ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, February 22, 2026

कत्रिम बुद्धिमता के दौर में कला—संस्कृति से जुड़ी जीवंतता


पत्रिका, 21 फरवरी 2026
कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंपैक्ट समिट ने वैश्विक स्तर पर हमें अग्रणी करने की दृष्टि से भले ही जोड़ा है परन्तु मौलिक चिंतन और मनन में यह शून्य उपजाने की बहुत सी आशंकाएं लिए भी है। लुप्त कलाओं की रिकॉर्डिग, अभिलेखीय संरक्षण में इसका बेहतर उपयोग हो सकता है परन्तु सब—कुछ जब मशीन ही करेगी तो मौलिक रचने, उसमें बसने की संभावनाएं क्या तेजी से समाप्त नहीं होगी!  ए.आई. शून्य से सृजन नहीं करती। मानव मस्तिष्क से पुनर्संरचित और अनुमान पर ही इसका अस्तित्व है।

बड़ा संकट यह भी है कि हमने सूचनाओं को ही ज्ञान मानना प्रारंभ कर दिया है। सूचनाएं, संस्कृति से जुड़ी दृष्टि तक पहुंच की सुगमता हो सकती है परन्तु कलाओं से जुड़ा विचार नहीं हो सकती। भारतीय कलाएं प्रतिकधर्मी है। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकलाएं आदि सभी में प्रतीकों से सूचनाओं का संप्रेषण होता है। एब्सट्रेक्ट ही नहीं आदिवासी और जनजातीय कलाओं के संसार में जाएंगे तो पाएंगे, वहां प्रतीकों में, अर्थगर्भित संकेतो में और कहन की भांत—भांत की छटाओं में संसार बुना गया है। ए.आई.बहुत सारे एकत्र शास्त्रीय संगीत, नृत्य की भंगिमाओं, नाट्य से जुड़ी परम्पराओं का एकत्रीकरण कर स्वयंमेव बहुत सारा उससे नया गढ़ देगी परन्तु वहां मनुष्य सिरजे की जीवंतता कहां से आएगी! प्रकृति की छटाएं, परिवेश की सुगंध वहां कैसे घुलेगी! जब बहुत सारा संस्कृति से जुड़ा सूचनाओं का ढेर हमारे पास सदा मौजूद रहेगा तो यह भी हो सकता है, हम कला में नया कुछ रचने की आदत को ही बिसरा दें।  

याद रखें, प्रकृति और परिवेश का संतुलन बिगड़ते ही सूचनाओं के स्त्रोत सूखने लगते हैं। मनुष्य और मशीन में यही बड़ा फर्क है। मनुष्य मस्तिष्क परिवेश और प्रकृति प्रदत्त सूचनाओं को निरंतर ग्रहण करता है परन्तु कहीं ठहरता नहीं है। इसलिए बहुतेरी बार अनपेक्षित अप्रत्याशित कलाओं का सृजन अनायास मनुष्य मन कर देता है। वह सूचनाओं का आश्रित नहीं होता—सूचना पाने की उसमें हौड़ नहीं होती। सहज, स्वाभाविक सूचनाएं पाकर वह उससे अपने आपको पोषित करता है।

ए.आई. में कलाओं से जुड़ी सूचनाओं के स्त्रोत महत्वपूर्ण कारक होते हैं। इनके आधार पर वहां बुद्धिमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन होता दिखता है पर यदि सूचनाएं गलत होगी या अनर्गल होगी तो सर्वथा विनाश की संभावनाएं भी बनेगी। मशीन—मनुष्य में बड़ा भेद यही है कि मशीन प्रदत्त सुचनाओं अथवा बहुत सारे एकत्र सूचना—बैंक का विश्लेषण कर उनको नियोजित कर परिणाम देगी परन्तु मानव मन चेतन—अचेतन से, प्रकृति से निंरतर संकेत—सूचनाएं तो लेता है परन्तु अच्छे—बुरे में भेद कर उसका उपयोग करना जानता है। मशीन अच्छे—बुरे में भेद नहीं कर सकती।  संस्कृति का अर्थ है—सुधरा हुआ। परिष्कृत। जीवन जीने का ढंग। कलाओं में जीवन जीने का यह ढंग अभिव्यक्ति पाता है तो उर में उमंग जगाता है। मनुष्य की चैतन्य अवस्था का यह स्वाभाविक गुण है। मशीन का नहीं।

