ऐतरेय ब्राह्मण का बहुश्रुत मन्त्र है चरैवेति...चरैवेति. जो सभ्यताएं चलती रही उन्होंने विकास किया, जो बैठी रहीं वे वहीँ रुक गयी. जल यदि बहता नहीं है, एक ही स्थान पर ठहर जाता है तो सड़ांध मारने लगता है. इसीलिये भगवान बुद्ध ने भी अपने शिष्यों से कहा चरत भिख्वे चरत...सूरज रोज़ उगता है, अस्त होता है फिर से उदय होने के लिए. हर नयी भोर जीवन के उजास का सन्देश है.

...तो आइये, हम भी चलें...

Saturday, January 25, 2025

सुषमा महाजन की जल—रंग कलाकृतियां



पत्रिका 25 जनवरी, 2025



कुछ समय पहले गुलेर चित्रकला की दो कलाकृतियां मुम्बई में 31 करोड़ में खरीदी गई। इनमें एक अप्रतिम कलाकार नैनसुख की गीत—संगीत सभा विषयक और दूसरी उन्हीं की बाद के पीढ़ी के कलाकार की जयदेव के गीत गोविंद पर आधारित सिरजी कलाकृति है। एब्सट्रेक्ट कला के इस दौर में पारम्परिक भारतीय लघु चित्र कला की यह बाजार—मांग उम्मीद जगाने वाली है।

पारम्परिक भारतीय चित्रकलाएं रंग—रेखाओं की शैलीगत विशेषताओं से ही नहीं विषय—वैविध्यता में भी विरल है। वह विडम्बना ही रही है कि ब्रिटिश का से ही समकालीन विमर्श में पारम्परिक भारतीय कलाएं वैश्विक स्तर उपेक्षित प्राय:  रही है। भारत से बाहर जब 'मुगल कला'  को धर्म से जुड़ा बताते सुनता हूं तो इस बौद्धिक दरिद्रता पर तरस आता है। भारतीय कला मर्मज्ञ आनन्‍द केंटिश कुमारस्‍वामी  कभी स्थापित किया था कि मुगल दरबारों में जो पनपी वही भारतीय कला—शैलियां है। मुगल कला का धर्म से कोई संबंध नहीं है। पश्चिम में आज भी भारतीय संगीत को “एथनो-म्यूजिकोलॉजी" कहा जाता है। माने उनका संगीत आधुनिक है और हमारा पारम्परिक। पश्चिम द्वारा कलाओं की विकसित की गई इसी हीन ग्रंथी ने वैश्विक स्तर पर हमारी कलाओं की समृद्ध परम्परा को प्रचारित नहीं होने दिया है। हमारे यहां कलाओं में मूत—अमूर्त का भेद कभी नहीं रहा है। भारतीय कलाओं में जितना बाह्य सौंदर्य महती है, उससे कहीं अधिक उनका आंतरिक पक्ष है। कलाओ में महत्वपूर्ण वही कहां होता है जो दिख रहा होता है, महती वह होता है जो दिखने के बाद मन में घटता है। 

