ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, April 22, 2023

माधव-मास का संस्कृति पर्व

आस्था और विश्वास में ही जीवन सदा उत्सवधर्मी बना रहता है। भारतीय काल-गणना पर गौर करेंगे तो पाएंगे लौकिक उत्सवों में ही वह पूरी तरह से गुंथी हुई है। 

चैत्र से वर्ष प्रारम्भ होता है और दूसरा माह वैशाख ही है। हर मास का अपना गान है। चैत्र का स्वागत ’चैती’ गाकर होता है।  वैशाख में 'घांटो’ का गान होता है। ठीक वैसे ही जैसे फागुन में ’फाग’, सावन में ’मल्हार’, भादों में ’कजली’ आदि। 

राजस्थान पत्रिका, 22 अप्रैल 2023
वैशाख  शब्द 27 नक्षत्रों में से 16 वें विशाखा से आया है। इसका एक अर्थ राधा भी है। इसीलिए वैष्णवों के लिए यह ’राधा-मास’ है। श्रीमद्भागवत में यह ’माधव-मास’ है। वैशाख शुक्ल तृतीया इस माह का अनूठा संस्कृति पर्व है। लोक में यह आखातीज है। अक्षय यानी कभी कहीं जिसकी क्षय नहीं हो। तीन प्रमुख अवतार नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव इसी दिन हुए। बद्रीनाथ के कपाट इसी दिन खुलते हैं तो वृन्दावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार इसी दिन होते हैं। किसी भी कार्य को करने का अनपूछा मुहूर्त है यह। अबूझ तिथि। शुभ! कोई भी कार्य प्रारम्भ करें, किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं। मंगलकारी दिन। इसीलिए सर्वाधिक विवाह इसी दिन होते हैं। खगोलीय रूप में गौर करेंगे तो पाएंगे विशाखा नक्षत्र विवाह समारोहों में प्रयुक्त होने वाले पत्तियों के तोरण के आकार का है। वर-वधु को पहनाई जाने वाली मालानुमा भी। 

अक्षय तृतीया कलाओं से जुड़ा दान पर्व भी तो है! अलंकृत घड़े, सुंदर सुराहियां, मिट्टी के बने और भी बर्तन, कलात्मक पंखियां दही, अन्न-धन आदि इस दिन बहन-बेटियों को देने का रिवाज है। अक्षयतृतीया पर लक्ष्मी सहित नारायण की पूजा होती है। वाणी जब सुसंस्कृत होती है, तब उसे सरस्वती का स्वरूप मिलता है पर शब्दों को फटक-फटक कर भाषा का जब निर्माण हुआ तो लक्ष्मी ने ही वाणी को निधि समर्पित की। वाणी, निधि सभी प्रतीक हैं। मंगलकामना, आध्यात्मिकता और पर्व रसिकता संग नवजीवन और पोषण देते प्रायः सभी उत्सवों में हम प्रतीकों का ही तो वरण करते हैं। 

अक्षय-तृतीया पतंग उत्सव भी है। बीकानेर में चिलचिलाती धूप, लू में भी घरों की छतें इस दिन आबाद होती है। पतंगे उड़ती है। स्थानीय भाषा में इन्हें किन्ना कहते हैं। वैशाख शुक्ल बीज, 1545, शनिवार के दिन बीकानेर शहर की स्थापना हुई थी। स्थापना की उमंग में बीकानेर में उत्सव मनाया गया। घरों में खीचड़ा बना। घी भर इसे लोगों ने खाया और जीभर पिया इमली का शर्बत। असल में आखातीज पर बीकानेर के संस्थापक राव बीका ने खुशी का इजहार करते, आसमान में उड़ते मन के प्रतीक रूप में चंदा यानी बड़ी पतंग उड़ायी। बस तभी से परम्परा हो गयी। पूरे विश्व में शायद बीकानेर एक मात्र जगह है जहां तपते तावड़े में छत पर चढ़कर लोग पतंगे उड़ाते हैं। कागज पर कोरे चित्र, आकृतियों से सजी कलात्मक पतंगे। इन्हें उड़ाना भी अपने आप में कला है। आसमान में गोते खाती पतंगों के उड़ाके तगड़े लड़ाके होते हैं। दूसरे की पतंग काटने में मजबूत डोर नहीं बल्कि पेच लड़ाने की कला प्रमुख होती है। ऐसी जिसमें कलाबाजियों खिलाते पतंग को अनायास ढील या औचक कसते हुए काटने के गुर निहित होेते हैं। 

