ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, October 19, 2024

आलोक छुए अपनेपन के रुद्र वीणा स्वर


ध्रुवपद भारतीय संगीत—संस्कृति का अभिज्ञान है। अभिज्ञान माने संगीत की हमारी परम्परा की पहचान। जयपुर ध्रुवपद का तीर्थ—स्थल है। यहीं डागर घराने के पितामह बाबा बेहराम खान की चौखट है। कभी यहां अखिल भारतीय ध्रुवपद समारोह होता रहा है। यह आयोजन तो इस समय नहीं होता परन्तु संस्कृतिकर्मी इकबाल खान की पहल पर कुछ दिन पहले जवाहर कला केन्द्र में दो दिवसीय ध्रुवपद उत्सव हुआ। गायन—वादन प्रस्तुतियों के साथ ही इसमें ध्रुवपद पर संवाद भी हुआ।  विश्वप्रसिद्ध रुद्र वीणा वादक ज्योति हेगड़े को सुनने, बतियाने का भी इस दौरान संयोग हुआ। अरसा पहले उनकी वीणा सुनी थी। फिर से सुना तो लगा, तार वाद्य में नाद—ब्रह्म से साक्षात् हुआ है। 

रुद्र वीणा माने शिव का वाद्य। आदि ध्वनि से जुड़ी है- रुद्र वीणा। शिव समय को संबोधित हैं। महाकाल माने उत्पत्ति, स्थिति और लय के अधिपति। कथा आती है, मां पार्वती सो रही थी। शिव ने उन्हें वक्ष स्थल पर हाथ रखकर लेटे देखा। जगत जननी की चढ़ती—उतरती सांस और लेटने की मुद्रा के पवित्र सौंदर्य पर रीझते उन्होंने रुद्र वीणा का आविष्कार कर दिया। शिव का यह प्रिय वाद्य है। कल्पना करता हूं, भगवान शिव रुद्र वीणा बजाते हैं और इसमें निहित ब्रह्मांडीय कंपन और दिव्य लय में इसका जैसे सार समझाते हैं। रुद्र वीणा में वह पारलौकिक ध्वनियों के जरिए ही सृजन, स्थिति और संहार को प्रतिध्वनित करते हैं। 

उस दौर में जब रुद्र वीणा महिलाओं के लिए सर्वथा त्याज्य था, ज्योति हेगड़े ने इसी में अपने को साधा। आरंभ में वह गुरु बिन्दु माधव माधव से सितार सीखती थी। एक रोज़ उन्हें रूद्रवीणा बजाते सुना। वीणा के तार से उनका मन इस कदर झंकृत हुआ कि उन्होंने इसे सीखने का निर्णय कर लिया। गुरु ने मना कर दिया। कहा, लड़कियों के लिए यह नहीं है। इसमें अतिरिक्त ताकत की जरूरत पड़ती है। ज्योति ने जिद पकड़ ली तो उन्होंने एक पुरानी न बज सकने वाली रुद्र वीणा परीक्षण के लिए दी। वह लगातार बारह घंटे इसे बजाती रही। घर वालो ने कहा, ग्रामोफोन की सुई अटक गई है। उनकी मां ने जब थॉमस की 'द वे म्यूजिक' में रुद्र वीणा के संबंध में यह लिखा हुआ पढ़ा-सुना कि इसे बजाने वाली महिला कभी मां नहीं बन सकती तो उन्होंने भी मना किया। पर ऐसे अंधविश्वासों को धता बताते ज्योति हेगड़े ने रुद्र वीणा सीखी। अंतर के उजास में ध्रुवपद की खंडार वाणी में इसकी साधना की।   फिर तो वीणा के उनके तार कुछ इस कदर सधे कि विश्वभर में विरल रुद्र वीणा वादक के रूप में ख्यात हुई। 