अभी कुछ दिन पहले ही डॉ. सुषमा महाजन की जल—रंग कलाकृतियों की प्रदर्शनी देखने का सुयोग हुआ। रंग, रेखाओं और टेक्सचर के सुगठित स्थापत्य में उन्होंने जैसे सौंदर्य का जीवन छंद रचा है। अंतर अन्वेषण में जेबरा, बंदर, गिलहरी, पक्षियों की विरल भात भांत की छवियां। एक कलाकृति में तीन घोड़ों के अलग—अलग रंगों में जीवन—गति है। हमारे यहां लोक देवताओं के घोड़ों को 'नीले घोड़े का असवार' कहा गया है। गूढ़ अर्थ है, नीला घोड़ा माने जो गति में आसमान से बातें करे। कलाओं में ही नहीं जीवन में भी कहन का यह गूढ़ पक्ष हमारे यहां महती रहा है। डॉ. सुषमा की कलाकृतियां रंग—संवेदना में प्रकृति में घुले रहस्यों से ही साक्षात नहीं कराती है, प्राचीन मंदिरों, पाषाण मूर्तियों और वास्तु—स्थापत्य को भी देखने का नया संस्कार देती है। हरेक कलाकृति में एक खास एकान्तिका है। कलाकार ने यहां उकेरे दृश्यों, स्थानों को देखा ही नहीं है, मानो पढ़ा है। कुछ इस तरह से कि वह स्थान फिर से हमारी स्मृति में सौंदर्य की एक नई दृष्टि प्रदान करता जीवंत हो जाए। कोणार्क के रथ मंदिर, बीकानेर की हवेलियों  और पहाड़ों पर छाई बर्फ  और पसरा मौन यहां दृश्य में जैसे ध्वनित है। उनकी सभी कलाकृतियों में रंग छंद सरीखे हैं। 

जल—रंगों में उन्होंने ठौड़—ठौड़ स्मृति को जैसे जीवंत किया है। असल में यहां जितना दृश्य है, उतना ही उसमें निहित अदृश्य का मोटिफ है। मसलन गणेश की एक कलाकृति में दूर तक फैला गणेश का कान! रंग—रूप में स्वरों का उजास यहां है। गौर करेंगे तो पाएंगे ग्रामोफोन से निकलते मधुर स्वरों को यहां सुषमा जी ने रूपान्तरित कर दिया है। पारम्परिक मिनिएचर पेंटिंग, लोक कलाओं के प्रतीक—चिन्ह और मांडणे और उनमें समाई सुंदर संरचनाओं से सजा संसार लगभग सभी कलाकृतियों में यहां है। हाथियों की आकृतियां हैं तो सूखे पत्तों, रंगों के धूसर में पार्श्व की मोहक रंग—छटाओं में जीवन के गहरे अर्थ यहां उद्घाटित हुए हैं। कलाएं क्या है? सौन्दर्य का अन्वेषण ही तो! डॉ. सुषमा की कलाकृतियां प्रकृति और जीवन में घुली उत्सवधर्मिता का गान है। रूपकों की दृष्टि—बहुलता में प्रकृति और जीवन का रूपान्तरण! इन पर लिखते हुए पश्चिम की दृष्टि की बजाय भारतीय सौंदर्य—रस की रमणीय दृष्टि में ही जाना पड़ेगा। ऐसा करेंगे तभी अपनी कलाओं से अपनापा होगा। इनकी वैश्विक पहचान भी बन सकेगी। 


Monday, January 20, 2025

भाव—भव में समाहित मार्धुय—छंद

संगीत संगीत क्या है? भाव—भव में समाहित मार्धुय—छंद ही तो! मुझे लगता है, सप्त स्वरों में लय की साधना है संगीत। मास्टर कृष्णराव फुलंब्रीकर को सुन—गुन यही सब मन में आता है। वह स्वर—सिद्ध गायक ही नहीं थे, भावों में गूंथी लय में संगीत को जैसे समझाते हैं। यह भी लगेगा, सहज, सरल और बहुत आसान लगने वाली धुनें उन्होंने सिरजी है, गायी है। पर, धैर्य—धर सुनें। पाएंगे अप्रचलित रागों में भी भावों की विरल सृष्टि उन्होंने की है। 

लता के गाए और उनके संगीतबद्ध 'कीचक वध' फिल्म के 'आज मिलन की रात है' गीत को ही सुनें। एक धुन में कितने—कितने भाव उन्होंने इसमें संजोए हैं! यह फिल्म 1959 में आई थी। मराठी में गीत लिखा था जी.डी.मडलुगर ने और हिंदी में पंडित भरत व्यास ने। संगीत दोनों का मास्टर कृष्णराव का है। सुनेंगे तो यह भी लगेगा वंसत देसाई, सी.रामचन्द्र, सुधीर फड़के आदि कितने ही संगीतकारों ने कितना—कुछ उनसे ही तो पाया है।