वैशाख में शिवलिंग के ऊपर जल-पात्र बांधने की भी परम्परा है। समुद्रमंथन में निकले भयंकर कालकूट विष को शिव ने कंठ में धारण किया था।  वैशाख में जब अत्यधिक गर्मी पड़ती है, इस विष से राहत देने के लिए शिवलिंग पर ’गलंतिका’ बांधी जाती हैं। गलंतिका माने जल पिलाने का करवा या बर्तन। मटकी में जल ठंडा रहता है, इसलिए प्रायः इसे ही बांधा जाता है। बूंद-बूंद  जल इससे शिव को स्वयमेव अर्पित होता रहता है। इस रूप में शिव आराधना से भी जुड़ा है यह मास। मुझे लगता है-सत्यम्, शिवं और सुंदरम् की अनुभूति का आलोक पर्व ही है-वेशाख मास और इसमें आने वाली अक्षय तृतीया! 

Saturday, April 8, 2023

नाद सौंदर्य के स्वर—सिद्ध गायक-पंडित कुमार गंधर्व

आज 8 अप्रैल 2023 से पंडित कुमार गंधर्व की जन्मशती शुरू हो रही हैं। मुम्बई में कुमार गंधर्व प्रतिष्ठान, देवास और नेशनल सेंटर्स फॉर परफोर्मिंग आर्ट्स द्वारा इसकी शुरूआत दो दिवसीय संगीत महोत्सव से आज सांझ ही हो रही है। शास्त्रीय संगीत के वह क्रांतिकारी गायक थे। किसी घराने विशेष से अपनी पहचान बनाकर उन्होंने अपनी स्वतंत्र शैली, विचारउजास की दृश्य गायकी ईजाद की। परम्परागत रूढ़ियां तोड़ते सदा उन्होंने संगीत में नया रचा।

राजस्थान पत्रिका, 8 अप्रैल 2023

मुझे लगता है, नाद सौंदर्य के भी वह विरल अन्वेषक थे। ऐसे जिन्होंने गान में शब्दों को जीते हुए अर्थ छटाओं की गगनघटा लहराई। सुनेंगे तो लगेगा वह स्वरों को फेंकते, उन्हें बिखराते, औचक ऊँचा करते, विराम देते और फिर अंतराल के मौन को भी जैसे व्याख्यायित करते थे। मिलनविरह और भांतभांत की जीवनानुभूतियों में उनका गायन सुना ही नहीं देखा जा सकता है। कबीर के निर्गुण को जो शास्त्रीय ओज उन्होंने दिया, किसी और के कहां बस की बात है! 'उड़ जाएगा हंस अकेला...,' मेंगुरु  की करनी गुरु  जायेगा, चेले की करनी चेला...’ स्वरनिभाव पर ही गौर करें, लगेगा जीवन का मर्म जैसे हमें कोई समझा रहा है। ऐसे ही 'अवधूता, गगन घटा गहराई रे...' और 'हिरना समझबूझ चरना' जैसे गाए निगुर्ण में स्वरों का अनूठा फक्कड़पन है। सुनते मन वैरागी हो उठता है। संसार का सारअसार जैसे समझ आने लगता है।

कुमार गंधर्व का गान लोकोन्मुखी है। लोक का उजास वहां है। स्वयं वह कहते भी थे, सारा शास्त्रीय संगीत 'धुन उगम' माने लोक संगीत से उपजा है।  मीरा, सूरदास के पद हो, ऋतु संगीत हो, ठुमरी, ठप्पा, तराना, होरी या फिर मालवा का लोकआलोक या फिर उनकी खुद की बंदिशे और स्वयं उनके बनाए रागों में प्रकृति की धुनें हममें जैसे बसती है।

युवाओं के लिए उनका आत्मविश्वास कम प्रेरणास्पद नहीं है।  यह उनकी गहन जीवटता ही थी कि छय रोग से बाधित एक फेफड़े के काम का नहीं रहने के बावजूद उन्होंने दमदार गायकी को नए अर्थ दिए। वह तब बीमारी से बिस्तर पर थे कि एक दिन कमरे में चिड़िया की तीखी स्वर फेंक सुनी। बस तभी तय किया, वह गाएंगे। स्वरसिद्ध करते उन्होंने सुनने वालों को गान की गहराई समझाई। श्वास उतारचढाव और शब्दों के मध्य के मौन का जो अर्थभरा संगीत उन्होंने बाद में दिया, वह उनका अपना सिरजा गानध्यान ही तो था!

