ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Wednesday, June 28, 2023

ऑंख भर उमंग’ की समीक्षा

प्रकाशन विभाग की पत्रिका ’आजकल’ के जुलाई 2023 अंक में यात्रा संस्मरण ’ऑंख भर उमंग’ की समीक्षा संस्कृतिकर्मी, आलोचक मंजरी सिन्हा जी ने की है...




Saturday, June 17, 2023

असाध्य की साधना है कला

कलाओं की समझ कैसे हो, इस पर सदा ही सवाल उठते रहे हैं। पिकासो ने कभी प्रश्न किया था कि कला को क्यों समझें? मूल अर्थ में ही यहां जवाब भी है। कलाएं समझाई नहीं जा सकती। वह तो ध्यान से ही सुनी-गुनी जा सकती है। मुझे लगंता है, किसी कलाकृति में जितनी कम चतुराई होगी, उतनी ही वह संप्रेषणीय होगी। कहानी है, राजा की सभा में उस्ताद गा रहे थे। गान पूर्ण हुआ तो सब 'वाह’, ’वाह’ कर उठे। उस्ताद संतुष्ट न हुए। बोले, संगीत से निपट अनजान भी ऐसे ही प्रशंसा करे तो मानूं। राजा ने संगीत की समझ नहीं रखने वाले एक गड़रिये को उस्ताद का गान सुनने बिठा दिया। गान पूर्ण हुआ तो उससे पूछा गया, 'कैसा लगा उस्तादजी का गाना?’ वह बोला, 'गाना तो कुछ समझ न पड़ा। पर इच्छा हो रही है कि सुनता ही रहूं।’ यह जो ’सुनता ही रहूं’ व्यंजना है, वही असल में कला और उसकी सार्थकता है।

राजस्थान पत्रिका, 17 जून 2023

सोचिए! कलादीर्घाएं पहले से कईं गुना बढ़ गयी है। संगीत, नाट्य, नृत्य प्रस्तुतियों का विस्तार भी कम नहीं हुआ है पर इस अनुपात में क्या कला रसिक समाज बना है? कला मर्मज्ञ का खि़ताब तो कोई संगीत, चित्रकला, वास्तु, नृत्य, नाट्य के इतिहास और थोड़ी-बहुत इनसे जुड़ी जानकारी से भी ले सकता है। परन्तु मन का क्या? मन तो रंजित तभी होता है जब कला अंतर को आलोकित करे। अज्ञेय की लम्बी कविता है, 'असाध्य वीणा।' कविता से जुड़ी कथा कुछ इस तरह से है कि राजदरबार में एक वीणा है, जिसे कोई साध नहीं सका। एक रोज़ दरबार में केशकम्बली प्रियवंद आता है। वह वीणा को गोद में ले बैठ जाता है। ध्यानमग्न हो अपने आपको भी भूल जाता है। वीणा जिस वृक्ष से बनी, उसकी डाली-डाली, उस पर बैठने वाले पक्षियों, उसकी पत्तियों पर हुई वर्षा-बूंदों की झम-झम। घनी रात में महूए के टपकने, वहां से गुजरने वाले हाथियों और जंगल के संपूर्ण परिवेश से एकाकार होते वह वीणा के मूल में, उसके बजने की अभ्यर्थना में अपने आपको तिरोहित कर देता है। औचक उसकी कांपती उंगलियों से वीणा गा उठती है। स्वरों का वह माधुर्य सबको अपनी-अपनी दीठ में सौंदर्य प्रदान करता सुहाता है। असाध्य की यही साधना है।

