ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Friday, November 5, 2021

लोक दृष्टि की शास्त्रीयता

(एनबीटी की पत्रिका 'पुस्तक संस्कृति' के नए अंक (नवम्बर—दिसम्बर 2021) में)

...कपिला वात्स्यायन जी के कला-चिन्तन को लोक संस्कृति की उनकी समझ से देखे जाने और इस पर गहराई से विचारे जाने की जरूरत है। उनके लिखे के अर्न्तनिहित में जाएंगे तो पाएंगे भारत भर की पारम्परिक प्रदर्शनकारी कलाओं का गहन अध्ययन, सर्वेक्षण करते उन्होंने लोक में प्रचलित कला रूपों, गाथाओं, परम्पराओं को गहरे से खंगाला ही नहीं है बल्कि शास्त्रीयता में उनके होने की गहरी तलाश की है। लोक से जुड़े आलोक में कलाओं की हमारी समृद्ध-संपन्न परम्पराओं और सभ्यता से उसके नाते पर उनका चिन्तन बहुत से स्तरों पर मन को मथता है...




Sunday, October 31, 2021

एकदा-स्मृति छंद

"...घर पर टंगी घड़ी पर ही बार-बार निगाह जा रही थी। निगोड़ी धीमी से और धीमी चलने लगी  थी। न जाने क्यों यह लगा, उसके सूईये जानबूझकर मुझे चिढ़ाते मंद हुए है। ऐसा ही होता है, जब ब्रेसब्री से किसी सुखद घटित होने का इन्जार होता हैं! पंडित जी का फोन प्रातः दस बजे आया था और दोपहर के ढाई बजते बजते जैसे युग बीतने को आ रहा था। तीन बजे से पहले ही रामबाग होटल पहुंच गया था। वह अपनी पत्नी मधुराजी संग हमारा इन्तजार ही कर रहे थे। मैंने प्रणाम किया। उन्होंने ‘जय हो!’ के माधुर्य से जवाब दिया। दूसरे सोफे पर मधुरा शांताराम को पहचानते मैंने उन्हें भी प्रणाम किया। मधुर ध्वनि, ‘और सब ठीक है, व्यास जी।’

अचरज हुआ! इतनी आत्मीयता से, अपनेपन से वह बोली थी जैसे पहले से जानती हों। पंडित जी ने शायद उन्हें मेरे बारे में पहले से बता दिया था। चाय पीते-पीते यही सब सोच रहा था कि पंडित जसराज जी ने एक फ्रेम में मढ़ा मेरा ही लिखा मुझे पकड़ा दिया। यह वही फ्रेम था जिसमें छायाकार मित्र महेश स्वामी ने पंडित जी के गान पर लिखे और राजस्थान पत्रिका में छपे मेरे आलेख को मढवाकर उन्हें भेंट किया था। 


पंडित जी का आग्रह था, गायन की अनुभूतियों पर उनपर जो मैंने लिखा था, उसका वाचन करूं। वह शायद सुनने में अनुभूत करना चाहते थे माण्डूक्योपनिषद के गान के मेरे उस अनुभव-भव को जो शब्दों में मैंने बंया किया था। संकोच था पर उनके आग्रह को न मानने का कोई कारण नहीं था। मैंने अपने ही लिखे शब्दों को बांचना प्रारंभ कर दिया...वह तन्मय हो सुनने लगे थे। ...

