षीय छवि नहीं उकेरकर उसके साथ धेनु, बांसूरी, गोपी, मोर मुकुट कदम्ब के पेड़ के साथ और क्या-क्या और नहीं उकेरा गया है! कला की इस भारतीय दृष्टि से देखने की ही आज आवश्यकता है। लेखक इसे चुनौती रूप में स्वीकार कर पुस्तक में अपने विचार और अनुभवों को पाठकों से साझा करता है।

यह महत्वपूर्ण है कि कला के विस्तृत जगत में लेखक डा. व्यास की दृष्टि जहां भी गयी है वह वहीं से देखता कम, पर दिखाता ज्यादा है। लेखक का पूरा जोर कला वस्तु को कैसे देखा जाना चाहिए, इस पर है। वह बहुत बारीकी से देखने की भारतीय ढब को परिभाषित करते हुए छवि को कैसे पढा जाए अर्थात देखा जाए उस ओर भी निरंतर संकेत करता है।

एक कलात्मक आत्मबल के सहारे लेखक चुपचाप भारतीय कला समीक्षा की एक सैद्धान्तिकी भी गढता चला जाता है, जिसकी कि समकालीन समय में बहुत जरूरत है।

‘कला-मन’ पुस्तक हमें कला की उस पगडंडी पर लिए चलती है जहां हम पाठकों का कभी प्रवेश नहीं हुआ है। लेखक हमें कला के सहारे भारतीय सौंदर्यबोध का अहसास कराता हुआ एक तरह से ‘संस्कृति का कला-नाद’ सुनवाता है। लेखक ने ‘लोकतंत्र और कला’, ‘राष्ट्र और संस्कृति’ जैसे बहुत से वैचारिक लेखों में भारतीय कला के सामयिक सवाल उठाए हैं, उनका सहज जवाब भी दिया है।

हमारी कलाओं में लय—ताल और रूप-स्वरूप की भाव व्यंजना के साथ संवेदनाओं पर जोर है। कोई कलाकृति भारतीय आंख से देखने के समय में ही नहीं देखने के बाद भी मन में निरंतर रस की सृष्टि करती है। रस निष्पत्ति की यह अबाध परम्परा ही भारतीय कला का सच है, यह बात भी हमें ‘कला-मन’ पुस्तक समझाती है।

इसे पढ़ने के बाद लेखक व्यास से अपेक्षा करता हूं कि वह भारतीय कला को इसी तरह भारतीय कला शब्दावली में उजागर करने का प्रयास करते रहेंगे। इसी से हमारा भारतीय मन असल में कला गंगा के तीर पर नहाकर अपने को ‘कला-मन’ करने में सक्षम होगा।

Saturday, September 10, 2022

मिस्र की प्राचीन सभ्यता का कला रूपान्तरण

 सभ्यता का इतिहास मनुष्य की कल्पनाओं से गढ़ी रचनाओं से अधिक यथार्थ की रूपान्तरणात्मक खोजों में सदा जीवंत हुआ है। पुरातत्व खोजों और उत्खनन में प्राप्त मूर्तियों, चित्र, वास्तुकला आदि से जुड़े तथ्यों ने ही अतीत के विस्मृत अध्यायों से पर्दा उठाया है। सुप्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक दया कृष्ण की महत्वपूर्ण अंग्रेजी पुस्तक है, ' प्रोलोजेमेना टू एनी फ्यूचर हिस्टोरियोग्राफी ऑफ कल्चरर्स एण्ड सिविलाइजेशन्स' इसमें उन्होंने मानव इतिहास को देखने के लिए शिल्प, शास्त्र और पुरूषार्थ के साथ संस्कार को भी जोड़ा है। उनके लिखे के आलोक में यह पाता हूं कि सभ्यताओं के उत्थान और पतन की गहरी दृष्टि असल में जीवन से जुड़े संस्कारों में ही बहुत से स्तरों पर समाई हुई है। जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में इस समय एक माह के लिए 'तुतेनखामुन सिक्रेट्स एण्ड ट्रेजर्स' प्रदर्शनी लगी  हुई है। इसे देखा तो लगा, गुम हुई प्राचीन मिस्र की नाइल नदी सभ्यता संस्थापन में यहां जीवंत हुई है।