हमारे यहां चित्रकलाओं का संसार ऐसे ही गुना-बुना गया है। ऐलोरा में एक बहुत सुंदर मूर्ति है। इसमें रावण कैलास को उठाने के प्रयास में है।  शिव अविचल समाधिस्थ बैठे हैं। पार्वती भयभीत हैं और उसकी सखियां इधर-उधर भाग रही है। मूर्तिकार ने वाल्मीकि रामायण से यह प्रसंग लिया है। कुबेर की लंका और पुष्पक विमान छीनकर रावण यमराज को भी हराकर लौट रहा है। कैलास के पास विमान डगमगाता है। रावण क्रोधित हो कैलास को हटाने का प्रयास करता है। शिव अंगूठे से कैलास को स्थिर करते हैं और फिर जब रावण का हाथ दब जाता है तो वह ’रव’ यानी हृदय-विदारक चीत्कार करता है। इसी से वह रावण कहा जाता है। इस कहानी को मूर्तिकार ने मूर्ति में इस कदर घोला है कि देखते मन नहीं थकता। हमारे यहां इतिहास भी इसी तरह कला में रूपायित हुआ है। शोध करेंगे तो और भी बहुत महत्वपूर्ण मिलेगा। भारतीय लघु चित्र-शैलियों को ही लें। चटख रंग वहां है। घनीभूत। बहुत सारे अलंकण और ढेर सारी कथाएं गूंथी हुई, पर देखेंगे तो पाएंगे उनका लदा देखने में निहित कोई बोझ वहां नहीं है। इसलिए कि कलाकार उन्हें उकेरते, वहां रंग बरतते कथा के भाव-लोक में रम गया है। बहुत बड़ी कथा को छोटे से चित्र में साधना सरल कहां है! फिर से कहूं, असाध्य की यही तो साधना है!

Saturday, June 3, 2023

ध्रुवपद-धमार में जीवंत होता है तमाशा


भरतमुनि का नाट्यशास्त्र संहिता है। कहें, सभी कलाओं का एक तरह से एकत्र ज्ञान वहां है। इसमें एक स्थान पर आता है कि जो कला शास्त्र में नहीं है, उसे लोक में खोजा जाए। लोक नाट्य की चर्चा वहां लोकधर्मी नाट्य के रूप में हुई है। लोकनाट्य का अर्थ ही है, वह जो लोक स्वभाव को प्रदर्शित करे। बगैर किसी दिखावे के जहां सामान्यजन की क्रियाओं और व्यवहार को सहज प्रदर्शित किया जाए। रम्मत, ख्याल, गवरी, नौटंकी आदि ऐसे ही लोकनाट्य हैं, जिनमें लोक का आलोक है। यूं जयपुर तमाशा भी लोकनाट्य ही है पर इसमें कोई एक नहीं बहुत सारी और कलाओं का भी अनूठा घोल मिला हुआ है। मुझे लगता है, लोक में शास्त्रीयता की सुगंध कहीं है तो वह जयपुर तमाशा में है।

प्रायः इसे महाराष्ट्र में होने वाले तमाशा से जोड़कर देखा और इसी संदर्भ में इस पर लिखा जाता रहा है। पर कुछ दिन पहले इसके अप्रतिम कलाकार वासुदेव भट्ट से दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम ’संवाद’ में जब चर्चा हो रही तो लगा, यह लोकनाट्य भर नहीं है, युगीन संदर्भों से जुड़ा लोकानुरंजन है। इसके जनक बंशीधर भट्ट रहे हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी उनके परिवार ने ही बाद में इसे पोषित किया और इसमें बाकायदा शास्त्रीयता का रस घोलते बढ़त की। फूलजी भट्ट, गोपीजी के बाद वासुदेव भट्ट और दिलीप भट्ट अभी भी इसे जीवंत किए हुए हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के साथ अभिनय का अपूर्व संगम इसमें होता है। 

राजस्थान पत्रिका, 3 जून 2023


तमाशा खुले में होता है। जहां होता है, वह स्थान अखाड़ा कहलाता है। कलाकार पौराणिक कथाओं, लोकाख्यानों के साथ आधुनिक संदर्भों को भी अपने तई तमाशों में गुनते-बुनते हैं। पर जब वह  घुंघरू बंधे पैरों के साथ थिरकते हैं और सुर-ताल के साथ संवाद अदायगी करते हैं तो देखने वाले भी उसमें सम्मिलित हो कलाकार बन जाते हैं। लयात्मक संवादों में ’रांझा-हीर’ ’लैला-मजनू’, ’जोगी-जोगन आदि पारम्परिक तमाशों के साथ ही आधुनिक संदर्भों को भी लोकनाट्य की इस विधा में निरंतर गुना-बुना गया है। वासुदेव भट्ट ने इधर तमाशा में कुछ विरल प्रयोग किए हैं। बंशीधर भट्ट के समय से किए जा रहे तमाशा में मुख्य भूमिका तो उन्होंने निभाई ही है, स्वयं भी ’गोविंद भक्त’, ’इक्कीसवी संदी’, ’बंदर का ब्याह’, ’उद्धव प्रसंग’ जैसे नए तमाशा लिख-खेलकर उन्होंने लोकनाट्य की इस परम्परा को नए समय-संदर्भ दिए हैं। वह इस दौर के बेहतरीन रंगमंच कलाकार भी हैं।