--पूर्णता की आस संजोए बहुतेरी पाण्डुलिपियों में से एक के पन्ने।


भव के वैभव से साक्षात्कार कराती यात्राएं-- कृष्ण बिहारी पाठक

'अमर उजाला' 
31 October 2021

डॉ. राजेश कुमार व्यास का यात्रा संस्मरण 'आँख भर उमंग' इस समय चर्चा में है। इसमें लेखक की साहित्यिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक, प्राकृतिक और पर्यावरणीय यात्रा दृष्टि का कवित्वपूर्ण, हृदयस्पर्शी रूपांकन और इतिहास मिथक को एकरस करती किस्सागोई विशिष्ट है। मार्ग से मंजिल तक की प्रत्येक संज्ञा से जुड़े पौराणिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सामाजिक संदर्भों पर लेखक की अद्भुत पकड है। यात्रावृत्त पढते पाठक को  बार बार  लगता है कि लेखक उसे हाथ पकड़कर इतिहास, भूगोल की सीमाओं के पार स्थल विशेष के उद्भव और विकास की परिधियों तक ले गया है, और  कोने कोने को झाँककर दिखा रहा है। कहीं चंबल के बीहड़ों के बीच खंडहरों में सांस्कृतिक वैभव की तलाश है तो  रवींद्र की हवेली तथा शांति निकेतन में मूर्त - अमूर्त कलाओं का आभास। कहीं सिद्धार्थ से तथागत बनते गौतम बुद्ध की आत्मिक यात्रा की सहवर्ती मानसिक यात्रा है तो शिव के ज्योतिर्लिंगों तीर्थों और मंदिरों में शिवत्व का संधान। कहीं आदिवासी कलाओं में पैठकर उनकी आदिम जीवन शैली की पडताल है तो कहीं लोक देवी- देवता, लोक परंपरा और लोकाचार । कहीं हम्मीर और कान्हड़देव की वीरगाथाओं के साक्ष्य हैं तो  खेत खलिहान और गाँव की गोधूलि का आनंद भव है।

शिल्प से सरोकार तक, श्लोक से मंत्र तक, कविता से चित्र तक,सेतु से नदी तक, संग्रहालय से संस्थान तक, खंडहर से दुर्ग तक, शास्त्र से लोककथाओं तक, पाषाण से मूर्ति तक, हवेली से मंदिर तक, दंतकथाओं से जातक कथाओं तक, किंवदंतियों से प्रमाण तक, सैलानी  ने  विस्तृत यात्रा संसार संजोया है।

विरासत, धरोहरों की यात्रा में लेखक लोकश्रुतियों, किंवदंतियों की भावुक कल्पनाओं को पुरातत्व और विज्ञान के साक्ष्यों की तार्किकता से पुष्ट करते हुए अतीत  गौरव की अमिट गाथाओं को और अधिक भास्वर,  मुखरित करता है।  संसद भवन की प्रेरणा में पुर्तगाली स्थापत्य के स्थान पर मितावली के इकोत्तरसा महादेव मंदिर की मूल प्रेरणा का प्रमाण देना और इस्लाम से गुंबद निर्माण की प्रेरणा के भ्रम को, इस्लाम के आगमन से वर्षों पूर्व बनी भोजेश्वर मंदिर की गुंबदाकार छत दिखा तोडने के प्रसंग इस वृत्त को भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का यात्रावृत्त सिद्ध करते हैं। “आँख भर उमंग” ऐसी ही सजीव कृति है जिसके पृष्ठ दर पृष्ठ, पंक्ति दर पंक्ति, शब्द दर शब्द पढ़ता पाठक एक पल को भी ध्यान नहीं भटका सकता।

 

यात्रा संस्मरण — 'आँख भर उमंग'

लेखक — डॉ. राजेश कुमार व्यास

प्रकाशक — नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, नई दिल्ली

मूल्य — 310 रूपये मात्र, पृष्ठ — 250

आँख भर उमंग-यात्रा की उमंग का साहचर्य

-डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी

केन्द्रीय साहित्य अकादमी से सम्मानित रसज्ञ कवि, कलाविद् डॉ.राजेश कुमार व्यास की राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित 'आंख भर उमंग' कृति एक दशक की उनकी यात्राओं का भाव भरा प्रस्फुटन है।  यह यात्रा चंबल के जंगलों, नालंदा के खंडहर, नर्मदा की धाराओं, पहाड़ों की नैसर्गिक छटाओं के साथ-साथ भारत की लोक संस्कृति, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक अन्तर्यात्राओं को भी समाहित करती है, जहां प्रकृति,वास्तु शिल्प, इतिहास एवं कला का वैभव चाक्षुष बिम्ब के रूप में व्यक्त होता है।


डॉ. व्यास के इस यात्रा संस्मरण में पहाड़ों की यात्रा में रोमांच के साथ प्राकृतिक सुषमा का मोहक दृश्य लेखनी की मंत्रमुग्ध गति है। भीमताल की यात्रा करते हुए वे लिखते हैं, " गाड़ी पहाड़ से नीचे उतर रही है। पेड़ों का झुरमुट... और बीच में इकट्ठा जल। बरखा के पानी को जैसे धरित्री ने अपनी छोटी सी अंजुरी में बहुत जतन से समेट लिया है।" यह भावमयी क्षिप्रता आकर्षण पैदा करती है।

