ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Sunday, July 12, 2020

यात्रा वृतान्त 'नर्मदे हर' -डा. कमल किशोर गोयनका


केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष, उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द साहित्य के मर्मज्ञ, विद्वान डा. कमल किशोर गोयनका ने यात्रा वृतान्त 'नर्मदे हर' के प्रकाशन के त्वरित बाद पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया मेल से भिजवाई थी। उनकी यह दीठ ..




कहन—सुनन



'कहन—सुनन' में

'कहन—सुनन' कार्यक्रम में कुछ समय पहले बोधि प्रकाशन के प्रकाशक, कवि  श्री मायामृग ने यात्रा वृतान्त साहित्य पर लम्बा संवाद किया।

इस संवाद में घुमक्कड़ी के अपने अनुभवों के साथ ही यात्रा साहित्य की परम्परा पर भी बोलना हुआ।

चाहें तो इस साक्षात्कार सेआप भी इस लिंक के जरिए साझा हो सकते हैं—

https://www.youtube.com/watch?v=YuOLHquECtU&feature=youtu.be&fbclid=IwAR3Vse1nnR-T-xVnuHkWFKJ2mmP-6x_DUDRPoGVpNpPu1nG-el6uyd16xhs

बातों बातों में ...



बातों बातों में


समालोचक श्री सुनील मिश्र ने लोकप्रिय कार्यक्रम 'बातों बातों में' के लिए एक साक्षात्कार किया। यूट्यूब पर यह उपलब्ध है,चाहें तो मित्र देख सकते हैं।
लिंक यह है —
https://www.youtube.com/watch?v=cVODlucCkp8&feature=share&fbclid=IwAR0w_kUQQz4yLG8rz3h27HsIHdXLEEiU7Cu_yrtu6ttsW4kJcjKMzPySHOg

"बातों बातों में" के 78वें भाग में 9 जुलाई को शाम 7 बजे हमारी भेंट प्रतिष्ठित कला आलोचक एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. राजेश कुमार व्यास से होगी। वे जयपुर में रहते हैं।
डॉ राजेश कुमार व्यास बहुआयामी प्रतिभा के लेखक, आलोचक, संपादक एवं संस्कृतिकर्मी हैं। उन्होंने राजस्थान की संस्कृति के सार्थक विस्तार के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। लगभग 21 पुस्तकों में राजस्थानी कविता संग्रह, राजस्थान की डायरी, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण आदि शामिल हैं।
नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया से प्रकाशित उनके दो यात्रा वृतांत कश्मीर से कन्याकुमारी और नर्मदे हर, इसके अलावा संगीत सर्जना की सुर जो सजे तथा नृत्य आदि कलाओं पर रंगनाद, भारतीय कला, सांस्कृतिक राजस्थान आदि का प्रकाशन पाठकों और कला प्रेमियों में बहुत प्रशंसनीय रहा हैl डॉ. राजेश कुमार व्यास को अब तक अनेक सम्मान मिले हैंl उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा उनकी काव्य कृति कविता देवै दीठ के लिए पुरस्कार भी प्राप्त हो चुका है l सृजन के अनेकानेक आयामों में वे विनम्र साधक की तरह काम करते हैंl उनसे बातचीत उनके बहुत सारे अनुभव का जीवंत और अनुभूतिपरक साक्ष्य होगी, यह हमारा विश्वास हैl
9 जुलाई को 7 बजे शाम यदि आप व्यस्त न हों तो एक घंटे हमारे साथ अवश्य रहिए। हमें अच्छा लगेगा।
 --सुनील मिश्र 



Saturday, July 11, 2020

संस्कृति, भूगोल, इतिहास और प्रकृति-प्रेम की रोचक गाथाएं सुनाती यात्राएं

मित्र ज्ञानेश उपाध्याय इस दौर के विरल संपादक, लेखक हैं। 'नर्मदे हर' पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। शिक्षा विभाग की लोकप्रिय पत्रिका  'शिविरा' के जुलाई 2020 अंक  में प्रकाशित उनकी यह दीठ आप मित्रों के लिए भी...