ज्योति हेगड़े रुद्र वीणा में होले—होले स्वरों की बढ़त करते एक मीठी सी अनूगूंज मन में पैदा करती है। अध्यात्म की गहराईयों में ले जाते आलाप के साथ निचले सप्तक में सुरों का प्रवाह! लयबद्धता संग जोड़़ और फिर झाला। संगीत के विरल ध्यान में डूबाते हैं, रुद्र वीणा के उनके स्वर! उनका वादन नाद—ब्रह्म से साक्षात् है। हठयोग प्रदीपिका में आता है, एकाग्र मन से नाद का अन्वेषण ही योग है। ज्योति हेगड़े यही कराती है। संगीत में ध्यान का योग। राग गुजरी तोड़ी, राग ललित, राग मधुवंती, राग चन्द्रकौन्स और भी दूसरे रागों में उन्हें सुनेंगे तो लगेगा ध्वनियों के जरिए अंतर्मन सौंदर्य को हमने पा लिया है। राग पूर्वी में उन्हें कभी सुना था। पूर्वी थाट के इस मौलिक राग को सुनते अनुभूत हुआ, सूर्यास्त के समय नटराज कैलाश पर नृत्यरत हैं। ध्यान से जुड़ी ध्वनि मे ज्ञान के परम आनंद का अवगाहन कराते रुद्र वीणा के स्वरों का वह उजास मन में अभी भी बसा है। ज्योति हेगड़े की रुद्र वीणा के स्वर ऐसे ही हैं, शिवत्व से साक्षात् कराते। योग संग ज्ञान का आलोक छुआ अपनापन वहां है।


Tuesday, October 8, 2024

प्रकृति की अनुगूंज है राग नट भैरव

 राग 'नट भैरव' पर 'दैनिक जागरण' सप्तरंग, 6 अक्टूबर 2024 में...

दैनिक जागरण - 6 अक्टूबर 2024




ध्रुवपद उत्सव

 जवाहर कला केन्द्र के आग्रह पर 5 अक्टूबर 2024 को ध्रुवपद उत्सव में बोलने जाना हुआ...

सुखद लगा, देश की ख्यातनाम रूद्रवीणा वादक ज्योति हेगड़े संग बतियाना हुआ।  उन्हें सुनता रहा हूं, रूद्रवीणा की वह इस दौर की विरल साधिका है। 

सुप्रसिद्ध सुरबहार साधक पं० पुष्पराज कोष्टी का भी सान्निध्य संपन्न करने वाला था...







Saturday, October 5, 2024

शक्ति की आराधना से जुड़ी संस्कृति

 

पत्रिका, 5 अक्टूबर, 2024

भारतीय संस्कृति समग्रता में शिव और शक्ति में समाई है। ​शिव स्रोत हैं, शक्ति गति। शिव निर्गुण, निराकार ब्रह्म है। शक्ति उसकी अभिव्यक्ति। बांग्ला कवि कृत्तिवास रचित रामायण में राम रावण को हराने इन्हीं दिनों शक्ति पूजा करते है। 

बंग्ला में यह नवरात्रा अकाल बोधन है। माने असमय पूजा।  कथा आती है, देवी अम्बिका रावण के साथ थी इसलिए राम उसे हरा नहीं पा रहे थे। राम ने 108 नील-कमल से देवी आराधना प्रारंभ की। राम एक—एक कर फूल चढाने लगे कि देवी ने परीक्षा ली। एक कमल कम पड़ गया। राम को याद आया, उनकी मां उन्हें कमल नयन कहती थी। उन्होंने अपनी आंखे निकाल देवी को भेंट करना चाहा। देवी प्रकट हुईं और उन्हें रावण को मारने की शक्ति प्रदान की।

