ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, June 4, 2022

पंडित भजन सोपोरी --संतूर में लयकारी का विरल संयोजन! राग—राग रस!

 पंडित भजन सोपोरी 'संतूर संत' थे। मूलत: वह सूफी घराने से थे पर संतूर को उन्होंनें ता-उम्र संत की तरह साधा। निरंतर उसमें नवीन प्रयोग किए। उसके गायकी अंग को निखारा। तंत्रकारी अंगो का विस्तार करते माधुर्य के बहुतेरे नये अध्याय भी लिखे।  मन के तारों को झंकृत करता संतुर का उनका 'ज़मज़मा' कमाल का था। तारों पर 'मेज़राब' से वह हल्का प्रहार कर बहुतेरी बार जब वहीं ठहर जाते तो मंदिर की घंटियों सा निनाद कानों में जैसे रस घोलता।

संतूर माने शततंत्री। सौ तारों वाला वाद्य। पर संतूर की अपनी आरम्भ से ही सीमाएं रही है। सुफियाना संतूर एक सप्तक का होता है। माने वहां रागों का फैलाव नहीं हो पाता। तीन सप्तक का हो तो यह फैलाव हो! सो भजन सोपोरी ने संतूर में इसे संभव करते बहुत से तकनीकी परिवर्तन किए। लकड़ी के बने 27—28 की बजाय संतूर के 45 गोटे (ब्रिज) उन्होंने इसमें बनवाए। संतूर में वीणा तत्व की मौजूदगी कायम की। रागदारी से जोड़ते संतूर में गान की बारीकियों के विरल प्रयोग फिर उन्होंने किए। भारतीय शास्त्रीय संगीत की रागरागिनियों के साथ ही गायकी अंग में गजल, भजन, नज्म़ों का भी अनूठा संसार संतूर में उन्होंने सिरजा।

संतूर की शिक्षा पंडित भजन सोपोरी को उनके पिता पंडित शंभुनाथ सोपोरी से मिली। पर उस सीखें में निरन्तर उन्होंने अपने तई बढ़त की। सुनेंगे तो लगेगा, शास्त्रीय रागों में दर्शित भाव को कश्मीर के लोक रागों में ढालते उन्होंने धुनों की प्रकृति को जैसे गहरे से जिया है। संतूर के उनके शास्त्रीय रागों का आलाप, जोड़, गत और द्रुत तीनताल की रूहदारी मन को सुकून देने वाली है। याद है, पहले पहल राग गावती में उनका संतूर सुना था। ढलती सांझ के कितनेकितने रंग मन में जैसे सदा के लिए तब समा गए थे। फिर तो उन्हें निरंतर सुनता ही रहा हूं। राग विभाश, चन्द्रकौंश, बागेश्री आदि में आप भी सुनेंगे तो मन करेगा गुनें। बस गुनते ही रहें।

'राजस्थान पत्रिका' 4 जून, 2022

यह महज संयोग ही नहीं है कि वह जब पांच वर्ष के थे तभी 1955 में श्रीनगर में उन्होंने अपनी पहली प्रस्तुति संतूर के एकल शास्त्रीय वादन से ही दी। संतूर में नवाचार करते बाद में उन्होंने भांतभांत के शास्त्रीय और लोक रागों में इसे सजाया। संतूर में 'बोल', 'छंद' और 'लय' का नया मुहावरा भी उन्होंने बनाया। शास्त्रीय संगीत की संतूर की व्यवस्थित शैली 'सोपोरी बाज' की भी उन्होंने अपने तई स्थापना की। सोचता हूं,  संतूर में क्याक्या उन्होंने नहीं रचा! भजन, गजलें, ओपेरा और भी बहुत सारा। सुनेंगे तो लगेगा, संतूर बजता नहीं गाता हुआ, नृत्य में रमतारमाता हुआ सदा के लिए हमारे ज़हन में बस जाता है। संगीत और प्रदर्शन कला के लिए उन्होंने 'सा मा पा', सोपोरी अकादमी की भी शुरूआत की। संस्कृत, अरबी, फारसी, राजस्थानी, सिंधी और बहुत सारी दूसरी भाषाओं में उन्होंने संगीत सिरजा तो देशभक्ति गीतों को भी विरल धुनों से निरंतर संपन्न किया।

