ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Tuesday, January 18, 2022

यायावरी तीन छंद-कश्मीर से कन्याकुमारी, नर्मदे हर और आँख भर उमंग

राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका 'मधुमती' के जनवरी 2022 अंक में यात्रा वृतान्त 'कश्मीर से कन्याकुमारी', 'नर्मदे हर' और 'आँख भर उमंग' के आलोक में यह शोधपूर्ण आलेख सुधि समालोचक श्री कृष्णबिहारी पाठक ने लिखा है।

....सुखद लगता है, जब आपके लिखे की कूंत होती है...
















Saturday, January 15, 2022

‘देखने’ से बनता कलाओं का संसार

कलाओं की वैदिक कालीन संज्ञा हमारे यहां शिल्प है। शिल्प माने संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु, चित्र आदि सभी कलाएं। पर विचार करता हूं, इन सभी कलाओं का मूल आधार ‘देखना’ है। राजा रवि वर्मा भोर में उठते। यह वह समय होता जब अंधकार विदा ले रहा होता और भोर का उजाला छा रहा होता था। कहते हैं, रवि वर्मा ने प्रकृति के उन रंगो को ही अपनी कलाकृतियों में सदा के लिए अंवेर लिया। इटली की मूर्तिकार एलिस बोनर ने ज्यूरिख में नृत्य सम्राट उदय शंकर का नृत्य देखा और बस देखती ही रह गयी। उनकी कला में रमते फिर वह भारत आकर यहां की कलाओं में ही रच—बस जाती है।

याद है, जयपुर के रविंद्र मंच पर कुछ वर्ष पहले पणिक्कर नाट्य समारोह हुआ था। पणिक्कर जी ने तब कहा था, ‘मेरे नाटकों को मन से देखें।' उनका कहा तब समझ नहीं आया था पर एक रोज़ उनका ‘कर्णभार’ नाटक देखा तो इसे जैसे गहरे से अनुभूत किया। पणिक्कर जी के साथ ही तब मंच के करीब बैठा हुआ था। घटोत्कच की भूमिका कर रहे अभिनेता ने पहाड़ उठाने का अभिनय किया। घटोत्कच की भार उठाती मुद्राएं देख एकबारगी तो सिहर उठा। अनुभूत हुआ, कहीं किसी चूक से पहाड़ हम पर न गिर जाए! जबकि असल में वहां पहाड़ था ही नहीं बस उसे उठाने का अभिनय भर था। तभी यह समझ आया कि बड़ा सत्य वह नहीं होता जो दिख रहा होता है, वह होता है जो दिखने के बाद मन में घट रहा होता है। सच्ची कलाएं यही कराती है। आपको उस स्थान पर ले जाती है, जहां आप पहले कभी नहीं गए हों। उस अनुभूति से साक्षात् कराती है जो पहले आपने कभी न की हो। मुझे लगता है, कलाएं इसी तरह देखने का अपना समय गढ़ती है।

राजस्थान पत्रिका, 15 जनवरी, 2022

हरेक कला में छंद, गति, विराम और लय का अपना गुणधर्म होता है। कालिदास के ‘मेघदूत’ को पढेंगे तो लगेगा पृथ्वी की विस्तारमयी छटाओं का विरल लोक जैसे उन्होंने सिरजा है। यह उनका उर्ध्व-आकाशीय देखना ही तो है जिसमें गतिमयता के सूक्ष्म बिम्ब उद्घाटित हुए हैं। अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ को याद करें। राजदरबार में वज्रकीर्ति निर्मित वीणा को कोई कलावंत बजा नहीं सका। आखिरकार प्रियंवद आता है और वीणा को गोद में लेकर बैठ जाता है। आंखे मूंद कर वह देखना प्रारम्भ करता है। वृक्ष से वीणा के बनने, वन्य प्राणियों के वहां से गुजरने, सांझ केे तारों की तरल कंपकंपी के स्पर्शहीन झरने आदि के कितने-कितने दृश्य प्रियंवद समाधिस्थ देख लेता है। और फिर जब औचक वीणा से संगीत झरता है तो राजदरबार में बैठा हर सुनने वाला अपनी भावनाओं के अनुरूप उसे मन में देखने लगता है। कलाएं इसी तरह बाहर से व्यक्ति को भीतर से देखने के लिए प्रेरित करती है। बौद्ध दर्शन में यही प्रक्रिया ‘तथता’ है। देखकर ही तो अंतर्मन सच को पाया जा सकता है।

इसीलिए कहता हूं, अनुभूत किए को लिखे गए शब्दों में, उकेरे किसी चित्र में, संगीत के सुरों में यदि मन के किसी दृष्य में उद्घाटित करने की क्षमता नहीं होगी तो वहां कला भी नहीं होगी। चिड़िया गाती है तो उसका कलरव हमें सुहाता है पर यह कला नहीं है। जब अनेक स्वरों में विशेष सांमजस्यपूर्ण ढंग से मन की आंखो से देखते किसी छंद में गूंथ उसे रागिनी में सिरज दिया जाता है, वह कला हो जाएगी। प्रकृति की धुनों को सुनने भर से नहीं, देखने से कला का भव बनता है। स्वाति मुनि ने जलाशय में खिले कमल के पत्तों पर वर्षा की बूंदो के गिरने को देखा। अनुभूत किया कि भिन्न भिन्न प्रकार के बड़े, मध्यम, छोटे पत्तोें पर गिरने वाली वर्षा बूंदों के स्वर गंभीर, मधुर, हृदयस्पर्षी आदि अलग-अलग ध्वनियां में है। उन्होंने इन्हें मन में गुना और मृदंग और अन्य वाद्यों का आविष्कार हो गया। देखे को मन में गुनते ऐसे ही तो सिरजा जाता है, कलाओं का संसार!