कुमार गंधर्व मूलत: केरल के थे। 'कोडवू' गांव के। नाम था, शिवपुत्रय्या यानी कुमार। कर्नाटक आने के बाद वह जब सात ही वर्ष के थे तभी उनके गायन की धूम मच गयी। वहीं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ। कन्नड़ मानपत्र में उन्हें संबोधित करते सहज, मनोहर गायन के लिए 'चिन्ह (सुवर्ण) गंधर्व' पदवी दी गयी। और इस तरह शिवरूद्रय्या बाद के हमारे पंडित कुमार गंधर्व हो गए।

कुमार गंधर्व पर आरोप लगता रहा है, गायन में वह सिर्फ मध्यलय का ही विशेष प्रयोग करते रहे हैं। बकौल कुमार, 'सुरीली नादमयता का सुंदर प्रकटीकरण मध्यमलय से ही होता है।' पर यह भी तो सच है, मध्यमलय को वही निभा सकता है जो स्वरविन्यास में अनूठीअपूर्व कल्पना गान का स्थापत्य रचे। उसके महल खड़े करे।  कुमार ऐसे ही थे, स्वरों के गहनज्ञाता। एक दफा जयपुर में जौहरी राजमल सुराणा के यहां नक्काशीदार मीनाकारी के कंगनों का जोड़ा उन्होंने देखा और केदार राग की 'कंगनवा मोरा' बंदिश उन्हें याद आई। दु: भी हुआ कि अनमोल कंगनों की उस नजाकत को वह बसबंदिश में कभी ला नहीं सके। पर अलगअलग ऋतुओं में होने वाली बरखा की झड़ियों, ऋतुओं और प्रकृति धुनों के साथ देखे दृश्यों को उन्होंने बाद में जैसे स्वरसिद्ध कर लिया था। इसीलिए तो उनकी गायकी उपज सदा खिलीखिली हमें लुभाती है, लुभाती रहेगी।



Monday, April 3, 2023

इब्राहिम अल्का जी का नाट्यकर्म

 संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका "संगना" में ...

"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021 


"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021 


"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021 




Tuesday, March 28, 2023

भरतनाट्यम की नवीन दृष्टि


राजस्थान पत्रिका, 25 मार्च 2023
भरत मुनि के नाट्य शास्त्र को पढ़ेंगे तो पाएंगे नाटक संगीत और नृत्य के बगैर अपना पूर्ण रूप ग्रहण  नहीं करता है। अभिनव गुप्त ने नाट्यशास्त्र की जो व्याख्या की है, उसमें नृत्य को ' शोभा' कहा गया है। माने नाट्य का सौंदर्य नृत्य में है। यों शास्त्रीय नृत्य हमारे यहां बहुतेरे हैं परन्तु जिन ज्ञात शास्त्रीय नृत्यों की व्याख्या हमारे यहां उपलब्ध हैं, उनमें  भरतनाट्यम प्रमुख है। भरतनाट्यम का मूल है—भावम्, रागम् और तालम्। माने भ से भाव, र से राग, त से लयबद्ध ताल और नाट्यम का अर्थ है, नृत्य।  नंदिकेश्वर के लिखे अभिनय दर्पण में इस नृत्य से जुड़ी मुद्राओं, अंग संचालन, हाव—भावों के संबंध में बहुत सुंदर व्याख्या है। तमिलनाडु के मंदिरों में देवदासियों द्वारा विकसित इस नृत्य का एक दौर वह भी आया जब यह मूल रूप से लुप्त प्राय: हो रहा था तब ई. कृष्ण अय्यर और रुक्मिणि देवी अरुंडेल के प्रयासों से यह फिर से अपने नए रूप में वि​कसित हुआ।