उन्हें सुनते रागराग रस की अनुभूति होती है। सितार पर भी उनकी गजब की पकड़ थी। यह था तभी तो बहुतेरी बार उन्हें सुनते संतूर के तारों में वीणा के अलौकिक संसार की भी झलक मिलती रही है। याद है, एक दफा उनसे जब भेंट हुई तो शततंत्री वीणा से संतूर की यात्रा पर बहुत कुछ नया उन्होंने बताया था। उस मुलाकात में ही रमा मन संतूर की उनकी रूहदारी में बस रहा है। लयकारी का अतुलनीय संयोजन! रागराग रस! ध्वनि में दृश्यों का अनूठा संसार और उनकी वह दिव्य उपस्थितिअब कहां!

Saturday, May 21, 2022

कला आयोजनों संग जरूरी है उनकी व्याख्या

संगीत, नृत्य, नाट्य और चित्रकला आदि कलाएं संस्कृति की जीवंतता हैं। इनकी प्रस्तुतियां पर हमारे यहां सूचनात्मक दृष्टि तो  है, पर विचार प्रायः गौण हैं। कलाएं मन को रंजित ही नहीं करती, उनमें रचते-बसते ही हम अपने होने की तलाश कर सकते हैं। पर कला प्रस्तुतियों का जितना महत्व है, उतना ही  उन पर सूक्ष्म दृष्टि से लिखे, व्याख्यायित किए जाने का भी है। यह लिखा खाली सूचनाप्रद, समाचार रूप में ही होगा तो उसकी कोई सार्थकता नहीं है। सोचिए, क्योंकर हम फिर कलाओं के निकट जाने के लिए प्रेरित होंगे! पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने कभी कहा था, ‘हमें तानसेन नहीं कानसेन बनाने हैं।  यह उन्होंने इसीलिए कहा था कि तानसेन जैसे गुणी संगीतकारों को सुनने के लिए ध्यान से उन्हें सुनने वालों की भी जरूरत है।

आनंद कुमार स्वामी ने पहले पहल जब श्री कृष्ण के बांसुरी बजाते बांकपन  स्वरूप, शंख, चक्र, गदा, हस्त के विष्णु, शिव के नटराज स्वरूप को देखा तो चकित  रह गए। मानव स्वरूप से इतर इन विग्रहों के निहितार्थ में वह वेद, पुराणों में लिखे, व्याख्याओं पर गए। भारतीय कलाओं  पर उनकी सूक्ष्म आलोचना दृष्टि से ही कला-कृतियों को वहृद स्तर पर हम संजो सके, सहेज पाए।

 पंडित रविशंकर का सितार जगचावा हुआ।  पर उनकी लोकप्रियता शास्त्रीय रागों के मधुर वादन भर से ही नहीं हुई। अपनी आत्म कथा में उन्होंने स्वीकार किया है, 'दूसरे देशों में मेरे सितार को आरम्भ में स्वीकार ही नहीं किया गया। पर जब मैंने अपनी रागों, उनकी मधुरता के अर्न्तनिहित की व्याख्या, समीक्षाओं का सहारा लिया तो तेजी से मुझे और मेरे संगीत को प्रसिद्धि मिली।' पंडित शिव कुमार शर्मा ने संतूर की अपनी पहली प्रस्तुति जब दी तो समीक्षकों ने संतूर को शास्त्रीय वाद्य यंत्र मानने से ही इंकार कर दिया। पंडित जी ने समीक्षाओं को अपने लिए चुनौती रूप में लिया और सूफी गायन संग बजने वाले संतूर की सीमाओं को समाप्त करते उसे तकनीकी रूप में परिष्कृत कर गायकी अंग में कुछ इस तरह से बढ़त की कि स्वयं वह बाद में संतूर के पर्याय बन गए।