याद है, अर्सा पहले गोपीजी का तमाशा देखा था। इधर फिर से वासुदेव भट् का और कुछ वर्ष पहले दिलीप भट्ट का किया तमाशा देखने का सुयोग हुआ। भगवान शिव से जुड़े किसी प्रसंग के कथानक में और भी दूसरे प्रसंगों संग भले ही पौराणिक और प्रेमाख्यानों में वह गूंथे लगे पर जिस तरह से सम-सामयिक घटनाओं, समाचारों को उनमें यह कलाकार जोड़ते हैं, लगता है तमाशा पुरानी परम्पराओं से जुड़ी कला होते हुए भी युगीन संदर्भों की अनूठी रस-व्यंजना हैं। 

यह सच है, जयपुर तमाशा के अपने तेवर, अपनी भंगिमा हैं। इसमें महाराष्ट्र में होने वाले तमाशा की लावणी की बजाय सूफी और निर्गूण गान का भी अनूठा आलोक है। ध्रुवपद-धमार और अन्य शास्त्रीय रागों संग कलाकार  घुंघरूओं के नाद में जब कुछ नहीं कहते हुए भी बहुत कुछ कहता है तो इसमें कथक भी कहीं घुला प्रतीत होता है। कभी जयपुर में होली, चैत्र-अमावस्या, शीतलाष्टमी आदि पर एक वर्ष में कोई 51 तमाशे होते थे। पर अब वह बात कहां! आधुनिकता के इस दौर ने लोकानुरंजन से जुड़ी उस विधा से हमारा नाता तोड़ा है जिसमें कोई एक कला नहीं बहुत सारी कलाओं का माधुर्य ही नहीं लोक कलाओं संग शास्त्रीयता का सौंदर्य भी घुला हुआ है। 



Saturday, May 20, 2023

भास के नाट्यकर्म की सौंदर्य संहिता

राजस्थान पत्रिका, 20 मई 2023


कालिदास ने नाटक को चाक्षुष यज्ञ कहा है। एक नहीं बहुत सारे रसों की अन्विति। नाटक साहित्य की ही एक विधा है, स्वाभाविक ही है बहुतेरे ऐसे हैं जो केवल उसे पढ़कर ही संतोष कर लेते हैं। पर, बहुत सारे नाटक देखने के बाद समझ यही आया है कि मंचीय प्रदर्शन में ही कोई लिखा नाटक अर्थ की पूर्णता के प्रवेश द्वार तक हमें ले जाता है। किसी एक ही लिखे नाटक की जब अलग-अलग निर्देशक अपने तई भिन्न युक्तियों से प्रस्तुति करते हैं तो उसे देखने वाले भी अर्थ की अनंत संभावनाओं से साक्षात् करते हैं। भरतमुनि ने नाटक को 'सर्वशिल्प-प्रवर्तकम्’ कहा है। इसलिए कि उसमें बहुत सारी कलाओं का समावेश है।