इधर इस नृत्य को नए प्रयोगों के साथ जो कलाकार आगे बढ़ा रहे हैं उनमें संध्या पुरेचा का नाम प्रमुख है।  रीतिबद्ध मुद्राओं, लयबद्ध गति के साथ ही नृत्य में ताल का विरल ढंग से निर्वहन करती संध्या के नृत्य को देखते रुक्मिणी देवी खास तौर से याद आती हैं। जिस तरह से अरुंडेल ने इस नृत्य में परम्परा से चले आ रहे श्रृंगार के प्रभुत्व को तोड़कर भक्ति भावों के आलोक में इसे जीवंत किया और नृत्य के शिक्षाशास्त्र से इसे जोड़ा ठीक उसी प्रकार संध्या पुरेचा ने दूसरे शास्त्रीय नृत्यों का इसमें समावेश कर अपने तई एक नई नृत्य भंगिमा 'अक्षत नायिका' के जरिए प्रयोगधर्मिता में इसे पुर्ननवा किया है। रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने जिस तरह से रामायण की ‘भरतनाट्यम श्रृंखला’ के जरिए सुदूर देशों तक भारतीय संस्कृति का प्रसार किया ठीक वैसे ही संध्या पुरेचा ने सनातन धर्म की तीन प्रमुख शैव, वैष्णव और शाक्त धाराओं के मेल में भरनाट्यम को सर्वथा नवीन दृष्टि प्रदान की है। जयदेव कृत अष्टनायिका की उनकी प्रस्तुति हो या फिर शिव के तांडव, श्रृंगार और  रोद्र रूप से जुड़े भावों की व्यंजना, वह नृत्य में मनोहारी दृश्यों का जैसे अनुष्ठान करती है।  प्रस्तुति के लालित्य संग भंगिमाओं के प्राणवंत छंद में वह भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को भी जैसे अपने में समाहित करती हममें बसती है।

याद है, खजुराहो नृत्य समारोह में उनकी राग और ताल मालिका से सजी अर्धनारीश्वर, उमा महेश्वर स्त्रोत 'रूपम देहि, जयं देहि'का आस्वाद किया था। भगवान विष्णु के द्वारिकाधीश और विट्ठल स्वरूप को नृत्त भावों में उन्होंने जैसे हूबहू साकार ​किया थ। दुर्गा शप्तशती के अर्गला स्त्रोत में शक्ति उपासना की उनकी प्रस्तुति, ऐसे ही आठ नायिकाओं का नृत्य रूपान्तरण कभी न भुलाने वाला है। वह नृत्य करती है तो अंग—प्रत्यंग भी तरंगित हो उठता है। अंगो के लयपूर्ण छंद! भाव—भंगिमाओं का विरल विन्यास। वाद्यों के साथ लय में स्पन्दित उनके हाथ, पैर और पूरा शरीर। नृत्य नहीं गति का एक तरह से आख्यान। नृत्य क्या है? गति—स्थिति का सामंजस्य ही तो!

बिरजू महाराज ने कभी संवाद में कहा था, हम नृत्य थोड़े ना करते हैं। हम तो हवा में चित्र बनाते हैं जो बनते हैं और मिटते रहते हैं। ठीक ऐसे ही संध्या पुरेचा अपने नृत्य में भावों का विरल अंगहार सिरजती भांत—भांत की भंगिमाओं के चित्र जैसे आंखों में बसाती है।

संध्या पुरेचा भरतमुनि के नाट्यशास्त्र की भी मर्मज्ञ विदुषी हैं। राजस्थान ललित कला अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष और देश के ख्यातनाम सुरबहार वादक अश्विनी दलवी ने एक दफा कलाओं के अंत:संबंधों पर जयपुर में महती विमर्श की पहल की थी। तभी उनसे नाट्यशास्त्र, अभिनय दर्पण के आलोक में ढेर सारी बातें हुई थी। बाद में भोपाल में उनके साथ एक जूरी में नृत्य की शास्त्रीय और लोक परम्पराओं के साथ कला संस्थाओं की भूमिका पर संवाद हुआ था। सुखद है इस समय वह संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष की भूमिका में हैं। उम्मीद करते हैं, उनके कार्यकाल में संगीत, नृत्य और नाट्य के साथ ही कलाओं पर विमर्श से नई राहों का सूत्रपात होगा।