 माखन लाल चतुर्वेदी के लिखे में शब्दों की पुनरावृति हेाती थी। हरिशंकर परसाई ने एक दफा इस पर करारा व्यंग्य किया। चतुर्वेदीजी ने बुरा नहीं माना। अपने अध्ययन कक्ष की टेबल के पास इस लिखे को टांग लिया। जब कभी वह कुछ नया लिखते, परसाई जी के लिखे को देखते और इस तरह से उनके लिखे में शब्दों का पुनरावृत्ति दोष समाप्त हो गया। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र आदि सभी कलाओं के प्रति समाज में रसिकता  भी तभी जगती है, जब सूक्ष्म दृष्टि से उनकी व्याख्या हो। पर इधर गूगल ने एकरसता का इस कदर प्रसार किया है कि पंडित शिव कुमार शर्मा जैसे विरल संगीतकार के अवसान पर उनके सन्तूर वादन के अन्तर्निहित में जाने की बजाय वही प्रकाशितप्रसारित हुआ जो गूगल ने सबको बताया था।

बहरहाल, कलाओं पर लिखे की सार्थकता तभी है, जब समय संदर्भों के साथ कला और कलाकार की विधा विशेष के अंर्तनिहित को छुआ जाए। दृष्य-श्रव्य कला में दिख रहे, सुने जा रहे संसार के परे भी भाव संवेदनाओं का आकाश बनता है। यह आकाश कलाकृति में रमते बसते ही सिरजा जा सकता है। समीक्षा को हमारे यहां रचना के समानान्तर और बहुत से स्तरों पर तो रचना से भी बड़ा इसीलिए माना गया है, कि वह कलाओं से हमें प्रेम करना सिखाती है। कलाओं के समग्र परिवेश को समझने की प्रक्रिया से भी आगे यह जीवन से जुड़े व्यापक और उदात्त दृष्टिकोण से भी हमें जोड़ती हैं। इससे ही तो बनता है, कलाओं का रसिक संसार।

 राजस्थान पत्रिका, 20 मई 2022


Saturday, May 7, 2022

अतीत से प्यार करता आधुनिकता में रचा-बसा शहर पेरिस

 कलाकृतियां सौंदर्य के संसार से जोड़ते जीवन को गढ़ती है।  वहां जो कुछ दिखता है, वही नहीं, आंतरिक स्वरूप का सत्यान्वेषण अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस देखे में इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान और पदार्थविज्ञान का थोड़ा-थोड़ा अध्ययन यदि हो तभी बहुत कुछ विरल हम पा सकते हैं। पेरिस के लुव्र संग्रहालय में इसे निंरतर अनुभूत किया। सीन नदी के किनारे कभी फ्रंास का राजमहल रहा ‘म्यूजे द लूव्र’ विश्वभर में सर्वाधिक देखा जाने वाला संग्रहालय है। इसे देखने का अर्थ है, पश्चिम के कला इतिहास की यात्रा करना। भारतीय लेखक प्रतिनिधिमंडल में संग्रहालय में संजोई ख्यात कलाकारों की उकेरी मूल कृतियों को देखते यह भी लगा, कलाकृतियों के प्रिंट बहुत से स्तरों पर आंखों को भरमाते है। मूल में जो रंग, रेखाओं और सतह से जुड़ी झंकार होती है, वह प्रिंट में कहां! 

यूजीन डेलाक्रोइक्स, वाॅन गाॅग, मातिस, माने, व्हिसलर, रेनोया, माने, लियोनार्डो दा विंची जैसे कितने ही कलाकारों की कलाकृतियों को एक दिन में देखना वहां संभव भी कहां है! एक माह भी शयद कम पड़े। कलाकृतियां ही नहीं, संग्रहालय का स्थापत्य भी अद्भुत है। यहीं लियोनार्डो द विंची की अपार लोकप्रिय ‘मोनालिसा' भी है। पर जब देखने पहुंचा तो निराशा हुई। लोग़ कलाकृति नहीं, उसके संग फोटो खिंचवाने में ही टूट पड़ रहे थे। लगा, मूल कलाकृति देखने की अनुभूति की बजाय अपने को उसके संग दिखाने की होड़ भी यहां आने वाली भीड़ का एक बड़ा कारण है।