इधर भास के लगभग सभी नाटकों का पारायण किया है। कुछ दिन पहले कवि और चिंतन से जुड़े रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने अपनी दो पुस्तकें पढ़ने के लिए भेजी थी, 'महाकवि भास के संपूर्ण नाटक’ और 'महाकवि भास का नाट्य वैषिष्ट्य’। दोनों ही विरल हैं। इस दृष्टि से कि भास के उपलब्ध नाट्य लेखन को संस्कृत और अंग्रेजी से हिंदी में इनमें जीवंत ही नहीं किया गया है बन्कि उनकी एक तरह से मीमांसा है और फिर संहिता भी। भास के सभी नाटकों के अर्थ-मर्म छुआती इन पुस्तकों में भास के नाट्य लेखन में छिपी असीमित मंचीय और अनंत अर्थ संभावनाओं का भी उजास है। नाटकों के विविध प्रसंगों के आलोक में जो विष्लेषण भारतरत्न भार्गव ने किया है, वह लूंठा-अलूंठा है। मुझे लगता है, इधर के वर्षों में इस तरह का यह अपने आप में अपूर्व कार्य है। साहित्य, कला और संस्कृति की दृष्टि से अनुकरणीय भी।

भास से कोई सौ वर्ष बाद कालिदास हुए हैं। पर अपने नाटक 'मालविकाग्निमित्रम्’ में सूत्रधार के जरिए वह  भास का संदर्भ देते हुए उससे यह कहलवाते हैं कि जब भास जैसे नाटककार के नाटक पहले से हैं तो फिर कालिदास जैसे नए नाटककार का नाटक क्यों? इस सवाल का उनका जवाब भी अनूठा है कि पुराना जो है, वही श्रेष्ठ नहीं है। नए की भी उसके गुणों के आधार पर परीक्षा होनी चाहिए। इस दृष्टि से भारतरत्न भार्गव के भास के नाट्यकर्म के किए इस कार्य को भी गहराई से अनुभूत करने की जरूरत है।

भास के नाटकों में महाभारत आधारित नाटक है-मध्यमव्यायोग, कर्णभारत, उरुभंग, पंचरात्र और दूतवाक्य। दो-अभिषेक और प्रतिभा वाल्मीकि रामायण पर अधारित हैं। एक-बालचरित कृष्ण कथाओं पर और चार उनके अपने कथानक के हैं-स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञा यौगन्धरायण, अविमारक और चारूदत्त। पढेंगे तो लगेगा, नाट्य लेखन में कितनी-कितनी मंचीय संभावनाएं उन्होंने हमें सौंपी हैं! नाटकों में उनकी अपनी दृष्टि, लेखन की विरल युक्तियां और महाभारत या दूसरी पुराण कथाओं से इतर भी स्थापना के अद्भुत प्रसंग हैं। मसलन उन्होंने दूतवाक्य में सुदर्शन चक्र और अन्य आयुधों को नाट्यपात्र रूप में जीवंत किया है तो 'मध्यमव्यायोग’ में जीतेजी व्यक्ति के तर्पण की त्रासदी की अद्भुत व्यंजना की है। सभी नाटक अर्थगर्भित, पर संप्रेषणीय संकेत लिए हैं। 'स्वप्नवासवदत्ता’ का मूर्ति में रूपायित उनका वह प्रसंग तो बहुतों को स्मरण होगा जिसमें हाथी पर उदयन वासवदत्ता को भगाए ले जा रहा है, सैनिक उन्हें पकड़ने को पीछे भाग रहे हैं और उदयन का अनुचर स्वर्णमुद्राएं फेंक रहा है। सैनिक उन्हें बटोरने में लगे हैं। याद नहीं पर संभवत: भारत कला भवन, वाराणसी में कभी मूर्ति में इस दृश्य का आस्वाद किया था जो अभी भी ज़हन में बसा है।

भारत रत्न भार्गव ने भास के संपूर्ण नाट्यकर्म के अनुवाद और संपादन का ही महती कार्य नहीं किया है, विशद विश्लेषण किया है। क्या ही अच्छा हो, ऐसी मौलिक दृष्टि में ही हमारी कला-संस्कृति निरंतर ऐसे ही पुनर्नवा होती रहे।