विश्व के सात अजूबों में मिस्र के पिरामिड भी है। शुष्क जलवायु के कारण मिस्र में शव जल्दी नष्ट नहीं होते इसलिए वहां जीवन की निरंतरता में आस्था रही है। राजा चूंकि वहां देवत्व रूप में शासन करते रहे हैं, उन्हें आभूषणों से सज्जित स्वर्णिम सिंहासन, रथ, घोड़ों, पलंग, मुद्राओं और तमाम अपने ऐश्वर्य के साथ कब्र में दफनाने की परम्परा रही है। सुनेसुनाए इतिहास, पाषाण पर, मिट्टी और पपाईरस यानी रेशे जैसे कागज पर मिली मिस्र की चित्र लिपियों के अध्ययन में जाएंगे तो यह भी पाएंगे कि एक समय में मिस्र की सभ्यता बेहद समृद्धसंपन्न और कलात्मक रही है। इजिप्ट के कलाकार डॉ.मुस्तफा अलजैबी ने वहां के शासक तुतेनखामुन के जीवनआलोक में इसी सभ्यता को जवाहर कला केन्द्र में मूर्तिकला, चित्रकला और संस्थापन में जैसे जीवंत किया है।

राजस्थान पत्रिका, 10 सितम्बर 2022

कहते हैं, तुतेनखामुन की बहुत कम उम्र में हत्या हो गयी थी। ब्रिटिश पुरातत्वविद् हावर्ड कार्टर ने 1922 में उनकी खोई हुई संरक्षित कब्र की खोज की थी। इस खोज ने ही वहां की प्राचीन कलात्मक परम्पराओं, चित्रलिपि और मूर्तिकला से जुड़े सौंदर्य संसार के भी द्वार नए रूपों में हमारे सामने खोले। जवाहर कला केन्द्र में मिस्र की सभ्यता से जुड़ी कलाप्रदर्शनी इस मायने में भी महती है कि इसमें स्वर्ण और दूसरी धातुओं की रंगधर्मिता, मूर्तियों के अनुपातसमानुपात के साथ रेखीय अंकन की गहराई है। सम्राट और उसकी जीवनचर्या, पशुपक्षियों, प्रकृति और जीवन से जुड़े संदर्भों की कलाप्रस्तुति में रमते यह भी लगता है कि मिस्र का सोया हुआ प्राचीन इतिहास जैसे हमारी आंखो के समक्ष जाग उठा है। प्राचीन मकबरे को लकड़ी, रेजिन और सोने की ढलाई जैसी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करके यहां पुनर्नवा किया गया है।

मिस्र को सोने के गहने पहनने वाली पहली सभ्यताओं में से भी एक माना जाता है। शासक तुतेनखामुन का नाम भी चन्द्रमा की कला से जुड़ा है। तुतेनखामुन माने अमुन की परछाई। अमुन मिस्र के देवता का नाम है। यही अमुन हमारा चन्द्रमा है।     

यह महज संयोग ही नहीं है कि वास्तुकार चार्ल्स कोरिया ने जवाहर कला केन्द्र का निर्माण नवग्रहों से जुड़ी कलाकृतियों के संदर्भ सहेजते किया था। यहां कॉफी हाउस में जब भी जाना होता है, टेबल्स में चंद्रमा की घटतीबढ़ती कलाओं को रूपायित पाता हूं। उसी जवाहर कला केन्द्र में तुतेनखामुन यानी चन्द्रमा की परछाई के आलोक में मिस्र की सभ्यता से जुड़ी कला प्रदर्शनी देखना विरल अनुभव है। इसलिए भी कि ग्रीक, फ़ारसी और असीरियन आक्रमणों ने कभी इस प्राचीन सभ्यता को कभी पूरी तरह से ख़त्म कर दिया था। सोचता हूं, यह कलाएं ही तो हैं, जो इस तरह से किसी सभ्यता और संस्कृति को हममें पुनर्नवा करती है।