राजस्थान पत्रिका, 7 मई 2022


बहरहाल, पेरिस भव्य है। एक रोज़ वर्साइल जाना हुआ तो देखा, वहां संग्रहालय देखने के लिए स्थानीय लोगों की लंबी कतार लगी हुई है। इसमें छोटे बच्चे और सुंदरता को निहारने की उत्सुकता, कौतुक ने भी लुभाया। फ्रांस में बाल्यकाल से ही कला शिक्षा जोर रहता है। बच्चों को इसीलिए संग्रहालय ले जाया जाता है कि उनमें छवि पहचानने, उसमें निहित सौंदर्य की संवेदना जग सके। मुझे लगता है, यह है तभी तो कि फ्रांस ने अपने कला इतिहास और स्थापत्य के अतीत को अभी भी सर्वथा नवीन बनाए रखा है। पेरिस भ्रमण के दौरान निंरतर यह भी अनुभूत किया यह शहर नहीं, कला रूपों एवं अभिव्यक्ति की मूलभूत प्रेरणाओं और उसमें हुए परिवर्तनों के इतिहास की अनूठी व्यंजना है।

‘लूर देफेल’ यानी एफिल टावर के पास ही एक होटल में हम रूके थे। सो रोज़ ही उसे देखने का सुयोग होता। कभी मेले के आकर्षण हेतु इसे एलेग्जेंडर गस्तेव एफिल ने बनाया था। बाद में इसकी स्थिरता और भव्यता ने इसे पेरिस का भव्य स्मारक बना दिया। लिफ्ट से दो मंजिल तक ऊपर पहुंच कर एक रोज़ देखा सिन नदी पेरिस के  ठीक बीच से होकर गुजरती किसी नहर सी है। ऊपर से देखेंगे तो नदी ही नहीं उस पर बने सुंदर पुल, अंदर तैरते पोत, सड़कें, महल, दूर कहीं चलती मेट्रो, चर्च के स्वर्ण गुम्बद, ग्रांड आर्च की मीनारें, महाद्वार, वृक्ष, वनस्पतियांे का सधा सांैदर्य सदा के लिए जैसे मन में बस जाता है।

पेरिस से कोई एक घंटे की दूरी पर स्थित  प्रोविंस गांव भी एक दिन जाना हुआ। रास्ते के खेतों के पीले, हरे और धूसर रंगो में रमते वाॅन गाॅग भी तब निरंतर याद आए। वहां बना बारहवीं सदी का दुर्ग, गुफा में बना प्राचीन निवास स्थान और अब संग्रहालय, स्थापत्य सौंदर्य का जैसे पाठ बंचाता है। गोथिक शैली में बनी इमारतें और गांव का वातावरण भी कम रमणीय नहीं है। और हां, पहाड़ी पर बसे उस गांव की ढ़लान उतरते खिलखिलाते बच्चों को भी तो कहां भूल पाया हूं! संग फोटो खिंचवाया तो शर्त थी-सोशल मीडिया पर साझा न करूं। पेरिस के बच्चे आधुनिकता में रचे-बसे हैं, पर दिखावे से परे हैं। लगा, अतीत से प्यार करते आधुनिकता में रचा-बसा पेरिस इसीलिए अपने कला-सौंदर्य को बरसों से ऐसे ही सहेजे हुए है।

Thursday, May 5, 2022

भारतीय लेखक प्रतिनिधिमंडल में पेरिस यात्रा

भारतीय लेखक प्रतिनिधिमंडल में पिछले दिनों फ्रांस की राजधानी पेरिस की यादगार यात्रा में निरंतर यह महसूस किया कि अपनी संस्कृति, सभ्यता और भाषा के प्रति वहां के लोगों को अथाह प्यार है।


भाषा के प्रति तो इस कदर अभिमान भी है कि वह इतर भाषा में संवाद से लगभग परहेज ही करते हैं। अतीत से प्यार करते आधुनिकता में रचे-बसे फ्रांस के लोगों में साहित्य और कलाओं से विरल अनुराग है।

लूव्र संग्रहालय हो या फिर दूसरे और भी संग्रहालय—छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों की लम्बी कतार टिकट क्रय कर उन्हें देखने लालायित दिखी। ऐसे ही जिस 'पेरिस बुक फेअर—2022' में हम मेहमान थे, वहां भी पुस्तकों और साहित्य से जुड़े विविध सत्रों में अपार जनसमूह जैसे उमड़ पड़ा था।