यात्रा के साथ साथ पुस्तक में लोक संस्कृति से तादात्म्य हमारी आंतरिक लय को भी गतिमान कर देता है। 'दहकते अंगारों पर सबद नाद' शीर्षक यात्रावृत्त में जसनाथी नृत्य का वर्णन करते हुए लेखक स्वयं चमत्कृत होकर लिखते हैं, "लाल दहकते अंगारों पर जसनाथी नृत्य। तेज होते वाद्यों की गति और शब्द नाद के साथ नर्तक अपनी धुन में मगन! औचक एक नर्तक अंगारे को हाथों में उठा मुँह में डाल रहा है तो दूसरा उसे अपनी हथेली में ले मजीरे की तरफ फोड़ रहा है।" यह वर्णन पाठक को भी रोमांचित कर देता है।

डॉ. व्यास प्रकृति के चितेरे हैं। ऐसी स्थिति में पदार्थवादी दुनिया के प्रति उनका विकर्षण स्वाभाविक है। कश्मीर की वादियों में विचरते हुए अपने मन की थाह लेते हुए कह उठते हैं, "शहरीपन से आए बदलावों पर जब भी विचारता हूँ, मन जैसे बुझ जाता है। ढूंढने लगता हूँ, इस गडरिए जैसी उस मस्ती को जो अब न जाने कहाँ लोप हो गई है।"

इसी तरह कवि मन, कला हृदय लेखक ने गाँव, नगर, दुर्ग, नदियों, पहाड़ों, मंदिरों से लेकर खेत खलिहानों तक की यात्रा को जीवंत रूप में प्रवाहमयी शैली के साथ प्रस्तुत किया है। उल्लेखनीय है कि यात्रावृत्त रिपोर्ताज शैली में ना लिखकर भाव-भरी रसात्मक शैली में प्रांजल शब्दावली के साथ है,जिसमें पाठक लेखक के साथ ठहरता हुआ यात्रा करता है। लघु आकार में अनावश्यक शब्द बोझिलता और अलंकरण से बच पाना लेखक की उदारता का प्रमाण है। छिहत्तर यात्रावृत्तों की 250 पृष्ठों में समाहित 'आंख भर उमंग' पुस्तक संपूर्ण भारत की परिक्रमा है। पुस्तक में लेखक द्वारा लिए छायाचित्र भी मोहक है।

पुस्तक: आँख भर उमंग
लेखक: डॉ. राजेश कुमार व्यास
प्रकाशक: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत
पृष्ठ संख्या: 250
आमंत्रण मूल्य: 310/-

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24 October 2021

राजस्थान पत्रिका, 24 अक्टूबर 2021

Friday, July 30, 2021

'यात्रावृत्तांतीय लय में विन्यस्त कविताएं'

कोरोना के इस प्रकोप से बस कुछ ही समय पहले, संजोग से बहुत सारी यात्राएं हुई थी। उन्हीं में से एक यात्रा 'एलोरा' की भी थी। वहां के शिल्प—स्थापत्य में रमते कवि हुआ था— मन। शब्द—शब्द जो झरा, उसे तब डायरी में सहेजा था। सुखद है, राजस्थान साहित्य अकादेमी की पत्रिका 'मधुमती' ने उसे अपने मई—2021 अंक में अंवेरा है।...संपादक मित्र डॉ. ब्रजरतन जोशी ने इन कविताओं को 'यात्रावृत्तांतीय लय में विन्यस्त कविताएं' कहा है—





Wednesday, July 28, 2021

"अमर उजाला" में -'रस निरंजन'

संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला पर एकाग्र 'रस निरंजन' की अमर उजाला, रविवारीय में प्रकाशित यह समीक्षा...


