ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, August 26, 2023

सहेजें लोक कलाओं का उजास

 कलाओं का आलोक सदा लोक चेतना से जुड़ा रहा है। सभ्यता के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता की जब भी बात होगी तो कलाओं के लोक स्वरूपों पर ही हमें विचारना होगा। लोक माने इंद्रियगोचर प्रत्यक्ष अनुभव। व्यष्टि की बजाय समष्टि। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है इनका वैविध्य। हरेक प्रांत की अपनी लोक कलाओं ने हमारी आधुनिक कलाओं को भी निंरतर समृद्ध और संपन्न किया है। 



राजस्थान पत्रिका, 26 अगस्त 2023


जे. स्वामीनाथन ने कभी आदिवासी और लोक कलाओं के संग्रहण का महती कार्य भोपाल में भारत भवन में रहते किया था। इसी संदर्भ में एक दफा वह एक सुदूर आदिवासी गावं गए तो उन्हें बहुत अचरज हुआ। ऐसे स्थान पर जहां शिक्षा की अलख कभी जगी नहीं थी, वहां आदिवासी कलाकार अपने सिरजे चित्रों में अक्षरों का प्रयोग कर रहे थे। लिपि के साथ सुंदर संसार उन्होंने अपनी कला में उकेरा था। पता चला, भोले आदिवासी कलाकारों ने यह देखा कि कोई अधिकारी, सरकारी कर्मचारी उनके यहां आता है और कागज पर लिखा कुछ देता है, लिखता है तो उससे उनको बहुत कुछ सरकारी योजनाओं का मिल जाता है। उन्हें लगा, यह जो लिखे हुए अक्षर हैं—चमत्कारी हैं। इनमें अद्भुत शक्ति है। बस उन्होंने इसे अपनी कला में संजो लिया। लोक से जुड़ी कलाएं ऐसे ही भांत—भांत रूपों मे हमें लुभाती है। उनके निहितार्थ में जाएंगे तो ऐसी और भी कहानियां चित्र सुनाते मिलेंगे।

 पर इधर बाजारवाद में लोक कलाएं अपने शुद्ध स्वरूपों में तेजी से लुप्त होती जा रही है। राजस्थान में जांगड़ा, सिंधु गायन या फिर मशक, अलगोजा, डेरू, भपंग आदि वादन और भील, मीणा, गरासियों के समूह गान हो या फिर जोगी, भाट, कामड़, सरगडी, भोपा आदि जातियों की कला परम्परा का शुद्ध स्वरूप अब ढूंढे से भी नहीं मिलता है। बहुत पहले लोक संस्कृति की एक शोध परियोजना पर काम करते गांव-गांव जाना हुआ था। तब "जांगड़ा" सुनने का संयोग पहली बार हुआ। ऐसे ही सिंधु देने की भी परंपरा इधर लुप्त हो रही है। सिंधु देना माने जोश जगाते टेर। खेतों में किसान मिलकर सिंधुड़ा देते रहे हैं। बहुत सा और भी  लोक का ऐसा है जो हमसे दूर हो रहा है।

याद है वर्षों पहले बीकानेर में वहीं पास के गांव के एक बुजुर्ग कलाकार को डेरू के साथ झूमते हुए भैरूंजी के हरजस सुने थे। और सुनने की चाह जगती रही। रात भर वह कलाकार डेरू पर झूमते हमें रस सिक्त करता रहा। इतने बरस हो गए, पर लोक का वह माधुर्य अभी भी ज़हन में बसा है। लोक ऐसे ही उजास देता है। वहां एकरसता नहीं है। 

हमारे देश में हर प्रांत की और हरेक समाज की अपनी लोक गायन और वादन परंपरा रही है। गान में आवाज लगाने की, उनके स्वर निभाव की अपनी रीत रही है। 

देश के हर प्रदेश के वाद्य यंत्र भी तो कितने बहुविध है! सुनेंगे तो पता चलेगा कितनी विविधता, भाव व्यंजना की दीठ इनमें है। महाराष्ट्र में सुंदरी का वादन होता है। यह शहनाई की छोटी बहन कही जाती है। पर इस लोक वाद्य के कलाकार भी अब गिनती के हैं। राजस्थान में डेरू, मशक, अलगोजा, भपंग कमायचा के वादक धीरे—धीरे लुप्त हो रहे हैं। पर भुले—भटके यदि इन्हें सुनने का अवसर मिले तो न गवांए। अतिसार में मशक और अल्गोजा बजते हुए ही कभी सुनें। मन अंतर के उजास से नहाएगा।