सूचनाओं के विष्फोट के इस दौर में मानव मष्तिष्क को पढ़, उससे अपना गढ़ने का गुण तो कृत्रि बुद्धिमता ने पा लिया है परन्तु सूचनाओं को संस्कृति मान आगे बढ़ने की जोखिम बढ़ने लगी है। चिंतन, ठहरकर सोचने की दृष्टि चुपके से इससे हमसे लोप होने लगी है। एकरसता में विविधता सिमट रही है। प्राचीन ग्रंथों, कलाओं से जुड़ी विरासत का डिजिटलाईजेशन तो हो रहा है परन्तु संकट यह है कि उसमें जो कुछ हमारे पास मौजूद हो रहा है—उसे पढ़ने की फुर्सत एक समय में बहुत सारा एक साथ पाने के लालच में क्या मिल पाएगी!

Wednesday, February 18, 2026

हलीम जाफर खान

 'दैनिक जागरण' में आज...

"उस्ताद हलीम जाफर खान का सितार बजता नहीं, गाता था। सितार को लोकप्रिय कर जन जन तक पहुंचाने वाली त्रयी-उस्ताद विलायत खान, पंडित रवि शंकर के साथ उस्ताद हलीम जाफर खान इस रूप में महत्वपूर्ण थे कि उन्होंने सितार का चमत्कृत करता सर्वथा अनूठा जाफरखानी बाज आविष्कृत किया। कर्नाटकी और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रस माधुर्य में उन्होंने सितार के गान पक्ष को लोकप्रिय किया। उनका सितार सुनेंगे तो पाएंगे छोटे छोटे स्वर, स्वरों में गुंथे और बहुत सारे अलंकृत स्वर मन को झंकृत करते हैं। मुझे लगता है, उनका सितार कहन का माधुर्य छंद है। ...उनके सितार की चंचलता, स्वर ठहराव और औचक ध्वनियों में घुला मधुर प्रवाह इसलिए भी मन को भाता है कि वहां सितार का कृन्तन है। कृन्तन माने मिज़राब को एक ही आघात में दो, तीन अथवा चार स्वरों को बिना मींड के केवल उँगलियों की सहायता से निकालते वह स्वरों को एक खास अंदाज में सदा ही सजाते रहे हैं।..."
दैनिक जागरण 16 फरवरी 2026


Saturday, January 17, 2026

कलाओ में रस और नाट्यशास्त्र

पत्रिका 17 जनवरी, 2025

"...रस निष्पति माने स्वाद की सिद्धि। नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में आया है, ’न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते रस’ यानी रस के बिना किसी अर्थ का प्रवर्तन नहीं होता।

नाट्यशास्त्र पंचम वेद है। ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, साम से गीत और अथर्ववेद से इसमें रस लिया गया है। अथर्ववेद से रस क्यों? इसलिए कि अथर्ववेद मन से जुड़ा है। जादू टोना, वशीकरण, विवाह मर्यादा आदि भी इसी में है। अथर्व ब्रह्म वेद है। माने मन को जो बांध ले।

मन किससे बंधता है, भाव से ही तो! भाव से ही रस आता है। इसलिए कहूं, नाट्यशास्त्र का बीजाक्षर रस है। रस माने जोड़ना, जुड़ना, बांधना। वाल्मीकि ने तमसा के तट पर कोंच वध देखा। शोकाकुल हो उनके मन में श्लोक उपजा। यही विश्व की पहली कविता बन गई।

सुमित्रानंदन पंत ने इसलिए कहा, 'वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान, निकल आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अन्जान।’ रामायण क्या है? राम का अयन ही तो! राम-सीता की विरह गाथा। शोक दुख नहीं है। करुण रस है। दुखी आदमी कुछ रच नहीं सकता। रस रचता है।"...