हमारी संस्कृति इसी तरह शक्ति—रूप में प्रतीक धर्मी है।​ ​शिव देवों के देव महादेव क्यों हैं? इसलिए कि अकेले वह हैं, जिन्होंने शक्ति को अपने समान, बल्कि अपने से भी अधिक सम्मान दिया। भृंगी उनके बहुत बड़े भक्त हुए। शिव को मानते थे, शक्ति को नहीं। एक बार शिव परिक्रमा करने कैलाश गये। देखा, मां पार्वती निकट बैठी है। उन्होंने प्रदक्षिणा करने बीच से गुज़रने की कोशिश की। शक्ति शिव के वामांग पर विराज गई। 

भृंगी ने सर्प रुप धारण कर बीच से निकलने का यत्न किया। शिव अर्द्धनारीश्वर हो गए। दाहिने भाग से पुरुष और बाएं भाग से स्त्रीरूप। भृंगी कहां माने? उसने चूहे रुप में मां पार्वती को विलग करना चाहा। क्रोधित हो मां ने शाप द‍िया। तू मातृशक्ति को नहीं मान रहा। जा इसी समय तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाए। तंत्र विज्ञान कहता है, शरीर में हड्डियां और पेशियां पिता से और रक्त-मांस माता से प्राप्त होता है। शाप से भृंगी के शरीर से रक्त और मांस गिरने लगा। अविमुक्त कैलाश में मृत्यु तो हो नहीं सकती थी। असह्य पीड़ा में क्षमा मांगी। शिव—शक्ति ने भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दे तीसरा पैर दिया। इसी से अपने भार को संभाल वह शिव-पार्वती संग चलते हैं। आरती में हम गाते भी तो हैं, नंदी-भृंगी नृत्य करत हैं...।

नवरात्र दुर्गा पर्व है। दुर्गा शब्द भी तो दुर्ग से बना है। माने जिसे जीता नहीं जा सकता। 

भवानी अष्टकम् में आदि शंकराचार्य लिखते है, 'गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि।'  माने मां मेरी शरण- गति आप ही हैं। कहते हैं, शंकराचार्य जब कश्मीर पहुंचे तो एक दफा भूख प्यास से शक्तिहीन हो गए। निकट से एक महिला निकली। उन्होंने पानी पिलाने का आग्रह किया। महिला ने कहा, पुत्र पास आकर पी लो। वह बोले, मां मैं शक्तिहीन हूं। मुस्कराते हुए उसने कहा,  शिव को मानते हो तो शक्ति की क्या जरूरत? शंकराचार्य को आदि शक्ति का भान हुआ। उन्होंने वहीं आराधना की। कहा, चराचर जगत को चलाने वाला कोई और नहीं आद्याशक्ति है।

शिव पूर्ण पुरुष है। इसलिए कि वह शक्ति को धारण किए हैं। शक्ति माने प्रकृति। मातृ शक्ति इसीलिए वंदनीय है​ कि वह अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीती है। 

पंडित विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं, नदी ऊंचाइयों का मोह त्याग ढ़लान की ओर बहती है। उसी तरह मां धीरे धीरे अपने पिता, पति से संतान की ओर अभिमुख होती, उसी के सुख के लिए जीती है। इसमें ही अपनी संपूर्ण सार्थकता पाती है। जननी कौन? वही जो जने को प्यार करें। जब तक जननी है—प्यार, नेह का भाव भी बना रहेगा। नवरात्रि नौ ​देवियों की आराधना का नहीं, मातृ—शक्ति के वंदन—अभिंनदन का पर्व है।

Saturday, September 21, 2024

नृत्य में लालित्य की भारतीय दृष्टि

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राजस्थान पत्रिका, 21 सितम्बर 2024

..इस 26 सितम्बर को उदय शंकर का हमसे बिछोह हुए 47 साल हो जाएंगे पर उनका नृत्य और प्रयोगधर्मिता विश्वभर में आज भी जीवंत है। असल में नृत्य देह का राग है। ऐसा जो मन को रंग दे। उदय शंकर का नृत्य ऐसा ही था। उन्होंने कलाओं के अंत:सबंधों का नृत्य लालित्य रचा।