Saturday, August 19, 2023

'अमर उजाला', 19 अगस्त 2023
-"छायांकन कहन की दृश्य कला है। इसमें तकनीक ही महत्वपूर्ण नहीं है, छायाकार की छायांकन दीठ महती है। दृश्य को पकड़ते बहुतेरी बार छायाकार उस निःसंग को भी पकड़ता है जिसमें मौन भी बोलने लगता है और तब हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कह सकते, वह एक छायाचित्र कह देता है।... दादा साहब फाल्के कैमरे से सिरजी दुनिया के प्रति इतना अधिक जुनूनी थे कि उन्हें इसके लिए अपनी एक आंख तक गंवानी पड़ी थी। ‘द ग्रोथ ऑफ द प्लांट’ में क्षण—क्षण को उन्होंने कलात्मक ढंग से जिया है। फिल्मो में जो ‘स्पेशल इफेक्ट’ हम देखते हैं, वह उन्हीं की देन है। सत्यजित राय के साथ भी यही था, उन्होंने साधारण विषयों, दृश्य के भी सूक्ष्म ब्योरों के विरल कलात्मक रूप सिरजे हैं। प्रख्यात कलाकार रोरिक ने जो कलाकृतियां सिरजी है, उनमें हिमालय पर पड़ती सूर्य की लालिमा, धूप, छांव, अंधकार और प्रकाश से जुड़े दृश्यों का अद्भुत लोक रंग-रेखाओं में रचा है। इसी आलोक में रमते प्रस्तावित करता हूं, इस बार जब किसी कलात्मक छायाचित्र को देखें तो उसमें भी प्रकृति से जुड़े ऐसे ही मोहक छंदो की तलाश करें। बहुत कुछ नया, अभूतपूर्व आप पाएंगे ही।

कलाओं का छंद संस्कार

 

 राजस्थान पत्रिका, 12 अगस्त 2023
"छंद कलाओ का सहज गुण है।.. कालपरक रूपों में छंद संगीत, नृत्य काव्य आदि कलाओं में तो देशपरक में वह मूर्ति, चित्र आदि रूपों में स्वयमेव सधता है। 

संस्कृत वाङ्मय में लय को बताने के लिये छन्द शब्द का प्रयोग मिलता है। 

लय से ही कलाओं में रंजकता आती है। लय क्या है? काल का अनुभूत प्रवाह ही तो! जिस तरह काल की गति मंद-तीव्र होती है, लय का भी वैसा ही प्रवाह होता है। दुःख, विरह शांति, विश्रांति में काल की गति धीमी, विलम्बित और भय, डर आदि में तीव्र, द्रुत होती जाती है।

कलाओं की चर्चा संग छंद की बात आपसे यहां इसलिए की है कि उसके मूल में हम अपनी कला-अन्तर्दृष्टि की ओर अग्रसर हो सकें। 

हुआ बिल्कुल उलट है। हमने कलाओं में अपनी स्वयं की दृष्टि की बजाय पश्चिम की अवधारणाएं ओढ़ ली है।... 

पर पश्चिम हमें आज भी कलाओं में संकुचित अर्थ में देखता है। भारतीय संगीत का अध्ययन वहां ’एथ्नोम्यूजिकॉलोजी’ से कराया जाता है। ...

Saturday, July 29, 2023

भगवान शिव का कंठ मेघ

राजस्थान पत्रिका, 29 जुलाई 2023

सावन में घिर-घिर घटाएं बरसती है। बादलों से ढके आसमान का दृश्य और बरखा कला-मन को नया रचने को भी उकसाती है। मेघ माने जीमूत। वह जो जीवन-जल को अपने में बद्ध रखता है। माने बांधे रखता है। सूर्य, मेघ, पशु-पक्षी, मंद बहती हवाएं और आम जन जब एक स्वर में गुनगुनाने लगे, समझ लीजिए तभी धरती-धन अन्न उपजता है। ब्राह्मण ग्रंथों में इसीलिए कृषि ’सर्वदेवतामयी’ है। कालिदास ने मेघ को ’कामरूप’ कहा है। इच्छानुसार रूप धरने वाला। उसका सौंदर्य अवर्णनीय है। इसीलिए मेघ की एक उपमा भगवान शिव का कंठ भी है।