पेरिस बुक फेयर—2022 : यात्रा वृतान्त का वाचन

भारतीय पवेलियन में अपने यात्रा वृतांत का पाठ किया। इसके साथ ही भारतीय और फ्रेंच भाषा के लेखन से जुड़ी विविधता, संस्कृत और संस्कृति की जीवंतता के साथ ही सामयिक भारतीय लेखन से जुड़े सरोकारों के समूह—सत्रों में भी अपनी बात रखी।

घुमक्कड़ हूं सो एक दिन यूनेस्को धरोहर में सम्मिलित गांव प्रोविंस भी घूम आया।

इस यात्रा में वहां के हरे, पीले, धूसरित खेतों और नीले आसमानी रंगो के प्रकृति कैनवस से रू—ब—रू होते वॉन गॉग की कलाकृतियां भी बहुत याद आयी।

यादों का वातायन











Saturday, April 16, 2022

काल को नियोजित करती कलाएं

कलाएं अंतर्मन संवेदना के उत्स में भीतर के हमारे सौन्दर्यबोध को जगाती हैं। लोक संस्कृति, परम्पराओं, रहन-सहन और स्थान विशेष के वास्तु, स्थापत्य में बहुत सा वह कलाओं का अर्न्तनिहित ही होता है जो आनंद का हमारा हेतु बनता है।  

बहुतेरी बार यह भी लगता है, कलाएं वृहद स्तर पर काल को नियोजित करती हैं। कुछ दिन पहले कालिंजर दुर्ग स्थित नीलकण्ठ जाना हुआ। शैलकृत गर्भगृह, एक मुखी शिवलिंग और स्तम्भ युक्त मण्डप! परिसर में विशाल खड़ी षोडषभुजी काल भैरव रूपी गजान्तक शिव की विरल प्रतिमा। गुफाओं, चट्टानों में उकेरी हजारों-हजार प्रतिमाओं के शिल्प वैभव से साक्षात् होते चंदेल शासकों के कला अनुराग से स्वतः मन साक्षात्कार करता है। शिव के नीलकण्ठ की विरल व्यंजना वहां प्रकृति प्रदत अचरज में भी है। जितनी भी शिव मूर्तियां वहां हैं, उनका कण्ठ गीला मिलेगा। पत्थरों में न जाने कहां से पानी आता है और वह कहीं और नहीं शिव के कण्ठ में ही जैसे ठहरता है। कला में पौराणिक काल का सुमधुर यह कला संयोजन ही तो है! 

अजंता,एलोरा की गुफाओं में, खजूराहो, कोर्णार्क की मूर्तियों में, सांची के स्तूप में, अशोक कालीन स्तम्भों में और तमाम हमारे प्राचीन स्थापत्य में कला नियोजन के ऐसे ही अनूठे चितराम प्रतिबिम्बित होते है। यही क्यों, समाधियां, स्मारकों में भी हमारे पूर्वजांे की संलिप्तता एक खास अंदाज में दिखाई देती है। 

राजस्थान पत्रिका, 16 अप्रैल 2022

यह जब लिख रहा हूं, यायावरी मन का देखा और भी बहुत सारा ऐसा ही आंखों के समक्ष जैसे साकार हो रहा है। कुछ वर्ष पहले खैरागढ़ स्थित देश के एक मात्र इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने जाना हुआ था। वहां से अस्सी किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के खजूराहो कहे जाने वाले कबीरधाम जिले में स्थित शिव धाम भोरमदेव भी तब जाना हुआ। रास्ते भर आदिवासी संस्कृति से साक्षात् होते मैनें पाया सड़क किनारे छपरेल के घरों में खास अंदाज में सिंदुरी रंग में चित्रकृतियां अंकित हैं। भोरमदेव पहुंचा तो वहां भी सिंदुरी रंग से सजा भोरमदेव मंदिर का संकेत चिन्ह अलग से दिखा। मंदिर की दीवारों पर शिल्पियों द्वारा अंकित सुंदर प्रतिमाएं। बहुत सारी मिथुन मूर्तियां भी। लौट आया पर वहां के वास्तु शिल्प और मिट्टी में समाए सिंदूरी रंग में ही मन रमा है। ऐसे ही हर स्थान में, वहां की मिट्टी का अपना एक खास रंग होता है, गौर करेंगे तो युगीन सरोकारों से जुड़ा और भी बहुत कुछ कला का हम पाएंगे ही। 

