साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के आमंत्रण पर
श्रीगंगानगर में बाल साहित्य पर आयोजित परिसंवाद में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया...इस दौरान राजस्थानी की डायरी विधा की पुस्तक 'कथूं—अकथ' का लोकार्पण भी हुआ।
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के आमंत्रण पर
श्रीगंगानगर में बाल साहित्य पर आयोजित परिसंवाद में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया...इस दौरान राजस्थानी की डायरी विधा की पुस्तक 'कथूं—अकथ' का लोकार्पण भी हुआ।
जानकीपुल-- June 6, 2021 .. 188Comments5 Mins Read
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राजेश कुमार व्यास की किताब ‘रस निरंजन’ समकालीन कला पर लिखे निबंधों का संग्रह है। इस किताब पर यह विस्तृत टिप्पणी लिखी है चंद्र कुमार ने। चंद्र कुमार ने कॉर्नेल विश्वविद्यालय, न्यूयार्क से पढ़ाई की। वे आजकल एक निजी साफ्टवेयर कंपनी में निदेशक है लेकिन उनका पहला प्यार सम-सामयिक विषयों पर पठन-लेखन है-
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कलाएँ वैसे अपने अर्थ का आग्रह नहीं करती, बस अपने होने के चिन्ह छोड़ती हैं। उन चिन्हों से पाठक-दर्शक-श्रोता अपने लिये जो ग्रहण कर सके, वही कलाओं का उद्देश्य है। इसीलिये प्रयाग शुक्ल कहते हैं कि कलाओं को देखना भी एक कला है। इस देखने-महसूस कर सकने में अक्सर कला-आलोचक, कला और रसिकों के मध्य एक सेतु का काम करते हैं। कला वस्तुत: अनंत के विस्तार की यात्रा होती है। इस निरंजन यात्रा में कोई सहचर अगर सहजता से रास्ता बताता चले, तो यात्रा का आनन्द असीमित हो सकता है। विभिन्न कलाओं को समदृष्टि से कला-रसिकों के लिये व्याख्यायित करना दरअसल कला को ही समृद्ध करना है। इस लिहाज़ से कला-आलोचक डॉ. राजेश कुमार व्यास का कलाओं पर एकाग्र — ‘रस निरंजन’ उनकी कला लेखन की यात्रा का ऐसा पड़ाव है जिस पर बरबस ही ध्यान जाता है।
मूलत: उनका लेखकीय सफ़र एक साँस्कृतिक रिपोर्टर के रूप में शुरू हुआ जो नाट्य, संगीत, चित्रकला, संस्थापन कला और सिनेमा से होते हुए यहाँ तक पहुँचा है जहाँ वो कला के समग्र रूपों के एक वाचक के रूप में हमसे मुख़ातिब होते हैं। कहन के अन्दाज़ में लिखते हुए वे कला के विभिन्न रूपों से हमें परिचित करवाते हैं। उनके भीतर के यायावर ने उन्हें एक अलग तरह के कला-आलोचक के रूप में स्थापित करने में महत्ती भूमिका निभाई है। यायावर कहीं देर तक नहीं ठहरता लेकिन जहाँ है, वहाँ पूरी शिद्दत से वह सब कुछ देख-समझ लेता है जिसे फिर बाद में वह जब चाहे, उसी शिद्दत से महसूस कर सकेगा। उनका कला-लेखन शास्त्रीय तो है पर जड़ता लिये नहीं है। वे मूलत: भारतीय दृष्टि से कला आलोचना करते हैं लेकिन ज़रूरत पड़ने पर पश्चिमी दृष्टि और विचारकों के हवालों से अपनी बात के मर्म को समझाने में भी संकोच नहीं करते। जब वे ऐसा करते हैं तो यह स्वत:-स्फूर्त होता है, न कि कोई थोपा हुआ उदाहरण।
शास्त्रीय गायन पर इत्मिनान से लिखने वाला कब ग़ज़ल (जगजीत सिंह), भजन (हरिओम शरण) और लोक-गायकी के रंग से सराबोर रेशमा तक पर सहजता से