दैनिक जागरण, 20 जनवरी, 2025


 मास्टर कृष्णराव ने शास्त्रीय रागों के अप्रचलित को भी प्रचलित किया। स्वर—लय की लूंठी व्यंजना में अभंगों, प्रार्थनाओं व आरतियों के एक ही ढर्रे के संगीत की एकरसता को शास्त्रीय रागदारी के माधुर्य से जोड़ा। शास्त्रीय रागों को विशिष्ट रूप में उन्होंने गाया ही नहीं उनमें निहित भाव—सौंदर्य का आकाश रचा है। इसीलिए मराठी ही नहीं हिंदी और दूसरी भाषाओं में भी उनके गीत बेहद लोकप्रिय हुए, बहुभाषी बने। यह संगीत में विचार—उजास की उनकी दृष्टि ही है जिसमें अप्रचलित जोड़-रागों का विरल स्वर छलका है। तार षड्ज लगाकर ‘जोवन मद भर आई’ सोहनी राग की उनकी बंदिश हो या फिर राग शिवमत भैरव में 'आज मौजूद भये', अनवट राग—गांधारी में 'कन्हैया आवो रे',राग भटियार में 'रैन गई भई भोर' सुनेंगे तो संगीत की दृश्य सृष्टि से भी औचक साक्षात होंगे। 

राग मिश्र पहाड़ी में 'मुरली वाले तुम जवाब दो' सुनेंगे तो पता चलेगा एक ही बोल को कितने कितने रूपों में प्रकटा जा सकता है। मुझे लगता है, आलाप में अलहदा फक्कड़पन, गान की विरल सादगी और जटिल रागों का भी सहज सौंदर्यान्वेषण उनके संगीत की विशेषता है। कम से कम स्वरों और अनावश्यक सांगीतिक जटिलता से अपने को बचाते हुए मास्टर कृष्णराव ने भिन्न रागों की बारीकियों के समन्वय से बहुतेरे मधुर राग भी बनाए।  यह मास्टर कृष्णराव के ही प्रयास थे, जिससे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के लिखे 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत की स्वीकृति मिली। 

आरंभ में 'वंदे मातरम्' ही तो हमारा राष्ट्रगान बना था। लोकमान्य तिलक की तो इसमें इतनी श्रद्धा थी कि शिवाजी की समाधि के तोरण पर इसे उत्कीर्ण करवाया था। आजादी आंदोन में भी इसी गीत ने लोगों में निरंतर जोश भरा था पर आजादी बाद राष्ट्रगान बनने के विरोध के चलते कविन्द्र रवीन्द्र के 'जन गण मन' को राष्ट्रगान स्वीकारा गया। 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' आंदोलन में मास्टर कृष्णराव ने मिश्र झिंझोटी राग में रचित धुन में इसे विधिवत प्रस्तुत किया। वह अपनी संगीत सभाओं का समापन भी इसी से करते थे। मन में एक मुहिम थी, इसे देश—गान बनाने की। सो संविधान सभा के सदस्यों के समक्ष इसे बार—बार उन्होंने प्रस्तुत किया। सराहना भी मिली। विरोध इस बात पर हुआ कि यह परेड में बजने योग्य नहीं है। 