थेर गाथाओं में वर्षा की विरल रसानुभूतियां हैं। थेर माने ध्यानलीन भिक्षु। बुद्ध वहां शास्ता है। वह, जिसका मन बस में है। थेर गाथा असल में प्रकृति काव्य ही है। इसमें आता है, ’देव! तुम मन भर बरसो। देव! तुम पेट भर बरसो।’ हृदय से उपजती कविता में इसी तरह संगीत घुलता है। लय और ताल में हर कोई इसे अनुभूत कर सकता है। हमारे समूचे भक्ति काव्य को ही लें। वह राग तत्व में गुंथा है। रीति काव्य में छंद समाया है। कविता में बजते संगीत की इससे बड़ी और क्या गवाही होगी! भक्ति में राग की अनुभूति इसलिए होती है कि वहां अभिभूत होकर, सुध-बुध खोकर ईश्वर के प्रति अभ्यर्थना है। रीति काव्य में आए छंद स्वयमेव शब्द की अलंकृति है। प्रयास करेंगे और वर्णाडम्बर से जटिल बुनेंगे तो कविता में संगीत नहीं घुलेगा। मुझे लगता है, ध्वनि का माधुर्य कविता का ही नहीं भाषा का भी सहज गुण है। 

राजस्थानी कविताओं में भी ठौड़-ठौड़ राग-रस ऐसे ही समाया हुआ है। रेवतदान चारण की एक कविता है, ’बिरखा बिनणी’। इसमें आए शब्द देखें-’ठुमक-ठुमक पग धरती, नखरौ करती, हिवड़ौ हरती...छम-छम आवै बिरखा बिनणी।..’ नई बहु के ठुमक-ठुमक चलने, मन हर्षाने के साथ बरखा की छम-छम की इस व्यंजना में संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्र सभी तो समाए हैं! ऐसे ही वर्षा से जुड़ा बहुत प्यारा लोक गीत भी है, ’झिरमिर बरसै मेह’। सुनता इसे बचपन से ही रहा हूं पर इधर सावन में बार-बार यह सुन रहा हूं और कभी बिन बरसे मेह की बूंदो से इसी में नहा लेता हूं। कविता में सहज बरते शब्द ऐसे ही सौंदर्य बरसाते है। पर मरू-भूमि में बूंदे जब नहीं बरसती तो लोक ने ’मारण मारग मोकळा, मेह बिना मतमार।’ जैसी व्यंजना भी की है। माने हे, सांवरे! बहुत सारे और भी मार्ग हैं, वर्षा के बिना मत मार। अकाल से जूझते मनुष्य की पीड़ा का यह विरल गान है।

कविता में निहित शक्ति और उसका शिल्प ऐसे भाव ही तो है। इससे ही छंद-गति, ताल-लय में कविता अन्य कलाओं से जुड़ी अनुभूतियां कराती हैं। यह सच है, चित्रकला, संगीत, नृत्य, नाट्य के मेल से महती सिरजा जा सकता है पर यह स्वतः हो तभी ठीक है। प्रयास से कलाओं के अंतःसंबंध स्थापित करने या दर्शाने की चेष्टा सदा निर्थक होगी। कविता या कोई भी दूसरी कला हृदय से ही उपजती है। सुनाने के लिए, छपवाने के लिए वहां आग्रह होगा, तो कुछ सार्थक न होगा। यह तो बाद की स्थितियां हैं। कालिदास और भास की कविताएं दृश्य से साक्षात् है। शुद्ध राजस्थानी कविताएं भी प्रायः ऐसी ही है। एक छोटे से पट पर समर्थ चित्र जैसे कवि वहां आंक देता है। इन शब्दों पर भी गौर करें, ’उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र।’ बताईए, यहां भाषा बाधा बनी है! कविता में समाई कलाएं ही उत्सव को मनुष्य की जाति और आंनद को गोत्र बनाती है।


Saturday, July 15, 2023

संस्कृति की मौलिक स्थापनाओं से जुड़ा उजास

आदिवासी और लोक कलाओं पर हमारे यहां लिखा तो बहुत गया है परन्तु उनके जरिए मौलिक स्थापनाओं पर काम अभी भी गौण प्राय: है। यह समझने की बात है कि जो कुछ लोक—संस्कृति का है, उसे संकलित किया जाता है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। इससे भविष्य की नई दृष्टि की संभावनाओं पर कार्य यदि होता है तभी सार्थक कुछ हो सकता है। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद् द्वारा प्रकाशित पत्रिका 'चौमासा'  के प्रकाशित अंक और उसकी सामग्री आलोक देने वाली है।