Thursday, January 6, 2022

यादों में—कमलेश्वर


आज कमलेश्वर जयंती है। उनका सान्निध्य सदा ही संपन्न करता था। हिन्दी साहित्य के वह हरफनमौला व्यक्तित्व थे। कोई विषय, साहित्य की कोई विधा ऐसी नहीं जो उनके लिखे से अछूती रही हो। बात में बात और कहानी में कहानी। लगातार सिगरेट पीते वह बोलते तो शब्द शब्द ज़हन में उतरते। कहीं कोई शिकवे—शिकायत भी हो तो सुनने वाला भुल जाए। उनसे जीवन जीने के मंत्र भी बहुत मिले। स्नेह इतना पाया कि उसका बेजा इस्तेमाल करते उनसे प्राय: बहस भी कर उलझ भी लेता था। पर वह कभी बुरा नहीं मानते थे  बल्कि उन्होंने दूरदर्शन के लिए लिखने के अवसर भी दिलाए। हां, मिठी झिड़कियां भी तो कहां भूलता हूं! याद है, तब संगीतकारों, गीतकारों, गायक—गायिकाओं से हुए संवाद आधारित किस्सों से जुड़ा अपना साप्ताहिक कॉलम 'सरगम' लिख रहा था। राजस्थान पत्रिका में हर शनिवार पांच—छह साल लगातार इसे लिखा था। पर प्रकाशित कॉलम में पूरा नाम नहीं जाकर केवल '—राजेश' लिखा होता था। कमलेश्वर जी ने एक बार ऐसे लिखे साप्ताहिक कॉलम जब देखे तो उन्हें वह बहुत पंसद आए। त्वरित उन्होंने प्रश्न किया? 'कॉलम' में तुम अपना पूरा नाम क्यों नहीं देते हो? कुछ कहता इससे पहले ही जैसे उन्होंने मन के भीतर झांक लिया था।  डांटते हुए जैसे सीख दी,  'यार, तुम हिन्दी लेखक फिल्मों से अवैध रिश्ता तो रखना चाहते हो, वैध रिश्ता रखने में डरते हो। यह क्या बात हुई! जब लिखते हो तो पूरा नाम जाना चाहिए।' उनके कहे को तभी गांठ बांध लिया और बाद में जो भी​ फिल्मों पर लिखा पूरे नाम से ही लिखा। 

कमलेश्वर के साथ लेखक

बहरहाल, उनके सान्निध्य को पहले पहल राजस्थानी में एक संस्मरण में अंवेरा था। वह तब राजस्थानी भाषा की पत्रिका 'जागती जोत' में प्रकाशित हुआ। इसे जब उन्हें भेजा तो उन्हें बहुत पंसद आया। त्वरित इस पर पत्र लिख उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी। राजस्थानी भाषा पर उनका लिखा यह पत्र आज ऐतिहासिक धरोहर रूप में मेरे पास संग्रहित है। इसे आप सबसे यहां पहले भी साझा किया था, आज फिर प्रसंगवश कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था, 'हिन्दी भाषा नहीं, भाषा मंडल है और इसे राजस्थानी, ब्रज, सौरसेनी ने अपने रक्त से सींचा है...।'

जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में था, बाकायदा उन्होंने अपने साथ एक पत्र में फीचर संपादक बतौर कार्य करने के लिए भी बुलाया था। पर जब पता चला कि लोकसेवा आयोग की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका हूं, उन्होंने खुद ही धैर्य रखने और सरकारी सेवा में ही जाने की सीख दी थी। पर सरकारी सेवा में आने के बाद जब लिखना—पढ़ना छूट गया और आंतरिक घुटन महसूस हुई तो उसे छोड़ने का मन बना लिया। उन्हें पता चला तो तुरंत उनका मार्मिक पत्र मिला। उनका वह पत्र अभी भी संभाल कर रखा है। शब्द शब्द स्मृति में बसा। उन्होंने लिखा, 'राजेश, तुम नौकरी को जिओ। मैंने अपने दुर्दिनों में ब्रुकबॉण्ड कंपनी में रातपाली की चौकीदारी की है और रात के सन्नाटे में कूत्तों के सान्निध्य में सोया हूं। पर तब भी जो काम किया, मन से उसे जिया। रचना इसी से जन्म लेती है, एक वैध संतान के रूप में। अब यह तुम्हे तय करना है कि तुम वैध संतान चाहते हो कि अवैध संतान चाहते हो?' उनके इस पत्र ने इस कदर प्रेरणा दी दी कि नौकरी को फिर मन से जीने लगा। बल्कि कहूं आज आज भी जी रहा हूं। उसे जीते ही अवकाश के समय में लिखना—पढ़ना होता है। सुकून देता हुआ।



बहरहाल, उन्हें जब पहला कविता संग्रह 'झरने लगते हैं शब्द' भेजा तो उन्होंने इस पर भी बहुत सुंदर टिप्पणी लिखकर भेजी। लिखा कि तुम्हारी फलां, फलां कविताएं बहुत ही उम्दा है—नई जमीन लिए। लिखो—लिखो और इस दारूण समय को जिओ!...पर साथ में झिड़का भी था, 'भूमिका में दिए बड़े वक्तव्यों से बचो! तुम अभी इस काबिल नहीं हुए हो कि रचना की धारा को बदल सको। रचना विनम्रता की बड़ी शर्त है।'

बहरहाल, उनसे ही यह भी सीख भी मिली कि किसी भी माध्यम के लिए लेखक के लिए कोई भी विषय परहेज लिए नहीं होना चाहिए।  मौलिकता लिखे में होगी तो हर विषय में आपका अपना अंदाज दिखेगा ही!  बहुत सारी बातें, बहुत सी यादें उनके सान्निध्य की, पत्रों की है। 

...यह सच है, साहित्य में वह सर्वथा जुदा, विरल व्यक्तित्व थे। अथाह प्यार देने वाले। वह सच में बड़े थे। संवेदना से लबरेज। अपनत्व भरे। ...उन्हें ऐसे ही याद करते यह सब आप मित्रों के लिए लिख गया हूं। जयंती पर नमन!

Tuesday, January 4, 2022

यात्रा वृतान्त "आंख भर उमंग" की समीक्षा

आज दैनिक नवज्योति में सुधि आलोचक प्रो. अखिलेश कुमार शंखधर जी ने लिखी है यात्रा वृतान्त "आंख भर उमंग" की यह समीक्षा। आभार!

दैनिक नवज्योति, 4 जनवरी, 2022



विशाल शब्दकोश, समृद्ध संस्कृति के बावजूद मान्यता न मिलने का अभिशाप

राजस्थानी में विशाल शब्दकोश है, समृद्ध संस्कृति है फिर भी संवैधानिक रूप में यह भाषा अभी भी न बोल पाने का अभिशाप झेल रही है। इस अभिशप्त समय में पिछले दिनों जब राजस्थानी भाषा के ऑनलाइन शब्दकोश का लोकार्पण हुआ तो लगा, अपने आप में कोई अभूतपूर्व, अलौकिक घटा है।भाषा के भविष्य को कुछ हद तक आश्वस्त करता हुआ। अभूतपूर्व शब्द यहां इसलिए प्रयोग कर रहा हूं कि देश की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी यह ऐसी भाषा के ऑनलाइन शब्दों की वैश्विक सहज उपलब्धता है, जिसमें नौंवी शताब्दी में ही लिखा साहित्य उपलब्ध होता आ रहा है।