स्वामी विवेकानंद जयंती पर व्याख्यान


महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के आग्रह पर महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के आग्रह पर 12 जनवरी 2026 को  'भारतीय ज्ञान परम्परा' पर मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान देने जाना हुआ..."ज्ञान परम्परा का अर्थ ही है, स्वीकार और निरंतर परिष्कार। 'ज्ञान परम्परा' पुस्तकों से नहीं समझाई जा सकती। यह संपूर्ण जीवन ही ज्ञान—परम्परा है। पश्चिम का चिंतन गणित से प्रारंभ होता है। विश्लेषण से श्रेणियां बनाना, वर्ग का विभाजन  की दृष्टि वहां है। भारतीय चिंतन का आधार संश्लेषण है। माने संबद्धता। रचना प्रक्रिया। सोचिए, प्रकाश संश्लेषण न हो, तो पौधे ऑक्सीजन उत्पन्न नहीं करें। इस दीठ से पूरी की पूरी भारतीय परम्परा सहमति—असहमति की संबद्धता से गूंथी हुई है। यहां नकार नहीं है। इसीलिए कहा गया, कोई भी ऋषि ऐसा नहीं है जिसका वचन प्रमाणित माना जाए। हमारे यहां शंकराचार्य का अद्वैत भी मान्य हुआ है तो कबीर और रैदास को भी हमने पूजा है। लोक में भी उन्हें ही पूजा गया जिन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीवन समर्पित किया। लोकदेवताओं की मान्यता से बड़ा इसका और बड़ा उदाहरण क्या होगा! प्रकृति पूजन से जुड़ी है, ज्ञान परम्परा।  अकेला भारत है, जहां नदी की पैदल परिक्रमा का विधान है। शिव—पुत्री नर्मदे की परिक्रमा का अर्थ है, अपने भीतर के अहंकार से मुक्त होकर अपने—आप का समर्पण...यही सब तो है, हमारी ज्ञान परम्परा।..."





Monday, December 29, 2025

"आखर" में अनुवाद कार्यशाला

 'आखर' ने राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति में लेखकों की दो दिवसीय अनुवाद कार्यशाला आयोजित की। समापन समारोह में बोलने जाना हुआ। यह अपनी भाषा के लेखकों के सान्निध्य से संपन्न होने का अवसर था। प्रमोद शर्मा जी ने महती पहल की है। भारतीय भाषाओं से राजस्थानी में सूझ से जुड़ी अनुवाद की खिड़की खोली है...