राजस्थान पत्रिका, 15 जुलाई 2023


अव्वल तो कलाओं पर ढग की पत्रिकाएं ही नहीं है और जो हैं
, वह या तो अकादमिक बोझिलता से लदी है या फिर उनमें वही सामग्री अधिक है जो यत्र—तत्र—सर्वत्र है। पर 'चौमासा' इस दृष्टि से विरल है कि इसके हर अंक में भारतीय संस्कृति से जुड़ी सूक्ष्म सूझ को युगीन अर्थों में कला—संस्कृति मर्मज्ञ और इसके संपादक अशोक मिश्र ने मौलिक स्थापनाओं के साथ प्रस्तुत किया है। अरसा पहले इसका एक अंक 'मृत्यु' जैसे अछूते विषय पर प्रकाशित हुआ था। इस अंक में जीवन प्रवाह के अंतिम विश्राम से जुड़े संस्कारों, मान्यताओं के लोक—आलोक में 'मृत्यु' से जुड़ी संस्कृति का अनूठा संधान है। ऐसे ही घुमंतू समुदायों के कला—सौंदर्य, काल की भारतीय दृष्टि, बांस की जीवन सृष्टि,  प्रदक्षिणा से जुड़ी भारतीय परम्परा जैसे विषयों में जीवन से जुड़े रहस्यों का अनावरण है। अभी 'चौमासा'  का जो नया अंक आया है, वह भी भू—अलंकरण से जुड़ी हमारी लोक संस्कृति का उजास है। इस अंक के अपने सम्पादकीय में अशोक मिश्र लिखते हैं, 'भूमि का अलंकरण धरती के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के साथ मांगलिकता और अभ्यागत के स्वागत का आह्वान है।'  अपने लिखे के इस आलोक में ही उन्होंने​ भित्ति चित्रों के अनछूए पहलुओं से जुड़ी विरल सामग्री इसमें जुटाई है।

अशोक मिश्र के पास लोक परम्पराओं, विश्वास और मान्यताओं से जुड़े लूंठे सन्दर्भ और उनकी वैज्ञानिक व्याख्या है। अभी कुछ दिन पहले ही भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में उनके कक्ष में बैठे बातचीत चल रही थी कि उन्होंने गोत्र परम्परा से जुड़े कुछ सूत्र सौंपे। कहा, शिष्ट और लोक समुदाय में भारत की अपनी एक प्राकृतिक संतुलन की दृष्टि गोत्र का हमारा जो विचार है, उसमें समाया है। वनस्पति, जीव—जंतु, पवित्र स्थल और ज्ञान की हमारी समस्त धाराओं में मानव समुदाय के उद्भव का कारण निरूपित कर उनके संरक्षण एवं विकास का आग्रह गोत्र चिन्हों के रूप में है। जीव जंतु, वनस्पतियां और प्रकृति से जुड़ी हमारी धरोहर के भी अपने—अपने गोत्र हैं। मन में आया, हमारे यहां एक गोत्र में विवाह नहीं किया जाता है। गोत्र संरक्षण इसी से होता है। अशोक मिश्र इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि जातीय समुदायों के गोत्रों के अध्ययन आलोक में संस्कृति की इस विरासत पर कुछ नया प्रकाश में आए। मुझे लगता है,  संस्कृति से जुड़ी इस दृष्टि से ही भविष्य के कुछ मौलिक में रचा—बसा जा सकता है।

बहुत बार लगता है, यह समय मूल ज्ञान से च्युत लोगों का है। ऐसे दौर में लोक सस्कृति मर्मज्ञ, लाक कलाविद्, विशेषज्ञ जैसी संज्ञाओं से अपने को अलग रखते अशोक मिश्र को देखता हूं तो अचरज होता है। मेरी जानकारी में लोक से जुड़े किसी एक अछूते विषय पर हर बार आग्रह करके निंरतर उन्होंने लेखकों से 'चौमासा' के लिए लिखवाया है। इसी से यह पत्रिका फल—फूल रही है। कला—संस्कृति में ऐसे उजास की ही तो इस समय सवार्धिक जरूरत है!