यह महज संयोग नहीं है कि अप्रतीम भाषाविद् महामंडित राहुल सांकृत्यायन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय जैसे मनीषियों ने सीताराम लालस निर्मित राजस्थानी शब्दकोष का पहला भाग जब देखा तो सहज ही राजस्थानी को विरल भाषा की संज्ञा देते हुए इसमें हुए शब्दकोष के कार्य को ऐतिहासिक बताया था। इससे पहले ही गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राजस्थानी साहित्य को पढ़कर प्रतिक्रिया यह दी थी कि राजस्थान ने अपने रक्त से जो राजस्थानी साहित्य निर्मित किया है उसकी जोड़ का साहित्य और किसी भाषा में नहीं मिलता। प्रारम्भिक काल में राजस्थानी राजस्थान ही नहीं बल्कि उसके आसपास के बहुत बड़े भूखंड की भाषा रही है। गुजराती भाषा के मर्मज्ञ एवं विद्वान स्वर्गीय झवेरचंद मेघाणी ने इसे स्वीकारते लिखा है कि मेड़ता की मीरां राजस्थानी में पदों की रचना करती और गाया करती थी। इन पदों को सौराष्ट्र की सीमा तक के मनुष्य गाते हुए अपना मानते रहे हैं। ग्रियर्सन ने के भाषा सर्वेक्षण को बांचेंगे तब यह और भी स्पष्ट हो जाएगा कि उन्होंने आजादी से पहले ही इस भाषा को बड़े भूभाग में बोली जाने वाली समृद्ध भाषा से अभिहित किया था।

राष्ट्रदूत, 4 जनवरी 2022


जो लोग यह कहते हैं, कि राजस्थानी कौनसी? उनको इस बात को समझने ही जरूरत है कि हिन्दी और तमाम दूसरी भाषाओं को अपनी बोलियों से ही भाषा का दर्जा मिला है। जिस भाषा में जितनी अधिक बोलियां, वह उतनी ही अधिक समृद्ध। बोलियां किसी पेड़ की वह टहनियां हैं जिनसे कोई वृक्ष हरा—भरा लहलहाता हुआ अपने होने की संपूर्णता जताता है। राजस्थानी ऐसा ही वृक्ष है जिसके विभिन्न अंचलों में बोली जानी वाली बोलियां उसकी हरी—भरी टहनियां हैं। ऐसे सभी लोग जो राजस्थानी की मान्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं, उन्हें राजस्थानी के ऑनलाइन शब्दकोश को जरूर ही देखना चाहिए। इसमें राजस्थानी शब्द हैं, भाषा का विवेचन है और हां, राजस्थानी व्याकरण भी है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि जोधपुर महाराजा गजसिंह, डॉ. लक्ष्मणसिंह, जगतसिंह राठौड़, महेन्द्रसिंह तंवर, सुरेन्द्र सिंह लखावत, मनोज और स्नेहा मिश्र की बाकायदा एक प्रबंधन समिति बनाकर राजस्थानी शब्दकोश परियोजना पर संयुक्त रूप से कार्य करने की पहल हुई है। राजस्थानी के ऑनलाइन शब्दकोश के साथ ही इसका मोबाइल एप भी लांच किया गया है। ढाई लाख से अधिक शब्दों को संजोए राजस्थानी  शब्दकोश  में जो शब्द हैं वह तो है ही, और भी नए शब्द जोड़ने के लिए भी राजस्थानी भाषाविद-समिति गठित की गयी है। राजस्थानी भाषा के आधिकारिक विद्वानों की इस समिति में राजस्थानी भाषा की विभिन्न बोलियों के प्रतिनिधि है। राजस्थानी के शब्दों एवं शब्दार्थों को प्रमाणित करने की मानक संस्था की तरह यह सब इस तरह से कार्य करेंगे कि राजस्थानी भाषा भविष्य में भी और अधिक फले—फुले। सभी जानते हैं, अंग्रेजी के ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में हर वर्ष विश्व भर की भाषाओं के नए शब्द जोड़ते हैं और इसी से अंग्रेजी आज विश्व भाषाओं में तेजी से सिरमौर हो रही है। राजस्थानी भाषा की शब्दावली के इस प्रयास को इसी कड़ी में देखा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होना चाहए।

बहरहाल,कुछ दिन पहले ही कुबेरनाथ राय को पढ़ रहा था। उन्होंने बहुत सुंदर व्यंजना की है कि भाषा का अर्थ ही होता है सिंटेक्स के साथ संस्कृति। कोई भी भाषा 'व्याकरण' और 'शब्दावली' दोनों से ही बनती है। व्याकरण ढांचा देता है परन्तु आकृति—प्रकृति शब्द बनाते हैं। शब्दों के पीछे संस्कार परम्परा है, और यह संस्कार परम्परा ही अभिव्यक्ति को 'व्यक्तित्व' या विशिष्टता प्रदान करती है। शब्द ऋषि सीताराम लालस द्वारा तैयार वृहदाकार राजस्थानी—हिन्दी शब्दकोश को देखकर सहज कोई भी यह कह सकता है कि विश्व भर की किसी भी भाषा से यह कमतर नहीं है।