...यह मान लिया गया है कि परम्परागत जो हॅै, उसका कुशलता से निर्वहन ही नृत्य निपुणता है। पर उदय शंकर ने इस मिथक को तोड़ा। बैले, भरतनाट्यम, कथकली, कथक, ओडिसी, गवरी आदि नृत्यों के घोल में उन्होंने नृत्य की अनूठी भारतीयता रची।...एलिस बोनर ने उनका नृत्य देखा तो बस देखती ही रह गई।

अन्ना पावालोवा ने उन्हें एक दफा देखा, पाया अजंता के किसी देवता ने मानव शरीर धारण कर लिया है। मूलत: उदय शंकर चित्रकार थे, अन्ना पावालोवा के साथ पहली बार राधा—कृष्ण बैले में कृष्ण बने तो बस नर्तक ही बनकर रह गए।

अमला शंकर ने उनके नृत्य पर मोहित होकर ही उनसे विवाह किया। उदयशंकर—अमला की विश्व की बेहतरीन 'कल्पना' फिल्म भी आई। यह सुमित्रानंदन पंत के कथ्य—काव्य पर आधारित थी...

Sunday, September 8, 2024

'चिनार पुस्तक महोत्सव

'अमर उजाला' में...

कुछ दिन पहले श्रीनगर जाना हुआ था। 'चिनार पुस्तक महोत्सव' के एक सत्र 'पुस्तकें, पाठक और जीवन' पर बोलने के लिए। पत्रकार कंकणा लोहिया से जब संवाद कर रहा था, कश्मीर भ्रमण और वहां बिताए दिनों से जुड़ी कहानियों को लेकर युवाओं में विशेष आकर्षण पाया। सत्र के बाद युवाओं ने बड़ी संख्या में प्रश्न किए। मूल प्रश्न इस बात के इर्द—गिर्द थे कि लिखें कैसे? अभिव्यक्ति के रास्ते कैसे खुले? अपनी ओर से इनका समाधान किया परन्तु निरंतर मन में यह अनुभूत भी होता रहा कि कश्मीर में बदलाव आ रहा है। अभिव्यक्ति के बहाने युवा जीवन की नई राहों की ओर प्रस्थान करने को उत्सुक हैं।...
अमर उजाला, 8 सितम्बर 2024


गान का माधुर्य आगरा घराना

 "दैनिक जागरण" सोमवार के "सप्तरंग" में...

"...ख्याल क्या है? कल्पना में गूंथी दृष्टि ही तो! पर ख्याल गायकी और ध्रुवपद के मेल से गान का माधुर्य रस कहीं छलकता है तो वह आगरा घराना है... उस्ताद वसीम खान को ही सुन लें। लगेगा तानों के अनूठेपन में स्वरों की अनंत शक्ति, सौंदर्य उजास से वह जैसे साक्षात् कराते हैं...

दैनिक जागरण, 19 अगस्त 2024



Saturday, September 7, 2024

दृश्य के पार अदृश्य का मनोरम रचते हालोई

पत्रिका, 24 अगस्त 2024

बंगाल कलाओं की उर्वर भूमि है। यहीं से ब्रिटिश राज में भारतीय कला की आधुनिक दृष्टि 'बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट' का प्रसार हुआ। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर इसके प्रवर्तक थे।अबन ठाकुरके रूप में उनका बाल साहित्य भी तो बंग्ला साहित्य की अनुपम धरोहर है! उनकी कलाकृतियों में बरते रंगों में भी सदा किसी मासूम बच्चे की सी खिलखिलाहट अनुभूत की है। यह महज संयोग ही नहीं है कि यही खिलखिलाहट अमूर्तन में कला की इस दौर की भाषा रचने वाले गणेश हालोई के चित्रों में भी है। वह भी बंगाल के ही हैं।