अपनी बात कह जाता है, अचंभित करता है। इसी तरह संगीत के साथ ही नाट्य-कला, चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी, संस्थापन कला, नृत्य कला इत्यादि कला के विभिन्न अनुशासनों में वे जिस प्रकार सहजता से उन कलाओं का शाब्दिक चित्रण करते हैं वह पाठकों को कला जगत के विभिन्न आयामों को आत्मसात् करने में सहायक है। दरअसल, कला के विभिन्न अनुशासनों का अनवरत अनुशीलन उन्हें इस मुक़ाम पर ले आया है जहाँ वो इन कला रूपों पर सहजता से लिखते-बोलते हैं। उनका कला-आस्वादन, एक कला-रसिक के रूप में उनके निबंधों में भाषिक रूप में उतरता है। वह पाठक को इतनी सहजता से कला के सूक्ष्म विश्लेषण तक ले जाता है जहाँ कला से प्राप्त आनन्द लेखक और पाठक एकसार ग्रहण करते हैं। रस निरंजन में यह आनन्द पाठकों को हर आलेख में महसूस होता है।
एकाग्र की सहज और सुरुचिपूर्ण भाषा व छोटे लेकिन सारगर्भित निबन्ध पाठकों के सामने विहंगम कला-संसार के भीतर पहुँचने के द्वार-सा कार्य करते हैं। रस निरंजन को पढ़ते हुए पाठकों को प्रस्तुत कला-रूप के सूक्ष्म विश्लेषण के बावजूद किसी तरह का भाषाई आडम्बर नहीं दिखता। एकाग्र में संचयित निबंध विभिन्न कला-रूपों, कला-साधकों और कला की दुनिया के अनजाने स्वरूपों को पाठकों के सामने खोलते हैं लेकिन इन निबंधों में एक अन्त:कथा है जो इन स्वतंत्र निबंधों को एक सूत्र में पिरो कर रखती है। यह अन्त:कथा दरअसल विभिन्न कला-रूपों के ज़रिये आस्वादन और अन्तत: भीतर के तम को उजास देने वाला वह प्रकाश है जो हर कला का अन्तिम उद्देश्य होता है। देशज भाषा का स्वच्छंद उपयोग, कलाओं में लोक का सतत् स्पंदन और कलाओं के अन्त:सम्बन्धों का सहज विश्लेषण इस एकाग्र को सिलसिलेवार पढ़ने हेतु प्रेरित करता है।
लेखक कलाकार की विराटता से नहीं, बल्कि उसके कला-कर्म के बारीक विश्लेषण से जो कला-दृश्य हमारे सामने रखता है वहीं इस एकाग्र की विशेषता है। इस छोटी सी पुस्तक में समकालीन भारतीय कला के सुपरिचित साधकों के कला-कर्म पर आलेख मिलेंगे। कला-लेखन के साथ ही कला-रसिकों और विद्यार्थियों को इस पुस्तक से भारतीय कला की विराट छवि अपने सूक्ष्मतम विश्लेषण के साथ, सहज भाषा में प्राप्त होगी। प्रेरणा श्रीमाली के नृत्य पर डॉ. राजेश कुमार व्यास का कथन है कि उनका नृत्य मौलिक है, वह पारम्परिक होते हुए भी जड़त्व धारण नहीं करता, नृत्य में शास्त्रीयता है लेकिन वह दुरूह नहीं। यही बात स्वयं डॉ. व्यास के कला-लेखन के लिये भी कही जा सकती है। उनकी कला-दृष्टि, भाषिक सहजता और भावपूर्ण संप्रेषण उनकी भाषा की शास्त्रीयता को बचाये रखते हुए भी उसे अकादमिक और क्लिष्ट नहीं होने देते। वह कलाओं का आस्वादन करते हुए पाठकों के साथ आनन्द की अनुभूति साझा करते है।चार खण्डों में समायोजित इक्कतीस निबन्धों में लेखक ने समकालीन भारतीय कला का पूरा दृश्य पेश किया है जिसे बोधि प्रकाशन, जयपुर ने ‘बोधि पुस्तक पर्व’ के पाँचवें बँध के रूप में नौ अन्य पुस्तकों के साथ प्रकाशित किया है। दस पुस्तकों का यह सैट मात्र सौ रुपयों में पाठकों के लिये उपलब्ध है।
~ चंद्रकुमार
पुस्तक: रस निरंजन
लेखक: डॉ. राजेश कुमार व्यास
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
पृष्ठ: 96
प्रकाशन वर्ष: दिसम्बर 2020
मूल्य: 10/- (पूरा सैट – 100/-)
अमर उजाला, रविवारीय में..