पंजाब केसरी 29 दिसम्बर 2025

पत्रिका 29 दिसम्बर 2025

अनुवाद कार्यशाला, 28 दिसम्बर 2025







Wednesday, December 24, 2025

सारंगी का सौरंगी गान

जागरण, 22 दिसम्बर 2025

 सारंगी सौ रंगों से जुडा है। कुछ लोग संस्कृत शब्द “सारंग” से भी इसे जोड़कर देखते हैं। जो हो, सारंगी करूणा, प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, रूदन के साथ जीवन के तमाम रसों का नाद करने वाला तत्वाद्य है। सुनेंगे तो लगेगा ध्वनियों का रस बरस रहा है। मानव कंठ सरीखा आलाप वहां है तो मींड और गमक भी है। कंठ से जो सधे, सारंगी उसे सजाए। राजस्थानी लोकवाद्य ‘रावणहत्था’ भी कुछ कुछ सारंगी सरीखा ही है। सारंगी कभी कोठों में बजती थी। पर, इसे कोठों की पहचान से शास्त्रीय रंगों में किसी ने साधा तो वह पंडित रामनारायण रहे हैं। पंडित रामनारायण की सारंगी बजती नहीं, गाती है। उनसे निकट का नाता रहा। जब भी मिले सारंगी के रस माधुर्य का नया कुछ सौंपा। ठुमरी के बोल की आवृतियां करती उनकी सारंगी। उल्टे-सीधे, छोटे-लम्बे गज! तानों में एक साथ कई सप्तकों की सपाट तान। सच! उनकी सारंगी सदा दृश्य भाषा रचती। ठुमरी ही नहीं राग जोगिया में वह असार संसार का सार समझाते। राग मुल्तानी, किरवानी, मिश्र भैरवी और राग बैरागी भैरव! अतृप्त प्यास जगाते हैं, सारंगी के उनके सुर। सब कुछ पा लेने के मोह से मुक्त ही तो करता है उनका सारंगी नाद! 

उदयपुर में वह जन्में और फिर बाद में मुम्बई में ही बस गए। उस्ताद अमीर खाॅं, गंगूबाई हंगल, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, केसर बाई, बड़े गुलाम अली खां के साथ उन्होंने सारंगी संगत की। यहूदी मेनुहिन, पैब्लो कासाल्स और रास्त्रोपोविच के साथ विश्वभर के मंचों पर उन्होंने सारंगी की प्रस्तुतियां दी। वह नहीं होते तो सारंगी कब की अतीत बन हमसे विदा ले चुकी होती। पिता नाथूजी बियावत दिलरूबा बजाते पर पंडितजी ने सारंगी अपनायी। वर्ष 1956 में पंडितजी ने मुम्बई के संगीत समारोह में पहली बार एकल सारंगी वादन किया। बस फिर तो देश-विदेश में उनकी सारंगी गाने लगी। सारंगी के सुरों की वर्षा पहले पहल फिल्मों में उन्होंने ही की।

याद करें ‘कश्मीर की कली’ का ‘दिवाना हुआ बादल...’ गीत। गीत की धुन में सारंगी के सुर क्या लाजवाब सधे हैं! बीन अंग आलाप के साथ मन्द्र सप्तक से लेकर अतिसार सप्तकों तक वह सारंगी की सदा बढ़त करते। उदयपुर से मुम्बई, लाहौर रेडियो स्टेशन पर स्टाफ आर्टिस्ट के रूप में कार्य करने और फिर कोठों से निकालकर सारंगी को शास्त्रीयता की पवित्रता के साथ स्थापित पर उनसे एक दफा संवाद हुआ तो कहने लगे, ‘सारंगी कोठों में कैद थी। बाहर तब बजती भी कहां थी! नृत्यांगनाओं के नृत्य मे ंप्रयुक्त संगीत के वाद्यों से निकाल एकल इसे बजाने की कार्यक्रम किए। फिल्मों में इसीलिए बजाया कि इसे मान मिले। संकट बहुत आए, परवाह नहीं की।" पंडितजी ने 1944 में रेडियों आर्टिस्ट के रूप में ऑल इंडिया रेडियो में स्टाफ आर्टिस्ट बने। पर वहां कार्यक्रम करने को नहीं मिलता। मिलता तो कार्यक्रम काट दिया जाता। उन्होंने सारंगी को ही अपने को समर्पित कर दिया। उनके प्रयास रंग लाए, सारंगी जन मन में बसने लगी।

सारंगी में गज का संतुलन उन्होंने ही पहले पहल समझाया। उनकी सारंगी बजते सौ रंगों की बरखा ही तो करती है, विश्वास नहीं है तो सुनें। मन करेगा, गुनें। गुनते ही रहें। वह नहीं हैं, पर सारंगी की उनकी दी सौगात स्वरों की हमारी थाती है।