"अमर उजाला" 11 Julay 2021


कलाओं में रमी दृष्यभाषा के पत्र

राजस्थान पत्रिका, 16 जुलाई 2021


कलाएं सौन्दर्य के अन्वेषण में बसे कला मन की परिणति है। कहें नया कुछ रचने, गढ़ने के लिए चलने वाली अकुलाहट। सोचता हूं, सूक्ष्म और स्थूल आकार पर यदि किसी रंग का नाम लिख दें तो क्या वह आकार उस रंग में दिखाई देगा! नहीं ही दिखाई देगा क्योंकि चित्र की भाषा शब्द नहंी आकृति और रंग है। चित्रकला दृष्यकला इसीलिये तो है कि यह पढ़ने या सुनने की चीज नहीं देखने की चीज है। पर कितना अच्छा हो, चित्रों को देखकर नहीं उनके बारे में पढ़कर मन संवेदित हो। 

 बहरहाल, यह लिख रहा हूं और ज़हन में सेंजा के चित्र और उनमें बरते रंगों की भाषा जैसे ध्वनित हो रही है। कारण यह नहीं है कि सेंजा के चित्र मैंने देखे हैं बल्कि यह है कि उनके चित्रों पर रायनर मारिया रिल्के द्वारा क्लारा रिल्के को लिखे पत्रों की भाषा को मन ने पढ़ा और सहेजा है। जोल एजी के अंग्रेजी में अनुदित पत्रों और हाइनरिख वाहगंड पत्सेज की पठनीय प्रस्तावना को पिछले दिनों कवि संजय कुंदन ने हिंदी में भाव भरे रूप मंे पाठकों को सौंपा है। असल में ‘रायनर मारिया रिल्के: पत्रों में सेंजा’ पुस्तक रजा पुस्तकमाला के तहत प्रकाषित ऐसी है जिसमें रिल्के के कवि मन को ही नहीं उनके कलाओं की परख से जुड़े अंतर्मन को पढ़ा ही नहीं बांचा जा सकता है। इसमें उनका अचंभित करने वाला वाक्य ‘अचानक सही आंख मिल गयी’ हो या फिर पत्रों में व्यक्त सेंजा के अनोखे नीले रंगों की निष्क्रिय, लाल और सुंदर अंतःकरण, ठण्डे नाममात्र के नीले समुद्र, नीले पण्डुक धूसर आदि व्यंजनाएं-सभी में रंग संवेदना का अद्भुत काव्य कहन है। रिल्के के पत्र कलाकृतियांे के निर्माण के अर्न्तनिहित में ले जाते खतरे उठाने और अनुभव बढ़ाते कला को असीम तक पहुंचाने से साक्षात् कराते हैं तो कलाकार की सर्जना में निहित तत्वों के साथ स्वयं उनके प्रकृति और कला से जुड़े सरोकारों से भी हमें जोड़ते हैं।  

रिल्के के इन पत्रों में सेंजा के चित्रों में उपजे रोष,  हूबहू बनाने की उनकी जिद से जुड़ी विडम्बनाओं, पेरिस में उनके अपने ही बनाए रेखाचित्रों को देख न्यूड बनाने की सनक, उनके बरते गहरे नीले, लाल, हल्के हरे और लालिमा युक्त काले रंग के साथ ही गजब तरीके की रंगहीनता का विरल वर्णन है। उनके यह पत्र इस मायने में भी महत्ती है कि इनमें वैन गॉग के जीवन का मर्म है तो मूर्तिकार रोंदा के कलाकर्म और अनुषासन की थाह भी गहरे से ली गयी है। रिल्के पत्रों में भी दृष्यभाषा रचते हैं। मन उसमें गहरे से रमता है। काष! हिंदी में भी कला और कलाकारों के अंर्तमन से जुड़ी ऐसी पुस्तकों का आकाश बने। 


Friday, April 16, 2021

मनोरंजन का आधार बने कलाएं

मनोरंजन माने मन का रंजन। पर इधर मनोरंजन में कला पक्ष गौण प्रायः हो रहा है। कहने को रेडियो-टीवी सर्वाधिक मनोरंजन करने वाले माध्यम हैं पर मनोरंजन के नाम पर भाषा के अनर्गल, फूहड़पन में वहां भोंडे लतीफे, नाग-नागिन, सास-बहू जैसे कभी न समाप्त होने वाले धारावाहिक परोसे जा रहे है। भावपूर्ण पारम्परिक हमारे नृत्यों के स्थान पर शरीर के अंगो की लोच के करतब और भयावह अपराध गाथाओं को दिखाने को ही मनोरंजन मान लिया गया है। विचार करें, इसी से युवापीढ़ी क्या तेजी से अवसादग्रस्त नहीं होती जा रही!