Sunday, July 9, 2023

गंगा निहार

कल श्रावण का पहला सोमवारहै। पर मैं तो एक दिन पहले ही शिव को स्मरण करते हरिद्वार में गंगा स्नान कर लौट आया हूं। मन कह रहा है, ‘तीर्थ बड़ा केदार, मन का मोक्ष हरिद्वार।’ हरिद्वार मन का मोक्ष ही तो है! न जाता तो भी क्या फर्क पड़ता! पर मन कहां मानने वाला है। हम वही करते हैं, जो मन कहता है। प्रातः पहुंचते ही मां गंगा के दर्शन किए। असल में इस बार एक छोटे पर अच्छे, साफ सुथरे घाट किनारे के होटल "गंगा निहार" में रुकना हुआ। गंगा के बिलकुल समीप। रात्रि वहां सोया तो वेग में बहती गंगा को ही सुनता रहा। दूसरे दिन प्रातः अलसुबह जगा तो देखा, घाट पर नहाने वाले पहुंच गए थे। भोर विष्णु घाट पर गंगा में डुबकी लगाई। ठंडा-टीप पानी! एक बार तो कंपकपी छुड़ाने वाला पर जब डुबकी लग गई तो मां की गोद से निकलने का मन न करे। मां गंगा लाड-लडाती है। आप फिर उसमें सहज हो जाते हैं। गंगा माने लोकमातरः। हम सबकी माता। निर्बन्ध! तीव्रतम इसके वेग को कौन पहले सहता सो भगवान शिव ने जटाओं में धारण किया। और फिर गंगा बह निकली। शिव जटा से मुक्ति, जह्नु गंधा, विष्णु पद से छूटने का अर्थ ही है-बंधन मुक्ति। गंगा स्नान भी मुक्त करता है, जीवन की विषमताओं से।

हरिद्वार शिव तक पहुंचने का द्वार ही तो है! घाट पर स्नान में गंगा का तीव्र वेग इस कदर होता है कि सांकल न पकड़ी हो तो व्यक्ति बह जाए। बारिश होने पर दूर पहाड़ों से बहती चली आने वाली गंगा बहुत सारी मिट्टी भी अपने संग बहा ले आती है। हरिद्वार में घाटों के पास गंगा का वेग बहुत प्रचण्ड होता है। इसलिए कि यहां वह कृत्रिम रूप से लायी धारा है।
पर प्रचण्ड या कम वेग में बहती नदी की यात्रा का ध्येय है सागर में समाना। और गंगा तो भागीरथी के रूप में सगर के साठ हजार पुत्रों की ही उद्वारक नहीं, हम सबकी भी मोक्षदायिनी है। तर्पणी! सप्तपुरियों में से एक हरिद्वार में ही यह पहाड़ों की गोद से उतरती है। हरिद्वार इसीलिए ‘गंगद्वार’ भी है! यूं हरिद्वार न भी कहें, हरद्वार से काम चल सकता है। हरद्वार में अपनापा है। आत्मीयता का भाव है। ...गंगा के मिले अपनापे को अंवेरते जयपुर लौट आया हूं। पर वह जो प्रातः काल विष्णु घाट पर किया स्नान है, मन उसमें ही नहा रहा है।
—राजेश कुमार व्यास
छायाचित्र—राजेश

Monday, July 3, 2023

अनुभवातीत भव्यता लिए रोबिन डेविड के मूर्तिशिल्प

राजस्थान पत्रिका, 1 जुलाई 2023

कलाओं के मर्म में जाएंगे तो एक रोचक तथ्य यह भी पाएंगे कि मूर्तिकला के जरिए इतिहास का संधान तो हमारे यहां हुआ है पर मूर्तिकारों पर कलम प्रायः मौन ही रही है। मूर्तिकला असल में हमारे यहां नृत्य के सर्वाधिक निकट रही है। जब कोई नर्तक मूर्ति की भांति परिमाप, परिप्रेक्ष्य और गति में संतुलन साधता है, हम कह उठते हैं, ’अद्भुत’! यह जो सराहने की व्यंजना है, असल में वही सौंदर्य का उत्कर्ष है। भांत-भांत के मूर्ति-रूपों पर जाएंगे तो पाएंगे समभंग, अभंग, त्रिभंग और अतिभंग की संरचना वहां है। भावानुकूल मुद्राओं का सौंदर्य संसार लिए। यही गति और संतुलन की साधना है। पर इधर मूर्तिकला में देषभर में जो सिरजा जा रहा है, उसे देखकर लगता है, सादृष्य के नाम पर भदेस और आधुनिकता की आड़ में अर्थहीन भी बहुत सारा रचाजा रहा है।

ऐसे दौर में रोबिन डेविड की मूर्तियां उम्मीद जगाती है। रोबिन भोपाल के हैं। देश-विदेश   में विशाल मूर्तिकला शिविरों के जरिए उन्होंने मूर्तिशिल्प  की भारतीय परम्परा को एक तरह से पुनर्नवा किया है। रोबिन की मूर्तियां अपनी विशिष्ट व्यंजकता मंे ही नहीं परिप्रेक्ष्य, परिमाप और गति-संतुलन में सौंदर्य की सृष्टि करती है। दिल्ली में यमुना नदी के पास बारापुला के उजाड़ स्थान पर बैंग्लोर की संस्था अ-फोरेस्ट द्वारा विकसित जंगल में उन्होंने कुछ समय पहले बड़ी-बड़ी मार्बल षिलाओं को तराष कर मूर्तियों का संुदर भव निर्मित किया है। चंडीगढ के रोज गार्डन में ली कार्बूजियर की स्मृति को समर्पित उनकी प्रतिमा, ग्वालियर में ’एक पत्थर की बावड़ी’ और देष-विदेष में ’द कॉलेजियम’, ‘इवोल्यूसन ऑफ द आर्क’, ‘फॉलोवर’, ‘कल्पतरू जैसे उनके मूर्तिषिल्प प्राचीन भारतीय स्थापत्य सौंदर्य के सर्वरूपों में आधुनिकता को भी समय-संदर्भों के साथ समाहित किए है। इमारतों, स्थानों और यहां तक कि संगीत के वाद्य यंत्रों के भी प्रतिमानित सौंदर्य को उन्होंने अपने सिरजे से एक तरह से पुर्नव्याख्यायित किया है।