Saturday, December 20, 2025

छायांकन—कला में समाई सौंदर्य—सृष्टि

पत्रिका, 20 दिसम्बर 2025

छायांकन  दृष्य- बंध कला है। दृश्यों में बाँधने की कला साधना। इसलिए तो कैमरे से निकली सुंदर छवियां  हमें भातीहै। किसी विशेष मुद्रा के भावों में हमारे अपने ही छाया चित्रों से हमें कई बार ऐसा मोह हो जाता है कि उनसे हम अपने को मुक्त नहीं कर पाते। छायाकार अनुभूतियों का सौन्दर्यान्वेषण करता है। देखने की विशिष्ट सूझ से दृश्यों का रूपक गढ़ता है। जो दिख रहा है,  वही सत्य कहां होता है! सत्य उसमें निहित भाव भव होता है। स्थिर छायाचित्र में ही नहीं मूवी में भी  कैमरा साधन होता है, साध्य छायाकार की कला दृष्टि होती है। इसी से छायाकार यथार्थ को भी सौंदर्य- छटाओं में रम्य बनाता हमें लुभाता है।

फिल्मों में हीरो-हिरोइन सुंदर दिखते है।  क्या वह वास्तव में वैसे होते है?  हां, सुंदर बहुत सा होता है, पर उसे स्वप्न-सौंदर्य में रूपांतरित कैमरामैन करता है। राजकपूर की,  सत्यजित राय की और मणिकौल की फिल्में देखें। वहां दृश्यों में छाया-प्रकाश संवेदना की कथा कहते मिलेंगे ।  सिनेमेटोग्राफर  राधु करमाकर ने राजकपूर की प्रायः सभी फिल्मों में छायांकन किया। उनका अनुभूति आलोक है, "नर्गिस सर्वश्रेष्ठ सुंदरी नहीं थी। पर कैमरे में दिखती है।" यह सच है। असल में नर्गिस का व्यक्तित्व गरिमापूर्ण था। आभामंडल मोहक था। यह उसे फिल्माने वाले छायाकार थे जो चेहरे के उन भावों को पढ़ उसे अपनी छायांकन-कला में रूपांतरित कर देते थे। छायांकन में भाव, दृश्य में निहित संवेदना पढ़ना आना ही कला है।  इसीलिए कैमरे की आंख से नर्गिस गतिशील चेहरे में गरिमा संपन्न ऐसे भव्य सौंदर्य में हमें नजर आती है, जैसे ईश्वर रचित चेहरे से हम साक्षात हो रहे हैं। यह सब उनके चेहरे का जितना सच था उससे अधिक छायाकार की वह सौंदर्य दृष्टि है, जिसमें कैमरे ने इतने अच्छे कोणों से चेहरा संजोया कि वह अप्रतिम सौंदर्य बन हमें लुभाता है।

छायांकन कला का बड़ा सच क्षण जो घट  रहा है,  उसमें कुछ खास लगा त्वरित संजोना है। इसी से साधारण भी बहुत बार असाधारण या कालातीत बन जाता है। कैमरे की तकनीक अद्भुत तो कर सकती है पर सौन्दर्य का सृजन तो वह कला दृष्टि ही करती है जिसमें  दृश्य  के समानान्तर संवेदनाओं को सहेजा जाता है।  