Sunday, September 4, 2022

'द प्रिंट' के साथ 'कला—मन' पुस्तक के संदर्भ में संवाद

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'कला—मन' के संदर्भ में 'द प्रिंट' के सुधि पत्रकार श्री शिव पाण्डेय से आज कला लेखन, भारतीय कला दृष्टि, कला समीक्षा से जुड़ी भाषा आदि प्रश्नों के आलोक में संवाद हुआ। कलाओं पर लिखे मेरे वैचारिक निबंधों और पुस्तक 'कला—मन' से जुड़ी इस बातचीत को चाहें तो आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=gy9pA8VGlrs पर जाकर यूट्यूब पर देख सकते हैं...






Saturday, September 3, 2022

"कला—मन" पुस्तक का लोकार्पण

राजस्थान के राज्यपाल श्री कलराज मिश्र और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्त्रबुधे ने 20 अगस्त को राजभवन राजस्थान में प्रदेश के मूर्धन्य कलाकारों की उपस्थिति में डॉ. राजेश कुमार व्यास की वैचारिक निंबंधों की पुस्तक 'कला—मन' का लोकार्पण किया।...


राजस्थान पत्रिका, 21 अगस्त 2022 




राष्ट्रदूत, 21 अगस्त 2022



राष्ट्रीय सहारा, 21 अगस्त 2022

Saturday, August 27, 2022

साहित्य—कला और पुरातत्व के अन्त:संबंधों के संवाहक-वाकणकर

 शैल चित्र मनुष्य की संभावनाओं का कला—इतिहास है। स्पेन के आल्तामीरा से भी 12 वर्ष पहले भारत में पुराविद् आर्किबोल्ड कार्लाइल ने बहुत से स्थानों पर शैल चित्रों की खोज कर ली थी। पर कला की दृष्टि से सर्वाधिक सुंदर शैल चित्रों की खोज देश में किसी ने की तो वह डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर थे। भोपाल से होशंगाबाद जाते उन्होंने 1957&58 में पर्वतों में गुम भीमबेटका गुफाओं की तलाश की थी। पर उन्होंने यही बड़ा कार्य नहीं किया था। कला इतिहास की भारतीय दृष्टि के और भी महत्वपूर्ण सूत्र हमें दिए हैं। यह विडम्बना ही है कि इस पर बहुत अधिक ध्यान अभी तक नहीं गया है।

डॉ. वाकणकर ने चंबल और नर्मदा के नालों की खोज की। सारनाथ, बनारस, अमरावती, महेश्वर आदि के कला इतिहास का सूक्ष्म अन्वेषण कर मौलिक भारतीय स्थापनाएं दी तो सरस्वती नदी के उद्गगम और प्रवाह मार्ग के साथ देश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मानचित्र की भी भारतीय दीठ से पुर्नव्याख्या की। स्वयं वह बहुत अच्छे चित्रकार थे। संगीत की उन्हें गहरी समझ थी और नृत्य से जुड़ी भारतीय विरासत से यह उनका सरोकार ही था कि उन्होंने शैल चित्रों के रूपात्मक से भावात्मक सौंदर्य के बहुतेरे अनछुए पहलुओं की ओर भी हमारा ध्यान दिलाया। वह बहुत सारी लिपियों के भी जानकार थे।  जंगलों, पहाड़ों में घूमते उन्होंने चार हजार से अधिक रॉक गुफाओं की खोज ही नहीं की इतिहास के विस्मृत उन पन्नों की भी धूल उतारी जिनमें कलाओं की हमारी मूल दृष्टि कहीं गुम हो रही थी। 