पंडित रामनारायण जी का सान्निध्य निरंतर मिलता रहा। उनसे जुड़ी बहुत सी यादें—बातें हैं। उनके बिछोह के साथ ही सारंगी के भारतीय युग का अवसान हो चला है। मुझे लगता है, यह पंडित रामनारायणजी ही थे जिन्होंने सारंगी के सौ रंगों का सार समझाया। सारंगी का विरल माधुर्य रचते इसे जन— मन से जोड़ा। ...
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| अमर उजाला, 10 नवम्बर 2024 |

पत्रिका, 9 नवम्बर 2024
भारतीय संस्कृति पर्वों में गूंथी है। गहरे और गूढ़ अर्थ इनमें समाए हैं। हिंदू कैलेंडर पृथ्वी से दिखने वाले चंद्रमा और सूर्य की गतिविधियों पर केन्द्रित है। हर मास का अपना अध्यात्म संस्कार है।परन्तु इनमें विज्ञान के संस्कार भी समाहित है। कार्तिक दामोदर मास है। दाम’ माने रस्सी और ‘उदर’यानी पेट। दामोदरष्टकम मे आता है, दधिभाण्ड फोड़ने के कारण माँ यशोदा के डर से कृष्ण ऊखल से दूर दौड़ रहे हैं। पर माँ यशोदा ने उनसे तेज दौड़कर उन्हें पकड़ ऊखल से बाँध दिया। ऐसे दामोदर भगवान को मैं प्रणाम करता हूं।
विष्णुसहस्रनाम में यह भगवान विष्णु का 367वाँ नाम है। दामोदर माने वह जिसके हृदय में ब्रह्माण्ड बसता है। कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक नदी स्नान अथवा घर में ही जल्दी उठ पवित्र नदियों के ध्यान—ज्ञान, दीपदान का महत्व है। ज्योतिष—विज्ञान कहता है, इस माह सभी को प्रकाश देने वाले सूर्य अपनी नीच राशि तुला में रहते हैं। इससे प्रकाश का क्षय हो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। दीपक जलाने और ध्यान—ज्ञान से सर्वत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस समय वायु की रुक्षता कम हो जाती है। चन्द्रमा का बल बढ़ जाता है। चन्द्र की सौम्य एवं स्निग्ध किरणों का जल शरीर—अंग प्रवाह सुधारकर मन को उमंग से भरता है। चरक संहिता में कार्तिक मास के इस जल को "हंसोदक" माने अमृत समान माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त में कार्तिक माह में स्नान का यही रहस्य है।
कार्तिक पूर्णिमा भी तो महाकार्तिकी है। इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासर का वध किया। त्रिपुरासर ने तीनों लोकों में त्राही त्राही मचा रखी थी। पुराण कथाओं मे आता है, भगवान शिव ने असंभव रथ पर सवार हो त्रिपुरासर का वध किया। सूर्य—चंद्र इसके पहिए थे। सृष्टा सारथी बने। श्रीहरि बाण और अग्नि नोक बनी।