भुवनेश्वर में लिंगराज का सुंदर मंदिर है। यह शहर दो भागों मंे बंटा हुआ है। एक आधुनिकता से जुड़ा है तो दूसरा पूरी तरह से प्राचीन संस्कृति को अपने में समाए है। लिंगराज मंदिर और वहां के अंधेरे गर्भगृह में दीपक की रोशनी का भला-भला उजास अभी भी मन सहेजे हुए है। बिन्दु सागर झील और खंडहर पाषाण मंदिरों का शिल्प वैभव अतीत से जुड़े अनुभवों की जैसे यात्रा कराता है। धरोहर संपन्न बहुत से नगर, स्थान, छतों के कंगूरें, चौराहों पर स्थापित मूर्तिशिल्प अतीत के अन्वेषण को प्रेरित करते हैं! कहीं रखी हुई पुराने ढंग की बैंच, पुराना बाजा, घड़ियों, झाड़फानुशों को देखकर ऐसा अनुभव होता है जैसे हम पुराने युग में प्रवेश कर रहे हैं। रोड साईटों पर लगाये गये पिल्लरों, उनमें बंधी लोहे की सांकलों को ही लें। शहर की संस्कृति, वहां की कला से आपका सीधे जैसे साक्षात् होता है। गुलाबी नगरी जयपुर की चौपडें़, एकरस बनी दुकानें, गुलाबी रंग और यहा का वास्तु-सभी में सुव्यवस्थित बसावट की धरोहर जैसे हमें बहुत कुछ और भी पढ़ा-सुना याद दिलाती है। बीकानेर की तंग गलियांे, हवेलियों, चौक मोहल्लों में बिछे तख्त पाटों की संस्कृति में अपनत्व के संस्कार जैसे घुले हुए हममें बसते हैं। प्राचीन दुर्ग, मंदिरों, नगरों के शिल्प-स्थापत्य में युग ऐसे ही तो ध्वनित होता हममें जैसे समाता है। 




Sunday, April 3, 2022

यात्रा वृतान्त 'नर्मदा के कंकर सब शिवशंकर'


धुन के धनी संपादक मित्र हरीश बी. शर्मा के संपादन में प्रकाशित

​ 'कथारंग वार्षिकी 2022—2023' में प्रकाशित यात्रा वृतान्त... 








Wednesday, March 30, 2022

ललित कलाओं में राजस्थान

 राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका 'मधुमती' में ...

आभारी हूं, संपादक डॉ. ब्रजरतन जोशी का जिन्होंने यह लिखवा लिया।

 "साहित्य और कलाओं की दृष्टि से हमारे पास समृद्ध-संपन्न परम्परा तो है पर इस परम्परा को पुनर्नवा करने, इससे समाज को बौद्धिक रूप में संपन्न करने, मूर्धन्य प्रतिभाओं और उनके विपुल अवदान से नई पीढ़ी को साक्षात् कराने का कोई जतन इधर नजर नहीं आता है। अतीत में झांकेंगे तो पाएंगे राजस्थान सांस्कृतिक दृष्टि, सांस्कृतिक मूल्यों से आरम्भ से ही संपन्न रहा है। संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्रकला और यहां तक कि स्थात्यकला का यह प्रदेश आरम्भ से ही गढ़ सा रहा है, पर सोचिए! कलाओं, स्थापत्य की हमारी धरोहर में कहीं किसी स्तर पर इधर बढ़त हुई है? ..."














Saturday, March 26, 2022

गति-स्थिति में काल की सनातन संरचना

गति में जीवंत होता नृत्य देह का गान है। काल भी लयबद्ध वहां हमें लुभाता है। महाकाल शिव की नटराज प्रतिमा देखें। अग्नि चक्र के भीतर नृत्य करते वह सृष्टि के उद्भव, स्थिति और संहार को ही जैसे व्यंजित करते हैं। इसीलिए कहें, नृत्य मनोरंजन नहीं देह का जागरण है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में पहले नृत्य नहीं था। कौतुक दिखाकर नट नाट्य का आरम्भ करते थे। शिव ने इसमें नृत्य का समावेश कराया। इसी से उनका ताण्डव 108 मुद्राओं, करण और अंगहार रूप में नाट्य का अंग बना। अभिनव ने नाट्यशास्त्र की व्याख्या करते बड़ा सुंदर शब्द बरता है-‘सर्वशिल्प प्रवर्तकम्’। माने नृत्य में सभी शिल्पों का समावेश है। वहां अभिनय, चित्र, वास्तु जैसी तमाम कलाएं ताल-लय में शोभायमान होती है।