Saturday, May 6, 2023

सुंदर सृष्टि और दृष्टि के संवाहक बनें

राजस्थान पत्रिका, 6 मई 2023


चार्ल्‍स कोरिया वास्तुविद् ही नहीं थे बल्कि कलाओं की गहरी सूझ से भी जुड़े हुए थे। कुछ अरसा पहले हरिश्चन्द्र माथुर राज्य लोक प्रशासन संस्थान में उनका एक व्याख्यान हुआ था। सुनने गया तो अनुभूत किया उनकी दृष्टि इमारतों में संस्कृति की जीवंतता से जुड़ी थी। संवाद में उनका कहा अभी भी ज़हन में बसा है कि कोई वास्तु संरचना तीन पायों पर खड़ी होती है। पहला पाया है जलवायु दूसरा—तकनीक और तीसरी संस्कृति। मुझे लगता है
, सबसे मजबूत कोई पाया है तो वह संस्कृति का है। कोई सार्वजनिक इमारत अपनी सार्थकता तभी बनाए रख सकती है जब वहां पर संस्कृति के मूल्यों का पोषण हो। इमारत सुविधा संपन्न तो तकनीक से हो सकती है परन्तु वहां स्पेस और अनुभूति मे सुदंरता तभी होगी जब कला—संपन्न दृष्टि उसके निर्माण की होगी। जयपुर के जवाहर कला केन्द्र और भोपाल के भारत भवन को देखेंगे तो इसे गहरे से महसूस कर सकेंगे। मुझे यह भी लगता है कोई इमारत सांस लेती प्रतीत भी तभी होती है, जब वहां संस्कृति से जुड़ी हमारी परंपराओं के आयोजनों में आधुनिक समय संदर्भों की गवाही हों।

वास्तु को हमारे यहां कलाओं की माता कहा गया है। यह सच भी है, किसी इमारत की सुंदरता का पैमाना यह नहीं है कि वह कितने क्षेत्रफल में और कितनी आधुनिक तकनीक से निर्मित हुई है। यह है कि वहां ठहरते हुए आपको अनुभूति किस प्रकार की हो रही है। पुराने हमारे मंदिरों के गर्भगृह में बहुत अंधेरा और संकड़ापन होता है परन्तु वहां अवर्णनीय आनंद की अनुभूति होती है। कन्याकुमारी में तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर मां पार्वती को समर्पित मंदिर की वास्तु संरचना ऐसी है कि सूर्य का उजास सबसे पहले वहीं होता है। ग्वालियर से कोई 40 किलामीटर दूर मितावली में बने चौंसठ योगिनी मंदिर से प्रेरणा लेकर ही लुटियन ने भारतीय संसद की भव्य इमारत कल्पित की। पर इस सत्य को बहुत कम लोग जानते हैं। भारतीय वास्तु संरचनाओं में स्पेस के साथ अनुभूति से जुड़े भव पर विचार करेंगे तो बहुत कुछ और भी महत्वपूर्ण मिलेगा।

खजुराहो के मंदिरों संग वहां जब नृत्य महोत्सव होता है तो उसका जो दृश्य बनता है, वह विरल होता है। यह विडम्बना ही है कि हमने विकास का जो दृष्टिकोण अपनाया हुआ है, उसमें आय अर्जन और पूंजी निर्माण को ही सर्वाधिक महत्व दिया हुआ है। आर्थिक संपन्नता का अपना महत्व है परन्तु अर्थ का अतिरिक्त आग्रह मूल्य—मूढ़ समाज का निर्माण करता है। विकास के नाम पर इंट—गारे की इमारतों, बड़े—बड़े पुलों और सार्वजनिक पार्कों के जो जंगल तेजी से हमारे चारों ओर बन रहे हैं, वह विकास के कौनसे मॉडल की ओर हमें ले जा रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