Friday, July 10, 2020

कैमरे की आंख से सिनेमा सृजन का इतिहास

'आजकल' जुलाई अंक में ....

निमाई घोष ने कैमरे की आंख से सिनेमा सृजन का एक तरह से इतिहास लिखा। सत्यजीत राय की छाया-छवियों के बहाने चलचित्र सृजन की प्रक्रिया और उसके इतिहास की सूक्ष्म सूक्ष को अपनी कला में गहरे से अंवेरा। कहूं, सत्यजीत राय के सिनेमा निर्माण से जुड़ी साधना का दृष्य कहन है निमाई घोष की छायांकन कला। उनकी छायांकन कला हमें उस काल बोध से भी जोड़ती हैं जिसमें बजरिए श्वेत-श्याम से लेकर रंगीन छायाचित्रों के सफर में सिने सृजन का पूरा एक युग हमारे समक्ष उद्घाटित होता है।




Saturday, May 9, 2020

‘रामायण’ धारावाहिक की लोकप्रियता के मायने

लोकप्रिय दैनिक 'राष्ट्रदूत' में आज यह अतिथि सम्पादकीय

"...मुझे लगता है, हम-सब में कुछ-कुछ राम बसता है। इसीलिए तो जब कहीं कुछ बुरा होता है, कोई कुछ गलत करता है तो औचक मुंह से निकलता है, ‘राम निसरग्यो!’ माने इसके भीतर का राम चला गया है। ...यह वक्त मनोरंजन शब्द के वास्तविक अर्थों को समझने का भी है। मनोरंजन माने वह जिससे मन रंजित हो। षडयंत्रों, डरावने, अश्लीलता परोसने वाली कथाओं से मन रंजित नहीं होता बल्कि त्रासदियों, अपराधबोध और अंततः अवसाद से ही घिरता है। स्वस्थ मनोरंजन अंतर्मन संवेदनाओं को अर्थ प्रदान करने वाला, भीतर से संपन्न करने वाला होता है। ‘रामायण’ धारावाहिक की लोकप्रियता को क्या इसी अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए! ...दर्शक संवेदना से लबरेज ऐसे धारावाहिक अभी भी अधिक पंसद करते हैं, जिन्हें बगैर किसी घालमेल के बनाया गया हो। जिनमें व्यावसायिक हितों की अपेक्षा मानवीय मूल्य केन्द्र में हो और जिनमें भव्यता के नाम पर दिव्यता को बिसराया नहीं गया हो।...अच्छेपन को हर कोई चाहता है। डरावने, आपराधिक मसलों के नाटकीय रूपान्तरण, नाग-नागिनों, सास-बहुओं आदि के बेसिरपैर की कथाओं के अंतहीन चलने वाले धारावाहिकों के प्रसारक चैनलों ने असल में इधर दर्शकों की रूचियों को मोड़ा नहीं है बल्कि बाजार की ताकतों के चलते उन्हें नशीले पदार्थों के सेवन की मानिंद अपना आदि बनाने का एक तरह से चक्रव्यूह रचा है। ...व्यक्ति एकान्त तो चाहता है परन्तु अकेलापन उसे नहीं भाता। आपा-धापी नहीं हो, कहीं जाने की उतावली नहीं हो और इस बात की फिक्र नहीं हो कि सब भाग रहे हैं, मैं कहीं पीछे नहीं रह जाऊं तभी ठहरकर अपने भीतर झांकने का वक्त मिलता है। अनर्गल कुछ भी सहने से तब वह बचने का भी उपाय तलाशता है। कोरोना में कुछ-कुछ ऐसा ही समय हरेक को मिला है। "...