मास्टर कृष्णराव ने इसके तीन सहज—सरल संस्करण तैयार किए। एक मार्च गीत रूप में, तीसरा नेताओं के स्वागत रूप में और तीसरा राष्ट्रगान रूप में। उनका सांगीतिक प्रदर्शन सबको भाया पर मुस्लिम विरोध की आवाजों में 'जन गण मन' राष्ट्रीय गान स्वीकारा गया। पर मास्टर कृष्णराव असफल नहीं हुए, उनके प्रयासों से ही बाद में 'वंदे मातरम' को राष्ट्र गीत की मान्यता मिली। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बाद में उनसे ‘बुद्ध वंदना‘ को भी सांगीतिक संरचना में निबद्ध करने का अनुरोध किया। मास्टर कृष्णराव ने बगैर मानदेय बुद्ध वंदना को संगीतबद्ध किया। यह भी बहुत लोकप्रिय हुई। शास्त्रीय संगीत को लोकप्रिय करते, सुगम संगीत में शास्त्रीयता का रस घोलते वह सप्त स्वरों में लय का माधुर्य रचते। राग भैरवी में भी तो उन्होंने नए से नए पद, बंदिशें रच उन्हें इतना सुंदर स्वर दिया कि वह कभी ‘भैरवी सम्राट’भी कहाए। कितना—कुछ विरल है, संगीत का उनका माधुर्य और वैविध्य! लिखें तो शब्द कम ही पड़ेगें।

Saturday, January 11, 2025

'अयन्नार देव लोक' में समाई कला सुगंध

पत्रिका, 11 जनवरी, 2025

भारतीय कलाएं लोकोन्मुखी है। लोक में जो कुछ व्याप्त है, कलाओं ने उसे ही रूपायित किया है। सिंधु घाटी की सभ्यता, कालीबंगा की खुदाई में मिट्टी की गाड़ी, खिलौनों का अपूर्व संसार मृण—मूर्तियों की सुंदर दृष्टि से ही तो हमें जोड़ता है। इतिहास जहां पहुंच नही पाता, वहां लोककलाओं का संसार हमें पहुंचाता है। इसलिए लोक में ही हमने सदा आलोक की राह तलाशी है। 

कुछ दिन पहले ग्वालियर जाना हुआ तो वहां 'अयन्नार देव लोक' के बहाने मृण—शिल्प की हमारी विरल विरासत से साक्षात् हुआ। लगा, प्रचार—प्रसार और व्यावसायिकता की दृष्टि से परे लोक—कला की हमारी समृद्ध थाती से नई पीढ़ी को जोड़ने की यह महती पहल है। लोक कलाओं के संरक्षण की उम्मीद जगाने वाली भी। 

तमिलनाडु के लोक—पूजित ग्राम देवता है—अयन्नार। अयन्नार शब्द अय्या शब्द से उपजा है। माने वह जो श्रेष्ठ—सम्मानित हो। दक्षिण भारत के गांवों में अयन्नार के मंदिरों में उनकी और उनके पूरे कुटुंब, साथियों की घोड़ों या हाथियों पर सवार मूर्तियां प्राय: मिलती हैं। क्रोधी संरक्षक रूप में अय्यनार तांत्रिक प्रतीकात्मकता में भैरव के संग भी होते हैं। कहीं—कहीं उनके साथ उनकी दो पत्नियाँ—पुराणा और पुष्कला भी मूर्तियों में मिलती है। ग्राम देवता के मंदिर के बाहर प्राय: उनके और टेराकोटा के घोड़ों को रखा जाता है। मंदिरों में रखे जाने वाले यह घोड़े इतने सुंदर होते हैं कि अयन्नार बहुत से स्थानों पर पीछे छूट गए, यह घोड़े जग—भर में व्याप्त हो गए। पर आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर और बड़ौदा में थंगैय्या आर. और  साथी कलाकारों ने अयन्नार और उनके कुटुम्ब संग सप्त मातृकाओं का भी अलंकृत पर सुहाने शिल्प का संसार रचा है। 

अयन्नार और उससे सबद्ध दूसरे मूर्ति—शिल्प में मिट्टी की कारीगरी संग धैर्य की जरूरत होती है। मिट्टी का चयन, उसे पकाने की प्रक्रिया और फिर उससे आकृतियों का लोक रचने में रमना पड़ता है। कलाकारों को यदि इस—सब में सृजन की छूट मिले तो वह अद्भुत—अपूर्व रच सकते हैं। सुधि चिंतक और आईटीएम के संस्थापक कला—रसिक रमाशंकर सिंह ने इसे संभव किया है। मृदा—शिल्प कलाकारों के ग्राम देवता परिवार को मुश्ताक खान ने क्यूरेट किया है। ग्वालियर स्थित आईटीएम विश्वविद्यालय में ग्राम देवता रचने वाले कलाकारों द्वारा मिट्टी को गूंथकर, आकार देकर, और अंत में आग में पकाकर उसे पूर्णता देने बाद रंगालेप करते देख मृण शिल्प की भारतीय परम्परा से भी जैसे साक्षात हुआ। 