वासुकी धनुष की डोर, और मेरूपर्वत धनुष बने थे। इंद्र, वरुण, यम, और कुबेर जैसे लोकपाल इस रथ के घोड़े बने। तमिल साहित्य में आता है,युद्धक्षेत्र में ब्रह्मा और विष्णु भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। तब एक क्षण आया जब त्रिपुर यानी तीनों किले एक सीध में आ गए। शिव मुस्कुराए और किले जलकर राख हो गए। तमिल में शिव को "सिरिथु पुरामेरिता पेरुमन" कहा गया है। वह जिसकी मुस्कुराहट मात्र से त्रिपुरासर जलकर खाक हो गया। त्रिपुर दाह पर देवताओं ने शिव की नगरी काशी पहुंच दीप जलाए। यही देव—दीपावली कहलाई।
सिखों के पहले गुरु नानक देव जी का जन्म भी कार्तिक पुर्णिमा पर हुआ। इसलिए यह दिन प्रकाश पर्व कहा गया। कार्तिक पूर्णिमा पर ही भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार ले हयग्रीव का वध किया। कथा आती है, सृष्टि रचयिता ब्रह्मा के निद्रामग्न होने पर हयग्रीवासुर वेदों को चुरा समुद्र में ले गया। सृष्टि अज्ञान के अंधकार में डूब गई। नारायण ने तब मत्स्य रूप धारण कर उसका वध किया। वेदों को मुक्त कराया। इसी अवतार में उन्होंने जल प्रलय से भी पृथ्वी को बचाया। वह मछली बन संसार के प्रथम पुरुष मनु के कमंडल में आए और उनसे संसार को बचाने के लिए बड़ी नाव का निर्माण करने को कहा। इस नाव पर सवार होकर ही बाद में मनु सप्त ऋषियों, बीजों, पशु-पक्षियों के जोड़ों संग सुरक्षित हुए। भगवान विष्णु ने बड़ी मछली बनकर मनु की बनाई नाव के निकट आकर वासुकि नाग की रस्सी से जल प्रलय से उन्हें बाहर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। तो कहें, भारतीय संस्कृति का उजास लिए है कार्तिक मास।
दैनिक जागरण—सोमवार,'सप्तरंग' में ...
रुद्र वीणा माने शिव का वाद्य। आदि ध्वनि से जुड़ी है- रुद्र वीणा। शिव समय को संबोधित हैं। महाकाल माने उत्पत्ति, स्थिति और लय के अधिपति। कथा आती है, मां पार्वती सो रही थी। शिव ने उन्हें वक्ष स्थल पर हाथ रखकर लेटे देखा। जगत जननी की चढ़ती—उतरती सांस और लेटने की मुद्रा के पवित्र सौंदर्य पर रीझते उन्होंने रुद्र वीणा का आविष्कार कर दिया। शिव का यह प्रिय वाद्य है। कल्पना करता हूं, भगवान शिव रुद्र वीणा बजाते हैं और इसमें निहित ब्रह्मांडीय कंपन और दिव्य लय में इसका जैसे सार समझाते हैं। रुद्र वीणा में वह पारलौकिक ध्वनियों के जरिए ही सृजन, स्थिति और संहार को प्रतिध्वनित करते हैं।