किसी भाषा के ढाई लाख शब्दों के लाखों—करोड़ों पर्यायवाची होने और उसके नौंवी शताब्दी के समय से अस्तित्व होने के बावजूद यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि आज भी यह राज—काज की भाषा नहीं बन पाई है। मैं यह मानता हूं कि राजस्थानी भाषा नहीं जीवंत संस्कृति है। ऐसी संस्कृति जिसमें हिन्दुस्तान की जड़ें जुड़ी हुई है। सीताराम लालस द्वारा तैयार राजस्थानी शब्दकोश पहली बार 1962 में प्रकाशित हुआ। बाद में 2013 में यह पुन: प्रकाशित हुआ। असल में सीताराम लालस राजस्थानी भाषा के युगपुरुष शब्द ऋषि हैं। ऐसे जिन्होंने चार दशकों की अनथक साधना से ढाई लाख से अधिक शब्दों का विरल 'राजस्थानी शब्दकोश' ही तैयार नहीं किया बल्कि 'राजस्थानी हिन्दी वृहद कोष' का भी निर्माण किया। उनका तैयार राजस्थानी शब्दकोश राजस्थानी भाषा के शब्दों का सौंदर्य उजास तो है ही, इसमें राजस्थानी भाषा से जुड़ा अनूठा भाव—भव भी है। बकौल सीताराम लालस इससे पहले डिंगल में रचे गये  माला कोश, अनेकार्थी कोश तथा एकाक्षरी कोश अल्प संख्या में उपलब्ध रहे हैं परन्तु साहित्य के अध्ययन में उनकी उपादेयता नहीं पाते हुए उन्होंने राजस्थानी शब्दकोश तैयार किया। यह बहुत दुरूह कार्य था।  इसके लिए बाकायदा उन्होंने पुराने हस्तलिखित ग्रंथों, पुस्तकों को अपने तई संजोया। समस्या यह भी थी कि राजस्थानी शब्दों के शुद्ध रूपों का पूरा निर्वहन उन ग्रंथों में भी कहीं था नहीं। बहुतेरे राजस्थानी ग्रंथ अपूर्ण अवस्था में भी थे। शब्द वर्तनी के दृष्टिकोण से भी उपलब्ध पुस्तकों का सम्पादन  इतना दोषपूर्ण था कि उनसे शब्द-चयन अपने आप में कठिनतम कार्य था। पर सीताराम जी ने उपलब्ध सभी प्रकार की राजस्थानी पुस्तकों को एकत्र कर स्वयं पढ़ा और शब्दों को अपने स्तर पर एकरूपता रखते तैयार किया। इस कार्य के लिए वह स्वयं सुदूर गाँवों में घूम-घूम कर उन्होंने विभिन्न जातियों, कारीगरों, कलाकारों, कहारों, जुलाहों, गाड़ीवानों, महाजनों, महावतों आदि से उनके द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले शब्दों को एकत्रित करने का लूंठा कार्य किया। असल मे यह उनकी वह साधना थी जिसमें किसी भाषा के बिखरे रूपों को सहेज कर एक करने का चुनौतीपूर्ण जतन था। यही नहीं, उन्होंने राजस्थानी में इतिहास, भूगोल, गणित, दर्शन शास्त्र, खगोल शास्त्र, वास्तु विद्या,राजनीति, युद्ध, अर्थशास्त्र, काम विज्ञान, धर्म शास्त्र, नीति शास्त्र आदि से संबंधित शब्दों को भी ढूंढ ढूंढ कर सहेजा। इसमें मूल एवं मुख्य शब्द के साथ बहुतेरे पर्यायवाची शब्द भी हैं। उन्होंने एकत्र शब्दों की लाखों स्लिप तैयार की। कोई 300 राजस्थानी पुस्तकों से उन्होंने शब्द इकट्ठे किये। प्रकाशित पुस्तकों को एक बार पढ़ कर लिए जाने वाले शब्दों को रेखांकित किया और फिर उनका अर्थ मिलान भी लेखकों से सम्पर्क कर किया। पांच हजार के लगभग फुटकर राजस्थानी डिंगल गीतों से भी शब्द जुटाए। राजस्थानी शब्दार्थ के साथ-साथ व्यापक जन—मानस  में प्रयुक्त मुहावरों और कहावतों को भी एकत्र कर उन्हें कोष में स्थान दिया। उनके जुनून को इसी से समझा जा सकता है कि प्रेस में पृष्ठों के छापे जाने के समय तक वह राजस्थानी के नवीनतम मिले शब्दों को अंकित करने का प्रयास करते रहे थे।

बहरहाल, पिछले दिनों दो विरल घटनाएं राजस्थानी भाषा के लिए हुई। पहली महत्वपूर्ण ऑनलाइन शब्दकोश  का लोकार्पण और दूसरी प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा 'आखर' के जरिए जयपुर के जवाहर कला केन्द्र में राजस्थानी लेखक युवा सम्मेलन का आयोजन। यह ऐसा आयोजन था जिसमें ठंड के बावजूद राजस्थान भर के लेखकों ने भाग लिया। इतनी बड़ी संख्या में लेखक—लेखिकाओं की सहभागिता के साथ राजस्थानी की विविध विधाओं में लिखे जा रहे साहित्य को देख सहज यह कहा जा सकता है कि राज की मान्यता नहीं मिलने के बावजूद राजस्थानी में निरंतर स्तरीय लिखा जा रहा है। कोई भाषा निरंतरता के लिखे में ही जीवंत होती जन—मन में रचती—बसती है। इसे समझते इस भाषा को मान्यता मिलनी ही चाहिए। मान्यता का अर्थ है, राजस्थानी में जो बोला जाएगा, उसे संवैधानिक स्तर पर दर्ज किया जाएगा। भाषा पाठ्यपुस्तकों का माध्यम बनेगी और इसकी समृद्ध शब्द संपदा हम वृहद स्तर पर अंवेर सकेंगे।

अभी तो स्थिति यह है कि लोकतांत्रिक हमारे राष्ट्र के सर्वोच्च सदन विधानसभा और लोकसभा में कोई जनप्रतिनिधि चाहे भी तो अपनी मातृभाषा में अपनी बात नहीं रख सकता है। विशाल शब्दकोश है, समृद्ध संस्कृति है पर न बोल पाने का इससे बड़ा कोई अभिशाप और क्या होगा!

Thursday, December 30, 2021

उत्सवधर्मिता से सजा ‘लोक रंग’

कलाओं के उद्भव का मूल लोकभावना और सामूहिक चेतना ही है। असल में कला सृजन और उपभोग में भी सामुदायिक भावना ही हमारे यहां प्रधान रही है। आरम्भ में समूह मिल-जुल कर गाता, नाचता था। तब अभिप्रायों (मोटिव्स) में कलाएं मन को गहरे से रंजित करती थी। पर इधर आधुनिकता की आंधी में लोक से जुड़ी कलाओं की हमारी वह दृष्टि लोप प्रायः होती जा रही है। अब संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों में तड़क-भड़क और इतना शोरोगुल होता है कि मन न चाहते हुए भी उनमें ही अटक-भटक जाता है। सोचिए, भटका और कहीं अटका मन कभी शांत होता है! पर लोक कलाओं के आलोक में जीवन धन, मन के चैन को हम सहज सहेज सकते हैं।


जयपुर के जवाहर कला केन्द्र के आमंत्रण पर पिछले दिनों जब ‘लोकरंग 2021’ में जाना हुआ तो मन यही सब-कुछ गुन रहा था। मुक्ताकाश मंच पर देशभर से आए लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों से रू-ब-रू होते लगा, मन अवर्णनीय उमंग से जैसे सराबोर हो उठा है। जम्मू-कश्मीर, झारखंड, असम, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कलाकारों की लोक कलाओं में ही मन जैसे रचने-बसने लगा था। कश्मीर के लोक कलाकारों की लोक नृत्य प्रस्तुत ‘रऊफ’ मन को तरंगित करने वाली थी। ‘रऊफ’ असल में कश्मीर में वसंत ऋतु के जश्न और ईद-उल-फितर की उत्सव व्यंजना है। पंक्तिबद्ध, हाथ में हाथ डालकर महिलाएं पारंपरिक कश्मीरी वेशभूषा में इसे करते जैसे मौसम के रंग में पूरी तरह से रंग जाती है।