हमारे यहां लोक से जुड़ी ऐसी कलाओं की लूंठी परम्परा आरंभ से रही है। लोक देवता बाबा रामदेवजी राजस्थान ही नहीं देशभर में सर्व पूज्य हैं। कपड़े की कतरनों से उनके घोड़े बनते हैं। बाबा को अपना घोड़ा बहुत प्रिय था इसलिए इन्हें उन्हें अर्पित कर मन की मुराद पाने यह कला परवान चढ़ी। बांस, घास, और थर्माकोल की शीट से घोड़े बनते रहे हैं और फिर इन्हें सफेद और रंगीन कपड़े, माला, ऊन की झालर से सजाया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकार घोड़ों की कलाकृतियों का यह संसार सिरजते आ रहे हैं। ऐसे ही गुरु गोरखनाथ के शिष्य गोगाजी  की आराधना में पत्थर या लकड़ी पर सर्प—मूर्ति ,  तेजाजी के घोड़े पर बैठे हुए, हाथ में तलवार और साँप पकड़े हुए का भी सुंदर संसार रचा जाता रहा है। देवनारायणजी और दूसरे लोक देवताओं, पाबूजी की पड़ के मोहक मृदा—शिल्प के लिए राजस्थान का मोलेला गांव तो विश्वभर में ख्यात है। मिट्टी की मूर्तियां अध्यात्म से ही नहीं जुड़ी मानव मन में शुभता—सुंदरता की सर्वत्र चाह से भी जुड़ी रही है।

देश-विदेश की कलादीर्घाओं में जाना होता रहा है। अचरज होता है कि वहां लोक कलाओं का सहारा लेते ही आधुनिकता का अपनापा रचा गया है। यह भी हर बार अनुभूत किया है, लोककलाएं जीवन में समाई सुगंध की व्यंजना है। साहित्य प्रत्यक्ष दृश्य नहीं है परन्तु लोक कलाओं में हम इतिहास को बांच सकते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ने ठीक ही कहा है, जो शास्त्र लोक के साथ नही जुड़ा, वह बुद्धि का छलावा है।

 

Friday, January 3, 2025

भारतीय ज्ञान परम्परा पर व्याख्यान

 मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एम.एन.आई.टी.) के निमंत्रण पर पिछले दिनों शिक्षक—प्रशिक्षण के अंतर्गत नई शिक्षा नीति के आलोक में 'भारतीय ज्ञान परम्परा' पर बोलने जाना हुआ। 'भारतीय ज्ञान परम्परा' की कहां कोई थाह! यह वृहद विषय है। पढ़ा—गुना थोड़ा कुछ साझा किया...

व्याख्यान, 18 दिसम्बर 2024


Thursday, December 26, 2024

तबले में जीवन छंद रचने वाले 'वाह! उस्ताद'

 तबले की स्वतंत्र सत्ता से ठीक से किसी ने परिचित कराया तो वह उस्ताद ज़ाकिर हुसैन थे। वह बजाने के लिए ही नहीं बजाते थे, तबले में रच—बस अपने को उसमें विलीन करते थे। जब भी उन्हें सुना, ताल की नई दृष्टि पाईं। गायन और दूसरे वाद्यों की संगत से जुड़े तबले में छंद गुँथाव से एक नई ताल - भाषा किसी ने सिरजी है तो वह उस्ताद जाकिर हुसैन थे। उन्होंने तबले में वार्तालाप संभव किया। राग ताल की उनकी भाषा इसलिए लुभाती थी कि वहां काल प्रवाह से साक्षात होता था।...ध्वनियों में कितने—कितने छंद वह गूंथते रहे हैं...