उनकी मूर्तियों में मीनार, सीढ़ियों, बावड़ियों, प्राचीन नाटकों के प्रेक्षागृहों सरीखी आकृतियों का जीवंत परिवेश भी अलग से लुभाता है। यह ऐसा है जिसे भले ही ठीक से हम पूर्व में देखे की किसी परिभाषा में व्यक्त नहीं कर सकते परन्तु अचानक हम जाने-पहचाने के बोध मे उनसे हम रमते हैें। मुझे लगता है, तमाम उनका शिल्प इमारतों, प्राचीन स्थापत्य के बाह्य ही नहीं आंतरिक लोक में भी हमें प्रवेश कराता है। काले, लाल, पीले, श्वेत पत्थरों के साथ ही बहुत से रंगों की आभा की रंग-लहरियों का आस्वाद भी उनके सिरजे षिल्प में होता है। इधर टूकड़ों-टूकड़ों में और कुछ समय पहले भोपाल में कोई तीन-चार दिन तक निरंतर रोबिन डेविड से संवाद हुआ। इसी से बहुत कुछ महत्वपूर्ण पा सका। पता चला, देषभर में वह अपने सृजन के लिए अनुकूल पाषाणों की तलाष में भी निरंतर भटकते रहे हैं। कभी इसी तलाष में वह मकराना पहुंच वहीं बस गए थे। बरसों वह मकराना में रहे और यहीं ’होमेज टू ताजमहल’ जैसी सुंदर मूर्ति शृंखला रची। पर बाद में यहां से भोपाल लौट गए। 

भांत-भांत के पत्थरों, चट्टानों को अपनी कला के लिए प्रयुक्त करते वह पत्थर को इतना घना तराषते हैं कि उसके खुरदुरेपन में पत्थर का मूल रंग उभरकर सामने आ जाता है। उन्होंने मार्बल ही नहीं मिट्टी, धातु, लकड़ी आदि के साथ ही कांच में भी मार्बल की ही तरह कलाकृतियां सिरजने के अनूठे सफल-असफल प्रयोग भी निरंतर किए हैं। कांच में कलाकृतियां सिरजने वह कोई एक साल फिरोजाबाद भी रहे। यह सच है, रोबिन का तमाम सिरजा मूर्तिशिल्प भारतीय परम्परा में आधुनिक बोध लिए अनुभवातीत भव्यता लिए है। 


 


Wednesday, June 28, 2023

ऑंख भर उमंग’ की समीक्षा

प्रकाशन विभाग की पत्रिका ’आजकल’ के जुलाई 2023 अंक में यात्रा संस्मरण ’ऑंख भर उमंग’ की समीक्षा संस्कृतिकर्मी, आलोचक मंजरी सिन्हा जी ने की है...




Saturday, June 17, 2023

असाध्य की साधना है कला

कलाओं की समझ कैसे हो, इस पर सदा ही सवाल उठते रहे हैं। पिकासो ने कभी प्रश्न किया था कि कला को क्यों समझें? मूल अर्थ में ही यहां जवाब भी है। कलाएं समझाई नहीं जा सकती। वह तो ध्यान से ही सुनी-गुनी जा सकती है। मुझे लगंता है, किसी कलाकृति में जितनी कम चतुराई होगी, उतनी ही वह संप्रेषणीय होगी। कहानी है, राजा की सभा में उस्ताद गा रहे थे। गान पूर्ण हुआ तो सब 'वाह’, ’वाह’ कर उठे। उस्ताद संतुष्ट न हुए। बोले, संगीत से निपट अनजान भी ऐसे ही प्रशंसा करे तो मानूं। राजा ने संगीत की समझ नहीं रखने वाले एक गड़रिये को उस्ताद का गान सुनने बिठा दिया। गान पूर्ण हुआ तो उससे पूछा गया, 'कैसा लगा उस्तादजी का गाना?’ वह बोला, 'गाना तो कुछ समझ न पड़ा। पर इच्छा हो रही है कि सुनता ही रहूं।’ यह जो ’सुनता ही रहूं’ व्यंजना है, वही असल में कला और उसकी सार्थकता है।