जवाहर कला केन्द्र में भी ऐसा ही हुआ। संगीत के साथ होले-होले उठते कदमों की सामुहिक थिरकन में ‘रऊफ’ में बढ़त हुई और औचक जाने-पहचाने बोल ‘बुम्बरो बुम्बरो श्याम रंग बुम्बरो’ जैसी अनुभूति हुई तो चौंका। लगा, लोक कलाकारों ने फिल्म संगीत को लोक में घोला है पर पता चला, मूलतः यह कश्मीर का ही लोक संगीत है, जिस पर राहत इन्दौरी ने गीत लिखा और लोक संगीत को हूबहू संगीतकार शंकर-एहसान-लॉय ने उनके बोलों में ‘मिशन  कश्मीर’ फिल्म में सजा दिया। पर लोक कलाकारों की मूल प्रस्तुति इस कदर उम्दा थी कि चाह कर भी मन उसे कहां बिसरा सकता है!झारखंड के लोक कलाकारों की कर्मा नृत्य प्रस्तुति भी कुछ ऐसी ही थी। महिला-पुरूषों का नाचता-गाता समूह! खेती और दूसरे श्रम से जुड़े कार्यों के दौरान सहज नृत्य करते गायन की इस विरल प्रस्तुति में झारखंड का लोक जीवन जैसे गहरे से रूपायित हुआ है। छत्तीसगढ़ और झारखंड में कर्मा लोक मांगलिक नृत्य है। करम पूजा, यानी कार्य करने को ही पूजा मानते वहां के लोगों को सहज थिरकते देख लोक में जैसे आलोक अनुभूत होता है। असम के कलाकारो द्वारा प्रस्तुत ‘बारदोही षिकला’ नृत्य, हरियाणा के लोक कलाकारों के ‘घूमर’ में लोक आस्था का अनूठा उजास था तो झारखंड का ‘षिकारी नृत्य’ आदिवासी जीवन से जुड़े जश्न  का जैसे आख्यान था। 

राष्ट्रदूत, 30 दिसम्बर 2021


ऐसे ही राजस्थान के ‘कालबेलिया’, पंजाब के झुमुर,  और होली पर किए जाने वाले शेखावटी अंचल के ‘डफ’ नृत्य के उल्लास में जीवन की सौंधी महक सदा ही अनुभूत होती रही है। असम के ‘झुमुरू’ नृत्य में ड्रम की थाप के साथ थिरकती नृत्यांगनाएं जीवन-संगीत से जैसे साक्षात् कराती है। चाय बागानों में काम करते जीवन की एकरसता तोड़ते वहां यह नृत्य किया जाता है। गुजरात के कलाकारों ने आदिवासी संस्कृति को ‘सिद्धि धमाल’ में अनूठे रंग में जीवंत किया। तेजी से बजते ड्रम और  नगाड़े की गूंज में लोक कलाकारों के मुंह से निकलते अजीबो-गरीब बोल और इसके साथ ही उछलते कूदते किए जाने वाले इस नृत्य में गुजरात के कलाकारों  की प्रस्तुति तन और मन को झंकृत करने वाली थी। उत्सव में कैसे कलाकार अपने आपको भुलकर गाते-नाचते हैं और ऐसा करते असंभव को भी कैसे सिद्ध किया जाता है, यह नृत्य जैसे इसकी गवाही दे रहा था। अनूठे बोल और संगीत-नृत्य संग देह की अद्भुत हरकतों से रोमांचित करते कलाकारों की यह प्रस्तुति आदिवासी जीवन की छटा का जैसे अनूठा छंद है।

बहरहाल, ‘लोक रंग’ में कला की सभी प्रस्तुतियां अलग-अलग भी पर सबकी सब अपने आप में विशिष्ट भी। ऐसी जिनसे मन उर्वर हो उठे। झुम उठे। भाषा भेद के कारण बोल समझ नहीं भी आ रहे थे पर ताल और लय संग कलाकारों संग मन भी नाच-गा रहा था। जवाहर कला केन्द्र जब ‘लोक रंग’ का आस्वाद करने पहुंचा तब साथ में पत्नी डॉ. अरुणा  और बच्चे भी थे पर उनका कहना था, ‘कुछ देर ठहर वह जरूरी काम निपटाने जाएंगे।’ पर गौर किया, कलाकारों की कला संग वे भी भाव-विभोर हो पूरे समय वहीं बैठे रहे। यह लोक कलाकारों की अनूठी कलाओं का रंजन ही था कि जरूरी काम निपटाना भूल सब उनके संग ही उमंग, उल्लास में डूब-डूब चले थे। लोक के उस आलोक को गुनते मैंने यह भी अनुभूत किया, शास्त्रीय संगीत, नृत्य आदि कलाएं अनुशासन  के आदर्श में हमें बहुत से स्तरों पर जकड़ते हैं पर लोक कलाएं मन में उमंग, उत्साह जगाते हमें अपने सहज होने का अहसास कराती हैं। यह है तभी तो कलाकारों के गान और नृत्य में रमते मन उनके संग हसंते हुए औचक गाने भी लगता है। पांव अपने आप थिरकते उनके संग बगैर किसी की परवाह किए नाचने को मचलते महसूस होते हैं। कला संस्कृति मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला की पहल पर केन्द्र की अतिरिक्त महा निदेषक अनुराधा गोगिया ने इधर जतन कर लोक से जुड़े देषभर के कलाकारों की प्रस्तुतियों को संयोजित किया है। याद है, जवाहर कला केन्द्र में एक क्यूरेटर, महामाया को जब कुछ समय के लिए महानिदेशक  बनाया गया था तो पश्चिमी कलाओं से यह पूरा केन्द्र आक्रांत हो उठा था और तभी लोक कलाओं से जुड़ा ‘लोकरंग’ भी बंद हो गया था। इस पर बहुत सा हो-हल्ला भी मचा था पर कौन परवाह करता! बाद में  विरल छायाकार और राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी फुरकान खान ने इसे फिर से प्रारम्भ किया पर कोविड के दौर में एक साल यह फिर नहीं हो पाया। कला संस्कृति मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला की पहल पर केन्द्र की अतिरिक्त महा निदेषक अनुराधा गोगिया ने इधर जतन कर लोक से जुड़े देषभर के कलाकारों की प्रस्तुतियों को फिर से संयोजित करने का महत्ती कार्य किया है। गौर किया, वह स्वयं भी लोक कलाकारों की इन प्रस्तुतियों में निरंतर स्वयं मौजूद रहकर कलाओं से लोगों की निकटता बढ़ाने में जुटी रहती है। यही कारण है कि कड़ाके की ठंड के बावजूद लोकरंग आयोजन के सभी दिनो के दौरान केन्द्र के मुक्ताकाश दर्शक दीर्घाओं  में भीड़ उमड़ती रही है। लोक का यही तो वह उजास है, जिसमें संग मिल सब झुमने को मजबूर होते  हैं।
लोक माने मन का रंजन। कहीं कोई दिखावा या बनावटीपन नहीं। इसीलिए तो लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों में दर्शक-श्रोता और कलाकारों का भेद समाप्त हो जाता है। नृत्य, गायन संग सुनने वाले और देखने वाले भी एकमेक हो जाते हैं। मिथकों, धार्मिक विश्वासों और दैनिन्दिनी कार्यकलापो में जीवन से जुड़ी सहज दृष्टि वहां है। वहां शिक्षा  है, स्वस्थ मनोरंजन है और सबसे बड़ी बात पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांरित होता वह परम्परागत बोध भी है, जिसमें जीवन की सूक्ष्म व्याख्या को सहज समझा जा सकता है।
बहरहाल, यह सच है कि आधुनिकीकरण की आंधी में लोक कलाएं निरंतर हमसे दूर होती जा रही है। सामूहिकता के ह्रास और अपनी स्थापनाओं के आग्रह में कलाओं के सहज सौंदर्यबोध से निरंतर हम दूर हो रहे हैं। स्वतः स्फूर्त परिवर्तन को स्वीकार करते लोक कलाएं निरंतर बढ़त  करती रही है, करती रहेगी। इसलिए कि लोक कलाओं में ही जीवन की शक्ति और सांस्कृतिक चेतना की हमारी परम्परा समाई हुई है। ऐसे दौर में जब उपभोक्ता संस्कृति हमें हमारी जड़ों से उखाड़ने का पुरजोर प्रयास कर रही है, यह जरूरी है कि लोक कलाओं में ही हम जीवन की उत्सवधर्मिता का यह नाद सुनें और इसे गुनें भी।