कुछ समय पहले कोलकाता जाना हुआ तो उनके निवास स्थान जाने का भी संयोग हुआ। प्रयाग शुक्ल जी और कलाकार यूसुफ के संग उनसे बतियाना हुआ। लगा किसी संत से भेंट हो रही है। सहज, शांत और निश्छल व्यक्त्तिव! उनकी कलाकृतियों में भी यही सबसमाया है। कला की परिपक्वता पर दृश्य का अनूठा अबोधपन! अमूर्तता पर उसको समझने की जटिलता नहीं। सीधी, वक्र, लहरदार रेखाएं पर उनमें समाई अनूठी लय। जितना दृश्य का मनोरम वहां है, उतना ही अदृश्य की एकरसता भंग करने वाली साधना भी।

गणेश हालोई न्यूनतम रेखाओं में छवियों का आकाश रचते हैं। वह कहते भी हैं, 'अमूर्ततता ही सुंदर होती है। वास्तविकता दम घोंटने वाली होती है।' सत्तर के दशक में उन्होंने 'मेटास्केप' चित्र शृंखला सिरजी थी। मुझे लगता है यह यथार्थ से बिम्ब, प्रतीकों और भावों की ओर उनका कलाप्रस्थान था। कभी उन्होंने अजंता में रहकर भित्ति चित्रों की प्रतिकृतियां बनाई थी। पर अचरज होता है, उनके सिरजे में भारतीय कला की वह सुगंध तो है पर उसका अनुकरण नहीं है। सूफियाना फक्कड़पन वहां है। कैनवस और कागज पर उन्होंने धान के खेत, घास के मैदान, रहस्यमय नदियां, पहाड़, गुफाओं और जीवन से जुड़ी कहानियां सिरजी है। बंग्ला कवि जीवनानंद दास की कविताओं के तत्वों को भी उन्होंने अपनी कलाकृतियों में जीवंत किया है। बंगाल की भूमि और उसकी जलवायु को रंगों की सतहों संग क्षणभंगुर ब्योरों में उन्होंने सहज ही कैनवस पर उकेरा है। धूप, हवा, बहती नदी, सूरज की किरणें, बरसते बादल, बरखा की बूंदे और पलपल बदलता मौसम और इनसबमें घुलती और औचक लोप होती सी मानवीय आकृतियां भी। उनके घर पर जब बैठे बतिया रहे थे, उनने कहा, 'चित्रकला समझ से प्रारंभ होती है और आश्चर्य पर समाप्त होती है।' उनकी कलाकृतियों का सच यही है।

अपनी कलाकृतियां  दिखाते, कविताएं सुनाते कोई दिखावा, प्रदर्शन नहीं। प्राय: ऐसा नहीं करता पर मैं अपने को रोक नहीं पाता और वहीं किताबों के पास पड़े एक आमंत्रण पत्र को उठा लेता हूं। उन्हें सौंपते हुए ऑटोग्राफ देने का आग्रह है । निश्छल मुस्कान संग वह वह पैन से कुछ बनाने लगते हैं। तीन छोटी खड़ी रेखाएं, उनसे निकली कुछ टहनियां सी, जल का आभास कराती लहरदार रेखाएं, टेढ़ी और उन्हें क्रॉस करती और दो रेखाएंपक्षी का अहसास कराती एक आकृति और किनारे जल किनारे टापू सा बना कुछ! ठीक से वर्णित नहीं कर सकते, क्या बना है, पर मनोरम। वह हस्ताक्षर करते हैं और मेरा नाम लिखकर सौंप देते हैं।

अनुभूत करता हूं, गणेश हालोई दृश्य के पार जाते हैं। अंतर्मन उजास में अनुभूतियों का विरल रचते हैं। प्रकृति की लय का जैसे सांगीतिक छंद। हरे, नीले, पीले और धूसर में उन्होंने संवेदनाओं का उजास उकेरा है। रोशनी और अंधेरा पर स्पेस का अद्भुत विभाजन! भले ही उनके चित्र अमूर्त हैं, पर वहां दृश्य की सुगंध इस कदर समाई है कि बारबार रिझाती वह अपने पास बुलाती है।