सार्वजनिक इमारतों, सार्वजनिक पार्कों, उद्यानों और नवनिर्मित कला केन्द्रों के संदर्भ में यह बात गहरे से देखी जानी चाहिए कि वहां पर कलाओं के नाम पर विभत्स तो नहीं रचा जा रहा? वास्तु और मूर्तिकला का आरम्भ से ही निकट का नाता रहा है। किसी वास्तु संरचना में यदि कलाकृतियां उकेरे जाने, मूर्तियों का संसार सिरजे जाने का आग्रह है तो यह जरूर खयाल रखा जाए कि आकृतियां आंखों को सुहाने वाली हों। जिन्हें देखकर मन सुकून पाएं। थोड़ा ठहरकर कलाकृतियां देखें तो मन उनसे विरक्त नहीं हों। पर यह विडम्बना है कि जो कुछ नए सार्वजनिक स्थल बन रहे हैं वहां पर कलाकृतियों के नाम पर कलाकारों की बजाय मजदूरों से प्राचीन कलाकृतियों, वास्तु संरचनाओं की नकल कराकर निर्माण कार्य तेजी से हो रहे हैं। विभत्स और भद्दा उकेरा जा रहा है। ऐसा ही यदि होता रहा तो भविष्य की सौंदर्य दृष्टि से सदा के लिए हम क्या महरूम नहीं हो जाएंगे!

ऐसे दौर में जब तेजी से विचार—विमुखता की ओर समाज उन्मुख हो रहा हो यह जरूरी है कि सुरूचिपूर्ण, भारतीय कला—संस्कृति से जुड़ी सौंदर्य—लय की ओर हम लौटें। वास्तु संरचना के हमारे इतिहास को खंगालते हुए सुंदर सृष्टि और दृष्टि के संवाहक बनें।


 

Saturday, April 22, 2023

माधव-मास का संस्कृति पर्व

आस्था और विश्वास में ही जीवन सदा उत्सवधर्मी बना रहता है। भारतीय काल-गणना पर गौर करेंगे तो पाएंगे लौकिक उत्सवों में ही वह पूरी तरह से गुंथी हुई है। 

चैत्र से वर्ष प्रारम्भ होता है और दूसरा माह वैशाख ही है। हर मास का अपना गान है। चैत्र का स्वागत ’चैती’ गाकर होता है।  वैशाख में 'घांटो’ का गान होता है। ठीक वैसे ही जैसे फागुन में ’फाग’, सावन में ’मल्हार’, भादों में ’कजली’ आदि। 

राजस्थान पत्रिका, 22 अप्रैल 2023
वैशाख  शब्द 27 नक्षत्रों में से 16 वें विशाखा से आया है। इसका एक अर्थ राधा भी है। इसीलिए वैष्णवों के लिए यह ’राधा-मास’ है। श्रीमद्भागवत में यह ’माधव-मास’ है। वैशाख शुक्ल तृतीया इस माह का अनूठा संस्कृति पर्व है। लोक में यह आखातीज है। अक्षय यानी कभी कहीं जिसकी क्षय नहीं हो। तीन प्रमुख अवतार नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव इसी दिन हुए। बद्रीनाथ के कपाट इसी दिन खुलते हैं तो वृन्दावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार इसी दिन होते हैं। किसी भी कार्य को करने का अनपूछा मुहूर्त है यह। अबूझ तिथि। शुभ! कोई भी कार्य प्रारम्भ करें, किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं। मंगलकारी दिन। इसीलिए सर्वाधिक विवाह इसी दिन होते हैं। खगोलीय रूप में गौर करेंगे तो पाएंगे विशाखा नक्षत्र विवाह समारोहों में प्रयुक्त होने वाले पत्तियों के तोरण के आकार का है। वर-वधु को पहनाई जाने वाली मालानुमा भी। 

अक्षय तृतीया कलाओं से जुड़ा दान पर्व भी तो है! अलंकृत घड़े, सुंदर सुराहियां, मिट्टी के बने और भी बर्तन, कलात्मक पंखियां दही, अन्न-धन आदि इस दिन बहन-बेटियों को देने का रिवाज है। अक्षयतृतीया पर लक्ष्मी सहित नारायण की पूजा होती है। वाणी जब सुसंस्कृत होती है, तब उसे सरस्वती का स्वरूप मिलता है पर शब्दों को फटक-फटक कर भाषा का जब निर्माण हुआ तो लक्ष्मी ने ही वाणी को निधि समर्पित की। वाणी, निधि सभी प्रतीक हैं। मंगलकामना, आध्यात्मिकता और पर्व रसिकता संग नवजीवन और पोषण देते प्रायः सभी उत्सवों में हम प्रतीकों का ही तो वरण करते हैं। 