'दैनिक जागरण' 23 दिसम्बर 2024


Wednesday, December 25, 2024

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आलोचना पुरस्कार

पुरस्कार के लिए कभी लिखना नहीं हुआ। पर, जब किसी कृति को इस बहाने स्वीकृति मिलती है तो सुखद लगता है। 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी को ही तो पढ़—गुन थोड़ी कुछ समझ बनी है... 









Saturday, December 21, 2024

ग्रंथ को ही गुरु मानने वाली संस्कृति

पत्रिका, 21 दिसम्बर 2024
संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुण है। समूह में व्याप्त विश्वास, आस्थाएं और कलाएं संस्कृति की ही व्यंजना है। गुरु—शिष्य परम्परा तो और भी स्थानों पर है पर ग्रंथ को गुरु मान पूजने की संस्कृति विश्व में कहीं है तो वह हमारे यहां ही है। इस संस्कृति के उन्नायक कोई  रहे हैं तो वह है गुरु गोबिन्द सिंह। उनके व्यक्तित्व पर जब भी मन जाता है, अनूठा आलोक पाता हूं। वह'सरबंसदानी' थे। अपने सहित पूरे परिवार का दान करने वाले। उनके चार साहिबजादों के बलिदान की स्मृति में ही पिछले वर्ष से हर वर्ष 26 दिसंबर को 'वीर बाल दिवस' मनाने की पहल देश में हुई है।

गोबिन्द सिंहजी गुरु नहीं भारतीय संस्कृति की सुगंध है। पिता का नाम त्यागमल था पर वह तेगबहादुर कहाए। माने तलवार के धनी। धर्म परिवर्तन नहीं करने पर औरंगज़ेब ने उनका सिर कटवा दिया। नौ वर्ष की कम उम्र में ही गोबिन्द सिंह गुरु गद्दी पर बैठे। यह वह दौर था जब मुगल शासक हिंदुओं को चिड़ियों का झुंड कहते थे। बाज के आने से जैसे चिड़िया भाग जाती है, उसी तरह मुगलों के अत्याचार से तितर-बितर होने वाला समूह। गोबिन्द सिंहजी ने तभी प्रतिज्ञा की 'सवा लाख से एक लड़ाऊँ तबे गोविंदसिंह नाम कहाऊँ।' माने वह इन चिड़ियों के झुण्ड में वह शक्ति उत्पन्न कर देंगे जिससे वह बाजों को मारकर खाने लग जाए। खालसा पंथ की स्थापना कर उन्होंने उपदेश दिया, किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। एक नए अभिवादन की उन्होंने शुरुआत की, 'वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तह'। 

औरंगजेब ने उनकी वीरता के सामने घुटने टेकते एक दफा अपने साथ मिलने का पत्र लिखा, एक वाहे गुरु को जैसे वह मानते हैं, ऐसे ही उनका अल्लाह है। फिर किस बात की दुश्मनी!  गुरु गोबिंद सिंह ने इन्कार करते जवाब दिया, नियत का फर्क बहुत बड़ा है। औरंगजेब के ही अनुयायी वज़ीर ख़ाँ ने धर्म परिवर्तन नहीं करने पर गुरु गोबिंद सिंह बेटों को  ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया। अंतिम पड़ाव मे गुरु गोबिंद सिंह नांदेड़ में जब प्रार्थना बाद आराम कर रहे थे, दो युवा पठानों अताउल्ला ख़ाँ और जमशेद ख़ाँ ने उनके पेट पर छुरे से वार कर बुरी तरह से घायल कर दिया। कुछ समय बाद वह अंतिम गति को प्राप्त हो गए।