Monday, May 4, 2020

आंचलिकता का लालित्य

"... इस  समय जो गद्य लिखा जा रहा है, उसमें ‘मेरी चिताणी’ इस मायने में विरल है कि लेखक ने इसमें अपने गांव के बहाने जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में गुना है। कहन के सहज, आंचलिक पर दार्शनिक बोध में लिखे का उनका आत्मकथात्मक लालित्य लुभाने वाला है।..."
राजस्थान साहित्य अकादेमी की पत्रिका "मधुमती" में -





Saturday, May 2, 2020

नवनीत, मई 2020 अंक

"...सतीश गुजराल ने चित्रों की अनूठी काव्य भाषा रची। उनके चित्र, मूर्तियों, म्यूरल और इमारतों की सिरजी संरचनाओं में भारतीय कलाओं के सर्वांग को अनुभूत किया जा सकता है।...आकृतिमूलक होते हुए भी सांगीतिक आस्वाद में अर्थ की अनंत संभावनाओं को उनकी कला में तलाशा जा सकता है। एक तरह की किस्सागोई वहां है। उनकी स्वैरकल्पनाएं (फंतासी) भावों का अनूठा ओज लिए सौंदर्यबोध की विरल जीवनदृष्टि है। यह सही है,उनके आरंभिक चित्र गहरा अवसाद लिए विभाजन की त्रासदियों पर आधारित है परन्तु बाद की उनकी कलायात्रा पर जाएंगे तो यह भी पाएंगे आत्मान्वेषण में उन्होंने भारतीय कला दृष्टि को अपने तई चित्र भाषा के नये मुहावरे दिये।..."