अक्षय-तृतीया पतंग उत्सव भी है। बीकानेर में चिलचिलाती धूप, लू में भी घरों की छतें इस दिन आबाद होती है। पतंगे उड़ती है। स्थानीय भाषा में इन्हें किन्ना कहते हैं। वैशाख शुक्ल बीज, 1545, शनिवार के दिन बीकानेर शहर की स्थापना हुई थी। स्थापना की उमंग में बीकानेर में उत्सव मनाया गया। घरों में खीचड़ा बना। घी भर इसे लोगों ने खाया और जीभर पिया इमली का शर्बत। असल में आखातीज पर बीकानेर के संस्थापक राव बीका ने खुशी का इजहार करते, आसमान में उड़ते मन के प्रतीक रूप में चंदा यानी बड़ी पतंग उड़ायी। बस तभी से परम्परा हो गयी। पूरे विश्व में शायद बीकानेर एक मात्र जगह है जहां तपते तावड़े में छत पर चढ़कर लोग पतंगे उड़ाते हैं। कागज पर कोरे चित्र, आकृतियों से सजी कलात्मक पतंगे। इन्हें उड़ाना भी अपने आप में कला है। आसमान में गोते खाती पतंगों के उड़ाके तगड़े लड़ाके होते हैं। दूसरे की पतंग काटने में मजबूत डोर नहीं बल्कि पेच लड़ाने की कला प्रमुख होती है। ऐसी जिसमें कलाबाजियों खिलाते पतंग को अनायास ढील या औचक कसते हुए काटने के गुर निहित होेते हैं। 

वैशाख में शिवलिंग के ऊपर जल-पात्र बांधने की भी परम्परा है। समुद्रमंथन में निकले भयंकर कालकूट विष को शिव ने कंठ में धारण किया था।  वैशाख में जब अत्यधिक गर्मी पड़ती है, इस विष से राहत देने के लिए शिवलिंग पर ’गलंतिका’ बांधी जाती हैं। गलंतिका माने जल पिलाने का करवा या बर्तन। मटकी में जल ठंडा रहता है, इसलिए प्रायः इसे ही बांधा जाता है। बूंद-बूंद  जल इससे शिव को स्वयमेव अर्पित होता रहता है। इस रूप में शिव आराधना से भी जुड़ा है यह मास। मुझे लगता है-सत्यम्, शिवं और सुंदरम् की अनुभूति का आलोक पर्व ही है-वेशाख मास और इसमें आने वाली अक्षय तृतीया! 

Saturday, April 8, 2023

नाद सौंदर्य के स्वर—सिद्ध गायक-पंडित कुमार गंधर्व

आज 8 अप्रैल 2023 से पंडित कुमार गंधर्व की जन्मशती शुरू हो रही हैं। मुम्बई में कुमार गंधर्व प्रतिष्ठान, देवास और नेशनल सेंटर्स फॉर परफोर्मिंग आर्ट्स द्वारा इसकी शुरूआत दो दिवसीय संगीत महोत्सव से आज सांझ ही हो रही है। शास्त्रीय संगीत के वह क्रांतिकारी गायक थे। किसी घराने विशेष से अपनी पहचान बनाकर उन्होंने अपनी स्वतंत्र शैली, विचारउजास की दृश्य गायकी ईजाद की। परम्परागत रूढ़ियां तोड़ते सदा उन्होंने संगीत में नया रचा।

राजस्थान पत्रिका, 8 अप्रैल 2023

मुझे लगता है, नाद सौंदर्य के भी वह विरल अन्वेषक थे। ऐसे जिन्होंने गान में शब्दों को जीते हुए अर्थ छटाओं की गगनघटा लहराई। सुनेंगे तो लगेगा वह स्वरों को फेंकते, उन्हें बिखराते, औचक ऊँचा करते, विराम देते और फिर अंतराल के मौन को भी जैसे व्याख्यायित करते थे। मिलनविरह और भांतभांत की जीवनानुभूतियों में उनका गायन सुना ही नहीं देखा जा सकता है। कबीर के निर्गुण को जो शास्त्रीय ओज उन्होंने दिया, किसी और के कहां बस की बात है! 'उड़ जाएगा हंस अकेला...,' मेंगुरु  की करनी गुरु  जायेगा, चेले की करनी चेला...’ स्वरनिभाव पर ही गौर करें, लगेगा जीवन का मर्म जैसे हमें कोई समझा रहा है। ऐसे ही 'अवधूता, गगन घटा गहराई रे...' और 'हिरना समझबूझ चरना' जैसे गाए निगुर्ण में स्वरों का अनूठा फक्कड़पन है। सुनते मन वैरागी हो उठता है। संसार का सारअसार जैसे समझ आने लगता है।