Saturday, March 11, 2023

इब्राहिम अल्काजी, श्रीराम लागू और गिरीश कार्नाड के रंग-अवदान पर विमर्श

पत्रिका, 11 मार्च 2023
भरतमुनि ने नाट्य को अपने स्वरूप से ही दृश्य कला माना है। ऐसी दृश्य कला जिसमें दूसरी सभी कलाओं का समावेश है। नाट्यशास्त्र में नाटक को ’सर्वशिल्प-प्रवर्तकम्’ कहा गया हैं। गौर करें, हमारे यहां कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा भी शिल्प है। आज जिस सीमित अर्थ में ’शिल्प’ शब्द को लिया जाता है, वह नहीं बल्कि संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु, चित्र आदि तमाम कलाएं तब शिल्प कही गयी है। एक महती बात यह भी है कि नाट्यशास्त्र में नाट्य कला को दूसरी कलाओं की साधना मानते हुए भी  स्वतंत्र कला कहा गया है।  शायद इसलिए कि इसमें प्रयोग की अनंत संभावनाएं हैं।

यह विडम्बना ही तो है कि प्रयोग की इस अनंत संभावना पक्ष में जिन्होंने परंपरा से चले आ रहे रंगकर्म  जड़त्व को तोड़ते नया कुछ किया है, उनके बारे में ढंग से कहीं कुछ विमर्श ही नहीं है। इस दृष्टि से संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका ’सगना’ का नवीन अंक संग्रहणीय है। इसमें इब्राहिम अल्काजी, श्रीराम लागू और गिरीश कार्नाड की मौलिक रंग-स्थापनाओं और चिंतन के आलोक में उनके व्यक्तित्व के अनछूए पहलू उभरकर सामने आए हैं। ' संगना' के इस अंक में देवेन्द्रराज अंकुर, जयदेव तनेजा, कमलाकर सोनटक्के, सुधा शिवपुरी, दलगोविंद रथ, गोविंद नामदेव, रानू मुखर्जी, शरद दत्त आदि के आलेखों, संस्मरणों में भारतीय रंगकर्म से जुड़ी शास्त्रीय और लोक परम्पराओं के अंतर्गत अल्काजी, श्रीराम लागू और गिरीश कर्नाड के नाट्यकर्म की अनायास ही विरल विवेचना सामने आई है। सुशील जैन और तेजस्वरूप त्रिवेदी ने संपादन  के अंतर्गत बगैर किसी वैयक्तिक आग्रह के  इन तीनों ही जनों के व्यक्तित्व संदर्भ में उनके कला अवदान की विश्लेषणात्मक सामग्री जतन कर जुटाई है।
अंक में इब्राहिम अल्काजी की रंगदृष्टि, मौलिक कल्पनाशीलता से जुड़ी यादें हैं और ढेर सारी वह बातें है जिनसे पता चलता है कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को विश्व का प्रमुख संस्थान बनाने का किस कदर जुनून उनमें समाया हुआ था। थिएटर की जीवंता के संदर्भ में उनका यह कहा हुआ भी यहां मथता है कि ' लंबे समय से स्थापित परंपराओं पर सवाल खड़े करना चाहिए,...हमे ंउन सामान्य सत्यों के खिलाफ खड़े होना चाहिए जो बहुत समय पहले ही अनुत्पादक और बंजर हो चुके हैं।' इसी तरह इब्राहिम अल्काजी ने एक स्थान पर अभिनय के ’प्रशिक्षण' या ’अनुशासन’ की बजाय अपने द्वारा ’नर्सिंग’ शब्द के उपयोग का खुलासा किया है, जिसमें माली की तरह शिक्षक नाजुक और सुकुमार पौधे के विकास में प्रवृत्त होता है।