राजस्थान पत्रिका, 27 अगस्त, 2022


सतपुड़ा, विंध्याचल पर्वत शृंखलाओं में शैलचित्रों का जो भव उन्होंने तलाशा उसके साथ प्रागैतिहासिक भारतीय कलाओं का उपेक्षित प्राय: सौन्दर्यान्वेषण भी इस दौरान किया। उन्होंने परम्पराओं और लोक मान्यताओं, पुराकथाओं के संदर्भ टटोलते अपनी खोज को प्रमाणित किया। ब्रिटिश पुरातत्वेताओं के पास उत्खनन के लिए समुचित साधन रहे हैं, सहयोगी रहे हैं परन्तु वाकणकर कला—मन के धुनी थे सो उन्होंने अपनी राह सदा खुद बनाई। पर यह आसान नहीं था। न कोई रास्ता, न कोई संकेत। बस धुन थी। बड़ी—बड़ी चट्टानों पर चढ़ते—उतरते वह आदि मानव द्वारा सिरजी कलाओं तक पहुंच जाते। ऐसे ही ट्रेन में राह चलते एक दफा उन्होंने लोगों को बातचीत करते सुना कि दूर पहाड़ों में भूत—प्रेत रहते हैं। रात में वह प्रकट होते हैं और दिन में चट्टानों में चित्र बन समा जाते हैं। उन्होंने वहीं उतरकर भीमबेटका की गुफाएं ढूंढ निकाली। वह कोट की जेब में कच्चे आलू रखते। भूख लगती तो रेत में भूनकर उन्हें खा लेते।

असल में वाकणकर पुरातत्ववेता भर ही नहीं थे, सौंदर्यबोध और विरल भारतीय कला दृष्टि उनमें थी। यह था तभी तो शैल चित्रों के जरिए उन्होंने भारतीय कलाओं के यथार्थ,उनकी वास्तविक छवि और सौंदर्य की दृष्टि से जुड़े भी महती अध्ययन हमें दिए। मसलन प्रागैतिहासिक चित्रों में बरते रंग] उनमें संगीत, नृत्य और वैदिक भारतीय धर्म—अनुष्ठानों के संदर्भ में उनका वह शोध अभी भी कहां प्रकाश में आया है! जिसके जरिए भारतीय कला—इतिहास को नई दृष्टि मिल सकती है।

डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज के साथ प्रागैतिहासिक कला की व्यवस्थित भारतीय दृष्टि हमें दी। अध्ययन, अन्वेषण के साथ चित्रों के विषय—वस्तु एवं कला सौंदर्य का उनका अनुशीलन हमारे सांस्कृतिक इतिहास की और भी बहुत सी खिड़कियां खोलने वाला है। मुझे लगता है, यह वाकणकर ही थे जिन्होंने साहित्य—कला और पुरातत्व के अन्त:संबंधों में अपने अन्वेषण से सनातन भारतीय संस्कृति के बीज अंकुरित किए हैं। प्रयास करेंगे तो इसके और भी मीठे फल हम भविष्य में पा सकते हैं।


Thursday, August 18, 2022

जड़ में चेतन की तलाश करती दृश्य-छंद कला

छायांकन विरल कला है। जो दिख रहा है और जैसा दिख रहा है वह तो हमारी आंख भी देख लेती है परन्तु छायांकन  दृश्य  में  बसे अदृश्य सौंदर्य को अंवेरने की अद्भुत कला है। बल्कि कहूं छायाकार बहुतेरी बार यथार्थ को अपने तईं मौलिक कला—दीठ से रूपांतरित करता है। छायाकार  रंग, स्पेस, रेखाओं और परिवेश से जुड़ी तमाम कलात्मक संभावनाओं का एक तरह से हम सबके समक्ष आकाश खोलता है।मुझे लगता है, छायांकन देखने को संस्कारित करने की दृश्य -छंद कला है। परिवेश को समग्रता में अनुभूत करने को प्रेरित करती वह कला जिसमें किसी दृश्य को उसके किसी एक पक्ष में नहीं, समग्रता में निहारा जा सकता है। सूक्ष्म पर्यवेक्षण में इस कला के अंतर्गत छायाकार चीजों, व्यक्तियों और यथार्थ से जुड़े दृश्यों में एक प्रकार से रमता है। ध्यानस्थ होते नया कुछ गढ़ता है। छायांकन असल में देखे, अनुभूत किए हुए यथार्थ को अपनी मौलिक दीठ में सर्वथा नए ढंग से रूपायित करने की ही विरल कला है।