कुमार गंधर्व का गान लोकोन्मुखी है। लोक का उजास वहां है। स्वयं वह कहते भी थे, सारा शास्त्रीय संगीत 'धुन उगम' माने लोक संगीत से उपजा है।  मीरा, सूरदास के पद हो, ऋतु संगीत हो, ठुमरी, ठप्पा, तराना, होरी या फिर मालवा का लोकआलोक या फिर उनकी खुद की बंदिशे और स्वयं उनके बनाए रागों में प्रकृति की धुनें हममें जैसे बसती है।

युवाओं के लिए उनका आत्मविश्वास कम प्रेरणास्पद नहीं है।  यह उनकी गहन जीवटता ही थी कि छय रोग से बाधित एक फेफड़े के काम का नहीं रहने के बावजूद उन्होंने दमदार गायकी को नए अर्थ दिए। वह तब बीमारी से बिस्तर पर थे कि एक दिन कमरे में चिड़िया की तीखी स्वर फेंक सुनी। बस तभी तय किया, वह गाएंगे। स्वरसिद्ध करते उन्होंने सुनने वालों को गान की गहराई समझाई। श्वास उतारचढाव और शब्दों के मध्य के मौन का जो अर्थभरा संगीत उन्होंने बाद में दिया, वह उनका अपना सिरजा गानध्यान ही तो था!

कुमार गंधर्व मूलत: केरल के थे। 'कोडवू' गांव के। नाम था, शिवपुत्रय्या यानी कुमार। कर्नाटक आने के बाद वह जब सात ही वर्ष के थे तभी उनके गायन की धूम मच गयी। वहीं उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ। कन्नड़ मानपत्र में उन्हें संबोधित करते सहज, मनोहर गायन के लिए 'चिन्ह (सुवर्ण) गंधर्व' पदवी दी गयी। और इस तरह शिवरूद्रय्या बाद के हमारे पंडित कुमार गंधर्व हो गए।

कुमार गंधर्व पर आरोप लगता रहा है, गायन में वह सिर्फ मध्यलय का ही विशेष प्रयोग करते रहे हैं। बकौल कुमार, 'सुरीली नादमयता का सुंदर प्रकटीकरण मध्यमलय से ही होता है।' पर यह भी तो सच है, मध्यमलय को वही निभा सकता है जो स्वरविन्यास में अनूठीअपूर्व कल्पना गान का स्थापत्य रचे। उसके महल खड़े करे।  कुमार ऐसे ही थे, स्वरों के गहनज्ञाता। एक दफा जयपुर में जौहरी राजमल सुराणा के यहां नक्काशीदार मीनाकारी के कंगनों का जोड़ा उन्होंने देखा और केदार राग की 'कंगनवा मोरा' बंदिश उन्हें याद आई। दु: भी हुआ कि अनमोल कंगनों की उस नजाकत को वह बसबंदिश में कभी ला नहीं सके। पर अलगअलग ऋतुओं में होने वाली बरखा की झड़ियों, ऋतुओं और प्रकृति धुनों के साथ देखे दृश्यों को उन्होंने बाद में जैसे स्वरसिद्ध कर लिया था। इसीलिए तो उनकी गायकी उपज सदा खिलीखिली हमें लुभाती है, लुभाती रहेगी।



Monday, April 3, 2023

इब्राहिम अल्का जी का नाट्यकर्म

 संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका "संगना" में ...

"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021 


"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021 


"संगना" अंक 40-41, अक्टूबर 2020-मार्च 2021