नाट्य निर्देशक, अभिनेता श्रीराम लागू ने कभी जब ईश्वर को रिटायर कर देने की बात कही थी तो उनका बहुत विरोध हुआ था। उनके प्रगतिशील रंगकर्म अवदान के संदर्भ में  ’संगना’ के इस अंक में उनके इसी विचार की बढत है। इसके साथ ही उनका वह रंगकर्म चिंतन भी यहां है जिसमें अभिनेता को तत्वचिंतक और दार्शनिक होने पर जोर दिया गया है।  एक आलेख में शरीर के लचीलेपन में अभिनय की संभावनाओं पर भी उनकी महती दृष्टि उभर कर सामने आई है।

हम सभी जानते हैं कि गिरीश कर्नाड ने पुरा और लोक कथाओं के आशयों में ’ययाति’, ’हयवदन’, ’नागमंडल’, तुगलक’ जैसी महती नाट्यकृतियां हमें दी है। अंक में उनके नाट्य चिंतन की यह बात भी विमर्श के लिए उकसाती है कि नाट्य में किस्सागोई, प्रतीकों के जरिए नए रूपक रचने और अर्थ की उत्पति से जुड़ी प्रयोधर्मिता जरूरी है। कर्नाड द्वारा प्रकाश पुंजो से कहानी की बढ़त और नाटक में अर्थ की उत्पति के संदर्भ में उनके रंगकर्म पर अंक में महती जानकारियां, उनका साक्षात्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने पर दिया वक्तव्य उनके विचारों से हमारी निकटता कराता है।

बहरहाल, अव्वल तो कलाओं पर स्तरीय पत्रिकाएं ही नहीं है और जो हैं, वह  इस कदर सामान्य जानकारियां भरी होती है कि उनसे किसी मौलिक स्थापना की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इस दृष्टि से ’संगना’ का यह अंक अपने आप में खास है। इसलिए भी कि यहां इब्राहिम अल्काजी, श्रीराम लागू और गिरीश कर्नाड के विचार-उजास से पाठक रू-ब-रू होते हैं। 

Saturday, February 25, 2023

फागुण सुहाणो, सैर बीकाणो

     

राजस्थान पत्रिका, 25 फरवरी 2023

यह लिख रहा हूं और रंगों के त्योंहार होली की परंपरा के आलोक में एक मित्र द्वारा भेजे गये वीडियो का भी आस्वाद कर रहा हूं। अनुभूत हो रहा है, कस्बाई संस्कृति में रचे—बसे अपने शहर बीकानेर का अपनापा और बरसों पुरानी होली की सभी परंपराएं जैसे इसमें श्रव्य—दृश्य आधुनिकी में जीवंत हो उठी है। असल में शिवदत्त ओझा द्वारा लिखा यह 'फागुण सुहाणो, सैर बीकाणो' राजस्थानी गीत है जिसे अशोक बोहरा ने अपने स्वरों में पिरोया है। सांगीतिक दीठ से इसमें कोई खास लय, ताल नहीं है एक बंधी हुई टेर और आधुनिक डीजे की एकरसता के ढम—ढम में पूरा गीत है। पर लोक की लूंठी मिठास और आंचलिक शब्दों की विरल सौरम इसमें है। और इससे भी बड़ी बात यह है कि एक ऐतिहासिक शहर की बरसों पुरानी लोकनाट्य परम्पराओं, होली से जुड़ी उत्सवधर्मिता और जीवन को इसमें जैसे बहुत खूबसूरती से गूंथ दिया गया है। क्या ही अच्छा होऐसे ही हमारी युवा पीढ़ी लोक से जुड़ी हमारी परम्पराओं की आधुनिकी की संवाहक बनती रहे। इसी से बहुत कुछ हमारा जो लोप हो रहा है, वह बचा रहेगा।

कलाओं में परम्पराओं की बढ़त जरूरी है। जब तक नई पीढ़ी को उसकी रूचि, परिवेश में परम्परा के बीज नहीं मिलेंगे, वह उससे आखिर क्योंकर जुड़ेगी! मुझे लगता है, परम्परा संस्कृति से जुड़ी वह अनिवार्य दृष्टि है जिसमें चले आ रहे मूल्यों को स्वीकार करते हम आगे बढ़ते हैं। यह जो आगे बढ़ने की प्रक्रिया है,  वही प्रयोग और नवाचारों के रूप में मनुष्य का एक तरह से कला—अन्वेषण है। मूल बात है, परम्परा के रूप में जो कुछ विरासत का हमारे पास है उसकी गहरे से पहचान और फिर स्वीकार।