इस समय जब नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परम्परा को लेकर बहुत उत्साह है, मुझे लगता है गुरु गोबिंद सिंह की सौंपी संस्कृति पर भी हमें नए ढंग से विचार करना चाहिए। उन्होंने अंतिम समय में उजास दिया, अब से कोई गुरु नहीं होगा। ग्रंथ ही गुरु होगा। मुझे लगता है, विश्व की कोई ऐसी संस्कृति नहीं होगी जहां ग्रंथ को ही गुरु रूप में मान्यता मिली हो।

ज्ञान—गुरु ही तो है—'गुरु ग्रंथ साहिब' । क्या नहीं है इसमें? सभी धर्मों का सार। सिखों के हरेक गुरु ने अपने अनुभवों का संचित ज्ञान इसमें संजोया है। दशवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने से पहले गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसे पूर्ण किया। कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी इसमें है तो पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी हैं। सहज, सरल भाषा और कहन का सांगीतिक अंदाज इसमें है। यह संगीत के सुरों व रागों के प्रयोग में गूंथा है। गुरु ग्रंथ कहें या 'गुरुबानी' , यह—वह अनूठा उदाहरण है जिसमें सदा शरीरी गुरूस्वरूप ग्रंथ को ऊँची गद्दी पर 'पधराया' जाता है। उसपर चंवर ढलते हैं। पुष्पादि चढ़ते और बाकायदा आरती उतारी जाती है। विश्व—संस्कृति में ग्रंथ को गुरु मान उसके आदर्श के आचरण की ऐसी दृष्टि और कहीं नहीं मिलेगी।


Thursday, December 12, 2024

अहमदाबाद 'अन्तरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव-2024’

अहमदाबाद में आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित पुस्तक महोत्सव के समापन सत्र में पुस्तकें और यात्रा संस्कृति विषय पर बोलने का संयोग हुआ। इस उत्सव में 8 दिसम्बर, रविवार—समापन समारोह के सत्र में—अपनी लिखी यात्रा—संस्मरण पुस्तकों 'कश्मीर से कन्याकुमारी', 'नर्मदे हर' और 'आंख भर उमंग' से जुड़ी अनुभूतियां साझा की। गुजरात में पढ़ने की संस्कृति है। पुस्तकों से लोगों को लगाव है। 'पुस्तक महोत्सव' में सुनने वालों का हुजूम उत्साहित करने वाला था...





‘बहुवचन’ में राजस्थानी भाषा का स्वरूप और शब्द सम्पदा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘बहुवचन’ में...राजस्थानी भाषा का स्वरूप और शब्द सम्पदा पर यह दीठ

"राजस्थानी भाषा नहीं संस्कृति है। यह ऐसी आधुनिक भाषा है, जिसमें साहित्य की सभी विधाओं में नौंवी शताब्दी से ही लिखा हुआ बहुत सारा उपलब्ध होता आ रहा है। इतिहास और संस्कृति के विरल आख्यान लिए है यह भाषा। कविन्द्र रवीन्द्र ने कभी कहा था, रवीन्द्र गीतांजलि लिख सकता है परन्तु डिंगल जैसे दोहे नहीं!

विडम्बना है, ऐसी समृद्ध, अनुपम भाषा अभी भी मान्यता की बाट जो रही है...






Tuesday, December 10, 2024

नदी से जुड़ी संस्कृति और शिव

राजस्थान पत्रिका, 7 दिसम्बर 2024

संस्कृति जीवन छंद है। 'छद्' धातु से बना है छंद। अर्थ है, आह्लादित करना। इधर घुमक्कड़ी में निरंतर यह अनुभूत किया कि कल कल बहती भारत की नदियां इस छंद की सुगंध है। यह भी पाया है, संगीत, नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाएं भी नदी में ध्वनित होती हममें बसती हैं। संस्कृति के इस रम्य रूप की सौगात इधर केदारनाथ यात्रा में मिली। कपाट बंद होने से कुछ दिन पहले वहां जाने जाने का सुयोग हुआ। गौरीकुंड से केदारनाथ की पैदल खड़ी चढ़ाई हैं। पर चढ़ाई में झरनों का संगीत थकान उतारता जाता है। रास्ते भर मंदाकिनी नदी को देखना भी सुखद अचरज है। मन्दाकिनी माने वह जो शिथिलता से बहे। पर पहाड़ों की गहरी घाटियों के मध्य उसकी किलकारियां गूंजती हुई लुभाती है। उसका बहता हुआ नीला रंग और चट्टानों में दौड़ता धवल झाग!