रघुराय ने इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की परन्तु भारतीय जन जीवन, प्रकृति दृष्यावलियों, युद्ध, आस्था स्थलों, स्मारकों के साथ ही राजनीतिक, सामाजिक जीवन से जुड़े विशिष्ट व्यक्तियों के उनके छायाचित्र जड़ को जीवंत करने वाले हैं। एक छायाकार की  अंतर्मन अनुभूतियों के भव को उनकी छायांकन कला संग पढ़ा ही नहीं देखा जा सकता है।  रघुराय के  संगीत, नृत्य, नाट्य आदि कलाओं से जुड़े कलात्मक छायाचित्रों में कलाकारों के जरिए कला के समय को भी हम सुन-गुन और बांच सकते हैं।  किसी सांगीतिक प्रस्तुति में ध्यानस्थ गायक-गायिका, नृत्यरत नर्तक की कोई खास भंगिमा, नाट्य से जुड़ा कोई ऐसा विरल भाव जो बीत चुका होता है, छायाकार उसे छायांकन कला में ऐसे छायाचित्रों में सदा के लिए फिर से जीवंत ही तो करता है!
छायाकार महेश स्वामी ने कभी नृत्य में छाया—प्रकाश से उभरती भंगिमाओं का ध्यान—लोक सिरजा था। इधर कुछ बरसों से वह कैमरे से ली पेड़—पौधों की जीवंत छवियों का कैनवस रूपान्तरण कर रहे हैं। ऐसा करते छायांकन प्रयोगधर्मिता में दृश्य से जुड़े मूल रंगो को दृश्य में छितराते, उन्हें परिवेश में सजाते, परिवर्तित करते हल्का—गहरा करते और बहुतेरी बार एक रंग में दूसरा घोलते एब्सट्रेक्ट कलाकृतियां का जैसे नव्य लोक वह सिरज रहे हैं। छायांकन का उनका यह कलाकृति आस्वाद लुभाने वाला है।
अविनाश पसरीचा के हिमालय के चित्र, निमाई घोष के सत्यजीत राय की सिने कला और व्यक्तित्व से जुड़े चित्र, राजदीप राकेश  के लोक संवेदना से जुड़े उत्सवधर्मिता से जुड़े छायाचित्रों को देखते बहुतेरी बार यह भी लगता रहा है कि बजरिए छायाचित्र हम कला की उस प्रस्तुति समय में प्रवेश  कर गये हैं। माने छायांकन -कला स्मृति को समृद्ध-संपन्न ही नहीं करती, बीते हुए समय में प्रवेश करने की अनुभूति भी है।
अकबर पदमसी ने कलाकृतियां का विरल लोक सिरजा है पर छायांकन की उनकी दृष्टि भी महती है। वह लिखते हैं,‘मैं चित्रकार हूं पर कई बार कैमरे से चित्रकारी करता हूं। परछाइयां रौशनी  को शिल्पित  करती है।’ यह सच है, छायांकन में परछाई में भी रोशनी से बहुत कुछ नया सिरजती है। छायाकार देखे हुए में अपनी संवेदना, घटित किसी तात्कालिकता में उपजे क्षण के सौंदर्य, दृश्य  में निहित गहराई, गंभीरता या व्यक्ति या वस्तु से जुड़े किन्हीं अचरज भावों को अपने तई कैमरे की आंख से जब परोटता है, तब उसका वह कैमरे का छायाकंन, कला में रूपान्तरित हो जाता है।