Sunday, April 19, 2020

एकांत को गुनते मौन को सुनें

कोरोना वायरस के इस दौर में जब हर ओर चुप्पी, सड़कों पर सन्नाटा पसरा है और घरों से बाहर जीवन थमा पड़ा है, मन का मौन जैसे भीतर के अनगिनत सवालों का जवाब है। मौन के गर्भ से ही तो भीतर की प्रज्ञा, बोध-शक्ति से साक्षात् होता है। यही वह समय भी है जब कईं बार मन आकाश बनता जैसे उड़ने को आतुर हो उठता है। मुझे लगता है, एकान्त ही हमें इच्छाओं, अपेक्षाओ से मुक्त करता है। इसलिए कि अपने भीतर झांकने, सोचने का अवकाश अकेले मे ही मिलता है। अन्यथा तो भौतिकता में, काम के बोझ में हम अपने से निरंतर दूर, बहुत दूर हुए जाते हैं।
भोर में उजास रोज ही होता है पर उसको देखने का अवकाश जैसे इन दिनों ही मिल रहा है। किताबे पढ़ते लगता है, ठीक से  समझ वह अभी ही आ रही है। 
यह जो एकान्त है, अपना खुद का चुना हुआ नहीं है इसलिए बहुतेरी बार बहुत बोझिल प्रतीत होता है पर किताबों में पढ़े हुए को गुनता हूं तो जैसे आलोक की किरणें यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी दिखाई देती है। इन्तजार करता हूं, सांझ का कि घर की छत पर पहुंच आकाश देखूं। पहले छठ-छमास ही घर की छत पर जाना होता था। पर इधर जब सब ओर बंद का आलम हैं। घर से बाहर, दुनिया के द्वार बंद है तो स्वाभाविक ही है, रोज ही छत पर जाना होता है। आकाश पर नजर जाती है। उसका नीलापन औचक मन का सूनापन जैसे मिटा देता है। निरंजन जो है, वह। विकार रहित। अनादि-अनंत। शाश्वत-सनातन। मन में विचार आते है, इसके  गर्भ से ही गृह नक्षत्रादि बनते और मिटते हैं। पर उनके अस्तित्व का अनुचिन्ह कभी आकाश अपने पास नहीं शेष नहीं रखता।  एकान्त का यह रस निरंजन है। कबीर की याद आती है, ‘एक नाद से राग छत्तीसो, अनहद बानी बोले।’  एकान्त के नाद में ही अनहद वाणी को सुना जा सकता है। अंदर  की पुकार सुनने का यही तो  समय है।
सांझ घिरने लगी है। सूर्य का ताप कम होता जान फिर से छत पर पहुंच जाता हूं। देखता हूँ, दिनभर पृथ्वी के कोने-कोने को भरपूर प्रकाशित करने के बाद थका-हारा सूर्य अब अपने घर लौट रहा है। आकाश में धूप की सफेदी के बाद श्यामली छांव का बसेरा होने लगा है। दूर कहीं पक्षियों की पूरी की पूरी एक टोली दिखती दूर कही विलीन हो गयी है। थोड़ी देर में ही पश्चिम में सिंदूरी होता व्योम अंधेरे की आहट सुनाने लगा। छत पर टहलते पता ही नहीं चला, कब आकाश मे तारों ने दस्तक दे दी। सर्वत्र छाए मौन में बचपन के वह दिन जैसे फिर से लौट आए है जिनमे घर की छत पर सोते असंख्य तारोंको गिनते-गिनते ही नींद आ जाती थी। पर अब कहाँ छत के वह दिन और तारों की वह गिनती और भरपूर नींद!  यही सोच रहा हूँ कि औचक आसमान में चमकते-दककते चांद ने जैसे अपनी और देखने की आवाज दी। तारों की छांव  के मध्य हीरे की अंगूठी की धज सा सुंदर चमकता चांद! आसमान मे छाए अंधेरे में चांद-तारों की रोशनी का चित्रपट और उसे निहारते विचारों का यह प्रवाह। कोरोना में थम से गये समय  की अनुभूति से ही तो उपजा है, मौन का यह मुखर। 