राजस्थान पत्रिका, 16.4.2021
कलाएं हमारे यहां रूप-रंगो से ही नहीं उत्सवधर्मिता से भी जुड़ी रही हैं। मनोरंजन में कलाओं के लोक-आलोक से ही मन रंजित होता है। नाट्य की हमारी समृद्ध परम्परा में विदूषक की उपस्थिति स्वस्थ मनोरंजन का कभी बड़ा आधार थी। संस्कृत नाट्य साहित्य के लोकप्रिय रूपक ‘मृच्छकटिकम्’ के एक प्रसंग में विदूषक से राजा कहते हैं, ‘कहानी सुनाओ।’ वह कहानी की शुरूआत करते कहता है, ब्रह्मदत्त नाम का राजा है। काम्पिल्य नाम की नगरी। राजा सुधारता है, ‘मूर्ख, राजा काम्पिल्य, नगर ब्रह्मदत्त। विदूषक इसको कईं बार रटता है। इतने में राजा को नींद आ जाती है। ‘सहस्त्र रजनी चरित’ में राजा हर रात एक स्त्री की हत्या करवाता है। एक दिन राजा के महामंत्री की पुत्री स्वयं आग्रह कर राजा के पास जाती है। रात्रि में वह राजा को कहानी सुनाना प्रारंभ करती है। भोर होने तक वह हर रात कहानी को ऐसे मोड़ पर ले आती है कि उसे सुने बिना राजा रह नहीं सकता। कहानी में कहानी। कहानी में एक और कहानी। इस तरह से कहानियों का जो सिलसिला प्रारंभ होता है वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है। और एक रोज राजा का हृदय परिवर्तन हो जाता है। ‘सहस्त्र रजनी चरित्र’ कहीं ‘अलिफ लैला’ हैं तो कहीं ‘दास्तानें हजार रात’। ‘कथा सरित्सागर’ की कथाएं भी कम मनोरंजक नहीं है। विष्णु शर्मा रचित ‘पंचतंत्र’ में मूर्ख राजपुत्रों को जीव जंतुओं की कथाओं के जरिए नीति संदेशों में भी रंजन हैं। हमारे यहां तो पहेलियां भी इसका बड़ा आधार रही है। कभी दरड़ी ने ‘काव्यादर्श’ में सोलह प्रकार की प्रहेलिकाएं बतायी थी। कहते हैं उसी से बाद में खूसरो ने ‘बूझ पहेली’ और ‘बिन बूझ पहेलियां’ गढ़ी। संगीत के अंतर्गत ध्रुवपद में ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ जैसे निर्थक शब्द भी कुछ इसी तरह से आए। कहते हैं अमीर खुसरो जब भारत आए तो उन्हें ध्रुवपद की भारतीय परम्परा बहुत भायी पर संस्कृत के श्लोकों को देख वह घबराए। वह अरबी विद्वान थे। उन्होंने ध्रुवपद में संस्कृत शब्दों की बजाय निर्थक ‘तन देदे ना’, ‘द्रे द्रे तनोम’ शब्द गढ़ कर तरह-तरह के हिन्दुस्तानी राग गाए। यही बाद में तराने हुए। मनोरंजन के ऐसे ही कलात्मक रूपों में हमारी संस्कृति निरन्तर संपन्न होती रही है।
संगीत, नृत्य, नाट्य कलाएं ही तो स्वस्थ मनोरंजन का आधार है। इसलिए भी कि इनके ऐतिहासिक, पौराणिक, धार्मिक संदर्भ हैं और कोई भी समाज सांस्कृतिक संदर्भ खोकर आगे नहीं बढ़ सकता। इस दृष्टि से टीवी-रेडियो माध्यमों में मनोरंजन का बड़ा आधार क्या यह कलाएं ही नहीं होना चाहिए!