उस दौर में जब रुद्र वीणा महिलाओं के लिए सर्वथा त्याज्य था, ज्योति हेगड़े ने इसी में अपने को साधा। आरंभ में वह गुरु बिन्दु माधव माधव से सितार सीखती थी। एक रोज़ उन्हें रूद्रवीणा बजाते सुना। वीणा के तार से उनका मन इस कदर झंकृत हुआ कि उन्होंने इसे सीखने का निर्णय कर लिया। गुरु ने मना कर दिया। कहा, लड़कियों के लिए यह नहीं है। इसमें अतिरिक्त ताकत की जरूरत पड़ती है। ज्योति ने जिद पकड़ ली तो उन्होंने एक पुरानी न बज सकने वाली रुद्र वीणा परीक्षण के लिए दी। वह लगातार बारह घंटे इसे बजाती रही। घर वालो ने कहा, ग्रामोफोन की सुई अटक गई है। उनकी मां ने जब थॉमस की 'द वे म्यूजिक' में रुद्र वीणा के संबंध में यह लिखा हुआ पढ़ा-सुना कि इसे बजाने वाली महिला कभी मां नहीं बन सकती तो उन्होंने भी मना किया। पर ऐसे अंधविश्वासों को धता बताते ज्योति हेगड़े ने रुद्र वीणा सीखी। अंतर के उजास में ध्रुवपद की खंडार वाणी में इसकी साधना की। फिर तो वीणा के उनके तार कुछ इस कदर सधे कि विश्वभर में विरल रुद्र वीणा वादक के रूप में ख्यात हुई।
ज्योति हेगड़े रुद्र वीणा में होले—होले स्वरों की बढ़त करते एक मीठी सी अनूगूंज मन में पैदा करती है। अध्यात्म की गहराईयों में ले जाते आलाप के साथ निचले सप्तक में सुरों का प्रवाह! लयबद्धता संग जोड़़ और फिर झाला। संगीत के विरल ध्यान में डूबाते हैं, रुद्र वीणा के उनके स्वर! उनका वादन नाद—ब्रह्म से साक्षात् है। हठयोग प्रदीपिका में आता है, एकाग्र मन से नाद का अन्वेषण ही योग है। ज्योति हेगड़े यही कराती है। संगीत में ध्यान का योग। राग गुजरी तोड़ी, राग ललित, राग मधुवंती, राग चन्द्रकौन्स और भी दूसरे रागों में उन्हें सुनेंगे तो लगेगा ध्वनियों के जरिए अंतर्मन सौंदर्य को हमने पा लिया है। राग पूर्वी में उन्हें कभी सुना था। पूर्वी थाट के इस मौलिक राग को सुनते अनुभूत हुआ, सूर्यास्त के समय नटराज कैलाश पर नृत्यरत हैं। ध्यान से जुड़ी ध्वनि मे ज्ञान के परम आनंद का अवगाहन कराते रुद्र वीणा के स्वरों का वह उजास मन में अभी भी बसा है। ज्योति हेगड़े की रुद्र वीणा के स्वर ऐसे ही हैं, शिवत्व से साक्षात् कराते। योग संग ज्ञान का आलोक छुआ अपनापन वहां है।
जवाहर कला केन्द्र के आग्रह पर 5 अक्टूबर 2024 को ध्रुवपद उत्सव में बोलने जाना हुआ...
सुखद लगा, देश की ख्यातनाम रूद्रवीणा वादक ज्योति हेगड़े संग बतियाना हुआ। उन्हें सुनता रहा हूं, रूद्रवीणा की वह इस दौर की विरल साधिका है।
सुप्रसिद्ध सुरबहार साधक पं० पुष्पराज कोष्टी का भी सान्निध्य संपन्न करने वाला था...