राजस्थान पत्रिका, 17 जून 2023

सोचिए! कलादीर्घाएं पहले से कईं गुना बढ़ गयी है। संगीत, नाट्य, नृत्य प्रस्तुतियों का विस्तार भी कम नहीं हुआ है पर इस अनुपात में क्या कला रसिक समाज बना है? कला मर्मज्ञ का खि़ताब तो कोई संगीत, चित्रकला, वास्तु, नृत्य, नाट्य के इतिहास और थोड़ी-बहुत इनसे जुड़ी जानकारी से भी ले सकता है। परन्तु मन का क्या? मन तो रंजित तभी होता है जब कला अंतर को आलोकित करे। अज्ञेय की लम्बी कविता है, 'असाध्य वीणा।' कविता से जुड़ी कथा कुछ इस तरह से है कि राजदरबार में एक वीणा है, जिसे कोई साध नहीं सका। एक रोज़ दरबार में केशकम्बली प्रियवंद आता है। वह वीणा को गोद में ले बैठ जाता है। ध्यानमग्न हो अपने आपको भी भूल जाता है। वीणा जिस वृक्ष से बनी, उसकी डाली-डाली, उस पर बैठने वाले पक्षियों, उसकी पत्तियों पर हुई वर्षा-बूंदों की झम-झम। घनी रात में महूए के टपकने, वहां से गुजरने वाले हाथियों और जंगल के संपूर्ण परिवेश से एकाकार होते वह वीणा के मूल में, उसके बजने की अभ्यर्थना में अपने आपको तिरोहित कर देता है। औचक उसकी कांपती उंगलियों से वीणा गा उठती है। स्वरों का वह माधुर्य सबको अपनी-अपनी दीठ में सौंदर्य प्रदान करता सुहाता है। असाध्य की यही साधना है।

हमारे यहां चित्रकलाओं का संसार ऐसे ही गुना-बुना गया है। ऐलोरा में एक बहुत सुंदर मूर्ति है। इसमें रावण कैलास को उठाने के प्रयास में है।  शिव अविचल समाधिस्थ बैठे हैं। पार्वती भयभीत हैं और उसकी सखियां इधर-उधर भाग रही है। मूर्तिकार ने वाल्मीकि रामायण से यह प्रसंग लिया है। कुबेर की लंका और पुष्पक विमान छीनकर रावण यमराज को भी हराकर लौट रहा है। कैलास के पास विमान डगमगाता है। रावण क्रोधित हो कैलास को हटाने का प्रयास करता है। शिव अंगूठे से कैलास को स्थिर करते हैं और फिर जब रावण का हाथ दब जाता है तो वह ’रव’ यानी हृदय-विदारक चीत्कार करता है। इसी से वह रावण कहा जाता है। इस कहानी को मूर्तिकार ने मूर्ति में इस कदर घोला है कि देखते मन नहीं थकता। हमारे यहां इतिहास भी इसी तरह कला में रूपायित हुआ है। शोध करेंगे तो और भी बहुत महत्वपूर्ण मिलेगा। भारतीय लघु चित्र-शैलियों को ही लें। चटख रंग वहां है। घनीभूत। बहुत सारे अलंकण और ढेर सारी कथाएं गूंथी हुई, पर देखेंगे तो पाएंगे उनका लदा देखने में निहित कोई बोझ वहां नहीं है। इसलिए कि कलाकार उन्हें उकेरते, वहां रंग बरतते कथा के भाव-लोक में रम गया है। बहुत बड़ी कथा को छोटे से चित्र में साधना सरल कहां है! फिर से कहूं, असाध्य की यही तो साधना है!