शास्त्रीय संगीत में पहले से चली आ रही रागों का संसार ही सब-कुछ है। राग वही हैं जो पहले से चले आ रहे हैं पर कलाकार उन रागों में सदा अपने आपको पुनर्नवा करते हैं। राग शास्वत हैं, उनके अपने अनुशासन हैं उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं करते हुए भी जो कलाकार समय के प्रवाह संग चलते पहले से बने राग में नवीनता का उत्स करता है, प्रयोगों से बढ़त करता है वही अपनी पृथक पहचान बना पाता है। इसी तरह लोक से जुड़ी बहुत सी परम्पराएं भले ही व्यक्त है, पर उसमें बहुत सारा अव्यक्त भी समाया होता है। जो कुछ किया गया है, उसमें बहुत सारा और करने की भी गुंजाईश बची होती है।

यह महज संयोग नहीं है कि जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में इन दिनों लगी 'सेवन सिस्टर्स' कला प्रदर्शनी भी मुझे परम्परा का पुनराविष्कार अनुभूत हुई । कोरोना में जीवन पर आए संकट, अनुभूतियों में पंख लगा उड़ता स्त्री—मन, तंत्र—मंत्र से जुड़ी हमारी विरासत की ध्यान परम्परा और सहज बतियाती मजदूर महिलाओं की बहुतेरी भाव—भंगिमाओं में जितना इस कला प्रदर्शनी में दृश्य संसार है, उतना ही रंग—रेखाओं, टैक्सचर में निहित और रेखाओं में रचा—बसा स्व—प्रतिष्ठ या कहूं अमूर्त आशय भी यहां समझ आ रहा था। मुझे लगा, कलाकार अर्पणा अनील, मीना बया, चेतना सुदामे, कृष्णा महावर, विपता कपाड़िया, कृति सक्सेना और सुप्रिया अम्बर ने परम्परा में मिले बीजों का कैनवस पर अपने—अपने ढंग से सर्वथा मौलिक दीठ से अंकुरण किया है। इन कलाकृतियों को देखते औचक गायतोण्डे, अमृता शेरगिल, ए.रामचन्द्रन, परमजीत सिंह, रजा आदि कलाकारों की भी याद आती रही। यही होता है। हर कलाकार अपने सिरजे में स्मृतियों के संसार और अनुभव की आंच से ही सदा नवीन होता है। मूल बात है, हम कहीं ठहरें नहीं। परम्परा की उर्वरता अनुभूत करते प्रयोग और नवाचारों से आगे बढ़ें।

Tuesday, February 21, 2023

सरोकार की रेखाएं

हिन्दी अकादमी, दिल्ली की मासिक पत्रिका 'इन्द्रप्रस्थ भारती' के नवीन अंक में...

व्यंग्य चित्रों के आलोक में आर.के.लक्ष्मण का यह संस्मरण—संवाद। नहीं लिखा जाता यह, गर आग्रह कर पत्रिका संपादक नीशा नीशांत जी लिखवा नहीं लेती। आभार!








अंतर्मन आलोक से जुड़ी कलाकृतियां


चित्र और मूर्तिकला मौन की भाषा है।

राजस्थान पत्रिका, 11 फरवरी, 2023

संवेदनाओं से रचा आकाश! अनुभूतियों के गान में वहां स्मृतियां झिलमिलाती है।

देशभर की कलादीर्घाओं में जाना होता है और कईं बार किसी एक कलाकृति को देखते घंटो बीत जाते हैं, फिर भी देखने से मन नहीं भरता।

पर इधर यह भी पाया है, मूर्त-अर्मूत में रंग-रेखाओं और रूपाकारों की हर ओर एकरसता है।

नये के नाम पर कुछ भी बनाने की होड़ भी इस कदर मच रही है कि विषय-वस्तु गौण हो रहे हैं।

इस दृष्टि से कुछ दिन पहले जयपुर स्थित आइसीए कलादीर्घा में राजस्थान के चौदह कलाकारों की कला प्रदर्शनी ’अनहद’ में मन जैसे मथा।...