Sunday, December 27, 2020

भाव भरी संगीत की अंजूरी

संगीत ध्वनियों का माधुर्य है। शब्द नहीं भी हो तो संगीत अर्थान्वेषण में मन को स्पन्दित करता है। सौंदर्यबोध और सुरुचि से जो जुड़ा होता है यह! नदी के प्रवाह की मानिंद बहता संगीत इसीलिए बहुतेरी बार न समझ आए शब्दों में भी हममें बस जाता है। डाॅ. मंगलमपल्ली बालामुरली कृष्ण का संगीत ऐसा ही रहा है। वह नहीं है पर उन्हें सुनते मन करता है, गुनें और गुनते ही रहें। स्वरों का सूक्ष्म संकेत वहां है। मंगलम् यानी मंगल करने वाला। शुभता का द्योतक। मन को अवर्णनीय आनंद की अनुभूति देने वाला। अपने तई संगीत, ज्ञान और विवेक से उन्होंने कर्नाटकी संगीत को नया मुहावरा दिया। आलाप के विविध मार्गों में मन को रंजित करता उनका गान पहले से रचे रागों का पुनराविष्कार करने वाला है। वह आलाप के सहारे राग को वहां तक ले जाते जहां तक ले जाने की आम कोई गायक सोच नहीं सकता। शब्दों का मधुर उच्चारण। हिंदी उन्हंे नहीं आती थी परन्तु पंडित भीमसने जोषी, किषोरी अमोनकर, पंडित जसराज के साथ उनकी जुगलबंदी को सुनेंगे तो लगेगा, शब्द शुद्धता में वह राग से अनुराग कराते। गान में शब्द के प्रकाष को दूर कहां तक ले जाना है और कहां उसे होले-होले कम करना है, यह उन्हें बखूबी आता था। यही कारण था, उनका गायन भाषा की सीमा से परे मन में गहरे से उतरता। बल्कि जो वह गाते, उसे फिर से वैसे ही गुनगुनाने का भी मन करता है। कहें, राग स्वर से वह एक भावनात्मक वातावरण सिरजते थे। ऐसा, जिसके ओज से हर कोई नहाना चाहता।

मुझे लगता है, जीवन के विविध  रंगो की रूपगोठ है, डाॅ. बाला मुरली कृष्ण का संगीत। कभी अहीर भैरव में उनका गाया ‘तिलाना’ सुना था। वाद्यों की संगत में वह गा रहे थे ‘नादिर धिन-धिन...’ पर लगा जैसे नृत्य के सर्वांग से साक्षात् हो रहा हूं। उन्हें सुनते यही होता है। बहुतेरी बार वह अपने गायन में नृत्य की भाषा भी रचते थे। उत्सवधर्मिता का रंग नाद ही तो था उनका गायन! गले से संगीत, नृत्य, चित्रकला और तमाम दूसरी कलाओं को वह व्यंजित करते कलाओं के अंतःसंबंधों से भी जैसे वह साक्षात् कराते हैं। विष्वास नहीं हो तो सुनें पंडित भीमसेन जोषी के साथ की उनकी वह जुगलबंदी, ‘मानस भज रे गुरूदेवम्...अमृत मधुर संगीत सुधाकर’। शब्द-षब्द सौन्दर्य, माधुर्य। स्वरों का अद्भुत उजास। और हां, ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ में उनकी गायी पंक्तियांे पर भी गौर करेंगे तो पाएंगे भाषा भेद से परे विरल लालित्य उनके स्वरों में है। ऐसा जो सुनने के बाद मन में सदा के लिए बस जाता है। उनकी स्वयं कंपोज रचना ‘मंगलम्’ तो अद्भुत है। सीधे-सपाट स्वर। राग का कहीं कोई उलझाव नहीं परन्तु शब्दों को परोटने का अनूठा अंदाज। जैसे कोई संगीत का बहुत अधिक ज्ञान नहीं रखने वाला सीधे-सीधे गाकर वेंकेटेष्वरन को मंगल के लिए निवेदित है। पर सुनेंगे तो मन करेगा, फिर से सुनें। सुनते ही रहें। इसलिए कि डाॅ. बालामुरली कृष्ण ‘मंगलम’ में सुरों का विरल आकाष रचते हैं। इसलिए कि वहां मौन का निवेदन है। इसलिए कि सहज संगीत वहां प्रवाहित है। उनकी यही बड़ी विषेषता थी-वह जन-मन से जुड़े संगीत भावों को अपने गले से सदा ही साधते थे। 