Saturday, June 3, 2023

ध्रुवपद-धमार में जीवंत होता है तमाशा


भरतमुनि का नाट्यशास्त्र संहिता है। कहें, सभी कलाओं का एक तरह से एकत्र ज्ञान वहां है। इसमें एक स्थान पर आता है कि जो कला शास्त्र में नहीं है, उसे लोक में खोजा जाए। लोक नाट्य की चर्चा वहां लोकधर्मी नाट्य के रूप में हुई है। लोकनाट्य का अर्थ ही है, वह जो लोक स्वभाव को प्रदर्शित करे। बगैर किसी दिखावे के जहां सामान्यजन की क्रियाओं और व्यवहार को सहज प्रदर्शित किया जाए। रम्मत, ख्याल, गवरी, नौटंकी आदि ऐसे ही लोकनाट्य हैं, जिनमें लोक का आलोक है। यूं जयपुर तमाशा भी लोकनाट्य ही है पर इसमें कोई एक नहीं बहुत सारी और कलाओं का भी अनूठा घोल मिला हुआ है। मुझे लगता है, लोक में शास्त्रीयता की सुगंध कहीं है तो वह जयपुर तमाशा में है।

प्रायः इसे महाराष्ट्र में होने वाले तमाशा से जोड़कर देखा और इसी संदर्भ में इस पर लिखा जाता रहा है। पर कुछ दिन पहले इसके अप्रतिम कलाकार वासुदेव भट्ट से दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम ’संवाद’ में जब चर्चा हो रही तो लगा, यह लोकनाट्य भर नहीं है, युगीन संदर्भों से जुड़ा लोकानुरंजन है। इसके जनक बंशीधर भट्ट रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी उनके परिवार ने ही बाद में इसे पोषित किया और इसमें बाकायदा शास्त्रीयता का रस घोलते बढ़त की। फूलजी भट्ट, गोपीजी के बाद वासुदेव भट्ट और दिलीप भट्ट अभी भी इसे जीवंत किए हुए हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के साथ अभिनय का अपूर्व संगम इसमें होता है। 

राजस्थान पत्रिका, 3 जून 2023


तमाशा खुले में होता है। जहां होता है, वह स्थान अखाड़ा कहलाता है। कलाकार पौराणिक कथाओं, लोकाख्यानों के साथ आधुनिक संदर्भों को भी अपने तई तमाशों में गुनते-बुनते हैं। पर जब वह  घुंघरू बंधे पैरों के साथ थिरकते हैं और सुर-ताल के साथ संवाद अदायगी करते हैं तो देखने वाले भी उसमें सम्मिलित हो कलाकार बन जाते हैं। लयात्मक संवादों में ’रांझा-हीर’ ’लैला-मजनू’, ’जोगी-जोगन आदि पारम्परिक तमाशों के साथ ही आधुनिक संदर्भों को भी लोकनाट्य की इस विधा में निरंतर गुना-बुना गया है। वासुदेव भट्ट ने इधर तमाशा में कुछ विरल प्रयोग किए हैं। बंशीधर भट्ट के समय से किए जा रहे तमाशा में मुख्य भूमिका तो उन्होंने निभाई ही है, स्वयं भी ’गोविंद भक्त’, ’इक्कीसवी संदी’, ’बंदर का ब्याह’, ’उद्धव प्रसंग’ जैसे नए तमाशा लिख-खेलकर उन्होंने लोकनाट्य की इस परम्परा को नए समय-संदर्भ दिए हैं। वह इस दौर के बेहतरीन रंगमंच कलाकार भी हैं।

याद है, अर्सा पहले गोपीजी का तमाशा देखा था। इधर फिर से वासुदेव भट् का और कुछ वर्ष पहले दिलीप भट्ट का किया तमाशा देखने का सुयोग हुआ। भगवान शिव से जुड़े किसी प्रसंग के कथानक में और भी दूसरे प्रसंगों संग भले ही पौराणिक और प्रेमाख्यानों में वह गूंथे लगे पर जिस तरह से सम-सामयिक घटनाओं, समाचारों को उनमें यह कलाकार जोड़ते हैं, लगता है तमाशा पुरानी परम्पराओं से जुड़ी कला होते हुए भी युगीन संदर्भों की अनूठी रस-व्यंजना हैं। 

यह सच है, जयपुर तमाशा के अपने तेवर, अपनी भंगिमा हैं। इसमें महाराष्ट्र में होने वाले तमाशा की लावणी की बजाय सूफी और निर्गूण गान का भी अनूठा आलोक है। ध्रुवपद-धमार और अन्य शास्त्रीय रागों संग कलाकार  घुंघरूओं के नाद में जब कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहता है तो इसमें कथक भी कहीं घुला प्रतीत होता है। कभी जयपुर में होली, चैत्र-अमावस्या, शीतलाष्टमी आदि पर एक वर्ष में कोई 51 तमाशे होते थे। पर अब वह बात कहां! आधुनिकता के इस दौर ने लोकानुरंजन से जुड़ी उस विधा से हमारा नाता तोड़ा है जिसमें कोई एक कला नहीं बहुत सारी कलाओं का माधुर्य ही नहीं लोक कलाओं संग शास्त्रीयता का सौंदर्य भी घुला हुआ है।