लौट रहा, कथाओं में घुला दृश्य—कला जग

इस वर्ष के आरंभ में हुए एक सवें में पाया गया है कि भारतीय युवाओं में कॉमिक्स पढ़ने की रूचि में तेजी से बढ़त हो रही है। युवा सुपर हीरो बैटमैन, सुपरमैन, स्पाइडर मैन आदि की चित्रकथाओं के साथ ही जापानी चित्रकथाओं, जिन्हें 'मांगा' कहा जाता है को बहुत पंसद करते हैं। कॉमिक्स छवियों संग शब्दों के सुनियोजित मेल से जुड़ी दृश्य कला है।  शब्द संग संकेतो में घुला दृश्य—जग! सहज संप्रेष्य। अमेरिका में पिछले वर्ष शिक्षण संस्थाओं में विषयों को पढ़ाने के लिए उनका कॉमिक्स—रूपान्तरण किया गया। विद्यार्थियों ने इसे बहुत पंसद किया। 

पत्रिका, 7 सितम्बर 2024

हमारे यहां 'अमर चित्र कथा' घर—घर चाव से पढ़ी जाती रही है। लोकाख्यानों से लेकर पुराण, मिथकों और किंवदंतियों का अनुपम संसार इसी के जरिए बहुत से स्तरों पर बच्चों से लेकर बड़ों तक सहज पहुंचा। पर यह आसान कहां था! 'अमर चित्र कथा'  सर्जक थे—अनंत पै। वह पहले टाइम्स समूह में नौकरी करते थे। मैनड्रेक, द फैंटम आदि चरित्रों से जुड़ी इन्द्रजाल कॉमिक्स शृंखला का प्रकाशन टाइम्स समूह ने ही किया था। एक दिन अनंत पै ने जब दूरदर्शन पर प्रसारित प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम देखा तो अंदर से हिल गए। प्रतिभागियों ने ग्रीक पौराणिक कथाओं से जुड़े सवालों के जवाब तो तुरंत दे दिए, लेकिन भारतीय पौराणिक कथाओं से जुड़े एक भी सवाल का जवाब नहीं दे पाए। तभी अनंत पै ने तय कर लिया कि वह कुछ करेंगे। उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया की अपनी नौकरी छोड़ “अमर चित्र कथा” की शुरूआत की। इंडिया बुक हाउस के जीएल मीरचंदानी को इसके लिए उन्होंने राजी किया। यह वह समय था जब लोग चित्रकथाओं को हल्के स्तर की समझते थे। चित्रकथा प्रकाशन का पै का कार्य कार्य इसी कारण आरंभ में असफल रहा। पर वह हार मानने वाले नहीं थे। उन्होंने विद्यालयों से संपर्क किया। छात्रों के एक समूह को चित्रकथा का उपयोग कर और दूसरे समूह को पारंपरिक पुस्तकों से इतिहास पढ़ाया गया। दोनों समूहों का जब परीक्षण हुआ तो पाया गया, जिन्होंने चित्रकथा से अध्ययन किया वह इतिहास को अधिक ढंग से समझे। उनके इस प्रयोग ने थोड़े समय में ही क्रांति ला दी। 'अमर चित्र कथा' घर—घर में लोकप्रिय हो गयी। अनंत पै ने झाँसी की रानी, शिव, कार्तिकेय, गणेश, कृष्ण और शिशुपाल, ह्वेन सांग आदि चरित्रों के साथ ज्ञान की भारतीय परम्परा से जुड़े विषयों को चित्रकथाओं में पिरोया। वह दौर भी आया जब अमर चित्र कथा के 86 मिलियन से ज़्यादा संस्करण बिके। राजस्थान में ब्रजराज राजावत ने मूमल महेन्द्रा, पद्मिनी, लोक देवता बाबा रामदेव, सैणी बीणा, सुक्खा ठग, अमृता देवी का बलिदान जैसी और भी बहुत सारी सुंदर चित्रकथाएं सिरजी है। पर व्यावसायिक दृष्टि और पहुंच की सीमा के कारण वह पाठकों तक ढंग से पहुंच नहीं पायी। 