Sunday, December 19, 2021

गीतों की भोर, रंगों की सांझ

कलाएं रस निरंजन हैं। यह कलाएं ही हैं जो जीवन को तरंगायित करती नया कुछ सीखने को भी सदा प्रेरित करती है। इसलिए कहते हैं, कलाओं से जुड़ा व्यक्ति कभी उम्रदराज नहीं होता। रवीन्द्र नाथ टैगौर को ही लें। उन्हें ‘गीतांजलि’ पर नोबल मिल चुका था, रवीन्द्र संगीत और ‘ताशेर देश’ जैसे उनके नाट्य अपार लोकप्रिय हो चुके थे पर फिर भी उम्र के 67 वें वर्ष में उन्होंने चित्रकला की शुरूआत की। संयोग देखिए, कविता लिखते वक्त पंक्तियों की काट छांट में उन्होंने रेखाओं में निहित चित्रों के आकार छुपे देखे। जिस कविता ने रवीन्द्र नाथ टैगौर को विश्व कवि रूप में अपार लोकप्रियता दिलाई, उसी से प्रसूत रेखाओं के आकारों ने उन्हें चित्रकार भी बनाया।  माने कलाएं बढ़त है।

बहरहाल, रेखाओं की मुक्ति के निमित कला की टैगौर की यात्रा कविता की लय सरीखी है। रवीन्द्र एक स्थान पर कहते भी है, ‘मेरी चित्रकला की रेखाओं में मेरी कविताएं है।’ पैरिस की गैलरी पिगाल में 1930 में उनके चित्रों की प्रथम प्रदर्शनी जब लगी तभी रवीन्द्र के चित्रकर्म पर औचक विश्वभर का ध्यान गया। बाद में लंदन, बर्लिन और न्यूयार्क गैलरियों के साथ यूनेस्को द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय आधुनिक कला प्रदर्शनियों में भी उनके चित्र सम्मिलित हुए।

रवीन्द्र के चित्रों की खास संरचना, उनमें निहित संवेदना और अंतर्मुखवृति के साथ परम्परा से जुदा मौलिकता ने सदा ही मुझे आकर्षित किया है। याद पड़ता है, पहले पहल रवीन्द्र का बनाया जब ‘मां व बच्चा’ कलाकृति देखी तो लगा जीवन को कला की अद्भुत दीठ से व्याख्यायित करते उनके चित्र कला की अनूठी दार्शनिक अभिव्यंजना है। उन्हीं का बनाया एक बेहद सुन्दर चित्र है ‘सफेद धागे’। इसमें स्मृतियों का बिम्बों के जरिए अद्भुत स्पन्दन है। ‘थके हुए यात्री’, ‘स्त्री-पुरूष’ जैसे मानव चित्रो के साथ ही पक्षियों के उनके रेखांकन में एक खास तरह की एकांतिका तो है परन्तु अंतर्मन संवेदनाओं की सौन्दर्य सृष्टि भी है। सहजस्फूर्त रेखाओं के उजास में रवीन्द्र के कलाकर्म की रंगाकन पद्धति, सामग्री में निहित रेखाओं की आंतरिक प्रेरणा को सहज अनुभूत किया जा सकता है।

कविता से चित्रकर्म की यात्रा का उनका यह संवाद भी तो न भुलने वाला है, ‘मेरे जीवन की भोर गीतों भरी थी, चाहता हूं सांझ रंग भरी हो जाए।’ यह रवीन्द्र ही है जिनके गीतों की भोर भीतर से हमें जगाती है तो चित्रों का उनका लोक सुरमयी सांझ में सदा ही सुहाता है। रवीन्द्र के चित्रों में पोस्टर रंगो, पेड़ों की पत्तियों और फूलों की पंखुड़ियों के रस के साथ ही पानी में घुलने वाले और दूसरे तमाम प्रकार के प्राकृतिक रंगों का आच्छादन, उत्सव लोक भी अलग से ध्यान खींचता है। एक व्यक्ति में कला के कितने-कितने रंग—रूप हो सकते हैं, यह भी तो रवीन्द्र के ही व्यक्तित्व में है। नहीं!