ऐसा पहली ही बार हुआ है, जब सामुहिक चेतना में कोरोना  से निजात पाने हम-सबने एकांत को चुना है।  इसी से हम अपने मनों से, आत्म से भी जुड़े हैं। जीवन के बने-बनाए ढर्रे, शोरोगुल और अधिक से अधिक पाने की उहापोह में अपने से ही गुम होते जाने की होड़ में यह वक्त हमें अपने होने का अहसास कराने वाला है। यह बचपन की यादों को जीवन में वापस लाने के दिन है। कुबेरनाथ राय का लिखा याद आता है, ‘पत्तियों का झरना धरती के सौंदर्य की करूणतम अवस्था है। करूणा में एक उदास सौंदर्य की उपलब्धि एक सर्वसाधारण अनुभव है।’  पर इस बात को भी समझें, करूणा विषाद नहीं है। महर्षि अरविन्द ने  बुद्ध की मूर्ति में उनके नेत्रों और ओष्ठों के भावों की अर्थपूर्ण व्याख्या की है।  उनके अनुसार भारतीय  बुद्ध प्रतिमाओं में करुणा का जो भाव घनीभूत रूप में विद्यमान है वह उनका अपना दुःख नहीं, अन्य सबका दुःख है। जगत के लिए करुणा है। वहां जो उत्कंठा दृष्टिगोचर होती है उसमें दुःख के निस्तार का आध्यात्मिक मार्ग छुपा है। यह सच है, करूणा में आस्था और विश्वास छुपा होता है। अच्छे से अच्छा होने की आस का बोध होता हैै। विषाद मृत्यु का बोध कराने वाला होता है। इसीलिये कहूँ, यह घड़ी विषाद की नहीं है।  हां, यह मानवता पर छाए कोहरे के प्रति करुणा के  दिन हैं। इसे उदासी का वक्त न कहें। आस्था और विश्वास की डोर हमें भविष्य के जीवन के नये सौंदर्यबोध से जोड़ेगी। इसलिए एकान्त के इस वास को आत्म की पुकार समझें।
छत पर टहलते यही सब कुछ मन विचार  रहा है। लगता है, घनीभूत एकान्त की इस वेला में प्रदूषण रहित आकाश में तारों की चमक रोशनी की राह है। 
आखों में नींद घुल रही है। छत की सीढ़ियां उतर रहा हूं। कुबेरनाथ राय का पढ़ा फिर से याद आने लगा,
‘एकान्त जितना पकहा होगा-मन उतना ही श्रीमद्भागवत का पन्ना बनता जाएगा।’
 और इसी के साथ ख़याल आता है, प्रकृति के मौन को सुनने, पक्षियों का कलरव सुनने, चांद की रोशनी  में नहाने और क्षण-क्षण की चेतना, आकाश की चित्रोपमता को अनुभूत करने के लिए कुछ समय के लिए थमना जरूरी है।  एक ही स्थान पर स्थिरता आवश्यक है। विचार करें, यह ऐसा ही समय है। घरों में रहें। समय के विलाप का नहीं अपने-विश्वास, आस्थाओं में जीवन चक्र को अनुभूत करते जीवंतता को कायम रखें। खुद से खुद का संवाद ही इसकी सबसे बड़ी राह है।
गुरू गोरखनाथ का जयघोष है ‘अलख निरंजन’। अलख का अर्थ होता है जगाना। निरंजन माने आकाश। वह अनंत, जहां कुछ भी शेष नहीं रहता। तो आइए, अपने को खाली कर, भीतर के प्रकाश से सम्पन्न होवें। कोरोना के इस प्रकोप में ‘अलख निरंजन’ के नाद के जयघोष में भविष्य के सुनहरेपन को  देखें। अपनी चुनी यांत्रिकता, शोरोगुल और भागमभाग में अपने भीतर न झांक पाने की अज्ञानता से मुक्त हों। यह सांस्कृतिक मनोपचार का दौर है। भले कुछ समय के लिए हम त्रासदी भोग रहे हैं पर खुद से खुद के वार्तालाप का यही वह समय भी है जो लौटकर फिर नहीं आएगा। इसे गुनें और किताबें पढ़ते, अच्छा कुछ सोचते, देखते, प्रकृति और जीवन की उदात्ता पर विचारते भविष्य के सुनहरेपन में इसे बुनें।