आज ही विश्व छायांकन दिवस पर पुष्पेंद्र उपाध्याय की पहली छायाचित्र प्रदर्शनी जवाहर कला केन्द्र में हो रही है। यह देखना सुखद है कि अपने चित्रों में उन्होंने प्रकृति रचे परिवेश को अंतर के अपने उजास से शिल्पित किया है। मुझे लगता है, छायाकार अपने देखे में सौंदर्य की तलाश  ही नहीं करता बल्कि अपने तई देखे इस सौंदर्य को विशेष  दृश्य-छंद से श्रृंगार भी करता है। इस दीठ से प्रकृति में क्षण-क्षण में जो परिवर्तित होता है, उस सत्य का सौन्दर्यान्वेषण  है, छायांकन कला। इसीलिए कहें, छायांकन में कैमरे की तकनीक और उसे बरतना ही महत्वपूर्ण नहीं होता। छायाकार के रंगो की, प्रकृति को अनुभूत करने की, दृष्य में लय को तलाशने की गहरी समझ उसकी कला के मूल तत्व है।
कुछ समय पहले ही प्रख्यात कलाकार हिम्मत शाह अपनी कलाकृतियों की एक किताब ‘हाई रिलीफ वर्क बाई हिम्मत शाह’ स्वयं वह घर आकर देकर गए थे। उनके द्वारा 1968-69 में सेंट जेवियर स्कूल, अहमदाबाद में दीवार पर सीमेंट, कंक्रीट, पत्थर और ईटों से बेहद कलात्मक म्यूरल कार्य के चितराम इसमें है।  पुस्तक में छायाकार सुरेन्द्र पटेल और राघव कनेरिया ने उनके सिरजे उस समय के सुंदर भित्ति चित्र, दीवार के खंड खंड सौन्दर्य के अखंड को गहरे से जिया है। उनके उन छाया चित्रों को देखकर ही मुझे यह भी अनुभूत हुआ, यह छायांकन ही है जिसमें किसी दूसरी कला साधना को इस तरह से सदा के लिए जीवंत कर कला इतिहास की सौंदर्य सृष्टि होती है। युवा छायाकार आकाश शर्मा ने इधर गोविंद देव जी, नाथद्वारा की कृष्ण मूर्तियों के छायाचित्रों को अपने स्तर पर परस्पर एक साथ संयोजित कर डिजिटल प्रिंट के विरल प्रयोग किये हैं ।  इन्हे देखकर मन में विचार आते हैं, छायांकन यथार्थ के बरक्स नवीन यथार्थ रचने की कला ही क्या नहीं है!
बहरहाल, प्रख्यात प्रिंट मेकर, कलाकार जयकृष्ण अग्रवाल की जवाहर कला केन्द्र में कभी जयपुर के जन्तर-मन्तर पर केन्द्रित एक छायाचित्र प्रदर्शनी देखी थी। इसमें उन्होने जंतर मंतर की सीढ़ियों, समय यंत्रों के  चित्रीय तत्वों को  खगोलीय घटना की अनुभूति में जीते हुए  शिल्प स्थापत्य के  अनंत विस्तार का अदभुत छाया चित्र रूपान्तरण किया है। मुझे लगता है, छायांकन में देखना ही महत्वपूर्ण नहीं है, उसे देखे को अपने तईं विकसित करते और फिर ऐसे को  अंतर्मन अनुभूति में कैमरे के जरिए रूपांतरित करने की कला अधिक महत्वपूर्ण है।
राजा रवि वर्मा प्रातः 4 बजे उठकर चित्र बनाते थे। यह वह समय होता है जब भोर के हल्के उजास का आगमन हो रहा होता है और रात्रि के अंधकार का गमन हो रहा होता है। कहते हैं, राजा रवि वर्मा ने प्रकृति के इसी उजास और अंधकार के रंगों की अनुभूतियों को अपनी कलाकृतियों में बरतें रंगों में रूपान्तरित किया है। गौर करें, उनकी कलाकृतियों में रंग संयोजन ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। छायांकन कला का तो बड़ा सच भी यही है कि वहां छायाकार प्रकृति में घूले रंगो को अपनी दीठ से अनुभूत कर उसमें नया दृश्य  यथार्थ रचता है।