Sunday, December 12, 2021

देखने का संस्कार देती कलाएं

कलाएं अतीत, वर्तमान और भविष्य की दृष्टि को पुनर्नवा करती है। और हां, देखने का संस्कार भी कहीं ठीक से मिलता है तो वह कलाएं ही हैं। चित्रकला और मूर्तिकला की ही बात करें। इटली की मूर्तिकार एलिस बोनर ने कभी ज्यूरिख में नृत्य सम्राट उदय शंकर का नृत्य देखा और बस देखती ही रह गई। यह उनके देखने का संस्कार ही था कि मंदिरों में उत्कीर्ण मूर्तियों को बाद में उसने अपनी कला में गहरे से जिया।

मुझे लगता है, कलाओं से साक्षात् भी अपनी तरह की साधना है। आपने कोई चित्र देखा है, मूर्ति का आस्वाद किया है। तत्काल कुछ भाव मन में आते हैं-उसके प्रति। कुछ समय बाद फिर से आस्वाद करेंगे तो कुछ और सौन्दर्य भाव अलग ढंग से मन में जगेंगे। जितनी बार देखेंगे मन उतना ही मथेगा। याद पड़ता है, इन पंक्तियों के लेखक ने कभी ख्यात निबंधकार विद्यानिवास मिश्र को अपना कविता संग्रह भेंट किया था। उन्होंने कविताएं पढ़ी और लिखा, ‘कविताएं घूंट घूंट आस्वाद का विषय है। मैं कर रहा हूं।’ माने कविताओं को वह पढ़ ही नहीं रहे थे, मन की आंखो से देख भी रहे थे। इस देखने से ही मन में शायद प्यार जगता है। 

स्पेन के प्रख्यात सिनेकार जोसे लुई गार्सिया की फिल्म ‘कैडल सांग’ का संवाद है, ‘जो देखना जानाता है, वही प्यार कर सकता है।’ चित्र-मूर्तियों के अंकन में ही जाएं। भारत ही नहीं विश्वभर में भगवान बुद्ध की एक से बढ़कर एक मूर्तियां मिल जाएंगी पर बुद्ध क्या वास्तव में मूर्ति में जैसे है, वैसे ही रहे होंगे? आरंभ में बुद्ध की उपस्थिति उनकी मूर्ति से नहीं उनसे जुड़े प्रतीकों से की जाती। बोधिवृक्ष। धर्मचक्र परिवर्तन कराते कर। छत्र। पादुका और उनकी दूसरे प्रतीक। उनसे ही तथागत की उपस्थिति का आभास होता। इन प्रतीकों के आधार पर ही मूर्तियां दर मूर्तियां गढ़ी गई। ठीक वैसे ही जैसे राजा रवि वर्मा ने देवी-देवताओं को जिस रूप में बनाया, वही बाद में पूज्य हो गए। उनके बनाए चित्रों से पृथक कहीं शिव, कृष्ण, राम दिखते हैं तो वह हमें स्वीकार्य नहीं।  माने अपनी दीठ से कलाकार ने जो सिरज दिया, वही सर्वव्यापी हो गया।
 
बहरहाल, आम शिकायत है कि एब्सट्रेक्ट चित्र समझ नहीं आते पर उन पर गौर करेंगे तो अर्थ का वातायन खुलता नजर आएगा। एब्सट्रेक्ट क्या है? किसी अर्थ खुलते अंश की व्यंजना ही तो! और हां, देखने का संस्कार पाना है तो प्रकृति से बड़ा सिखाने वाला और कौन होगा! आप आसमान को देखें। समय के साथ बदलता नीला, भूरा, पीला और लाल होता आकाश! रात्रि की नीरवता में तारों को देखें और आसमान में बदलते रंगों में अपनी अनुभूतियों को घोलें। और नहीं तो रूसी चित्रकार रोरिक के हिमालय चित्रों को ही देखें। पल-पल बदलते हिमालय के हजारों-हजार रंगों को उन्होंने अपने कैनवस पर जिया ही तो है। साल बीतने को है। कलाओं में रचेंगे-बसेंगे तो सहज-सरल में भी बहुत कुछ नया पाएंगे ही।

Saturday, December 11, 2021

चित्त शिक्षित हो, मन सर्जक

नई शिक्षा  नीति में उच्च एवं तकनीकी  शिक्षा   के पाठ्यक्रम को बोझिलता से बचाने के लिए उनमें कला और संस्कृति से जुड़े अध्ययन के समावेश  की बात कही गयी है। ऐसा व्यवहार में यदि हो जाता है तो  शिक्षा   सच में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की वाहक हो सकती है। 

कलाएं शिक्षण  में बोझिलता को दूर करती है। संस्कारों की सूझ भी बहुत से स्तरों पर कलाएं ही देती है। पर इस समय की  शिक्षा   को देखें तो पाएंगे, अंतिम लक्ष्य वहां नौकरी प्राप्त करना भर है। पढ़ाई इसीलिए शायद व्यक्तित्व निर्माण, संस्कारों की खेती नहीं कर पा रही। और ऐसे में जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे युवा प्रायः भटक भी जाते हैं। पर कलाओं से यदि शिक्षण  को जोड़ा जाता है तो पढ़ाई नौकरी की विवशता  नहीं, संस्कारों की जीवंतता बन सकती है।

उच्च एवं तकनीकी शिक्षण संस्थानों में अतिथि अध्यापन के अंतर्गत निरंतर जाना रहता है और पाता हूं, बोझिल पढ़ाई की यंत्रणा जैसे वहां विद्यार्थी निरंतर झेलते हैं। पर देखता हूं, कला संस्कृति से जुड़ा कोई आयोजन वहां होता है तो विद्यार्थी खिल-खिल जाते हैं। सोचता हूं, क्या ही अच्छा हो इस तरह का उल्लास शिक्षण के दौरान भी रहे। यह मुश्किल नहीं है, बशर्ते  तकनीक में कलाओं का छोंक भर लगा दिया जाए। कुछ समय पहले पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्यरत भारतीय यात्रा एवं पर्यटन प्रबंध संस्थान में व्याख्यान देने जाना हुआ। अचरज हुआ कि पर्यटन  शिक्षा   प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बारे में जानकारी नहीं थी। माने पर्यटन की पढ़ाई व्यवसाय और प्रबंधन भर के ज्ञान से इतनी भरी है कि ‘घुम्मकड़ शास्त्र’ लिखने वाला उद्भट विद्वान ही वहां नदारद है। यह है तभी तो इस क्षेत्र के शिक्षित  बाद में भारतीय संस्कृति और संस्कारों से बाद में नहीं जुड़ पाते।  एक दफा मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वास्तुकला विभाग में  छायांकन पर व्याख्यान देने जाना हुआ। छायांकन से जुड़ी कलाओं पर रोचक बातें जब साझा कर रहा था तो अनुभूत किया विद्यार्थी जैसे खिल-खिल उठे थे। लगा, सुनने की विवशता  उदासी ओढाती है पर जब किस्से-कहानियों में वास्तु और पर्यटन से जुूड़ी कला-संस्कृति वहां हो तो पढ़ाई सुनने वालों के लिए रोचक हो उठती है।