राजस्थान पत्रिका, 26 मार्च, 2022

खजुराहो नृत्य समारोह इस बार मंदिरों के बाहर नहीं उनके प्रांगण में हुआ। भरत नाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी, कथक आदि की नृत्य प्रस्तुतियां देखते वहां मन भी जैसे नर्तक हो उठा। अलाउद्दीन खां अकादमी के निदेशक जयंत भीषे के साथ खजुराहो में भांति भांति के शास्त्रीय नृत्यों का आस्वाद करते लगा, मंदिर के पाषाणों पर उकेरी मूर्तियां भी वहां जैसे जीवंत हो रही है। केलूचरण महापात्रा की पुत्रवधु सुजाता ने जानकी को ही नहीं कालिदास को भी अपनी प्रस्तुति में जिया तो राजेन्द्र- निरूपमा ने समागम के अंतर्गत भरत नाट्यम और कथक का विरल समन्वय किया। जयरामाराव ने ‘धिमिकित धिमिकित ताल मृदंग’ की आवृति में मुद्राओं का अनुठा लालित्य बिखेरा।  अन्नू-पल्लवी, संध्या पुरेचा आदि के नृत्य में अंतराल, स्थिति और गति में देखने वालों से संवाद कर रहे थे। नृत्य की इन प्रस्तुतियों में रमते लगा, नृत्य व्यक्ति के बाह्य ही नहीं अंतर को भी उद्घाटित करता है। माधवी मुदगल, केलूचरण महापात्र, कुमुदनी लाखिया, अदिति मंगलदास के देखे वह नृत्य भी जैसे जहन में कौंधे जिनमें एक कला में कितनी कितनी कलाएं समाहित होती हस्तमुद्राओं, पद संचलन में जी उठती है। कथकली, भरत नाट्यम में कोण बनते हैं तो ओडिसी में त्रिभंग होता है। मुझे लगता है, नृत्य इसी तरह अवकाश और काल की सनातन संरचना करता हैं। 


नृत्य विसर्जन है। कलाकार देह से प्रायः वहां गौण हो जाता है। यूक्रेन का नर्तक निंजिस्की नृत्य करते इतनी ऊंची छलांगे लगाता कि गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त भी वहां नदारद हो जाता। किसी ने उससे पूछा, कैसे यह संभव होता है? निंजिस्की ने कहा, नृत्य करते वह लापता हो जाता है। खुद उसे नहीं पता होता कैसे वह ऐसे करता है। नृत्य जड़, चेतन, शरीर, आत्मा और मन की गति-स्थिति है। यामिनी कृष्णमृर्ति ने कभी वितस्ता को अपने नृत्य में बांधना चाहा था। अनुभूति में तभी उन्हें जैसे आलोक मिला, ‘नदी और नृत्य में समानता होती है। दोनों ही गति में जीवंत होते हैं।’

मुझे लगता है, अंग-उपांग, प्रत्यंग की अर्थपूर्ण व्यंजना में नृत्य समग्र रूप में कला का सार है। पंचभूत तत्वों से बने शरीर का भाव-भव। नृत्य में मन, बुद्धि और आत्मा का भी जैसे समवाय होता है। अदृष्य के लिए शब्द पर्याप्त नहीं होते, भाषण काल को समेट लेता है परन्तु देश को नहीं। नृत्य देश और काल दोनों को एक साथ स्वीकारता है। इसे वहां देखा-सुना और बांचा भी जा सकता है। आप क्या कहेंगे!