--"राष्ट्रदूत" में प्रकाशित अतिथि सम्पादकीय, 8 अप्रैल, 2020 

Monday, December 30, 2019

वर्ष 2019 की उल्लेखीय, पठनीय पुस्तकों का संसार

हिन्दी साहित्य में यह दौर स्थापनाओं का है। एक ओर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के इस समय में मुद्रित शब्द के अतीत होते चले जाने का हर ओर बोलबाला है तो दूसरी ओर पुस्तकें बहुतायत से छप रही है, बिक रही है और ‘लिटरेचर फेस्टिवल्स’, ‘साहित्य आज तक’ जैसे आयोजनोें से पुस्तक-लेखक को प्रचारित करने का भी एक नया ट्रेंड बाजार में चल निकला है। पर विडम्बना यह भी है कि कुछेक प्रकाषन समूहों, लेखकों की बिरादरी ही इनमें नजर आती है या फिर इस बिरादरी ने जिन्हें स्थापित करने की ठानी है, वही हर तरफ प्रमुखतया से प्रचारित किए जा रहे हैं। पुस्तकें भी ऐसे-ऐसे शीर्षकों और सज्जा से प्रकाषित करने की होड़ मच रही है, जिससे पाठक उसे खरीदे ही खरीदे-यह देखने के लिए कि आखिर उनमें है क्या? हिन्दी अंग्रेजी भाषा में भी जैसे कोई भेद नही ंरह गया है। साहित्य के नाम पर रहस्य, रोमांच के साथ ही भूत-प्रेत गाथाओं से संबद्ध प्रकाषनों की भी बाजार में जैसे बाढ़ आ गयी है।
वर्ष 2019 साहित्य की दृष्टि से इस रूप में महत्वपूर्ण रहा कि अज्ञेय द्वारा संपादित ‘चैथा सप्तक’ के कवि, नाटककार, आलोचक राजस्थान के नंदकिषोर आचार्य को हिन्दी का केन्द्रीय साहित्य अकादेमी सम्मान उनकी काव्य कृति ‘छिलते हुए अपने को’ पर मिला तो राजस्थानी का यह सम्मान ख्यात कथाकार रामस्वरूप किसान को उनकी कथाकृति ‘बारीक बात’ के लिए मिला। हिन्दी के लिए राजस्थान के किसी लेखक को पहली बार साहित्य अकादमी का सम्मान मिला है। पुस्तको के प्रकाषन की दृष्टि से देखें तो यह साल उम्मीदें जगाने वाला रहा। सालभर पुस्तकों के प्रकाषन का दौर चलता रहा। बहुतेरी प्रकाशित पुस्तकेां में हिमांषु वाजपेयी का  उपन्यास ‘किस्सा-किस्सा लखनउवा’, प्रभात रंजन का ‘पालतू बोहेमियान: मनोहरष्याम जोषी की एक याद’, राजेन्द्र मोहन भटनागर का उपन्यास ‘अथ पद्मावती’, उदय प्रकाष का कविता संग्रंह ‘अम्बर में अबाबील’, कृष्ण कल्पित का ‘हिन्दनामा’ खूब चर्चित रहीं।
बहरहाल, पुस्तकों के बड़ी संख्या में प्रकाषन को देखते हुए सहज यह कहा जा सकता है कि पुस्तकों के पाठक हैं और भविष्य में भी रहेंगेे।  प्रकाषित कथाकृतियों में  ईषमधु तलवार की ‘रिनाला खुर्द’ विभाजन की त्रासदी को बंया करता दो देषो के भाषायी, भावनात्मक संसार की अनूठी कथा व्यंजना है। सूर्यबाला की औपन्यासिक कृति ‘कौन देस को वासी: वेणु की डायरी’ कृति आधुनिक समय संवेदना का एक तरह से लालित्य भरा कथा कोलाज है। सूर्यबाला के पास अनूठी किस्सागोई है और भाषा का लालित्य भी। मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास ‘मल्लिका’ भारतेन्दु हरिष्चन्द्र और उनकी प्रेमिका के अकथ प्रेम की व्यंजना है। पढ़ते भारतेन्दु हरिष्चन्द्र के युग से ही पाठक साक्षात् नहीं होते बल्कि शब्दों की उस दृष्य लय से भी औचक साक्षात् होते हैं जिसमें घटनाएं, समय और परिवेष जीवंत होता सदा के लिए हममें बस जाता है। इसी तरह जितेन्द्र सोनी की कथाकृति ‘एडियोस-ढाई आखर की ढाई कहानियां’ ढाई अक्षरों में व्यंजित प्रेम का अनहद नाद सुनाती पात्रों की मर्मान्तक मजबूरियों के क्षणों का सुंदर कथा संयोजन कथाकार जितेन्द्र सोनी ने किया है। बेहद सामान्य सी लगने वाली स्थिति-परिस्थितियों से प्रारंभ कर कहानियों को बड़ा और मार्मिक अर्थ कथाकार ने दिया है। राजस्थानी कहानी की गौरवमयी परम्परा के साथ ही आधुनिक दृष्टि और बदले परिवेष का षिल्प समृद्ध संसार लिए डाॅ. नीरज दईया द्वारा संपादित ‘एकसौ एक राजस्थानी कहानियां’ इस मायने में महत्वपूर्ण रही है कि इसमें राजस्थानी कहानी की परम्परा और वर्तमान के विविध पक्षों की गहराई है। भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही कहानी की भी एक तरह से यह विरल दीठ है।