कैमरामैन छाया प्रकाश की संवेदना और दूर, नजदीक में भाव भरने का अर्थ सामर्थ्य रखता है। इसी से दृश्य जितना सुंदर होता नहीं उससे अधिक सुंदर बन जाता है। फिल्मों में एक समय वह भी था जब हिरोइनें हीरो से नहीं अच्छे भविष्य के लिए कैमरामैन से विवाह करती थी। या कहें प्यार करने का कईं बार नाटक रचती थी। इसलिए कि कैमरामैन राजी नहीं तो सुंदर चेहरे का भी भद्दे कोण से चित्र ले अभिनेत्रियों का भविष्य चौपट कर देता था। आरंभिक अभिनेत्रियों में शांता आप्टे कैमरे से बाहर देखने में इतनी सुंदर नहीं थी पर उनका चेहरा सदा ही सुंदर दर्शाया गया। बकौल राधु करमाकर मूवी कैमरा प्रकाश के सहारे चित्रकारी करता है। जिंदगी, प्रकृति और समाज को देखने और मानव मन को आत्मसात करने की सूझ जितनी अधिक छायाकार में होगी, सुंदर से अति सुंदर घटित होगा। इसीलिए कहूं, छायांकन अन्वेषण कला है। जो छायाकार जिंदगी को, व्यक्ति को जितना अधिक बारीकी से भांत भांत की अर्थ छटाओं में देखने की कला दृष्टि रखेगा, वही सार्थक और सुंदर स्थिर और चलायमान चित्र सिरज सकेगा।


Saturday, December 6, 2025

'नाट्यशास्त्र' पर एकाग्र


नाट्यशास्त्र ने सदा ही मन को मथा है। सुखद है, मर्मज्ञ विद्वानों ने मेरे आग्रह का मान रखते हुए इस ग्रंथ पर एकाग्र संपादन—कार्य में सहयोग किया। शुक्रवार 5 दिसम्बर 2025 को चंडीगढ़ में पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाबचंद कटारिया ने इसका लोकार्पण किया। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन स्थापित उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक, मित्र फुरकान खान जी की पहल पर नाट्यशास्त्र पर महती विमर्श से जुड़े इस संपादन कार्य को कर सका। उन्होंने बहुत सुंदर रूप में पुस्तक प्रकाशित की है। जब इसके संपादन के लिए कार्य प्रारंभ किया तब लगा था, लेखक—मित्र जल्द अपना लिखा भेज देंगे। पर, लेखकों से लिखवाना आसान कहां है! देवेन्द्र सत्यार्थी जी निरंतर याद आते रहे। वह 'आजकल' के संस्थापक—संपादक थे। उनसे संपादन अनुभव के बारे में एक दफा पूछा गया तो उनका कहना था, "लेखक से लिखवाना सबसे मुश्किल काम है।" मेरा यह अनुभव भी ऐसा ही रहा हैं। बार—बार आग्रह करता रहा। तगादे भी खुब किए कईं बार यही लगा, लिखना आसान है, लिखवाना कठिन! पर, कृतज्ञ हूं...उन सभी विद्वान लेखकों का जिन्होंने नाट्यशास्त्र पर लेखन—सहयोग किया। नाम पर जाएंगे तो 'नाट्यशास्त्र' नाट्य विधा से जुड़ा लगेगा पर गायन, वादन, नर्तन, अभिनय आदि के साथ कोई कला इससे अछूती नहीं है। यह विडंबना ही है कि कलाओं के मर्म में ले जाता नाट्यशास्त्र विमर्श में बहुत अधिक रहा नहीं। विश्वास है—इस दृष्टि से यह संपादन—कृति पाठकों को नाट्यशास्त्र की वृहद ज्ञान परंपरा से जोड़ती सर्वथा नया अनुभव देगी।




नृत्य विसर्जन है...

 'रंग संवाद', नवीन अंक में—

"...नृत्य विसर्जन है। देह से, अपने आप का। देह से परे चले जाना ही नृत्य की असल परिणति है। कालिदास के नाटकों में 'चलित' नृत्य का संदर्भ आता है। चतुष्पद आधारित इस नृत्य—रूप में नर्तक अभिनय करता भावों में गुम हो जाता है। हमारे सभी शास्त्रीय और लोक नृत्य इसी रूप में अनुष्ठान हैं। रूसी नर्तक निजिंस्की नृत्य करते इतनी ऊंची छलांग लगाया करते थे कि गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत धरे रह जाते थे। किसी ने उनसे पूछा नृत्य में आप यह कैसे करते हैं? निजिंस्की का जवाब था नहीं पता। नृत्य करते मैं लापता हो जाता हूं।"