नर्मदा के अनथक यात्री अमृत लाल वेगड़ ने नर्मदा के किनारे बसे गांवों के बेहद मोहक शब्द चित्र ही अपनी यात्रा संस्मरणें में नहीं उकेरे हैं बल्कि अपने रेखांकन में भी नर्मदा यात्रा को गहरे से जिया है। छायांकन कला के बारे में जब भी विचारता हूं, ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ पुस्तक में लिखी यात्रा अनुभूति की उनकी यह पंक्तियां जहन में कौंधती है। वह लिखते हैं, ‘...सारा दिन मंडला की उस पहाड़ी पर रहा। वह पेपरवेट जैसी लग रही थी। आस-पास के खेत कहीं उड़ नहीं जाए, इसलिए उन पर रखा पेपरवेट।’ जिस तरह से वेगड़जी यहां आंख से देखे दृश्यों को अपने मन की आंख से अनुभूतियों में रूपान्तरित कर रहे हैं, ठीक वैसे ही छायाकार भी कईं बार दृश्य  में ऐसे ही संवेदनाओं को घोल कर यथार्थ को देखे से इतर  नवीन ढंग से रूपायित करता हमारे समक्ष रखते  है। इसीलिए कहें, छायाकार जो देखता है वह कोई और नहीं देखता है।  
भारतीय फिल्मों के भीष्म पिता कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के कैमरे से सिरजी दुनिया के प्रति इतना अधिक जुनूनी थे कि उन्हें इसके लिए अपनी एक आंख तक गंवानी पड़ी थी। ‘द ग्रोथ ऑफ द प्लांट’ के अंतर्गत मटर बोने और उसके बाद उसके क्षण-क्षण में बढ़ते समय को उन्होंने छायांकन में अद्भुत ढंग से जिया है। फिल्मों में अभी जो ‘स्पेशल  इफेक्ट’ हम देखते हैं, उसके जनक यही दादा साहब फाल्के ही रहे हैं। सत्यजित राय के साथ भी यही था, उन्होंने साधारण विषयों, दृश्यों के भी सूक्ष्म ब्योरों के इतने कलात्मक रूप चलचित्र में सिरजे हैं कि अचरज होता है, कैसे यह संभव हुआ होगा। काशी  में कभी उन्होंने ‘अपराजित’ फिल्म की शूटिंग की थी। ‘माई इयर्स विद अपू’ में वह लिखते हैं,  ‘बंगाली टोला मे जाकर वहां के मकानों को ध्यान से देखा। गणेश  मोहल्ले के मकान फिल्म में शायद सबसे अच्छे आंएगे। ऐसा लगने की वजह क्या है? यहां की गलियां घुमावदार है, मकानों के सामने के हिस्से कुछ टूटे-फुटे से हैं, दरवाजे, खिड़कियां, रेलिंग, बरामदे और खम्भे-कुल मिलाकर चित्र सा उभरता है।’ गौर करें, दृश्य के कितने सूक्ष्म ब्योरों पर सत्यजीत राय यहां गए है। कितने-कितने अर्थों में उन्होंने दिख रहे दृश्यों की छवियों का अंकन अपनी कला दीठ में  किया है।
छायांकन कला का बड़ा सच यही है। इस कला में दृश्य से अधिक उसमें निहित और उभरती छवियों की विरलता अधिक महत्वपूर्ण होती है। आईए, विश्व छायांकन दिवस पर दृश्य छंद की इस कला के ऐसे ही मोहक छंदो में रमें। बहुत कुछ नया, अभूतपूर्व मिलेगा।