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| पत्रिका, 5 अक्टूबर, 2024 |
बंग्ला में यह नवरात्रा अकाल बोधन है। माने असमय पूजा। कथा आती है, देवी अम्बिका रावण के साथ थी इसलिए राम उसे हरा नहीं पा रहे थे। राम ने 108 नील-कमल से देवी आराधना प्रारंभ की। राम एक—एक कर फूल चढाने लगे कि देवी ने परीक्षा ली। एक कमल कम पड़ गया। राम को याद आया, उनकी मां उन्हें कमल नयन कहती थी। उन्होंने अपनी आंखे निकाल देवी को भेंट करना चाहा। देवी प्रकट हुईं और उन्हें रावण को मारने की शक्ति प्रदान की।
हमारी संस्कृति इसी तरह शक्ति—रूप में प्रतीक धर्मी है। शिव देवों के देव महादेव क्यों हैं? इसलिए कि अकेले वह हैं, जिन्होंने शक्ति को अपने समान, बल्कि अपने से भी अधिक सम्मान दिया। भृंगी उनके बहुत बड़े भक्त हुए। शिव को मानते थे, शक्ति को नहीं। एक बार शिव परिक्रमा करने कैलाश गये। देखा, मां पार्वती निकट बैठी है। उन्होंने प्रदक्षिणा करने बीच से गुज़रने की कोशिश की। शक्ति शिव के वामांग पर विराज गई।
भृंगी ने सर्प
रुप धारण कर बीच से निकलने का यत्न किया। शिव अर्द्धनारीश्वर हो गए। दाहिने भाग से
पुरुष और बाएं भाग से स्त्रीरूप। भृंगी कहां माने? उसने चूहे रुप में मां
पार्वती को विलग करना चाहा। क्रोधित हो मां ने शाप दिया। तू मातृशक्ति को नहीं
मान रहा। जा इसी समय
तेरे शरीर से तेरी माता का अंश अलग हो जाए। तंत्र विज्ञान कहता है, शरीर में
हड्डियां और पेशियां पिता से और रक्त-मांस माता से प्राप्त
होता है। शाप से भृंगी के
शरीर से रक्त और मांस गिरने लगा। अविमुक्त कैलाश में मृत्यु तो हो नहीं सकती थी। असह्य
पीड़ा में क्षमा मांगी। शिव—शक्ति ने भृंगी को अपने गणों में प्रमुख स्थान दे तीसरा
पैर दिया। इसी से अपने भार को संभाल वह शिव-पार्वती संग चलते हैं। आरती में हम
गाते भी तो हैं, नंदी-भृंगी नृत्य करत हैं...।
नवरात्र दुर्गा पर्व है। दुर्गा शब्द भी तो दुर्ग से बना है। माने जिसे जीता नहीं जा सकता।
भवानी अष्टकम् में आदि
शंकराचार्य लिखते है, 'गतिस्त्वं
गतिस्त्वं त्वमेका भवानि।' माने मां मेरी शरण- गति आप ही हैं। कहते हैं, शंकराचार्य जब कश्मीर पहुंचे तो एक दफा भूख प्यास से
शक्तिहीन हो गए। निकट से एक महिला निकली। उन्होंने पानी पिलाने का आग्रह किया। महिला
ने कहा, पुत्र पास आकर पी लो। वह बोले, मां मैं
शक्तिहीन हूं। मुस्कराते हुए उसने कहा, शिव को मानते हो तो शक्ति की क्या जरूरत? शंकराचार्य को
आदि शक्ति का भान हुआ। उन्होंने वहीं आराधना की। कहा, चराचर जगत को चलाने
वाला कोई और नहीं आद्याशक्ति है।
शिव पूर्ण पुरुष है। इसलिए कि वह शक्ति को धारण किए हैं। शक्ति माने प्रकृति। मातृ शक्ति इसीलिए वंदनीय है कि वह अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जीती है।
पंडित विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं, नदी ऊंचाइयों का
मोह त्याग ढ़लान की ओर बहती है। उसी तरह मां धीरे धीरे अपने पिता, पति से संतान
की ओर अभिमुख होती, उसी के सुख के लिए जीती है। इसमें ही अपनी संपूर्ण सार्थकता
पाती है। जननी कौन? वही जो जने को प्यार करें। जब तक जननी है—प्यार, नेह का भाव भी
बना रहेगा। नवरात्रि नौ देवियों की आराधना का नहीं, मातृ—शक्ति के
वंदन—अभिंनदन का पर्व है।