Monday, March 21, 2022

दैनिक 'ट्रिब्यून' में "आँख भर उमंग"

 दैनिक 'ट्रिब्यून' रविवारीय 20 मार्च 2022 में  "आँख भर उमंग"

--खास यात्राओं का दिलचस्प ब्योरा

--नदी के समान गतिमान शैली में दर्ज यात्रा वृतान्त

--मन के एकांत की चाह से राह

दैनिक ट्रिब्यून, 20 मार्च 2022






'आंख भर उमंग' पर--श्री गंगा शरण सिंह

संपादक, अनुवादक और समीक्षक श्री गंगा शरण सिंह ने 'आंख भर उमंग' पर मन से लिखा है—

#किताबें_2022

स्मृतियाँ सँजोती हैं-
यादों का घर।
पर्वतों से बह चली आती है नदी,
झूमते पेड़ों संग
हवाएँ सुनाती हैं-
जंगल का राग,
धोरों की रेत में बरसता है
चाँदनी का हेत
पंख खोल उड़ता मन
सुनता है-
देखा- अदेखा
जीवन संगीत।
हर बार यात्रा ही देती है-
आँख भर उमंग।
किसी किताब का पाँचवाँ पृष्ठ अमूमन समर्पण के लिए सुरक्षित होता है। डॉ राजेश कुमार व्यास के सद्यः प्रकाशित यात्रा संस्मरण 'आँख भर उमंग' के पाँचवें पृष्ठ पर दर्ज यह काव्य पंक्तियाँ उन स्मृतियों को समर्पित प्रतीत होती हैं जिनके रचनात्मक दबाव के चलते इस किताब की रचना सम्भव हो सकी।
यात्रा की स्मृतियाँ जब किसी रचनाकार को स्मृति यात्रा पर बहा ले जाएँ, तभी ऐसी लालित्यपूर्ण, पठनीय कृतियों का जन्म होता है। 'आँख भर उमंग' एक समर्थ कवि का सरस, प्रवाहमान गद्य है। इस काव्यात्मक यात्रा वृत्तान्त से गुजरते हुए पाठक किसी सहयात्री की तरह तमाम तीर्थस्थलों और ऐतिहासिक धरोहरों के साथ ही उस प्रकृति का भी साक्षी बनता जाता है जो इस किताब के हर अंश में अविच्छिन्न रूप से मौजूद है।
किसी कृति की भूमिका या प्रस्तावना इसलिए महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि यहीं से पाठक और उस किताब की आंतरिक दुनिया के बीच एक खिड़की खुलती है। इस यात्रा वृत्तान्त की प्रस्तावना 'पुरोवाक्' मुझे बहुत भायी इसलिए उसी के कुछ सम्पादित अंश आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
◆ यात्रा मन के एकान्त की चाह की राह है। यात्रा में रमे मन के एकांत में ही प्यार और सौन्दर्य के फूल खिलते हैं।
◆ यात्राओं के दौरान ही मन विराट का दर्शन कर पाता है।
यात्रा पथ से गन्तव्य तक पहुँचने की अधीरता है।
◆ जिस तरह से फूल फल ही किसी वृक्ष का एक मात्र लक्ष्य नहीं होता वैसे ही यात्रा का भी अंतिम लक्ष्य किसी स्थान पर पहुंचकर आनंद की प्राप्ति भर नहीं है। किसी स्थान पर पहुंचकर मन के आंगन में जो फूल खिलते हैं, फल लगते हैं वह तो एक पड़ाव है। फल अपने गर्भ में भावी वृक्ष के बीज को जैसे पका रहा होता है, ठीक वैसे ही किसी एक रमणीय स्थान की यात्रा अपने अंदर दूसरे स्थान या स्थानों के बीजों का अंकुरण भी हमारे अंदर कर रही होती है। इन यात्राओं में प्रायः यह भी अनुभूत किया है कि हर यात्रा अंतर्मन आलोक तक पहुंचने का भी गंतव्य है। इस गंतव्य में बहुत सारा पढ़ा हुआ, सुना हुआ और स्मृतियों में संचित ही सबसे बड़ा पाथेय होता है। जब तक कहीं नहीं पहुंचते, उस स्थान का अनजानापन रहस्य के आवरण में घुम्मकड़ मन को और अधिक अन्वेषण के लिए उकसाता है। पहुंचने पर उस स्थान का अनजानापन आत्मीयता में घुल जाता है। आँख की उमंग के सहारे यह हमारा अपना हो जाता है।
● आँख भर उमंग (यात्रा संस्मरण)
● डॉ राजेश कुमार व्यास
● राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT)
● पृष्ठ: २५०
● मूल्य: ₹ ३१०