इधर देश की नई शिक्षा नीति के अंतर्गत शिक्षा के सभी स्तरों के पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परम्परा को सम्मिलित कर पढ़ाने की नीति पर जोर दिया गया है। सवाल यह उठता है कि क्या यह सहज संभव है? मुझे लगता है, कॉमिक्स इसमें खासा मदद कर सकते हैं। बच्चों ही नहीं बड़ों पर भी दृश्य—शब्द प्रभाव गहरा असर करते हैं। छवियों संग यदि शब्द पढ़ें जाए तो वह स्मृति में लम्बे समय तक जीवंत रहते हैं। पाठकीय बोझिलता वहां समाप्त जो हो जाती है! विश्वभर में इसीलिए इधर कथा—कहानियों के पुस्तक संस्करणों से कहीं अधिक ग्राफिक उपन्यासों का रूझान बढ़ रहा है। युवाओं के लिए जितनी रोचक सुपरहीरो और रहस्य—रोमांचक चित्रकथाएं हैं, उतनी ही भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़े विषय हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें 'अमर चित्र कथा' की तर्ज पर प्रस्तुत किया जाए। कुछ समय पहले चुनाव आयोग ने मतदान—जागरूकता के लिए ऐसा सफल प्रयोग किया था। कॉमिक बुक "चाचा चौधरी और चुनावी दंगल" के जरिए युवाओं को अपना नामांकन करने और भाग लेने के लिए प्रेरित करने की पहल हुई थी। यह सच है, कथा कहती छवियां मन में गहरा असर करती है। 



Saturday, August 10, 2024

ध्यान के ज्ञान से जुड़ी कलाकृतियां


न्यूयॉर्क टाइम्स की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व भर के युवाओं में बीते जमाने की बात रही सुलेखन कला या कहें कैलिग्राफी के प्रति रुचि तेजी से बढ़ रही है। सुलेखन दृश्य कला है। इसमें कलम, स्याही, ब्रश से अक्षरों में डिजाइन कर कुछ कहा जाता है। माने जितना दृश्य महत्वपूर्ण है, उतना ही अदृश्य भी है। मैं समझता हूं, युवाओं में यह सुलेखन की रूचि—भर नहीं है। यह ध्यान के ज्ञान से जोड़ने की प्रक्रिया है।
राजस्थान पत्रिका, 10 अगस्त 2024

कलाओं में बड़ा यथार्थ वह नहीं होता है जो दिखाई देता हैवह होता है जो देखने के बाद मन में घटता है। वैचारिक रूप से संपन्न कलाकृतियां इसीलिए आकृष्ट करती है। कुछ दिन पहले कोलकाता जाना हुआ। यह देखकर सुखद अचरज हुआ कि देश के ख्यात कलाकार युसूफ की कलाकृतियों को देखने के लिए महानगर का बहुत बड़ा युवा वर्ग एकत्र हुआ था। कुछ समय के अंतराल में ही उनकी कलाकृतियों को मुंबईलखनऊचेन्नईपांडिचेरीकोलकाता आदि शहरों में प्रदर्शित किया जा रहा है। महत्वपूर्ण यह भी है कि कला दीर्घाओं में हर बार उनकी नई कलाकृतियां प्रदर्शित होती रही है।