‘त्यागराज पंचरत्न कीर्ति’ के अंतर्गत ‘नगमोगू जंदानंद कारका...’ सुनते मन अध्यात्म के रंग में पूरी तरह से रंग जाता है। मुझे लगता है, संत कवि त्यागराज की रचनाओं को तो उन्होंने अपने तई संगीत में जज्ब कर लिया था। लय और ताल पर उनकी विषिष्ट पकड़ थी। यह था तभी तो संत त्यागराज की तेलगू भाषा में रची रचनाओं, खासकर राम की प्रषंसा में रचे शब्दों को उन्होंने इस दौर में जैसे फिर से पुर्नजीवित किया। कर्नाटक संगीत के रागों में आरभी, आदि तालम् में गाया उनका ‘सीता कल्याण-वैभागमी’ राम-सीता विवाह के बहाने प्रकृति का मधुर वर्णन है। भोर, सूर्यादय, पेड़-पौधों पर खिले फूल, जीवने की उमंग की जैसे उन्होंने अपने इस गान में सुमधुर व्यंजना की है। उन्हंे सुनते लगेगा, भाषा भेद समाप्त हो गया है। रह गया है तो बस संगीत।

कर्नाटक संगीत का अर्थ है प्राचीन, पारम्परिक। कभी 14 वीं से 16 वीं सदी में विद्यारण्य, रामामात्य, विट्ठल आदि संगीत विभूतियों ने इस संगीत को अपार लोकप्रिय किया। पुरंदरदास ने संस्कृत और कन्नड़ में संगीत के माध्यम से उपदेष जन-जन तक पहुंचाए। और फिर चैन्नई वैद्यनाथ भागवतार, एस.एस.सुब्बालक्ष्मी की परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य कर्नाटक संगीत में डाॅ. बालामुरलीकृष्ण ने किया। उनके गाए कीर्तन ईष्वर की संगीताराधना है। यह सही है, कर्नाटक संगीत में कृतियां राग और निष्चित ताल में निबद्ध होती है। उनसे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। बालाकृष्णमूरली ने भी कृतियों, कीर्तन संतो या वाग्येयवात की रचनाओं को निष्चित राग और ताल में ही गाया पर अपने मौलिक अंदाज का घोल उन्होंने उनमें किया। माने वह अपने मन के भावों को निष्चित राग-ताल में इस कदर अलंकृत करते कि गान में  उनका अपना एक नया मुहावरा बना। ऐसा जो सुनने वालों को गाने वाले के मनोभावों की गहराई में ले जाता। इसीलिए कहें, उनका गान तन-मन को रंजित करता अंतर्मन संवेदनाओं का अनूठा उजास बिखेरने वाला था। 

डाॅ. बाला कृष्ण मुरली ने बहुत से नए राग भी कर्नाटक संगीत को दिए। बहुत सारी बंदिषे भी बनाई पर सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें अपनी संगीत साधना से गान में शोभायमान किया। वह गाते तो स्वयं उसमें डूब जाते, या कहें लीन हो जाते। कीर्तन में पदों को राग में निभाने का उनका अपना मौलिक अंदाज है। सही और भावुक उच्चारण! भाव भरा, नेह से ओत-प्रोत। स्वर सौंदर्य लिए। शायद इसलिए कि रागों पर और ताल पर उनका पूरा कलात्मक अधिकार था। रागमानिलका, तालमालिका, वर्णम् के बंधे नियमों के बावजूद उन्होंने अपने गायन का सर्वथा नव्य कर्नाटकी संगीत मुहावरा बनाया। वह मृदंगम्, घटम्, मंजीरा और बांसूरी, वायलिन, वीणा वादन भी करते थे। इसीलिए संगीत से जुड़ी सूक्ष्म सूझ उनमें भी। मुझे लगता है, उनका संगीत मनोधर्म संगीत है। अपने संगीतानुभव से सिरजा हुआ। कल्पना और मौलिक दीठ के साथ भावों का अनूठा भव ही तो है उनका संगीत!