मंदाकिनी ही नहीं सभी नदियां कभी नहीं थकने का मंत्र गाती है। नदी और नृत्य में विरल समानता होती है। दोनों गति में जीवंत होते हैं। नदी का अर्थ ही है, जीवन प्रवाह। अविरल बह वह समुद्र में मिल जाती है। पर रास्ते के गड्ढों को भरती जाती वह अभाव में भी जैसे भाव भरती जाती है।

कहीं पढ़ा हुआ याद आया। सभी नदियां सागर पत्नी हैं। समुद्र का एक नाम सरित्पति है। समुद्र नदियों के कारण ही पवित्र है। इसीलिए तो कहा है, 'सागरे सर्व तीर्थानि'। पहाड़ों में बहती नदी की ध्वनि को सुन किसी ने कहा समुद्र की ओर जाती नदी अपने ससुराल जाते हुए रो रही है। पर, इस रोने में मिलन की सुखानुभूति है। पूर्णता पाने की चाह समाई है। नदी का ब्याह सगोत्र में नहीं होता। दूर वास करने वाले समुद्र से होता है। इसलिए वह भारतीय संस्कृति की सूक्ष्म व्यंजना है। हमारे यहां एक ही गौत्र में विवाह नहीं करने की दृष्टि क्या नदी संस्कृति की सीख ही नही है? पुराने जमाने में राजपुत्र दूर दूर के राजाओं की कन्याओं से ब्याह करते थे। नदियों से सीखी यह संस्कृति ही हमारे जीवन का वैज्ञानिक आधार है।

मंदाकिनी शिव—तीर्थ केदारनाथ की सुगंध है। पुराण कहते हैं, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने मंदाकिनी घाटी के सामने शिव धाम का निर्माण किया। शिव का कोई रूप—रंग कहां है! रम्य प्रकृति ही शिव का वास्तविक सौंदर्य है। अकेले शिव हैं जो हिमालय पर्वत पर विराजते हैं। शिव का एक नाम व्योम है। माने आकाश। समाधिस्थ चित्त की वह अवस्था जिसमें केवल आंतरिक चेतना का खाली आकाश होता है। जिस भाव रूप में रंगे उसी में शिव शृंगारित हो दर्शन देते हैं। शिव माने प्रकृति का सामीप्य। शिव संस्कृति की प्रकृति है। 

गौरीकुंड से सुबह पग पग चला तो सांझ केदार पहुंचा। दूर ऊपर एक पहाड़ी के टुकड़े पर धवल बर्फ और अस्ताचल होते सूर्य की किरणों से स्वर्णिम होती उसकी आभा पर नजर ठहरी। जैसे प्रकृति ने शिव मंदिर को हीरे, जवाहरात से जड़ मुकुट पहना दिया है। थका थका यह देख रहा था कि औचक हल्की फुहार हुई। कालिदास के मेघदूत की याद आई जहां वह मेघ से संबोधित है, 'तट पर पुष्प वन उगा है, जिसमें परिश्रम क्लांत मालिने फूल चुनती है। उनके मुख और ललाट पर पसीना आता रहता है। थकान से उनके मुख मुरझा जाते हैं। ओ मेघ, तुम उनके चेहरे पर हल्की फुहार देना। उनके मुख कमल अचानक खिल जाएंगे।' केदार पहुंच मुझे लगा शिव ने मेघ से कह हल्की फुहार करवाई है। सोलह किलोमीटर की दुर्गम पर्वत पथ यात्रा की सारी थकान पल में मिट गई। शिव सौंदर्य से नहा उठा कृतज्ञ मन!