राजस्थान पत्रिका, 11 दिसम्बर 2021

शिक्षण में कलाओं का समावेश  विद्यार्थियों को रोबोटिक होने से बचा सकता है। पर यह इस तरह से न हो कि विद्यार्थी पूर्ववर्ती कलाकारों, सांस्कृतिक धरोहर के बारे में अध्ययन भर करे। सार्थकता इसमें है कि शिक्षण संस्थानों में मौलिक दृष्टि विकसित करने से जुड़े ज्ञान का समावेश हो।    वहां कलाओं के जरिए  शिक्षा  विद्यार्थी को संवेदनशील  बनाने से जुड़े। पढ़ाई की बोझिलता से उन्हें मुक्त करे। अनुभवों की सीर इसमें मदद कर सकती है। संस्कृति की सोच से जुड़े लेखकों, कला मर्मज्ञों के अनुभव आधारित ज्ञान का प्रसार यह संभव कर सकता है। इसी दृष्टि से उच्च एवं तकनीकी  शिक्षा   में कला-संस्कृति का समावेष करने की नई शिक्षा नीति पर कार्य किया जाए। याद है, वास्तु से जुड़ा विज्ञान सदा ही मुझे बोझिल लगता रहा है पर एक दफा जब चाल्र्स कोरिया का एक व्याख्यान सुना तो फिर ढूंढ ढूंढ कर वास्तु ज्ञान से जुड़ी और भी सामग्री पढ़ने का मन हुआ। यह बात यहां इसलिए साझा कि है कि रोचक और अनुभूतियों से भरा यदि कोई संवाद शिक्षण  में मिलता है तो मन और भी नया कुछ जानने को उत्सुक होगा। विरल शिक्षाविद  गिजूभाई के शब्दों में कहूं तो इसी से चित्त शिक्षित होगा और मन सर्जक।

Saturday, November 13, 2021

सिंधी सारंगी में लोक स्वरों का उजास

सिं​धी सारंगी वादक लाखा खान
इस वर्ष जिन 119 हस्तियों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, सुखद है कि उनमें बहुत से लोक कलाकार भी हैं। ऐसे दौर में जब आधुनिकता की चकाचैंध लोक कलाओं को लीलती जा रही है, उनसे जुड़े कलाकारों का पद्म सम्मान महत्वपूर्ण है। लोक ही तो जीवन का आलोक है! पद्मश्री पाने वालों में इस बार सिंधी सारंगी वादक राजस्थान के लाखा खान भी है। उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी सिंधी सारंगी में लोक संगीत को अंवेरते उसमें निरंतर बढत की है। बहुतेरी बार उन्हें सुना है। सुनते हर बार यह भी लगा, लोक स्वरों के सहज प्रवाह में जैसे वह माधुर्य का अनुष्ठान करते हैं।

बीन अंग के आलाप, मन्द्र सप्तक से अति तार सप्तकों के विस्तार की कथा भले लाखा खान शब्दों में बंया न कर पाएं पर सारंगी की उनकी स्वर गूंज सुनते अनुशासित वादन के सुगठित प्रस्तुतिकरण को सहज हर कोई अनुभूत कर सकता है। कबीर की मूल साखियों में स्थानीय अंचल की बोलियों में भावों का अपने तई किए अनूठे मेल में वह जब सारंगी बजाते हैं तो रेत राग जैसे जीवंत हो उठती है। वह सारंगी संग गाते भी है पर सोचता हूं, गान के शब्द वादन में न भी घुले हों तो भी कानों में जैसे रस घुलता है। लोक राग मांड, सूप, सामेरी, आसा, मारू आदि संग कभी-कभी भैरवी जैसी शास्त्रीय राग में भी लय एवं ताल के गणित प्रभुत्व बगैर सहज स्वर-सौंदर्य प्रवाह वहां है।
सारंगी असल में तत्सम शब्द है। अर्थ करें तो, स्वर के माध्यम से कानों में जो अमृत घोले वह सारंगी है। लाखा खान की सारंगी ऐसी ही है। हरजस के ‘गरू बिना कौन संगी मन मेरा’ स्वर या सूफी मुल्तान सिंध के सूफियों के कलाम या फिर ‘खेलण दे दिन चार’ जैसे लोक गीतों की स्वर लहरियों वह जब सारंगी संग बिखेरते हैं तो लगता है सीमावर्ती क्षेत्रों के धोरे, वहां का जीवन हममें गहरे से बस रहा है।

राजस्थान पत्रिका, 13 नवम्बर 2021

राजस्थान में जोगिया, अलाबू, गुजराती आदि सारंगी वादन की परम्परा है। लाखा खान सिंधी सारंगी बजाते हैं। यह शास्त्रीय संगीत की सारंगी नहीं है। रावण हत्थे की मानिंद वह इसे जब बजाते हैं, संगीत में पष्चिमी राजस्थान के गांव, वहां के जीवन की छवियां जैसे आंखों में बसने लगती है। यह सच है, उनकी सारंगी गाती हुई धोरों की धरा में बसे जीवन को आंखों में बसाती है। लोक स्वरों को शास्त्रीयता से नहीं जोड़ा जा सकता। यहां सारंगी संग तबला नहीं ढोलक बजती है। भले ही लोक संगीत में आरोह अवरोह क्रम में राग का कोई निष्चित स्वर नहीं हो पर लय की सहज प्रकृति, मात्राओं के विशिष्ट क्रम में सारंगी स्वरों का उजास बिखेरती है। मींड, गमक, मुर्की की छोटी छोटी बोलतानों में कंठ के स्वर जहां नहीं पहुंचते वहां लाखा खान की सारंगी पहुंच जाती है। लाखा खान के छोटे आकार की सारंगी को उनके गान संग सुनना स्वयं स्फूर्त स्वर छंद की माधुर्य बढत से साक्षात् है। लाखा खान राजस्थान के उस संगीत घराने के वारिस हैं जिनकी पच्चीस पीढ़ियां सिर्फ गाने-बजाने से ही जुड़ी रही है। वह जब 11 बरस के थे तभी से सारंगी बजाना प्रारंभ कर दिया था। बाद में लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी के जरिए सुदूर देषों तक उनकी सारंगी के स्वर बिखरे। राजस्थान की धोरा धरा को अपनी सारंगी में लोक रागों के जरिए जीवंत करते लाखा खान को पद्मश्री लोक के आलोक का सही मायने में सम्मान है।