उन्हें गाते हुए सुनेंगे तो यह अहसास भी बारम्बार होता है कि वह अंतर्मन संवेदनाओं में संगीत को ही ओढ़ते और बिछाते थे। यह महज संयोग ही नहीं है कि ‘माधवाचार्य’ फिल्म के संगीत निर्देषन के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और अर्सा पहले आई इस फिल्म में उनके गाए ‘वंदे वन्ध्यम सदानंदम वासुदेवम...’ को सुनेंगे तो पाएंगे लोकप्रिय माध्यम में भी उन्होंने संगीत की शास्त्रीयता की विरल दीठ को संजोया था। ‘हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत घरानों की दिग्गज हस्तियों के साथ उन्होंने जुगलबंदी की। तेलगू फिल्म ‘भक्त प्रहलाद’ में उन्होंने अभिनय भी किया और कभी रवीन्द्र संगीत की रचनाओं को बांग्ला भाषा में रिकाॅर्ड भी किया परन्तु जो भी किया, उसमें सुने-गुने को ही फिर से नहीं सिरजा बल्कि अपने तई उसे नवीन व्याकरण भी दिया। वह कहते भी, ‘सभी प्रस्तुतियों को मैं चुनौती के रूप में लेता हूं। मैं सभी प्रकार के संगीत को पंसद करता हूं। सब में एक सीख जुड़ी होती है। फ्यूजन विविध प्रकार के संगीत की समझ को संभव बनाता है। मेरे लिए श्रुति माता है और पिता लय। कर्नाटक-हिंदुस्तानी संगीत जैसा कुछ नहीं है। संगीत बस संगीत होता है। संगीत जीवन है। अगर संगीत नहीं है तो फिर जीवन में कुछ भी नहीं है। जैसे सूर्य, चन्द्र और उनका प्रकाष है, ठीक वैसे ही जीवन में संगीत का अस्तित्व है।’

डाॅ. बालामुरलीकृष्ण ने 50 के करीब नए रागों को सिरजा। बहुत सारी बंदिषे बनाई। अपने गाए गीत भी लिखे और संत परम्परागत कृतियां, कीर्तन आदि को अपने तई गुना और फिर से नयी दीठ में बुना। नयी सिरजी रागों पर उनका कहना था, ‘नए राग कंपोज नहीं होते अचानक गाते हुए अपने आप ही सृजित हो जाते हैं। और जब कभी ऐसा होता, मैं उन्हें नोट कर लेता और एक गीत उस राग में कंपोज कर देता।’ वह संगीत को अपना भगवान मानते थे। इसीलिए बार-बार कहते भी थे, ‘मेरा संगीत मेरा भगवान है।’ 

बहरहाल, आंध्रप्रदेष के संकरागुप्तम में जन्मे मंगलमपल्ली बालामुरली कृष्ण जब 6 वर्ष के थे तभी से गाना शुरू कर दिया था। जब 8 वर्ष के वह थे तभी उन्होंने सार्वजनिक सभाओं में प्रस्तुति प्रारंभ कर दी। उनकी माता उत्कृष्ट वीणावादक थी तो पिता निपुण बांसूरी वादक। माता-पिता के जन्जमात संगीत संस्कारों के साथ ही उन्होंने कर्नाटक संगीत के विद्वान संगीतज्ञ परूपल्ली रामकृष्णया पंटुलु से संगीत की बारीकियां सीखी। तेलगूभाषी होते हुए भी उन्होंने कन्नड़, संस्कृत, तमिल, मलयालम, हिंदी, बंगाली आदि कईं भाषाओं में देष-विदेष में 25 हजार से अधिक साधिकार प्रस्तुतियां दी। पर उन्होंने अपने सीखे को सीखाते हुए नई पीढ़ी को संस्कारित भी किया। जिनमें सीखने की ललक दिखती, उन्हें वे निःषुल्क सीखाते भी। यह सब लिख रहा हूं और उनका गाया सुना हुआ बहुत सारा जेहन में फिर से बसने लगा है। 



Friday, October 2, 2020

'पुस्तक संस्कृति' मे 'नर्मदे हर'

नेशनल बुक ट्रस्ट ​इण्डिया की लोकप्रिय पत्रिका 'पुस्तक संस्कृति' के सितम्बर—अक्टूबर 2020 अंक मे 'नर्मदे हर' पर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष, प्रेमचंद के लेखन के मर्मज्ञ विद्ववान डॉ. कमल किशोर गोयनका की यह दीठ और नर्मदा के अनथक पदयात्री अमृतलाल वेगड़ जी का पत्र... (पुस्तक की पाण्डुलिपि उन्होंने बांची थी और और तभी उन्हें यह इतनी दाय आयी कि इस पर अपनी सुंदर हस्तलिपि में अपने को व्यक्त किया था)