वर्ष 2019 में कविता की भी बहुत सारी पुस्तकें प्रकाषित हुई परन्तु उनमें राकेश रेणु की काव्य कृति ‘इसी से बचा जीवन’ प्रेम, प्रकृति और जीवन को कविता के चालू मुहावरे की बजाय वैचारिक सघनता में अनुभव की आंच पर पकी है। कवि मायामृग की ‘मुझसे मिठा तू है’ काव्यकृति में कविता बोलती नहीं बल्कि दिखती हुई हममें बसती है। कवि के पास कहन की अनूठी संवेदना है तो पेड़, धरती और आसमान को देखने की उदात्त दृष्टि भी है। राकेष मिश्र के कविता संग्रह ‘जिन्दगी एक कण है’ में विचार, भाव और रूप का अनूठा साहचर्य है। आंतरिक अन्वेषण में उनकी कविताएं ‘याद की बारिष’ से सराबोर करती है तो भ्रम बीजों से उपजी खुषियों की फसल की अनुभूतियां से भी साक्षात् कराती है।
कथेतर गद्य में वर्ष 2019 में रामबक्ष जाट की आत्मकथात्मक, संस्मरण कृति ‘मेरी चित्ताणी’ गद्य का अनूठा उजास लिए है। इसमें अपने गांव के बहाने लेखक ने लोक संस्कृति, आधुनिकता में साहित्य और साहित्य से इतर जीवन का सांगोपांग कथात्मक चित्र उकेरा है। सत्यनारायण की ‘सब कुछ जीवन’ कृति रिपोर्ताज, रेखाचित्र रूप में हिन्दी गद्य की बढ़त हैं। लेखिका, संपादक उमा की कृति ‘किस्सागोई’ मे जीवनीपरक है परन्तु इसमें लेखकों के चरित्र के अपनापे को अनूठी कथा शैली में गुना और बुना गया है। यात्रा संस्मरण की महत्ती कृतियांे में असगर वजाहत की ‘स्वर्ग में पांच दिन’ हंगरी के इतिहास का वातायन ही नहीं है बल्कि जीवन और स्थानों की यात्रा से जुड़े संस्मरणों की उज्ज्वल शब्द दृष्टि भी है। प्रताप सहगल का यात्रा संस्मरण ‘देखा-समझा देस-बिदेस’ इस मायने मंे विषिष्ट है कि इसमें कहानी का अनूठा गद्य है तो डायरी की निजता भी है, निबंध का लालित्य है तो स्थान और परिवेष को देखने और समझने-समझाने की आलोचना दीठ भी है। डाॅ. गोपबंधु मिश्र का पेरिस प्रवास का यात्रावृतान्त ‘पारावार के पार’ मूल संस्कृत से हिन्दी मे अनुदित है पर इसमें पेरिस की सभ्यता और संस्कृति की सुंदर दार्षनिक व्याकरणिक व्याख्या करते भारतीय और पष्चिमी समय संवेदना के गहरे मर्म भी उद्घाटित हुए हैं।
इस वर्ष आयी गद्य की कुछ अन्य महत्वपूर्ण कृतियों में चार साल की ही उम्र में ही पोलियो से ग्रस्त होने के बावजूद कठिनाइयों से जूझते समाज में अपना एक विषिष्ट स्थान बनाने की कहानी कहती ललित कुमार कीे संस्मरणात्मक जीवन गाथा ‘विटामिन जिन्दगी’ चुनौतियों को अवसर में बदलने का जैसे प्रभावी सूत्र है। प्रयाग शुक्ल की ‘स्वामीनाथन: एक जीवनी’ बंधे-बंधाए ढर्रे से पृथक कलाकार स्वामीनाथन के साथ की यात्राओं, उनके कला प्रष्नों, कलाकृतियों और सृजन सरोकारों को सहेजते सिनेमा की मानिंद शब्दों का दृष्य रूपान्तरण सरीखी है। विजय वर्मा की व्यंग्यकृति ‘राग पद्मश्री’ सरकारी तंत्र, समाज और साहित्य-संस्कृति से जुड़ी जीवनानुभूतियों की से सूक्ष्म दीठ है। इस वर्ष शरद सिंह द्वारा संपादित ‘थर्ड जेंडर विमर्ष’ को तीसरे लिंग से जुड़ी वर्जनाओं, धार्मिक सामाजिक और भय से जुड़ी मानसिकता के चिंतन की महत्ती कृति कहा जा सकता है तो लेखिका सुजाता की ‘स्त्री निर्मिती’ स्त्रीवाद का जैसे आईना है। डाॅ. श्रीलाल मोहता और ब्रजरतन जोषी सपादित ‘संगीत: संस्कृति की प्रकृति’ इस मायने में इस वर्ष की विरल कृति कही जा सकती है कि इसमें भारतीय कलाओं के आलोक में संस्कृति से जीवंत संवाद में डाॅ. छगन मोहत्ता की महत्ती स्थापनाएं हैं।
-राजस्थान पत्रिका ‘हम लोग’ में प्रकाशित

29-12-2019