मसलन कोलकाता की आकृति आर्ट गैलरी में युसूफ की कलाकृतियां सुलेखन की भांति अर्थ की विरल छटाएं बिखेरती लुभा रही थी। प्रकृति और जीवन वहां एकाकार हो रहा था। एक कलाकृति में बड़ी सी गर्दन और फिर कोई चेहरा। पर थोड़ा ठहरकरठिठककर देखेंगे तो पाएंगे वृक्ष है। भरी पूरी डालो का। कुछ टेढ़ा हुआ सा। यही होता हैएब्सट्रेक्ट अर्थ के आग्रह से मुक्त होती है। रंगरूप और रेखाएं वहां स्वयंप्रतिष्ठ होकर अर्थ की भांत—भांत की छटाएं रचती है।

युसूफ की कलाकृतियां घूंट घूंट आस्वाद के लिए उकसाती है। वहां जैसे कथा कोलाज हैं। गोल मटोल पृथ्वी इंक से बरती रंग लय में औचक अंडाकार होती दो भागों में विभक्त हों रही है। कड़कती बिजलीपेड़पानीआकाश और गृहनक्षत्रों की बहुतेरी अनुभूतियां इन्हें देखने से होती है। कहीं रंग लहर से निकल स्वयमेव लेटे हुए व्यक्ति की नींद से हमें साक्षात करा रहे हैं तो कहीं टेढ़े और खड़ी लाइन के आकार में इमारतव्यक्तिसीढ़ी और जमीन के टुकड़े संग कहीं कोई कस्बाई जीवन सांस लेता नजर आता है।

युसूफ ने आरंभ में भारत भवन के पूर्व निदेशक जगदीश स्वामीनाथन के साथ आदिवासी कलाओं का निरंतर अन्वेषण किया तो वहां का भी बहुत—कुछ उनकी कला में बाद में समाता चला गया। इसलिए उनके रेखांकनों में आदिवासी जीवनानुभूतियां भी समाई हुई है। पेड़ की शाखाओं और उनसे झरते पत्तों की अनुभूतियों को टेक्सचर में जैसे उन्होंने घोल दिया है। वह कहते भी हैंपेंटिंग जीवंत होती है। इसलिए कि उसमें ऊर्जा होती है। ऊर्जा का कोई एक रूप नहीं होता। वह बदलता रहता है। इसी तरह कला ऊर्जा के रूपाकार ग्रहण कर हमें लुभाती है।

कभी उन्होंने सिलाई मशीनों के मूर्तिशिल्प भी सिरजे। इनमें सिलाई मशीन मनुष्य के हैड में रूपांतरित होती जैसे जीवन से जुड़े द्वन्दों से हमें साक्षात कराती है। बड़ी रोचक कहानी हैइसकी। वह कहते हैंएक दफा हमारे यहां बाढ़ आई तो लोग पलायन करने लगे। मैंने देखाएक व्यक्ति अपने परिजनों को छोड़कर अपनी सिलाई मशीन लिए भागा जा रहा है। मुझे लगासंवेदना गौण हो रही है। आदमी को लगामशीन जरूरी है। इसे बचा लूं। मेरी मूर्तियों में फिर सिलाई मशीन में सर रह गया। धड़ गायब होता चला गया। ऐसे ही कभी उन्होंने नोटेशन शृंखला बनाई। संगीत की ध्वनियां सरीखी रेखाओं की जीवंतता में। युसूफ की कलाकृतियां संवेदना से भरी—पूरी  है। दृश्य आख्यान सरीखी। जो कुछ वहां हैलयात्मक है। एक खास तरह की एकांतिका वहां है। औचक कोई पहाड़ पेड़ में रूपांतरित हो जाता हैपेड़ पहाड़ में। फन फैलाए नाग और उसको मनुष्य की दो बाहों का घेरा जैसे आगे बढ़ने से रोक रहा है। ऐसे ही पत्तियां हैंपेड़ से बिछड़ी पर हवा में ठहरी सी। कला में यही होता हैदृश्य से बड़ी वहां अदृश्य की सत्ता होती है। युसूफ की कलाकृतियां इसका उदाहरण है। युवाओं में कला के जरिए ध्यान के ज्ञान में प्रवेश कराती हुई।